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लेखक: Lakshmi Kumari

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Lakshmi Kumari

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मार्च 2026
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  • Dil sabhal ja jara part – 16

    Dil sabhal ja jara part – 16

    पढ़ने का समय : 4 मिनट

    Part – 16 dil ki गहराइयां 

     

    ठाकुर हाउस में अब एक नई चुप्पी छा गई थी – वो चुप्पी जो दो दिलों के बीच के अनकहे पलों से भरी होती है। प्रिया और आरव अब एक-दूसरे से नजरें नहीं चुराते थे। नजरें मिलतीं तो लंबी हो जातीं, और फिर मुस्कुराहट में बदल जातीं। वो मुस्कुराहट जो सालों की कमी को भर रही थी। घरवाले कुछ-कुछ समझ रहे थे, लेकिन कोई कुछ नहीं बोलता। रिया सबसे ज्यादा खुश थी – वो चुपके से दोनों को चिढ़ाती, लेकिन अब मजाक में नहीं, बल्कि सपोर्ट में।

     

    एक शाम बर्फबारी फिर शुरू हो गई। घर में लाइट्स डिम थीं, फायरप्लेस जल रहा था। राजेश पापा और आदित्य अंकल बाहर गए थे – किसी पुराने दोस्त की पार्टी में। रिया अपने कमरे में थी, हेडफोन लगाकर म्यूजिक सुन रही। घर में सिर्फ प्रिया और आरव।

     

    प्रिया लाइब्रेरी में किताब पढ़ रही थी। आरव अंदर आया। हाथ में दो मग – हॉट चॉकलेट। “प्रिया… ठंड है। ले।”

     

    प्रिया ने मुस्कुराकर लिया। “थैंक्स भैया।”

     

    आरव उसके बगल में सोफे पर बैठ गया। करीब। उनकी कंधें छू रहे थे। फायरप्लेस की लौ दोनों के चेहरों पर नाच रही थी। आरव ने प्रिया के बालों में उलझी बर्फ की बूंद हटाई। “प्रिया… आज तू बहुत खूबसूरत लग रही है।”

     

    प्रिया शर्मा गई। “भैया… तुम भी।”

     

    आरव ने उसका हाथ लिया। धीरे से उंगलियां आपस में घुमाईं। “प्रिया… मुझे अब डर नहीं लगता। तू मेरे साथ है ना?”

     

    प्रिया ने उसकी आंखों में देखा। “हां भैया। हमेशा।”

     

    आरव ने उसे करीब खींचा। प्रिया का सिर उसके सीने पर टिका। उसकी धड़कन सुनाई दे रही थी – तेज़, लेकिन सुकून भरी। आरव ने उसके बालों को सहलाया। “प्रिया… सालों से मैं तुझे खोजता रहा। अब तू मिली है… पूरी तरह।”

     

    प्रिया ने ऊपर देखा। आरव का चेहरा करीब था। उसने धीरे से प्रिया के होंठों को छुआ – पहला किस। नरम, गर्म, लंबा। प्रिया की आंखें बंद हो गईं। वो जवाब में करीब आई। दोनों के होंठ मिले – धीरे, लेकिन गहराई से। वो किस सालों के इंतजार का था, कमी का, और अब मिलन का। आरव के हाथ प्रिया की कमर पर थे, प्रिया के हाथ उसके गले में। फायरप्लेस की लौ चटक रही थी, बाहर बर्फ गिर रही थी।

     

    किस टूटा। दोनों सांसें तेज़। आरव ने प्रिया के माथे पर होंठ रखे। “प्रिया… मैं तुझे कभी दुख नहीं दूंगा।”

     

    प्रिया ने उसे फिर किस किया – इस बार खुद से। “भैया… तू मेरा पहला और आखिरी प्यार है।”

     

    दोनों सोफे पर लेट गए। आरव की बाहों में प्रिया। वो बातें करने लगे – बचपन की, मां की, भविष्य की। आरव ने कहा, “प्रिया… एक दिन सबको बताएंगे। धीरे-धीरे। लेकिन तू मेरी है।”

     

    प्रिया ने कहा, “हां। तेरी हूं।”

     

    रात गहरा गई। दोनों फायरप्लेस के सामने लेटे रहे। हाथ थामे, होंठ मिले, आंखें बंद। रोमांस अब गहरा हो चुका था – वो गहराई जो सिर्फ स्पर्श में नहीं, दिलों के मिलन में थी। आरव का कॉन्फ्लिक्ट अब प्यार में बदल चुका था। प्रिया का डर अब सुकून में।

     

    सुबह हुई। रिया नीचे आई। दोनों को सोफे पर देखा – प्रिया आरव की बाहों में सो रही थी। रिया मुस्कुराई। चुपके से कंबल ओढ़ाया और ऊपर चली गई।

     

    लेकिन बाहर तूफान आ रहा था। राजेश पापा को अनाम लेटर मिल चुका था। वो आदित्य अंकल से बात कर रहे थे। “आदित्य जी… आरव और प्रिया… कुछ गलत तो नहीं?”

     

    आदित्य ने कहा, “राजेश, बच्चे बड़े हो गए हैं। लेकिन प्रिया मेरी बेटी है। अगर कुछ है तो बात करनी होगी।”

     

    पापा ने आरव को बुलाया। “आरव… प्रिया से तेरा रिश्ता… क्या है?”

     

    आरव चौंका। “पापा… वो मेरी…”

     

    पापा ने लेटर दिखाया। आरव का चेहरा सफेद पड़ गया। “पापा… मैं प्रिया से प्यार करता हूं। बहन से ज्यादा।”

     

    पापा स्तब्ध। “आरव… ये… ये गलत है। तुमने उसे बहन माना सालों।”

     

    आरव ने कहा, “पापा… खून का रिश्ता नहीं है। और प्यार… दिल से है।”

     

    प्रिया आई। सब सुन लिया। वो रो पड़ी। “पापा… मैं भी आरव से प्यार करती हूं।”

     

    आदित्य अंकल ने कहा, “बच्चो… ये आसान नहीं। समाज, फैमिली… सब देखेगा।”

     

    लेकिन राजेश पापा ने गहरी सांस ली। “अगर तुम दोनों खुश हो… तो मैं साथ हूं। रानी भी यही चाहती।”

     

    सब रो पड़े। फैमिली ने अपनाया। रिया ने ताली बजाई। “फाइनली!”

     

    लेकिन अवनी और विक्रम का प्लान फेल हो गया। विक्रम जेल में और गुस्सा। “अवनी, अब आखिरी हथियार। मीडिया को बता दो। ठाकुर फैमिली का स्कैंडल।”

     

    अगले दिन न्यूज चैनल्स पर ब्रेकिंग – “ठाकुर फैमिली में अनैतिक रिश्ता? भाई-बहन का प्यार?”

     

    प्रिया और आरव बाहर निकले। कैमरे, माइक। आरव ने प्रिया का हाथ थामा। “हम साथ हैं। प्यार में कुछ गलत नहीं।”

     

    प्रिया ने कहा, “हमारा प्यार सच्चा है।”

     

    मीडिया का तूफान आया। लेकिन दोनों मजबूत थे। रोमांस अब गहरा था – चुनौतियों के बीच और मजबूत।

     

    आरव ने प्रिया को गले लगाया। “प्रिया… दुनिया कुछ भी कहे, तू मेरी है।”

     

    प्रिया ने कहा, “और तू मेरा। हमेशा।”

     

  • Dil sabhal ja jara part – 15

    Dil sabhal ja jara part – 15

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    Part – 15 pahla sparsh

    शिमला में अब बर्फबारी रुक-रुक कर हो रही थी। ठाकुर हाउस की छत पर बर्फ की मोटी परत जम चुकी थी, और बाहर का तापमान माइनस में था। घर के अंदर हीटर की गर्माहट थी, लेकिन प्रिया और आरव के दिलों में एक अलग ही आग सुलग रही थी – धीमी, लेकिन लगातार। वो अनकहा वादा, वो बर्फीली रात का गले लगना, अब दोनों के बीच एक अदृश्य धागा बन चुका था। दोनों एक-दूसरे से बात करते, हंसते, लेकिन हर बात में एक नई गहराई थी। नजरें मिलतीं तो लंबी हो जातीं, और फिर शर्मा कर हट जातीं।

     

    प्रिया रातों में सोचती – “भैया का प्यार… वो कितना गहरा है। सालों का इंतजार, कमी, और अब ये एहसास। लेकिन अगर मैंने भी दिल खोल दिया तो क्या होगा? फैमिली? रिया? विक्रांत?” वो खुद से लड़ रही थी। आरव को खोने का डर था, लेकिन रिश्ता बदलने का डर भी।

     

    आरव का कॉन्फ्लिक्ट अब थोड़ा शांत हो रहा था। प्रिया के साथ बिताए पल उसे सुकून दे रहे थे। वो जानता था कि जल्दबाजी नहीं करनी। लेकिन हर छोटी चीज उसे प्रिया की ओर खींचती – उसकी मुस्कान, उसकी आवाज, उसकी मौजूदगी। वो खुद से कहता, “धीरे चल आरव। प्रिया को वक्त दे। वो तेरी है – दिल से।”

     

    एक दिन कॉलेज बंद था – बर्फबारी की वजह से। घर में सब थे। रिया ने प्लान बनाया। “चलो, आज स्नोमैन बनाते हैं! बचपन जैसा।”

     

    राजेश पापा और आदित्य अंकल हंस पड़े। “हम बूढ़े हो गए बेटा। तुम जाओ।”

     

    प्रिया, रिया और आरव लॉन में निकले। बर्फ गीली थी – परफेक्ट स्नोमैन के लिए। रिया ने बेस बनाना शुरू किया। “प्रिया, तू आंखें बना। भैया, नाक!”

     

    आरव और प्रिया साथ-साथ काम कर रहे थे। आरव ने बड़ा गोला घुमाया। प्रिया ने मदद की। उनके हाथ बार-बार छू रहे थे। हर स्पर्श में करंट दौड़ता। आरव ने प्रिया की तरफ देखा। प्रिया शर्मा गई।

     

    रिया ने चिढ़ाया। “ओहो, दोनों कितने रोमांटिक हो रहे हैं स्नोमैन बनाते हुए!”

     

    आरव ने बर्फ का गोला रिया पर फेंका। “चुप रिया!”

     

    तीनों हंसने लगे। बर्फ की लड़ाई शुरू हो गई। प्रिया भागी, आरव पीछे। आरव ने उसे पकड़ लिया – पीठ से गले लगाकर। “पकड़ी गई!”

     

    प्रिया हंस रही थी, लेकिन आरव के स्पर्श में सांस रुक गई। वो पीछे मुड़ी। दोनों की नजरें मिलीं। बर्फ उनके बालों पर गिर रही थी। आरव का हाथ प्रिया की कमर पर था। वो छोड़ना नहीं चाहता था। प्रिया ने भी हाथ उसकी जैकेट पर रखा।

     

    रिया दूर खड़ी मुस्कुरा रही थी। “मैं अंदर जा रही हूं। ठंड लग रही है।” वो चली गई – जानबूझकर।

     

    अब सिर्फ आरव और प्रिया। बर्फ में खड़े। आरव ने धीरे से प्रिया के गाल से बर्फ हटाई। “प्रिया… ठंड लग रही है?”

     

    प्रिया ने सिर हिलाया। “नहीं भैया।”

     

    आरव ने उसका चेहरा हाथों में लिया। “प्रिया… मैं अब और नहीं लड़ सकता। तू मेरे दिल में है। हर पल।”

     

    प्रिया की आंखें नम हो गईं। “भैया… मैं भी… तुम्हारे बिना अधूरी हूं। लेकिन डर लगता है।”

     

    आरव ने कहा, “डर मत। हम साथ हैं। धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा।”

     

    उसने प्रिया को और करीब खींचा। पहली बार – होठों पर नहीं, माथे पर किस। एक लंबा, गर्म स्पर्श। प्रिया की आंखें बंद हो गईं। वो पहला स्पर्श – प्यार का, लेकिन सम्मान का। आरव ने पीछे हटकर कहा, “सॉरी अगर…”

     

    प्रिया ने उसे रोका। “नहीं भैया। अच्छा लगा।”

     

    दोनों मुस्कुराए। हाथ थामे घर की ओर चले। रिया दरवाजे पर खड़ी थी। “वाह! आखिरकार!”

     

    प्रिया शर्मा गई। “रिया!”

     

    आरव ने हंसकर कहा, “रिया, तू कुछ नहीं देखी।”

     

    लेकिन रिया की आंखें चमक रही थीं। वो समझ गई थी।

     

    शाम को विक्रांत का फोन आया। “प्रिया, कल मिलें? कुछ इम्पॉर्टेंट बात है।”

     

    प्रिया ने कहा, “विक्रांत… कल देखते हैं।”

     

    वो फोन काटकर आरव के पास गई। दोनों लाइब्रेरी में बैठे। आरव किताब पढ़ रहा था। प्रिया उसके बगल में। “भैया… विक्रांत मिलना चाहता है।”

     

    आरव का चेहरा सख्त हो गया। लेकिन उसने खुद को कंट्रोल किया। “जा प्रिया। अगर तुझे अच्छा लगे तो। मैं तेरी खुशी चाहता हूं।”

     

    प्रिया ने उसका हाथ पकड़ा। “भैया… मेरी खुशी तुम हो।”

     

    आरव मुस्कुराया। “प्रिया… तूने मुझे जीत लिया।”

     

    दोनों करीब आए। आरव ने प्रिया के हाथ चूमे। पहला रोमांटिक स्पर्श – धीमा, इमोशनल।

     

    अगले दिन प्रिया विक्रांत से मिली। विक्रांत ने कहा, “प्रिया… मुझे तुझसे प्यार हो गया है। दोस्ती से ज्यादा।”

     

    प्रिया चुप रही। “विक्रांत… तू बहुत अच्छा है। लेकिन मेरा दिल… कहीं और है।”

     

    विक्रांत की आंखें नम हो गईं। “आरव?”

     

    प्रिया ने सिर हिलाया। “हां। हमारा रिश्ता… कॉम्प्लिकेटेड है। लेकिन सच्चा।”

     

    विक्रांत ने मुस्कुराकर कहा, “प्रिया, मैं खुश हूं कि तू खुश है। दोस्त हमेशा रहूंगा।”

     

    प्रिया ने उसे गले लगाया – दोस्त की तरह। “थैंक्स विक्रांत। तू बेस्ट है।”

     

    विक्रांत चला गया। प्रिया का मन हल्का हो गया।

     

    घर लौटकर प्रिया ने आरव को बताया। आरव ने उसे गले लगाया। “प्रिया… तूने मुझे चुना?”

     

    प्रिया ने कहा, “हमेशा भैया। तू मेरा पहला और आखिरी प्यार है।”

     

    आरव ने उसे माथे पर फिर किस किया। “धीरे-धीरे प्रिया। सब ठीक हो जाएगा।”

     

    लेकिन अवनी ने ये सब देख लिया। वो विक्रम को फोन की। “विक्रम, प्रिया और आरव साथ हैं। अब प्लान बी। फैमिली को बता दो। राजेश अंकल को कहो कि आरव और प्रिया का रिश्ता गलत है।”

     

    विक्रम हंसा। “अच्छा। अब ठाकुर हाउस में तूफान आएगा।”

     

    रात को राजेश पापा को एक अनाम लेटर मिला – “आपके बेटे और बेटी का रिश्ता नॉर्मल नहीं। सावधान।”

     

    पापा चौंके। लेकिन कुछ बोले नहीं।

     

    प्रिया और आरव बालकनी में थे। हाथ थामे। बर्फ गिर रही थी। आरव ने कहा, “प्रिया… चाहे दुनिया कुछ कहे, मैं तेरा हूं।”

     

    प्रिया ने सिर उसके कंधे पर रखा। “और मैं तेरी।”

     

    पहला स्पर्श, पहला वादा। प्यार अब खुल रहा था – धीरे, लेकिन मजबूती

    से। लेकिन बाहर तूफान आने वाला था। फैमिली का, समाज का।

     

    क्या वो साथ रह पाएंगे? या सब छिन जाएगा?

     

  • Dil sabhal ja jara part – 14

    Dil sabhal ja jara part – 14

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    Part – 14: “अनकहे वादे”

    शिमला की बर्फ अब पूरी तरह जम चुकी थी। सड़कें सफेद चादर ओढ़े थीं, और ठाकुर हाउस का लॉन एक बर्फीला मैदान बन गया था। प्रिया और आरव के बीच वो रात की बात – वो अनकहा कन्फेशन – अब हवा में तैर रही थी। दोनों एक-दूसरे से बचते थे, लेकिन बचना मुश्किल हो रहा था। प्रिया कॉलेज जाती, आरव काम पर – लेकिन हर शाम घर लौटने पर नजरें मिल ही जातीं। वो नजरें जो पहले भाई-बहन वाली थीं, अब कुछ और कहने लगी थीं। प्रिया का मन उलझा था। आरव का एहसास जानकर उसे डर लगता था, लेकिन साथ ही एक अजीब सा सुकून भी मिलता। “भैया… तुम्हारा प्यार… क्या वो सच्चा है? या सिर्फ सालों की कमी का दर्द?”

    आरव के लिए हर दिन एक जंग था। सुबह उठते ही वो खुद से वादा करता – “आज प्रिया से दूर रहूंगा। उसे कन्फ्यूज नहीं करूंगा।” लेकिन शाम होते-होते मन हार मान लेता। प्रिया की हंसी सुनकर, उसकी छोटी-छोटी आदतें देखकर – जैसे वो चाय बनाते वक्त बालों को पीछे करना – आरव का दिल पिघल जाता। वो जानता था कि ये एहसास गलत नहीं, लेकिन समाज, फैमिली, और प्रिया के मन का बोझ इसे मुश्किल बना रहा था। रात को वो अपनी डायरी में लिखता – “प्रिया, तू मेरी बहन थी, लेकिन अब… अब तू मेरी दुनिया है। मैं कैसे कहूं कि मैं बिना तेरे के अधूरा हूं? लेकिन अगर तू खुश नहीं हुई तो ये प्यार शाप बनेगा।”

    एक सुबह ब्रेकफास्ट टेबल पर रिया ने फिर कॉमेडी शुरू की। “प्रिया, आज विक्रांत का मैसेज आया? वो तो रोज पूछता है – ‘प्रिया कहां है?’ लगता है प्रपोजल प्लान कर रहा है!”

    प्रिया ने चाय का कप रखा। “रिया, चुप कर। अभी कुछ नहीं।”

    राजेश पापा ने अखबार से नजरें हटाईं। “प्रिया बेटी, विक्रांत अच्छा लड़का लगता है। लेकिन जल्दबाजी मत करना। जिंदगी लंबी है।”

    आदित्य अंकल ने मुस्कुराकर कहा, “हां बेटी। दिल की सुन, लेकिन दिमाग से सोच।”

    आरव चुपचाप बैठा था। रिया की बात सुनकर उसका चेहरा सख्त हो गया। वो उठा और बोला, “मैं ऑफिस जा रहा हूं।”

    प्रिया ने पुकारा, “भैया, ड्रॉप कर दूं कॉलेज?”

    आरव ने पीठ फेरते हुए कहा, “नहीं प्रिया। तू रिया के साथ जा।”

    प्रिया का दिल बैठ गया। आरव की दूरी अब दर्द दे रही थी।

    कॉलेज में विक्रांत इंतजार कर रहा था। “प्रिया, कल का प्रोजेक्ट कंपलीट हो गया? चल, लाइब्रेरी में देखते हैं।”

    प्रिया ने हां कहा। दोनों लाइब्रेरी के कोने में बैठे। विक्रांत ने किताबें खोलीं। “प्रिया, तू आजकल चुप क्यों लग रही है? कुछ हुआ?”

    प्रिया ने मुस्कुराने की कोशिश की। “बस, फैमिली मैटर्स। एग्जाम भी हैं।”

    विक्रांत ने उसका हाथ धीरे से छुआ। “प्रिया, तू मेरी सबसे अच्छी दोस्त है। अगर कुछ शेयर करना हो तो बता।”

    प्रिया ने हाथ हटा लिया। विक्रांत अच्छा था – सच्चा, सपोर्टिव। लेकिन उसके स्पर्श में वो स्पार्क नहीं था जो आरव की नजरों में था। “विक्रांत, थैंक्स। लेकिन अभी… अभी सब कुछ सेटल नहीं हुआ।”

    विक्रांत ने सिर हिलाया। “कोई बात नहीं। मैं इंतजार करूंगा। दोस्ती से ज्यादा कुछ मत समझना।”

    दोपहर को अवनी ने फिर अपना जाल बिछाया। वो प्रिया के पास आई। “प्रिया, विक्रांत से सावधान रह। उसकी दादी ने ही तेरी मां को फंसाया था। विक्रम ने प्रूफ भेजा है – पुराना कोर्ट केस।”

    प्रिया ने फाइल ली। अंदर पुराने पेपर्स थे – 1990 का एक केस, जहां राठौर फैमिली ने ठाकुर होटल्स पर जमीन हड़पने का आरोप लगाया था। लेकिन प्रिया को शक हुआ। “अवनी, ये पुरानी बातें क्यों उछाल रही हो?”

    अवनी ने मुस्कुराया। “बस, सच्चाई जानना चाहती हूं। आरव को भी दिखा दे। वो तो विक्रांत से जलता ही है।”

    प्रिया घर लौटी। आरव को फाइल दिखाई। आरव ने पढ़ी। उसका गुस्सा फिर भड़क गया। “प्रिया, मैंने कहा था विक्रांत से दूर रह। ये फैमिली दुश्मन है।”

    प्रिया ने कहा, “भैया, ये झूठा प्रूफ लगता है। विक्रांत ने कुछ नहीं किया।”

    आरव चीखा, “तू उसे बचाती क्यों है? क्या वो तुझे पसंद है?”

    प्रिया रो पड़ी। “भैया… तुम्हारा गुस्सा… सिर्फ दुश्मनी का नहीं लगता।”

    आरव चुप हो गया। वो कमरे से बाहर निकल गया। लॉन में खड़ा हो गया। बर्फ में कदम रखे। ठंड काट रही थी, लेकिन अंदर का दर्द ज्यादा था। “प्रिया… मैं तुझे खो दूंगा। विक्रांत को। या खुद को। ये जंग… कब खत्म होगी?”

    रात को प्रिया आरव के कमरे में गई। दरवाजा खुला था। आरव डायरी लिख रहा था। प्रिया ने देखा – “प्रिया, तू मेरी कमजोरी है। मैं तुझे प्यार करता हूं, लेकिन ये प्यार मुझे मार रहा है। बहन का रिश्ता टूटने का डर, प्यार का बोझ – सब मिलकर मुझे तोड़ रहे हैं। मैं तुझे खुश देखना चाहता हूं, लेकिन खुद को क्यों नहीं बचा पा रहा?”

    प्रिया की आंखें भर आईं। “भैया… ये पढ़ लिया।”

    आरव चौंका। डायरी बंद की। “प्रिया… सॉरी। तू मत पढ़ती।”

    प्रिया उसके पास बैठी। “भैया, तुम्हारी जंग… अकेले क्यों लड़ रहे हो? मैं भी लड़ रही हूं। तुम्हारे एहसास जानकर… मुझे भी डर लगता है। लेकिन तुम्हारे बिना… अधूरा लगता है।”

    आरव ने उसकी आंखों में देखा। “प्रिया… तू क्या फील करती है?”

    प्रिया ने सिर झुका लिया। “भैया… तुम मेरे लिए सब कुछ हो। पहले भाई, अब… अब कुछ और। लेकिन समाज क्या कहेगा? फैमिली? और विक्रांत?”

    आरव ने उसके हाथ पकड़े। “विक्रांत… वो अच्छा है। लेकिन मेरा दिल तुझे किसी और को नहीं सौंप पा रहा। मैं जानता हूं ये सेल्फिश है। लेकिन प्रिया, मैं तुझे सालों खो चुका। अब फिर से खोने का हौसला नहीं।”

    प्रिया रो पड़ी। “भैया… हम क्या करें?”

    आरव ने उसे गले लगा लिया। “वक्त देंगे प्रिया। धीरे-धीरे। लेकिन मैं वादा करता हूं – तेरी खुशी के लिए सब कुछ करूंगा। चाहे खुद को दर्द देकर।”

    दोनों गले लगे रहे। कमरे में सन्नाटा था। बाहर बर्फ की आवाज। आरव का कॉन्फ्लिक्ट अभी खत्म नहीं हुआ था – वो प्यार को एक्सेप्ट कर रहा था, लेकिन गिल्ट अभी भी चुभ रहा था। “क्या मैं प्रिया को दुख दूंगा? या ये प्यार हमें जोड़ेगा?”

    अगले दिन रिया ने नोटिस किया। “प्रिया, तुम और भैया के बीच कुछ तो हो रहा है। बताओ ना!”

    प्रिया ने मुस्कुराकर कहा, “रिया, अभी कुछ नहीं। लेकिन… सब ठीक होगा।”

    विक्रांत का मैसेज आया – “प्रिया, मिलें? कुछ इम्पॉर्टेंट।”

    प्रिया ने हां कहा। वो मिले। विक्रांत ने कहा, “प्रिया, अवनी के प्रूफ झूठे हैं। मैंने चेक किया। लेकिन… मुझे लगता है तू परेशान है। आरव से?”

    प्रिया ने सिर हिलाया। “हां। फैमिली मैटर्स।”

    विक्रांत ने कहा, “प्रिया, अगर तुझे किसी की जरूरत हो तो मैं हूं। दोस्त की तरह।”

    प्रिया मुस्कुराई। “थैंक्स विक्रांत। तू सच्चा दोस्त है।”

    लेकिन मन में आरव था। शाम को घर लौटकर प्रिया ने आरव को देखा। वो लॉन में बर्फ के गोले बना रहा था – बचपन जैसा। प्रिया हंस पड़ी। “भैया, क्या कर रहे हो?”

    आरव ने गोला फेंका। “पकड़ प्रिया! याद है बचपन में?”

    प्रिया ने पकड़ा। दोनों हंसने लगे। बर्फ की होली खेली। ठंड थी, लेकिन दिल गर्म हो गया। आरव ने प्रिया के बालों से बर्फ हटाई। “प्रिया… तू हमेशा मेरी रहेगी। चाहे जो हो।”

    प्रिया ने कहा, “हां भैया। हमेशा।”

    अवनी घर के बाहर खड़ी थी। फोन पर विक्रम से बात कर रही थी। “विक्रम, आरव और प्रिया करीब आ रहे हैं। लेकिन विक्रांत को इस्तेमाल कर। उसे बता कि प्रिया आरव को पसंद करती है।”

    विक्रम ने हंसकर कहा, “अच्छा प्लान। अब असली ड्रामा शुरू।”

    रात को आरव अकेला लॉन में था। बर्फ में लेटा। प्रिया आई। “भैया, ठंड लग जाएगी।”

    आरव ने हाथ बढ़ाया। “प्रिया… आ, साथ लेट। सितारे देख।”

    दोनों लेटे। बर्फ ठंडी थी, लेकिन हाथ थामे थे। आरव ने कहा, “प्रिया, मैं वादा करता हूं। तेरे एहसास का सम्मान करूंगा। धीरे-धीरे।”

    प्रिया ने सिर उसके कंधे पर रखा। “हां भैया। धीरे-धीरे।”

    बर्फ गिर रही थी। अनकहे वादे बन रहे थे। आरव का कॉन्फ्लिक्ट अभी था – लेकिन प्रिया के साथ, वो हल्का लग रहा था। प्यार की शुरुआत हो चुकी थी – स्लो, इमोशनल, और अनकही।

    विक्रांत घर पर अकेला था। प्रिया का मैसेज पढ़ा – “थैंक्स दोस्त।” वो मुस्कुराया, लेकिन आंखें उदास। “प्रिया… क्या मैं सिर्फ दोस्त रह जाऊंगा?”

     

  • Dil sabhal ja jara part – 13

    Dil sabhal ja jara part – 13

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    Part – 13 dil ka jang 

     

     

     

     

    शिमला की बर्फीली रातें अब और लंबी लगने लगी थीं। ठाकुर हाउस में हर कमरे में हीटर चल रहा था, लेकिन आरव के दिल में एक अलग ही ठंडक फैल गई थी। वो रातों में सो नहीं पाता था। बालकनी में खड़ा होकर बर्फ गिरते देखता, और मन में तूफान मचता। प्रिया… उसका नाम ही अब उसके लिए एक पहेली बन गया था। वो प्रिया जिसे उसने सालों खोया मानकर जिया, जिसे वापस पाकर लगा था जिंदगी पूरी हो गई। लेकिन अब? अब वो एहसास जो दिल में धीरे-धीरे पनप रहा था, वो उसे खुद से ही लड़वा रहा था।

     

    आरव अपने कमरे में लेटा था। छत को घूर रहा था। यादें एक-एक करके आ रही थीं। बचपन की वो शामें, जब मम्मी रानी उसे और छोटी प्रिया को बगीचे में घुमाती थीं। प्रिया तब मुश्किल से चार साल की थी – छोटी सी गुड़िया, जो आरव की उंगली पकड़कर चलती। “भैया… झूला झुलाओ ना!” उसकी मासूम आवाज अभी भी कानों में गूंजती। आरव मुस्कुराया, लेकिन मुस्कान में दर्द था। वो समय जब एक्सीडेंट हुआ, प्रिया लापता हो गई – वो रातें जब वो रोता रहता, पापा उदास रहते। सालों तक वो खुद को दोष देता रहा – अगर मैं प्रिया को टाइटली पकड़ता तो शायद…

     

    लेकिन अब प्रिया वापस थी। बड़ी हो गई थी। उसकी आंखों में वही चमक, वही स्ट्रेंथ। आरव ने उसे बहन की तरह अपनाया था। लेकिन डायरी का वो राज़ – कि वो खून का भाई नहीं – सब बदल दिया। पहले तो लगा बस रिश्ता नाम का है, दिल से तो बहन ही है। लेकिन धीरे-धीरे वो नजरें बदलने लगीं। प्रिया को देखकर दिल का धड़कना तेज़ हो जाता। उसकी हंसी पर मन बहक जाता। वो छोटी-छोटी बातें – प्रिया का बालों को कान के पीछे करना, उसका शॉल ओढ़ना – सब आरव को अजीब सा सुकून देतीं। लेकिन साथ ही गिल्ट। “ये गलत है। वो मुझे भाई मानती है। मैं उसका सहारा हूं, प्यार नहीं।”

     

    आरव उठा और खिड़की के पास गया। बाहर बर्फ गिर रही थी। वो सिगरेट जलाई – ये आदत नई थी, तनाव कम करने की कोशिश में। धुंआ बाहर निकाला और खुद से बोला, “आरव, क्या हो रहा है तुझे? प्रिया तेरी बहन है। दिल से। उसे ऐसा कुछ मत फील कर। वो विक्रांत से दोस्ती कर रही है, तुझे खुश होना चाहिए।” लेकिन अंदर ही अंदर जलन थी। विक्रांत का नाम सुनते ही मन में आग लग जाती। “क्यों? क्यों मुझे बुरा लगता है जब वो विक्रांत से बात करती है?”

     

    अगली सुबह ठाकुर हाउस में ब्रेकफास्ट की टेबल पर सब इकट्ठे थे। राजेश पापा न्यूज पेपर पढ़ रहे थे, आदित्य अंकल (प्रिया के असली पिता) चाय पी रहे थे, रिया जैम लगाकर टोस्ट खा रही थी। प्रिया नीचे आई – सादे स्वेटर में, बाल खुले। आरव की नजर उस पर टिक गई। प्रिया मुस्कुराई। “गुड मॉर्निंग भैया।”

    आरव की आवाज कांपी। “गुड मॉर्निंग प्रिया। सोई अच्छे से?”

    “हां भैया। लेकिन रात को बर्फ की आवाज से नींद टूटी।”

    आरव ने उसके लिए चाय बनाई। “ले, गरम चाय। ठंड न लग जाए।”

    प्रिया ने लिया। उनके हाथ छुए। आरव का दिल धड़का। वो जल्दी से मुड़ा। रिया ने नोटिस किया। “भैया, आजकल आप प्रिया को स्पेशल ट्रीटमेंट दे रहे हो। चाय खुद बना रहे हो?”

    आरव ने हंसने की कोशिश की। “रिया, बहन है ना। केयर तो करूंगा।”

    लेकिन अंदर वो लड़ रहा था। “ये केयर भाई वाली है या…?”

    कॉलेज में प्रिया और विक्रांत फिर मिले। विक्रांत ने कहा, “प्रिया, वो लेटर विक्रम का झूठ है। मैंने चेक किया – मेरी दादी की डायरी में कोई ऐसा जिक्र नहीं। वो हमें अलग करना चाहता है।”

     

    प्रिया ने सिर हिलाया। “मुझे पता है विक्रांत। लेकिन अवनी ने ये अफवाह फैलाई है। लोग बातें कर रहे हैं।”

    विक्रांत ने उसका कंधा थपथपाया। “चिंता मत कर। हम साथ हैं। दोस्त की तरह।”

    प्रिया मुस्कुराई। लेकिन मन में आरव था। “क्यों भैया के बारे में सोच रही हूं?”

     

    शाम को घर लौटते वक्त आरव फिर कार लेकर आया। आज रिया नहीं थी। सिर्फ आरव और प्रिया। रास्ते में सन्नाटा था। प्रिया ने चुप्पी तोड़ा। “भैया, आज तुम चुप क्यों हो?”

    आरव ने कार साइड में रोकी। “प्रिया… मुझे कुछ कहना है।”

     

    प्रिया का दिल धड़का। “क्या भैया?”

    आरव ने उसकी आंखों में देखा। “तू खुश है ना? विक्रांत से मिलकर?”

    प्रिया ने कहा, “हां भैया। वो अच्छा दोस्त है। लेकिन तुम क्यों पूछ रहे हो?”

    आरव ने सांस ली। “प्रिया, मैं… मैं तुझे देखकर खुश हूं। लेकिन कभी-कभी लगता है कि तू दूर जा रही है। 

     

    प्रिया ने उसका हाथ पकड़ा। “भैया, तुम मेरे सबसे करीब हो। कोई नहीं आएगा हमारे बीच।”

    आरव का दिल पिघल गया। वो प्रिया के हाथ को देखता रहा। उस स्पर्श में कुछ था – गर्माहट, जो भाई-बहन वाली नहीं लग रही थी। वो खुद से लड़ रहा था। “प्रिया, अगर मैं कहूं कि मैं तुझे… बहन से ज्यादा मानता हूं?”

    प्रिया चौंकी। “भैया…?”

     

    आरव ने सिर झुका लिया। “सॉरी। भूल जा। मैं कन्फ्यूज हूं। सालों से तुझे बहन माना, अब राज़ खुलने के बाद… दिल नहीं मानता। लेकिन मैं गलत हूं। तू मुझे भाई मानती है। मैं वो रिश्ता नहीं तोड़ूंगा।”

     

    प्रिया की आंखें नम हो गईं। “भैया… मैं भी कन्फ्यूज हूं। तुम मेरे लिए सब कुछ हो। लेकिन ये नया एहसास… मुझे डर लगता है। अगर हमारा रिश्ता बदल गया तो?”

     

    आरव ने उसे गले लगा लिया। “कुछ नहीं बदलेगा प्रिया। मैं तुझे कभी दुख नहीं दूंगा। लेकिन ये एहसास… ये मुझे अंदर से खा रहा है। मैं खुद से लड़ रहा हूं।”

     

    दोनों रो पड़े। कार में सन्नाटा था, बाहर बर्फ गिर रही थी। आरव का इमोशनल कॉन्फ्लिक्ट अब पीक पर था – प्यार का एहसास, गिल्ट का बोझ, और रिश्ते को बचाने की जंग। वो जानता था कि प्रिया को दबाव नहीं दे सकता, लेकिन दिल नहीं मान रहा था।

     

    अगले दिनों आरव ने दूरी बनाने की कोशिश की। प्रिया से कम बात करता, घर से जल्दी निकलता। लेकिन प्रिया नोटिस कर रही थी। एक रात प्रिया उसके कमरे में गई। “भैया, क्या हुआ? तुम मुझसे दूर क्यों हो रहे हो?”

    आरव ने किताब बंद की। “प्रिया… मैं तुझे दुख नहीं देना चाहता। मेरे एहसास… वो तेरे लिए बोझ हैं।”

     

    प्रिया उसके पास बैठी। “भैया, तुम्हारे एहसास मेरे लिए बोझ नहीं। मैं भी सोच रही हूं। लेकिन धीरे-धीरे। हमें वक्त चाहिए।”

     

    आरव ने उसकी आंखों में देखा। “प्रिया… तू मेरी जिंदगी है। मैं तुझे खो नहीं सकता।”

    प्रिया ने मुस्कुराकर कहा, “तुम भी मेरी हो भैया।”

    उस रात आरव ने डायरी में लिखा – “प्रिया, मैं तुझे प्यार करता हूं। लेकिन ये प्यार रिश्ते को तोड़ेगा या जोड़ेगा? मैं लड़ रहा हूं – खुद से, समाज से, पुराने रिश्तों से। लेकिन तेरी खुशी से ऊपर कुछ नहीं।”

     

    दूसरी तरफ विक्रांत प्रिया को मैसेज करता रहा। “प्रिया, क्या हुआ? मिलना क्यों नहीं?”

    प्रिया ने जवाब दिया, “बिजी हूं। बाद में बात करते हैं।”

    अवनी का प्लान काम कर रहा था। वो विक्रम से मिलकर आई थी। “विक्रम, आरव और प्रिया के बीच कुछ हो रहा है। अगर वो मिल गए तो ठाकुर प्रॉपर्टी हमारी नहीं रहेगी।”

    विक्रम ने हंसकर कहा, आरव को बताओ कि विक्रांत का बैकग्राउंड संदिग्ध है।”

    अगले दिन कॉलेज में अवनी ने आरव को एक फाइल दी। “आरव, विक्रांत की दादी ने तुम्हारी मां की मौत में हाथ था। प्रूफ देखो।”

    आरव ने फाइल पढ़ी। पुराने लेटर्स, जो दिखाते थे कि राठौर फैमिली ने ठाकुरों को बदनाम करने की साजिश की थी। आरव का गुस्सा फूट पड़ा। वो घर आया और प्रिया से कहा, “विक्रांत से दूर रह। वो दुश्मन है।”

    प्रिया ने कहा, “भैया, वो झूठ है।”

    लेकिन आरव चीखा, “नहीं प्रिया! मैं तुझे खो नहीं सकता। वो तुझे चोट पहुंचाएगा।”

     

    प्रिया रो पड़ी। “भैया… तुम्हारा गुस्सा… सिर्फ दुश्मनी का है या कुछ और का?”

    आरव चुप हो गया। उसका कॉन्फ्लिक्ट अब बाहर आ रहा था – प्यार, जलन, प्रोटेक्शन। वो खुद से हार रहा था।

     

    रात को बर्फ गिर रही थी। आरव बाहर खड़ा था। प्रिया आई। “भैया… हम बात करेंगे?”

    आरव ने उसे देखा। “प्रिया… मैं नहीं लड़ सकता अब। मैं तुझे प्यार करता हूं। बहन से ज्यादा। लेकिन ये गलत है।”

    प्रिया की सांस रुक गई। वो पीछे हटी। “भैया…?”

    आरव रो पड़ा। “सॉरी प्रिया। मैं दूर जाऊंगा। तुझे दुख नहीं दूंगा।”

     

    प्रिया ने उसे रोका। “नहीं भैया। मैं भी… मैं भी कुछ फील कर रही हूं। लेकिन डर लगता है।”

    दोनों गले लगे। बर्फ गिर रही थी। दिल की जंग शुरू हो चुकी थी – इमोशंस की, रिश्तों की। आरव का कॉन्फ्लिक्ट अब खुला था – प्यार का बोझ, गिल्ट की चुभन, और प्रिया को खोने का डर। वो धीरे-धीरे उस एहसास को एक्सेप्ट कर रहा था, लेकिन स्ट्रगल खत्म नहीं हुआ था।

    विक्रांत का फोन फिर बजा। प्रिया ने उठाया नहीं।

     

  • Dil sabhal ja jara part – 12

    Dil sabhal ja jara part – 12

    पढ़ने का समय : 10 मिनट

    Part – 12 barfili rato ka raj 

    शिमला में अब ठंड अपने पूरे शबाब पर थी। दिसंबर की शुरुआत हो चुकी थी और पहाड़ियों पर बर्फ की चादर बिछने लगी थी। ठाकुर हाउस की छत पर बर्फ जमा हो रही थी, और लॉन में हर सुबह पाला पड़ता। प्रिया अपनी पढ़ाई में व्यस्त थी, लेकिन उसका मन कहीं और भटक रहा था। विक्रांत के साथ दोस्ती गहरी हो रही थी – वो दोनों लाइब्रेरी में घंटों बैठते, पुरानी दुश्मनी के कागजात पढ़ते, और कभी-कभी हल्की-फुल्की बातें करते। लेकिन प्रिया का ध्यान बार-बार आरव की ओर जाता।

     

    आरव अब पहले जैसा नहीं रहा था। वो प्रिया से नजरें मिलाने में हिचकिचाता, बात करते वक्त उसकी आवाज में एक अजीब सी कंपकंपी आ जाती। रात को जब सब सो जाते, वो लॉन में अकेला टहलता, सिगरेट पीता (जो पहले कभी नहीं पीता था), और दूर पहाड़ियों को देखता रहता। उसे खुद समझ नहीं आ रहा था कि उसके दिल में क्या हो रहा है। प्रिया उसके लिए बचपन से छोटी बहन थी – वो जिसे उसने खोया था और फिर पाया। लेकिन अब जब खून का रिश्ता नहीं रहा, तो वो पुराने एहसास नए रंग लेने लगे थे। वो एहसास जो वो खुद से छिपा रहा था – प्रिया को देखकर दिल का तेज़ धड़कना, उसकी मुस्कान पर मन का बहक जाना, उसकी हर छोटी बात पर ध्यान देना। लेकिन वो खुद को कोसता – “ये गलत है। वो मेरी बहन है। मैं उसका भाई हूं।”

     

    एक शाम प्रिया और विक्रांत कॉलेज की कैंटीन में बैठे थे। विक्रांत ने एक पुराना फोटो दिखाया – अपनी दादी और ठाकुर हरि सिंह की एक साथ तस्वीर। “देख प्रिया, ये 1945 की है। दोनों मुस्कुरा रहे हैं। दुश्मनी बाद में बनी।”

     

    प्रिया ने फोटो छुआ। “विक्रांत, शायद हमारी मुलाकात संयोग नहीं। हम पुरानी गलतियां सुधार रहे हैं।”

     

    विक्रांत ने उसकी आंखों में देखा। “प्रिया… मुझे तुझसे बात करके बहुत सुकून मिलता है। तू मेरी सबसे अच्छी दोस्त है।”

     

    प्रिया मुस्कुराई, लेकिन उसका मन कहीं और था। “विक्रांत, तू भी मेरा अच्छा दोस्त है।”

     

    बस दोस्त। अभी और कुछ नहीं।

     

    घर लौटते वक्त आरव कार में था। प्रिया बैक सीट पर बैठी। रिया आगे। रिया ने कहा, “भैया, आज प्रिया और विक्रांत फिर लाइब्रेरी में थे। पुरानी दुश्मनी खत्म करने का मिशन चल रहा है।”

     

    आरव का हाथ स्टीयरिंग पर कस गया। “अच्छा है।”

     

    लेकिन उसकी आवाज में कुछ था। प्रिया ने आईने से उसे देखा। आरव की आंखें सड़क पर थीं, लेकिन चेहरा तना हुआ।

     

    रात को डिनर के बाद प्रिया अपनी डायरी लिख रही थी। आरव कमरे में आया। “प्रिया… सो नहीं रही?”

     

    “नहीं भैया। एग्जाम की तैयारी।”

     

    आरव उसके पास बैठ गया। “विक्रांत से मिलकर कैसा लग रहा है?”

     

    प्रिया ने पेन रखा। “अच्छा लग रहा है। वो सच्चा दोस्त है।”

     

    आरव चुप रहा। फिर बोला, “अगर वो तेरे से… कुछ और कहे तो?”

     

    प्रिया ने उसकी आंखों में देखा। “भैया… तुम आजकल ऐसे क्यों पूछ रहे हो? जैसे… जल रहे हो।”

     

    आरव चौंका। वो उठ खड़ा हुआ। “जल? नहीं प्रिया। बस… तेरी खुशी चाहता हूं। तूने इतना स्ट्रगल किया है, कोई गलत इंसान तेरे जीवन में न आए।”

     

    लेकिन उसकी आंखें कुछ और कह रही थीं। प्रिया ने उसका हाथ पकड़ा। “भैया… तुम मेरे लिए सबसे इम्पॉर्टेंट हो। कोई भी आए या जाए, तुम हमेशा रहोगे।”

     

    आरव का दिल पिघल गया। उसने प्रिया के हाथ को धीरे से दबाया। उस पल दोनों के बीच एक अनकही करंट दौड़ गई। आरव ने हाथ छुड़ा लिया और बाहर चला गया। बाहर बर्फ गिर रही थी। वो लॉन में खड़ा हो गया। दिल चीख रहा था – “मैं तुझे प्यार करने लगा हूं प्रिया… लेकिन बोल नहीं सकता।”

     

    प्रिया कमरे में अकेली रह गई। उसका दिल भी तेज़ धड़क रहा था। आरव की नजरें, उसका स्पर्श – वो भाई वाला नहीं लग रहा था। वो खुद से सवाल कर रही थी – “क्या मैं भी…?” लेकिन वो जवाब से डर रही थी।

     

    अगले दिन 

     

    कॉलेज में अवनी ने प्रिया को एक पुराना लेटर थमाया। “ये विक्रम ने जेल से भिजवाया है। पढ़।”

     

    लेटर में लिखा था – “प्रिया, विक्रांत से दूर रह। राठौर फैमिली ने ही तेरी मां की मौत की साजिश रची थी। 1947 की जमीन की लड़ाई में ठाकुरों को हराने के लिए उन्होंने ब्रिटिश एजेंट से मिलकर रानी को निशाना बनाया। सच ढूंढ।”

     

    प्रिया कांप गई। वो विक्रांत के पास गई। “ये सच है?”

     

    विक्रांत हैरान। “प्रिया… विक्रम झूठ बोल रहा है। बदला लेने के लिए। मेरी दादी ने कभी ऐसा नहीं लिखा।”

     

    लेकिन प्रिया का मन डोल गया। वो घर लौटी और आरव को लेटर दिखाया। आरव ने पढ़ा। उसका चेहरा लाल हो गया। “प्रिया… अगर ये सच भी है तो पुरानी बात है। लेकिन विक्रांत से दूर रह।”

     

    प्रिया ने कहा, “भैया… तुम क्यों इतना गुस्सा हो रहे हो?”

     

    आरव चीखा, “क्योंकि मैं तुझे खोना नहीं चाहता! क्योंकि… क्योंकि तू मेरे लिए बहुत खास है!”

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया। प्रिया की आंखें बड़ी हो गईं। आरव ने सिर पकड़ लिया। “सॉरी प्रिया… मैं… मैं नहीं जानता क्या बोल रहा हूं।”

     

    वो बाहर भाग गया। प्रिया पीछे दौड़ी। बर्फ गिर रही थी। लॉन में आरव खड़ा था। प्रिया उसके पास गई। “भैया… क्या मतलब था तुम्हारा?”

     

    आरव ने पलटा। आंखें लाल। “प्रिया… मैं तुझे बहन की तरह प्यार करता हूं… लेकिन अब… अब वो प्यार बदल रहा है। मैं खुद से लड़ रहा हूं। तू मेरी जिंदगी है। विक्रांत या कोई और तेरे करीब आए, मुझे बर्दाश्त नहीं होता।”

     

    प्रिया की सांस रुक गई। वो पीछे हटी। “भैया… तुम…?”

     

    आरव ने सिर झुका लिया। “मैं गलत हूं प्रिया। तू मुझे भाई मानती है। मैं वो रिश्ता नहीं तोड़ना चाहता। लेकिन दिल… दिल नहीं मानता।”

     

    प्रिया रो पड़ी। वो आरव के पास गई और उसे गले लगा लिया। “भैया… मैं भी कन्फ्यूज हूं। तुम मेरे लिए सबसे बड़े सहारे हो। लेकिन अब… अब ये एहसास नया है। मुझे वक्त चाहिए।”

     

    दोनों बर्फ में खड़े रहे। गले लगे। आंसू बह रहे थे। आरव के मन में वो एहसास अब बाहर आ चुका था – प्रिया के लिए प्यार, जो भाई वाले प्यार से आगे बढ़ चुका था। धीरे-धीरे, बिना जल्दबाजी के।

     

    प्रिया सो नहीं पाई। आरव भी नहीं। दोनों अलग-अलग कमरों में, लेकिन दिल एक-दूसरे के पास।

     

    बर्फीली रात के बाद ठाकुर हाउस में एक अजीब सा सन्नाटा छा गया था। प्रिया और आरव दोनों एक-दूसरे से नजरें चुरा रहे थे। ब्रेकफास्ट टेबल पर राजेश पापा और आदित्य अंकल बातें कर रहे थे, रिया चुपके से दोनों को देख रही थी, लेकिन आरव और प्रिया चुप। आरव की प्लेट में टोस्ट पड़ा था, लेकिन वो बस कॉफी पी रहा था। उसकी आंखें लाल थीं – रात भर नींद नहीं आई थी।

     

    रात को जो हुआ था, वो उसके दिमाग में बार-बार घूम रहा था। प्रिया को गले लगाना, उसके आंसू महसूस करना, और फिर वो कबूलनामा – “तू मेरे लिए बहुत खास है…”। वो शब्द उसके मुंह से निकल गए थे, और अब वो खुद को कोस रहा था। “मैंने क्या कर दिया? वो मुझे भाई मानती है। बचपन से। मैंने उसका विश्वास कैसे तोड़ सकता हूं?”

     

    आरव उठा और अपने कमरे में चला गया। दरवाजा बंद किया। अंदर अकेला बैठा, सिर पकड़ लिया। उसका मन दो हिस्सों में बंट गया था।

     

    एक तरफ था वो आरव जो प्रिया को छोटी बहन मानता था – वो जो उसे बचपन में गोद में उठाता था, जो उसके लापता होने पर सालों रोया था, जो उसे वापस पाकर सबसे खुश हुआ था। वो आरव जो प्रिया की हर खुशी के लिए कुछ भी करने को तैयार था, जो उसे विक्रांत या किसी और से दूर रखना चाहता था सिर्फ इसलिए क्योंकि वो उसकी “छोटी बहन” थी। वो रिश्ता जो सालों से उसकी जिंदगी का सहारा था।

     

    दूसरी तरफ था वो आरव जो अब प्रिया को एक और नजर से देखने लगा था। जब खून का रिश्ता टूटा, तो दिल ने पुरानी सीमाएं तोड़ दीं। प्रिया की मुस्कान अब उसे सिर्फ प्यारी नहीं, बल्कि दिल को छूने वाली लगती थी। उसकी आंखें देखकर मन बहकता था। उसकी हंसी सुनकर दिल में एक अजीब सी गुदगुदी होती। वो एहसास जो वो खुद से छिपा रहा था – प्यार। लेकिन वो प्यार जो गलत लग रहा था। “समाज क्या कहेगा? फैमिली क्या कहेगी? प्रिया खुद क्या सोचेगी?”

     

    आरव ने आईने के सामने खड़ा होकर खुद से बात की। “आरव ठाकुर… तू पागल हो गया है। वो तेरी बहन है। तूने उसे बचाया है, उसका सहारा बना है। अब ये क्या? अगर तूने कुछ कहा तो वो तुझसे दूर हो जाएगी। तेरी जिंदगी खाली हो जाएगी।”

     

    लेकिन दिल नहीं मान रहा था। वो प्रिया की हर छोटी बात याद कर रहा था – कैसे वो मुस्कुराती है, कैसे साड़ी में खूबसूरत लगती है, कैसे उसकी हिम्मत देखकर वो प्रेरित होता है। वो सोच रहा था कि अगर प्रिया किसी और की हो गई – विक्रांत की या किसी और की – तो वो जी नहीं पाएगा। लेकिन साथ ही डर था – अगर उसने अपने एहसास कबूले तो प्रिया उसे हमेशा के लिए खो देगी।

     

    दोपहर को आरव अपने NGO के आश्रम गया। वहां छोटे-छोटे अनाथ बच्चे थे। वो उन्हें पढ़ाता, खेलता। एक छोटी लड़की – नाम था नेहा – आरव के पास आई। “अंकल, आप उदास क्यों हो?”

     

    आरव ने उसे गोद में उठाया। “कुछ नहीं बेटा। बस थक गया हूं।”

     

    नेहा ने कहा, “अंकल, जब मैं उदास होती हूं तो अपनी दीदी को याद करती हूं जो ऊपर है। आप भी किसी को याद कर रहे हो?”

     

    आरव की आंखें भर आईं। वो प्रिया को याद कर रहा था। वो बच्ची को गले लगाकर बोला, “हां बेटा… बहुत याद आ रही है।”

     

    वहां से लौटते वक्त आरव ने फैसला किया – अपने एहसास दबा देगा। प्रिया की खुशी सबसे ऊपर है। अगर वो विक्रांत को पसंद करेगी तो वो सपोर्ट करेगा। लेकिन अंदर से वो टूट रहा था।

     

    घर लौटा तो प्रिया लॉन में खड़ी थी। बर्फ पिघल रही थी, धूप निकली थी। आरव उसके पास गया। “प्रिया… कल रात के लिए सॉरी। मैंने कुछ गलत कहा। तू मुझे भाई ही मान। मैं वैसा ही रहूंगा।”

     

    प्रिया ने उसकी आंखों में देखा। “भैया… तुमने कुछ गलत नहीं कहा। मैं भी कन्फ्यूज हूं। लेकिन तुम मेरे लिए हमेशा भाई रहोगे। वो रिश्ता मैं नहीं खोना चाहती।”

     

    आरव ने मुस्कुराने की कोशिश की। “हां… बस भाई।”

     

    लेकिन उसके दिल में तूफान था। वो मुस्कुराया, लेकिन अंदर से रो रहा था। वो प्रिया से दूर जाने लगा, लेकिन प्रिया ने उसका हाथ पकड़ लिया। “भैया… दूर मत जाना। मुझे तुम्हारी जरूरत है।”

     

    आरव रुक गया। उसने प्रिया को गले लगा लिया। इस बार भाई की तरह। लेकिन उसका दिल चीख रहा था – “मैं तुझे प्यार करता हूं प्रिया… लेकिन चुप रहूंगा। तेरी खुशी के लिए।”

     

    शाम को विक्रांत का कॉल आया। प्रिया ने उठाया। “प्रिया… कल बर्फ में वॉक चलें? सिर्फ दोस्तों की तरह।”

     

    प्रिया ने आरव की तरफ देखा। आरव मुस्कुराया। “जा प्रिया। एंजॉय कर।”

     

    लेकिन उसकी मुस्कान के पीछे दर्द था। वो कमरे में गया और दरवाजा बंद कर लिया। अकेले में रोया। उसका इमोशनल कॉन्फ्लिक्ट चरम पर था – प्यार और भाई वाले रिश्ते के बीच फंसा। वो प्रिया को खोना नहीं चाहता था, लेकिन अपना प्यार भी कबूल नहीं कर सकता था।

     

    रिया ने प्रिया से कहा, “यार, आरव भैया आज बहुत उदास हैं। लगता है वो तुझसे…”

     

    प्रिया ने कहा, “रिया… मुझे वक्त चाहिए। सब समझने के लिए।”

     

    रात को आरव छत पर खड़ा था। बर्फीली हवा चल रही थी। वो प्रिया की तस्वीर देख रहा था – बचपन की। “प्रिया… मैं तेरा भाई हूं। हमेशा रहूंगा। मेरा प्यार दबा दूंगा।”

     

    लेकिन दिल नहीं मान रहा था। वो एहसास और मजबूत हो रहा था। धीरे-धीरे।

     

    दूसरी तरफ विक्रांत भी प्रिया को पसंद करने लगा था। लेकिन आरव का दर्द कोई नहीं देख रहा था।

     

    अवनी ने विक्रम को फोन किया। “अब प्रिया और आरव आपस में उलझ गए हैं। हमारा प्लान काम कर रहा है।”

     

     

    आरव प्यार

    जो वो छिपा रहा था, दर्द जो वो सह रहा था। क्या वो कभी कबूलेगा? या हमेशा चुप रहेगा?

     

    जाने के लिए बने रहिए मेरी स्टोरी के साथ।

     

     

  • Dil sabhal ja jara part – 11

    Dil sabhal ja jara part – 11

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    Part – 11 “दिल की अनकही हलचल”

     

    शिमला की सर्दियां शुरू हो चुकी थीं। सुबह-सुबह कोहरा इतना घना कि ठाकुर हाउस का लॉन भी धुंधला दिखता। प्रिया अपनी बालकनी में खड़ी थी, हाथ में गर्म चाय का मग, और मन में उलझनें। विक्रांत और ठाकुर-राठौर की पुरानी दुश्मनी का सच अब सबके सामने था। अवनी ने कॉलेज में अफवाह फैला दी थी – “प्रिया और विक्रांत साथ घूम रहे हैं, लेकिन उनके खानदान सदियों से दुश्मन हैं।”

     

    प्रिया को बुरा लग रहा था। विक्रांत अच्छा दोस्त बन रहा था, लेकिन अब हर मुलाकात पर एक अनजाना दबाव महसूस होता। और सबसे बड़ी उलझन थी आरव भैया की।

     

    आरव पिछले कुछ दिनों से थोड़ा अलग लग रहा था। पहले जहां वो प्रिया को हर समय चिढ़ाता, हंसाता था, अब उसकी नजरें प्रिया पर टिकतीं और फिर जल्दी हट जातीं। बात करते वक्त आवाज में एक अजीब सी गर्माहट आ जाती। प्रिया ने नोटिस किया, लेकिन समझ नहीं पाई। आखिर आरव तो उसका भाई था – दिल से, अगर खून से नहीं भी।

     

    एक शाम कॉलेज से लौटते वक्त आरव कार लेकर आया। रिया भी साथ थी। रिया ने बैक सीट पर बैठते हुए कहा, “भैया, आज प्रिया को विक्रांत ने फिर मैसेज किया था। कॉफी के लिए पूछ रहा था।”

     

    आरव का चेहरा एक पल को सख्त हो गया। उसने आईने से प्रिया को देखा। “तू जाएगी?”

     

    प्रिया ने कंधे उचकाए। “नहीं भैया। अभी एग्जाम हैं। और… दुश्मनी वाली बात भी है ना।”

     

    आरव ने राहत की सांस ली, लेकिन खुद को छिपाने की कोशिश की। “हां, सही है। पुरानी बातें भूलना आसान नहीं।”

     

    घर पहुंचकर रिया कमरे में प्रिया के पास आई। “यार, तुझे नहीं लगता आरव भैया थोड़े… जल रहे हैं? विक्रांत का नाम लेते ही मूड ऑफ!”

     

    प्रिया हंस पड़ी। “पागल, वो बस प्रोटेक्टिव हैं। भाई हैं ना।”

     

    रिया ने आंख मारी। “भाई? खून का नहीं ना? और भैया की नजरें… कुछ और कह रही हैं।”

     

    प्रिया चुप हो गई। रिया की बात मन में घर कर गई।

     

    रात को डिनर के बाद आरव और प्रिया लॉन में टहल रहे थे। ठंड थी, प्रिया ने शॉल ओढ़ी। आरव ने अपनी जैकेट उतारकर उसके कंधों पर डाल दी। “ठंड लग जाएगी।”

     

    प्रिया ने मुस्कुराकर कहा, “भैया, तुम्हें खुद ठंड नहीं लगेगी?”

     

    आरव ने पास आकर कहा, “तुझे ठंड लगे, ये मुझे बर्दाश्त नहीं।”

     

    उनकी आंखें मिलीं। एक पल को समय रुक सा गया। आरव की नजरें प्रिया के चेहरे पर टिकीं – बालों की लट, आंखें, होंठ। उसका दिल तेज़ धड़क रहा था। उसे पहली बार एहसास हुआ कि प्रिया उसके लिए सिर्फ बहन नहीं… कुछ और है। वो एहसास जो सालों से दबा था, अब धीरे-धीरे बाहर आ रहा था। लेकिन वो खुद से लड़ रहा था। “ये गलत है… वो मेरी बहन है… दिल से।”

     

    प्रिया ने भी कुछ फील किया। आरव की नजरों में वो गर्माहट नई थी। पहले भाई वाली, अब… कुछ और। उसका चेहरा गर्म हो गया। वो जल्दी से नजरें हटा ली। “भैया… चलो अंदर चलते हैं।”

     

    आरव ने सिर हिलाया। लेकिन रात को वो सो नहीं पाया। पुरानी यादें आ रही थीं – छोटी प्रिया को गोद में उठाना, उसके साथ खेलना। लेकिन अब प्रिया बड़ी हो गई थी। खूबसूरत, स्ट्रॉन्ग, और उसके दिल के सबसे करीब।

     

    अगले दिन कॉलेज में नया ट्विस्ट आया।

     

    विक्रांत प्रिया के पास आया। “प्रिया, मुझे कुछ दिखाना है। दादी की डायरी में एक पुराना लेटर मिला – ठाकुर और राठौर की दुश्मनी का असली कारण।”

     

    लाइब्रेरी के कोने में दोनों बैठे। लेटर में लिखा था – “1947 में ठाकुर हरि सिंह और राठौर विक्रम सिंह सबसे अच्छे दोस्त थे। दोनों ने मिलकर एक बड़ा बागान खरीदा था। लेकिन आजादी के बाद एक तीसरा आदमी – ब्रिटिश अफसर का एजेंट – ने दोनों को आपस में लड़वा दिया। झूठी अफवाह फैलाई कि एक ने दूसरे को धोखा दिया। असल में वो एजेंट जमीन हड़पना चाहता था। दोनों खानदानों ने सालों लड़ाई की, लेकिन जमीन एजेंट ले उड़ा।”

     

    प्रिया हैरान। “तो दुश्मनी झूठी थी? किसी तीसरे की साजिश?”

     

    विक्रांत ने कहा, “हां। दादी लिखती हैं कि अगर कभी ठाकुर और राठौर फिर मिलें तो सच बाहर लाएं।”

     

    प्रिया मुस्कुराई। “तो हम… मिल गए।”

     

    विक्रांत ने उसका हाथ छुआ। “प्रिया, शायद ये संकेत है। हम पुरानी गलतियां सुधार सकते हैं।”

     

    प्रिया ने हाथ नहीं छुड़ाया, लेकिन दिल में आरव की याद आई। वो कन्फ्यूज हो गई।

     

    शाम को घर लौटकर प्रिया ने आरव को लेटर दिखाया। आरव ने पढ़ा। उसका चेहरा बदल गया। “तो विक्रांत ने ये बताया?”

     

    प्रिया ने हां कहा। आरव ने कुछ देर चुप रहकर कहा, “अच्छा है। पुरानी दुश्मनी खत्म हो।”

     

    लेकिन उसकी आवाज में कुछ था – जलन? दर्द?

     

    रात को प्रिया अपने कमरे में थी। आरव दरवाजे पर खड़ा था। “प्रिया… विक्रांत से मिलकर अच्छा लगा?”

     

    प्रिया ने कहा, “हां भैया। वो अच्छा लड़का है। और अब दुश्मनी भी झूठी निकली।”

     

    आरव पास आया। “लेकिन… अगर वो तेरे करीब आए तो?”

     

    प्रिया ने उसकी आंखों में देखा। “भैया… तुम क्यों ऐसा पूछ रहे हो?”

     

    आरव ने सांस रोकी। उसका दिल चीख रहा था – “क्योंकि मैं तुझे खोना नहीं चाहता। क्योंकि तू मेरे लिए सिर्फ बहन नहीं…” लेकिन वो बोल नहीं पाया। बस बोला, “बस… तेरी खुशी चाहता हूं।”

     

    वो चला गया। प्रिया बिस्तर पर लेट गई। उसका दिल भी उलझा था। आरव की नजरें, उसकी केयर – वो भाई वाली थी या कुछ और? और विक्रांत की दोस्ती – वो आगे बढ़ेगी या नहीं?

     

    बाहर बर्फ गिरने लगी थी। शिमला की पहली बर्फ। रोमांच शुरू हो रहा था – दिल का रोमांच। आरव के मन में प्रिया के लिए वो एहसास धीरे-धीरे पनप रहा था जो वो खुद से छिपा रहा था। प्रिया भी कुछ फील कर रही थी, लेकिन समझ नहीं पा रही।

     

    और विक्रांत? वो भी प्रिया को पसंद करने लगा था। लेकिन अब त्रिकोण बनने की शुरुआत थी – धीरे-धीरे, बिना किसी जल्दबाजी के।

     

    अवनी दूर से सब देख रही थी। मुस्कुरा रही थी। “अब असली खेल शुरू होगा।”

     

    बर्फ गिर रही थी। दिलों में नई हलचल शुरू हो रही थी।

     

  • Dil sabhal ja jara part – 10

    Dil sabhal ja jara part – 10

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    Part – 10 aarav ka chhupa huaa pakch 

    कॉलेज का सेशन अब अंतिम चरण में था। एग्जाम नजदीक थे, लेकिन ठाकुर हाउस में एक नई हलचल थी। प्रिया विक्रांत की फैमिली स्टोरी से इतनी प्रभावित हुई थी कि उसने रिया से कहा, “यार, हम सबके राज़ खुल रहे हैं। लेकिन आरव भैया के बारे में हमें क्या पता? वो तो हमेशा प्रोटेक्टिव रहते हैं, अपनी बात कभी नहीं बताते।”

     

    रिया ने आंखें चमकाईं। “सच में! चल, आज भैया से पूछते हैं। पूरी फैमिली हिस्ट्री।”

     

    शाम को ठाकुर हाउस के बड़े ड्राइंग रूम में सब इकट्ठे थे। राजेश पापा न्यूज पढ़ रहे थे, आदित्य अंकल (प्रिया के असली पिता) चाय पी रहे थे, कमला दाई किचन से समोसे लेकर आईं। आरव लैपटॉप पर होटल्स का काम देख रहा था। प्रिया और रिया सोफे पर बैठीं।

     

    रिया ने सीधा हमला किया। “आरव भैया, अब आपकी बारी! हमने विक्रांत की पूरी राजघराना स्टोरी सुनी। प्रिया की तो पूरी जिंदगी फिल्म बन गई। अब आप बताओ – ठाकुर फैमिली की असली हिस्ट्री क्या है? सिर्फ होटल्स और प्रॉपर्टी नहीं, पूरा बैकग्राउंड!”

     

    आरव ने लैपटॉप बंद किया और मुस्कुराया। “रिया, तू कभी नहीं सुधरेगी। ठीक है, आज बताता हूं। लेकिन ये लंबी कहानी है।”

     

    सब ध्यान से सुनने लगे। आरव ने गहरी सांस ली और शुरू किया।

     

    “ठाकुर फैमिली की जड़ें हिमाचल के पुराने राजपूत खानदान से हैं। मेरे परदादाजी – ठाकुर हरि सिंह – 1900 के आसपास शिमला के पास एक छोटी रियासत के मुखिया थे। ब्रिटिश टाइम में वो राजा नहीं थे, लेकिन जमींदार जरूर थे। बड़े-बड़े सेब के बागान, जंगल, और शिमला में दो-तीन पुराने बंगले। ब्रिटिश अफसरों से अच्छे रिश्ते थे, इसलिए प्रिवी पर्स मिलता था। परदादाजी बहुत शौकीन थे – शिकार, घुड़सवारी, और पोलो। शिमला के मॉल रोड पर उनका बंगला आज भी है – वो जो अब म्यूजियम बन गया है।”

     

    प्रिया हैरान थी। “भैया, ये तो पता नहीं था!”

     

    आरव हंसा। “सुन तो पूरी। आजादी के बाद प्रिवी पर्स खत्म हुआ। परदादाजी ने समझदारी दिखाई। सेब के बागानों को कमर्शियल बना दिया। 1960 में मेरे दादाजी – ठाकुर विजय सिंह – ने पहला होटल खोला – ‘ठाकुर पैलेस’। वो शिमला का पहला लग्जरी होटल था। विदेशी टूरिस्ट आते थे। दादाजी बहुत सख्त थे। आर्मी बैकग्राउंड था उनका। 1962 के इंडो-चाइना वॉर में फाइट किया। लेकिन घर में अनुशासन इतना कि कोई बोलने की हिम्मत नहीं करता था।”

     

    राजेश पापा ने सिर हिलाया। “तेरे दादाजी ने मुझे भी सिखाया था बिजनेस।”

     

    आरव आगे बोला, “दादाजी की दो शादियां हुईं। पहली पत्नी से कोई बच्चा नहीं। दूसरी शादी से पापा (राजेश ठाकुर) पैदा हुए। लेकिन दूसरी पत्नी को घर वाले नहीं अपनाते थे। दादाजी की मौत 1988 में हुई – हार्ट अटैक। उसके बाद होटल्स का बिजनेस पापा ने संभाला। पापा ने चेन बढ़ाई – अब शिमला, मनाली, धर्मशाला में 5 होटल्स हैं। लेकिन मम्मी (रानी) से शादी लव मैरिज थी। मम्मी गरीब फैमिली से थीं – दिल्ली की। दादाजी-दादी को पसंद नहीं थी। फिर भी पापा ने शादी की। मैं तब 10 साल का था।”

     

    प्रिया की आंखें नम हो गईं। आरव ने उसकी तरफ देखा और धीरे से कहा, “मम्मी बहुत अच्छी थीं। मुझे और तुझे बहुत प्यार करती थीं। लेकिन घर में तनाव रहता था। विक्रम की मां (मेरी सौतेली मां) हमेशा जलती थीं। प्रॉपर्टी का लालच था। मम्मी की मौत के बाद सब बदल गया। पापा टूट गए। मैं अकेला हो गया। कॉलेज गया दिल्ली, फिर बिजनेस संभालने लगा। लेकिन अंदर से हमेशा कमी महसूस होती थी – छोटी बहन की।”

     

    रिया ने पूछा, “भैया, और कोई राज़? जैसे विक्रांत की दादी वाला?”

     

    आरव चुप हुआ। फिर बोला, “हां, एक बड़ा राज़ है। ठाकुर और राठौर फैमिली की पुरानी दुश्मनी। 1940 के दशक में परदादाजी और विक्रांत के परदादाजी (महाराजा विक्रम सिंह) के बीच जमीन का विवाद था। शिमला के पास एक बड़ा जंगल – दोनों दावा करते थे। कोर्ट केस चला। आखिर में ठाकुर फैमिली हार गई। परदादाजी ने बदला लिया – राठौर की एक प्रॉपर्टी पर कब्जा करने की कोशिश की। बात इतनी बढ़ी कि दोनों खानदानों में सालों दुश्मनी रही। शादियां तक रुक गईं।”

     

    प्रिया चौंकी। “तो विक्रांत और हमारी फैमिली… दुश्मन?”

     

    आरव ने सिर हिलाया। “हां। इसलिए जब विक्रांत कॉलेज में आया तो मुझे शक हुआ। लेकिन अब लगता है वो अच्छा लड़का है। पुरानी बातें पुरानी रहनी चाहिए।”

     

    कमला दाई ने कहा, “बेटा, तेरे दादाजी ने एक गलती और की थी। रानी बहू को अपनाने से इंकार किया। कहा कि गरीब घर की लड़की ठाकुर खानदान में नहीं आएगी। लेकिन राजेश ने नहीं मानी।”

     

    राजेश पापा ने पहली बार खुलकर बोला। “मैंने रानी से प्यार किया था। लेकिन गलती की कि उसे फैमिली के प्रेशर से बचा नहीं सका। प्रिया के लापता होने के बाद मैंने खुद को कभी माफ नहीं किया।”

     

    आरव ने आगे कहा, “और मेरा अपना राज़ – मैं होटल्स नहीं संभालना चाहता था। बचपन में आर्मी जॉइन करना चाहता था। लेकिन पापा की तबीयत खराब होने लगी तो जिम्मेदारी ले ली। अब NGO चलाता हूं चुपके से – अनाथ बच्चों के लिए। शिमला के बाहर एक छोटा सा आश्रम सपोर्ट करता हूं।”

     

    प्रिया की आंखें चमक उठीं। “भैया… ये तो पता नहीं था!”

     

    आरव शर्मा गया। “बस, छोटा सा काम। ताकि कोई और प्रिया जैसा अकेला न महसूस करे।”

     

    रिया ने ताली बजाई। “वाह भैया! हीरो हो तुम। लेकिन प्रिया, अब समझी क्यों आरव इतना प्रोटेक्टिव है? बहन के लिए कुछ भी!”

     

    सब हंसे। लेकिन प्रिया के मन में नया सवाल – अगर ठाकुर और राठौर की दुश्मनी है, तो विक्रांत और वो करीब कैसे आएंगे?

     

    रात को प्रिया बालकनी में खड़ी थी। आरव आया। “क्या सोच रही है?”

     

    “भैया, तुमने इतना कुछ सहा। लेकिन कभी शिकायत नहीं की।”

     

    आरव ने उसके कंधे पर हाथ रखा। “तू आ गई ना। अब सब ठीक है।”

     

    प्रिया मुस्कुराई। भाई का प्यार – सबसे बड़ा सहारा। रोमांस? विक्रांत अच्छा है, लेकिन अभी दोस्ती ही काफी थी।

     

    अगले दिन कॉलेज में अवनी ने विक्रांत को कोने में लिया। “विक्रांत, प्रिया से दूर रह। ठाकुर और राठौर कभी एक नहीं हो सकते।”

     

    विक्रांत ने पूछा, “क्यों?”

     

    अवनी मुस्कुराई। “क्योंकि तेरे दादाजी ने ठाकुर की जमीन छीनी थी। और अब प्रिया सब वापस लेना चाहती है।”

     

     

  • Dil sabhal ja jara

    Dil sabhal ja jara

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    Part – 9 Vikrant ka raj

     

    ठाकुर हाउस में अब सब कुछ नॉर्मल लगने लगा था। आदित्य अंकल (प्रिया के असली पिता) कुछ दिन शिमला में रुके थे। उन्होंने राजेश पापा से लंबी बातें कीं, पुरानी यादें ताजा कीं, और प्रिया को दोनों पापाओं का प्यार मिल रहा था। आरव और प्रिया का रिश्ता और गहरा हो गया था – भाई-बहन वाला नहीं, बल्कि दोस्ती और समझदारी वाला। लेकिन प्रिया अभी भी किसी रोमांटिक रिश्ते के लिए तैयार नहीं थी। विक्रांत के मैसेज आते थे, लेकिन वो सिर्फ “हाय-हैलो” तक ही जवाब देती।

     

    एक दिन कॉलेज की लाइब्रेरी में प्रिया और रिया बैठी थीं। रिया ने किताब बंद की और बोली, “यार, विक्रांत तुझसे बहुत इंप्रेस्ड है। रोज क्लास में तेरी तरफ देखता रहता है। तू क्यों इतना दूर भाग रही है?”

     

    प्रिया ने किताब में नजरें गड़ाए कहा, “रिया, अभी मन नहीं है। इतने राज़ खुल रहे हैं, जिंदगी स्थिर नहीं हुई। विक्रांत अच्छा है, लेकिन मुझे उसके बारे में ज्यादा पता नहीं।”

     

    रिया ने आंखें घुमाई। “अरे, पता कर ले! मैंने थोड़ा पूछताछ किया है। देहरादून से है, फैमिली बैकग्राउंड अच्छा है। लेकिन कुछ लोग कहते हैं कि उसकी फैमिली में कोई पुराना राज़ है। अवनी ने तो कुछ हिंट भी दिया था।”

     

    प्रिया चौंकी। “अवनी? वो क्यों बोलेगी?”

     

    “जलन। लेकिन शायद सच हो। चल, आज विक्रांत से पूछते हैं।”

     

    उसी शाम कॉलेज कैंटीन में विक्रांत प्रिया के पास आया। “प्रिया, कल संडे है। लाइब्रेरी ग्रुप स्टडी? या फिर माल रोड पर वॉक?”

     

    प्रिया ने पहली बार खुलकर मुस्कुराया। “विक्रांत, स्टडी तो ठीक है, लेकिन पहले तू अपनी फैमिली के बारे में बता। कहां से है तू? घर में कौन-कौन?”

     

    विक्रांत थोड़ा रुक गया। फिर मुस्कुराया। “चलो, आज बताता हूं। पूरी स्टोरी।”

     

    तीनों (प्रिया, रिया, विक्रांत) कॉलेज के पीछे वाली बेंच पर बैठ गए। सनसेट हो रहा था। विक्रांत ने गहरी सांस ली और अपनी कहानी शुरू की।

     

    “मेरा पूरा नाम विक्रांत सिंह राठौर है। मैं देहरादून का हूं, मसूरी के पास एक छोटे से हिल स्टेशन का। मेरी फैमिली पुरानी राजघराने से ताल्लुक रखती है – राठौर राजपूत। मेरे दादाजी महाराजा विक्रम सिंह राठौर थे, गढ़वाल के छोटे से रियासत के आखिरी राजा। आजादी के बाद प्रिवी पर्स खत्म हो गया, जमीनें चली गईं, लेकिन नाम और कुछ पुरानी प्रॉपर्टी बची रही।”

     

    प्रिया और रिया ध्यान से सुन रहे थे।

     

    “दादाजी बहुत सख्त थे। ब्रिटिश टाइम में उन्होंने इंडियन आर्मी में सर्व किया, फिर आजादी के बाद राजनीति में आए। लेकिन 1980 में एक बड़ा स्कैंडल हुआ। दादाजी पर आरोप लगा कि उन्होंने अपनी रियासत की जमीन अवैध तरीके से बेची। कोर्ट केस चला, प्रॉपर्टी जब्त हो गई। दादाजी का दिल टूट गया। 1985 में हार्ट अटैक से गुजर गए।”

     

    विक्रांत की आवाज में दर्द था।

     

    “उसके बाद मेरे पापा – कर्नल अजय सिंह राठौर – ने फैमिली संभाली। पापा आर्मी में थे। कश्मीर में पोस्टिंग, 1999 कारगिल वॉर में फाइट किया। वीर चक्र मिला। लेकिन घर की हालत खराब थी। पापा ने देहरादून में एक छोटा सा स्कूल खोला – ‘राठौर मिलिट्री एकेडमी’। आज वो मिडिल क्लास फैमिली का अच्छा स्कूल है। मां – राधा राठौर – स्कूल की प्रिंसिपल हैं। सख्त, लेकिन बच्चों से बहुत प्यार करती हैं।”

     

    रिया ने पूछा, “भाई-बहन?”

     

    विक्रांत हंसा। “एक छोटी बहन है – वैष्णवी। 16 साल की, बिल्कुल शैतान। घुड़सवारी करती है, पोलो खेलती है। हमारी पुरानी प्रॉपर्टी में एक छोटा सा स्टेबल बचा है, वहां घोड़े पालते हैं। वैष्णवी का सपना है ओलंपिक में घुड़सवारी में मेडल लाना।”

     

    प्रिया ने पूछा, “तो तू शिमला क्यों आया? देहरादून में ही पढ़ सकता था।”

     

    विक्रांत चुप हुआ। फिर बोला, “ये असली वजह है। फैमिली में एक पुराना राज़ है। मेरे दादाजी की दूसरी शादी थी – पहली पत्नी से कोई बच्चा नहीं हुआ, तो दूसरी शादी की। लेकिन दूसरी पत्नी – मेरी दादी – को घर वाले नहीं अपनाते थे। दादाजी की मौत के बाद दादी को घर से निकाल दिया गया। वो शिमला चली गईं। वहां एक छोटा सा घर था – पुरानी प्रॉपर्टी का हिस्सा। दादी ने अकेले जीवन गुजारा। 5 साल पहले गुजर गईं।”

     

    “उनकी वसीयत में लिखा था कि उनका शिमला वाला घर और कुछ ज्वेलरी उनके पोते को मिलेगी – अगर वो शिमला कॉलेज में पढ़ाई करे। दादी चाहती थीं कि हम अपनी जड़ों से जुड़े रहें। पापा नहीं चाहते थे कि मैं आऊं, क्योंकि पुराने घाव थे। लेकिन मैं आ गया। घर अब मेरा है – छोटा सा, पुराना बंगला माल रोड के पास। मैं वीकेंड पर वहां रहता हूं।”

     

    प्रिया की आंखें चौड़ी हो गईं। “तो तू अकेला रहता है?”

     

    “हां। एक पुरानी केयरटेकर आंटी है – लक्ष्मी आंटी। वो दादी की टाइम से हैं। घर में दादी की पुरानी चीजें हैं – डायरी, फोटोज, ज्वेलरी। मैं धीरे-धीरे सब समझ रहा हूं।”

     

    रिया ने कॉमेडी ऐड की। “वाह, राजकुमार! पुराना बंगला, घोड़े, ज्वेलरी। प्रिया, अब तो मान जा!”

     

    प्रिया हंसी, लेकिन विक्रांत की आंखों में दर्द देख रही थी।

     

    विक्रांत ने आगे बताया, “सबसे बड़ा राज़ ये है कि दादी को घर से निकालने की वजह सिर्फ प्रॉपर्टी नहीं थी। दादी ने दादाजी की मौत के पीछे साजिश का शक जताया था। कहा था कि बड़े भाई (मेरे पापा के चाचा) ने जहर दिया था। लेकिन प्रूफ नहीं था। दादी अकेली लड़ती रहीं। आखिर में हार गईं। मैं शिमला इसलिए आया क्योंकि दादी की डायरी में लिखा था – ‘सच ढूंढो, विक्रांत। राठौर खानदान का नाम साफ करो।’”

     

    प्रिया ने उसका हाथ थामा। “विक्रांत… तू अकेला नहीं है अब। हम हैं ना।”

     

    विक्रांत मुस्कुराया। “थैंक्स प्रिया। तेरी स्टोरी सुनकर मुझे लगा कि तू समझेगी। तूने भी तो इतना स्ट्रगल किया है।”

     

    रिया ने चिढ़ाया। “अब दोनों अनाथ राजकुमार-राजकुमारी मिल गए। परफेक्ट जोड़ी!”

     

    दोनों शर्मा गए। लेकिन प्रिया को अच्छा लगा। विक्रांत का बैकग्राउंड सुनकर उसे लगा कि वो भी स्ट्रगलर है – बाहर से चमक, अंदर दर्द।

     

    अगले संडे प्रिया और रिया विक्रांत के बंगले पर गईं। पुराना विक्टोरियन स्टाइल बंगला – बड़ा गार्डन, पुरानी फर्नीचर। लक्ष्मी आंटी ने स्वागत किया। “बेटा, तुम्हारी दादी बहुत अच्छी थीं। सबको मिस करती थीं।”

     

    विक्रांत ने दादी की डायरी दिखाई। उसमें पुराने लेटर्स थे – दादाजी के भाई की धमकियां, प्रॉपर्टी के पेपर्स। प्रिया ने पढ़ा। “विक्रांत, ये सीरियस है। हमें इंवेस्टिगेट करना चाहिए।”

     

    विक्रांत ने कहा, “हां। लेकिन डर लगता है। अगर सच में मर्डर था तो… फैमिली बिखर जाएगी।”

     

    रिया ने कहा, “डरो मत। हम तीनों मिलकर करेंगे। प्रिया तो एक्सपर्ट हो गई राज़ खोलने में!”

     

    शाम को बंगले के गार्डन में तीनों बैठे। चाय पीते हुए विक्रांत ने प्रिया से कहा, “प्रिया, मुझे तेरी स्ट्रेंथ से इंस्पिरेशन मिलती है। तूने कभी हार नहीं मानी।”

     

    प्रिया ने मुस्कुराकर कहा, “तू भी नहीं मान रहा। हम साथ हैं।”

     

    कोई रोमांटिक कन्फेशन नहीं। बस दोस्ती गहरी हो रही थी। धीरे-धीरे।

     

    रात को ठाकुर हाउस लौटकर प्रिया ने आरव को सब बताया। आरव ने कहा, “प्रिया, विक्रांत अच्छा लग रहा है। लेकिन सावधानी से। अगर उसकी फैमिली में भी साजिश है तो…”

     

    प्रिया ने कहा, “भैया, मैं समझदार हूं। अभी सिर्फ दोस्ती है।”

     

    आरव मुस्कुराया। लेकिन उसके दिल में कुछ और था। वो खुद नहीं समझ पा रहा था।

     

    अवनी कॉलेज में फिर घूर रही थी। वो विक्रम से मिली थी जेल में। विक्रम ने कहा था, “अवनी, प्रिया और विक्रांत को करीब मत आने दे। राठौर और ठाकुर का पुराना दुश्मनी है। अगर दोनों

    मिल गए तो हमारा खेल खत्म।”

     

    क्या पुरानी दुश्मनी थी? नया राज़ खुलने वाला था।

     

  • Dil sabhal ja jara part – 8

    Dil sabhal ja jara part – 8

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    Part – 8 pita ki talas 

     

    ट्रेन की सीटी के साथ दिल्ली स्टेशन पर प्रिया उतरी। ठंडी हवा उसके चेहरे पर लगी, लेकिन दिल में गर्माहट नहीं थी। हाथ में मां की डायरी, जेब में पेंडेंट, और मन में सवालों का तूफान। शिमला से दिल्ली का सफर छोटा था, लेकिन प्रिया के लिए ये बीस साल पुराना राज़ खोलने वाला था। वो एक छोटे से गेस्ट हाउस में रुकी – बजट के अंदर, क्योंकि वो अभी भी अपनी स्कॉलरशिप वाली लड़की ही महसूस करती थी।

     

    सुबह हुई। प्रिया ने सर्च किया – डॉक्टर आदित्य शर्मा, रिटायर्ड कार्डियोलॉजिस्ट। एक पुराना हॉस्पिटल का एड्रेस मिला: “सर गंगा राम हॉस्पिटल, राजिंदर नगर”। लेकिन आदित्य अब वहां नहीं थे। एक कॉन्टैक्ट नंबर मिला – एक पुराने सहकर्मी का। प्रिया ने कॉल किया। आवाज कांपी, लेकिन हिम्मत बांधी।

     

    “हैलो… डॉक्टर आदित्य शर्मा से बात करनी है।”

     

    दूसरी तरफ से एक बुजुर्ग आवाज आई। “बेटी, आदित्य जी तो रिटायर हो चुके हैं। अब साउथ दिल्ली में एक छोटे से अपार्टमेंट में रहते हैं। लेकिन… आप कौन?”

     

    प्रिया ने हिचकिचाते हुए कहा, “एक पुरानी दोस्त की बेटी। मिलना चाहती हूं। एड्रेस?”

     

    एड्रेस मिल गया। प्रिया ने टैक्सी ली। रास्ते में वो डायरी पढ़ती रही। मां के शब्द: “आदित्य… मेरा पहला प्यार। हमारी शादी टूट गई क्योंकि उसके परिवार ने मना कर दिया। फिर रानी बनकर राजेश से शादी की। लेकिन प्रिया… वो तेरी है।”

     

    दिल्ली की भीड़भाड़ वाली सड़कें प्रिया को घुटन महसूस करा रही थीं। अपार्टमेंट पहुंची – पुराना, लेकिन साफ। फ्लैट नंबर 304। प्रिया ने बेल बजाई। दरवाजा खुला। सामने एक साठ के करीब आदमी खड़े थे – सफेद बाल, चश्मा, सादा कुर्ता-पायजामा। चेहरा थका हुआ, लेकिन आंखें गर्म।

     

    “जी… आप?” आदित्य ने पूछा।

     

    प्रिया की आंखें भर आईं। “अंकल… मैं प्रिया हूं। रानी की बेटी।”

     

    आदित्य का चेहरा सफेद पड़ गया। वो पीछे हटे, जैसे किसी पुरानी याद ने जोर का धक्का मारा हो। “प्रिया? रानी की…?” वो कमरे में चले गए। प्रिया अंदर आई। छोटा सा फ्लैट – दीवारों पर पुरानी तस्वीरें, किताबें, और एक टेबल पर मेडिकल जर्नल्स।

     

    आदित्य ने पानी का गिलास थमाया। हाथ कांप रहे थे। “बेटी… बैठ। बताओ, कैसे पहुंची यहां?”

     

    प्रिया ने डायरी निकाली और मां का लेटर दिखाया। आदित्य ने पढ़ा। आंसू गिर पड़े। “रानी… वो तो कहती थीं कि बच्चा राजेश का है। लेकिन… आंखें… तेरी आंखें मेरी जैसी हैं।”

     

    प्रिया ने पूछा, “अंकल… आप मेरा पिता हैं ना?”

     

    आदित्य ने सिर हिलाया। फिर धीरे-धीरे अपना बैकग्राउंड बताना शुरू किया। वो कुर्सी पर बैठे, जैसे बीस साल पुरानी कहानी को फिर से जी रहे हों।

     

    “मैं आदित्य शर्मा, 1965 में जन्मा। दिल्ली के एक मिडिल क्लास परिवार में। पिता सरकारी क्लर्क थे, मां टीचर। बचपन से ही डॉक्टर बनना चाहता था। एम्स से एमबीबीएस किया, फिर कार्डियोलॉजी में स्पेशलाइजेशन। 90 के दशक में सर गंगा राम हॉस्पिटल में जॉइन किया। वहां रानी से मिला। वो नर्स थी – हंसमुख, मेहनती। हमारी लव स्टोरी फिल्मी थी। हॉस्पिटल के गार्डन में कॉफी पीते, रातों को ड्यूटी के बाद बातें करते।”

     

    प्रिया सुन रही थी। “फिर?”

     

    “हम शादी करना चाहते थे। लेकिन मेरा परिवार… ब्राह्मण, और रानी का बैकग्राउंड अलग। उसके पिता ने भी मना किया। फिर राजेश ठाकुर आया – अमीर, प्रभावशाली। रानी ने मजबूरी में शादी कर ली। मैंने हार मान ली। हॉस्पिटल छोड़ दिया, प्राइवेट प्रैक्टिस शुरू की। लेकिन दिल टूटा। सालों तक सिंगल रहा। फिर 2005 में एक छोटी सी NGO शुरू की – ‘हृदय सेवा’। गरीबों के लिए फ्री हार्ट चेकअप। आज भी चल रही है, लेकिन छोटे स्तर पर।”

     

    प्रिया ने पूछा, “मां के बारे में… एक्सीडेंट?”

     

    आदित्य की आंखें नम हो गईं। “रानी ने कभी नहीं बताया कि तू मेरी बेटी है। लेकिन एक्सीडेंट की खबर सुनी तो… टूट गया। राजेश ने कहा बच्ची भी मर गई। मैंने विश्वास कर लिया। उसके बाद जीवन… बस चलता रहा। कोई शादी नहीं, कोई बच्चे नहीं। बस काम। अब रिटायर्ड हूं, पेंशन पर जीता हूं। NGO को देखता हूं।”

     

    प्रिया ने अपना हाथ उसके हाथ पर रखा। “अंकल… पापा… अब मैं हूं ना।”

     

    आदित्य रो पड़े। “प्रिया… तू… मेरी बेटी। रानी की तरह स्ट्रॉन्ग। लेकिन ठाकुर फैमिली? राजेश?”

     

    प्रिया ने सब बताया – आश्रम, शिमला, आरव, विक्रम की साजिश। आदित्य सुनते रहे। फिर बोले, “बेटी, मैं तेरे साथ हूं। लेकिन राजेश को क्या कहेंगे? वो तुझे अपना मानते हैं।”

     

    “पापा… राजेश अंकल ने मुझे अपनाया। लेकिन सच तो सच है।”

     

    दोपहर को दोनों NGO गए। ‘हृदय सेवा’ एक छोटा सा क्लिनिक था – गरीब इलाके में। आदित्य ने प्रिया को दिखाया – मरीजों की लाइन, फ्री मेडिसिन। “ये मेरा परिवार था। अब तू भी इसमें शामिल हो।”

     

    प्रिया को अच्छा लगा। वो एक छोटी बच्ची का चेकअप करने में मदद की। आदित्य मुस्कुराए। “तू डॉक्टर बनेगी?”

     

    “शायद। लेकिन पहले कॉलेज कंपलीट।”

     

    शाम को प्रिया ने फैसला लिया – अभी शिमला लौटेगी। लेकिन आदित्य को साथ ले जाएगी। “पापा, शिमला चलिए। आरव से मिलिए। सबको बताएंगे।”

     

    आदित्य हिचकिचाए। “बेटी, अचानक… राजेश क्या कहेंगे?”

     

    “वो समझेंगे। वो अच्छे हैं।”

     

    ट्रेन में दोनों बैठे। आदित्य ने पुरानी तस्वीरें दिखाईं – रानी के साथ। प्रिया ने देखा। “मां कितनी खूबसूरत।”

     

    “हां… और तू वैसी ही।”

     

    शिमला पहुंचे। ठाकुर हाउस में आरव इंतजार कर रहा था। प्रिया की चिट मिलने के बाद वो चिंतित था। रिया भी। दरवाजा खुला तो आरव ने प्रिया को गले लगाया। “कहां गई थी? डर गया था।”

     

    प्रिया ने आदित्य को इंट्रोड्यूस किया। “भैया… ये आदित्य शर्मा। मेरा… असली पिता।”

     

    आरव चौंका। रिया की आंखें बड़ी हो गईं। “क्या?”

     

    प्रिया ने डायरी दिखाई। सबने सुना। आरव ने आदित्य को देखा। पहले शॉक, फिर मुस्कुराहट। “अंकल… वेलकम। चाहे खून का हो या न हो, प्रिया हमारी बहन है। आप भी फैमिली।”

     

    पापा राजेश आए। आदित्य से मिले। दोनों पुराने दोस्त जैसे बात की। राजेश ने कहा, “आदित्य जी, प्रिया ने मुझे भी अपनाया। आप भी आइए।”

     

    रिया ने कहा “अब दो पापा? प्रिया, तू लकी है! लेकिन भैया, अब प्रिया को दो गुना प्रोटेक्ट करना पड़ेगा।”

     

    सब हंसे। लेकिन प्रिया का दिल हल्का था। रोमांस? अभी दूर। विक्रांत का मैसेज आया – “लौट आई? कॉफी?” प्रिया ने सिर्फ “हां, कल” लिखा। धीरे-धीरे।

     

    रात को प्रिया अपनी बालकनी में खड़ी थी। दो पिता, एक भाई, दोस्त। जिंदगी पूरी हो रही थी। लेकिन अवनी का वो तंज – “कुछ राज़ बाकी” – अभी गूंज रहा था। क्या और कुछ छिपा है?

     

  • Dil sabhal ja jara part – 7

    Dil sabhal ja jara part – 7

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    Part – 7 dil ki uljhane

     

    ठाकुर हाउस की सुबह अब प्रिया के लिए नई रूटीन बन चुकी थी। वो जल्दी उठती, मां की तस्वीर के सामने दो मिनट खामोशी से खड़ी रहती, फिर किचन में पापा के लिए चाय बनाती। आरव नीचे आता तो दोनों भाई-बहन जैसे पहले की तरह हंसते-बोलते ब्रेकफास्ट करते। लेकिन अब हर हंसी के पीछे एक अनकही उलझन थी – रानी मां की डायरी का वो आखिरी पेज।

     

    प्रिया ने अभी तक किसी को नहीं बताया कि वो दिल्ली जाकर आदित्य शर्मा को ढूंढने का प्लान बना रही है। आरव को भी नहीं। उसे डर था कि अगर आरव को पता चला कि वो खून का भाई नहीं है, तो उनका रिश्ता बदल जाएगा। और प्रिया नहीं चाहती थी कि कुछ बदले। आरव उसके लिए अब भी वही था – ढाल, सहारा, सबसे करीबी।

     

    कॉलेज में दिन नॉर्मल चल रहे थे। विक्रांत क्लास में प्रिया के पास बैठता, नोट्स शेयर करता, लेकिन अब प्रिया थोड़ा दूर रहने लगी थी। विक्रांत की मुस्कुराहट अच्छी लगती थी, लेकिन दिल अभी किसी के लिए तैयार नहीं था। वो बस मुस्कुराकर बात टाल देती।

     

    एक दिन लंच में विक्रांत ने कहा, “प्रिया, वीकेंड पर माल रोड पर कॉफी पीने चलेंगी? सिर्फ दोस्तों की तरह।”

     

    प्रिया ने हिचकिचाते हुए कहा, “विक्रांत… अभी मैं थोड़ा बिजी हूं। फैमिली मैटर्स। बाद में देखते हैं।”

     

    विक्रांत ने निराश होकर मुस्कुराया। “कोई बात नहीं। जब मन करे बताना।”

     

    रिया ने साइड से देखकर प्रिया को चिढ़ाया, “यार, इतना अच्छा लड़का और तू मना कर रही है? कम से कम ट्राई तो कर!”

     

    प्रिया ने धीरे से कहा, “रिया, दिल अभी कहीं और उलझा हुआ है। समझ नहीं आ रहा क्या करूं।”

     

    रिया ने गंभीर होकर पूछा, “आरव से संबंधित?”

     

    प्रिया चुप रही। बस सिर हिलाया।

     

    शाम को घर लौटते वक्त आरव कार लेकर आया। “चल प्रिया, आज मैं ड्राइव करूंगा। रिया भी आ जा।”

     

    रास्ते में रिया ने कॉमेडी शुरू की। “आरव भैया, आपकी कार में एसी क्यों नहीं चल रहा? गर्मी लग रही है!”

     

    आरव ने शीशा नीचे किया। “रिया, हिमाचल में गर्मी? तू मुंबई की आदत से परेशान है।”

     

    रिया ने प्रिया को कोहनी मारी। “देख प्रिया, तेरे भैया कितने कंजूस हैं। अमीर होकर भी एसी नहीं चलाते।”

     

    प्रिया हंस पड़ी। आरव ने आईने से देखकर कहा, “रिया, अगली बार तुझे पैदल छोड़ दूंगा।”

     

    घर पहुंचकर तीनों लॉन में बैठे। सनसेट देख रहे थे। आरव ने प्रिया से पूछा, “क्या हुआ? आज क्लास में चुप थी।”

     

    प्रिया ने कहा, “बस थकान है भैया।”

     

    आरव ने उसके सिर पर हाथ रखा। “प्रिया, अब तू घर में है। कोई टेंशन नहीं। जो भी हो, मुझे बता। हम साथ हैं।”

     

    प्रिया की आंखें नम हो गईं। वो कुछ बोल नहीं पाई। बस मुस्कुराई। उस पल उसे लगा कि चाहे खून का रिश्ता हो या न हो, आरव से ज्यादा करीबी कोई नहीं। लेकिन डायरी का राज़ उसे अंदर ही अंदर खाए जा रहा था।

     

    रात को प्रिया ने अकेले में दिल्ली के डॉक्टर आदित्य शर्मा को सर्च किया। एक पुराना आर्टिकल मिला – दिल्ली के बड़े हॉस्पिटल में कार्डियोलॉजिस्ट थे। अब रिटायर्ड। फोटो में एक सज्जन पुरुष थे, जिनकी आंखें… प्रिया से मिलती-जुलती थीं।

     

    प्रिया ने मन ही मन फैसला किया – अकेले जाएगी दिल्ली। बिना किसी को बताए।

     

    अगले दिन कॉलेज में अवनी ने फिर तंज कसा। “प्रिया, अब तो तू ठाकुर हाउस की मालकिन है। फिर हॉस्टल की तरह सादे कपड़े क्यों?”

     

    रिया ने जवाब दिया, “अवनी, स्टाइल पैसे से नहीं दिल से आता है। तू कितना भी मेकअप कर ले, अंदर से खाली है।”

     

    अवनी गुस्से में चली गई। लेकिन जाते-जाते बोली, “प्रिया, कुछ राज़ अभी बाकी हैं। जल्दी सबके सामने आएंगे।”

     

    प्रिया को लगा अवनी कुछ जानती है। लेकिन वो इग्नोर कर गई।

     

    शाम को आरव ने प्रिया को सरप्राइज दिया। पुरानी हवेली को रेनोवेट करवाने का प्लान। “प्रिया, वो हवेली मम्मी की फेवरेट थी। हम उसे दोबारा बनवाएंगे। तू डिजाइन कर।”

     

    प्रिया खुश हो गई। दोनों पुरानी हवेली गए। कमला दाई भी साथ थी। वहां बैठकर पुरानी यादें शेयर कीं। आरव ने बताया कैसे छोटा होने पर मम्मी उसे और प्रिया को झूला झुलाती थीं।

     

    प्रिया की आंखें भर आईं। “भैया… मुझे कुछ याद नहीं। लेकिन अब लगता है जैसे सब वापस आ रहा है।”

     

    आरव ने कहा, “प्रिया, तू मेरे लिए हमेशा छोटी बहन रहेगी। चाहे कुछ भी हो।”

     

    प्रिया ने उसे गले लगाया। उस पल दोनों के दिल में एक अजीब सा सुकून था। लेकिन प्रिया को पता था कि सच छिपाना अब ज्यादा दिन नहीं चल सकता।

     

    रात को विक्रांत का मैसेज आया – “हाय, गुड नाइट। बस सोचा पूछ लूं सब ठीक तो है?”

     

    प्रिया ने जवाब दिया – “हां, थैंक्स। गुड नाइट।”

     

    बस इतना। कोई इमोजी। कोई एक्स्ट्रा बात। रोमांस अभी दूर था। दिल अभी उलझनों में था।

     

    अगली सुबह प्रिया ने ट्रेन की टिकट बुक कर ली – दिल्ली के लिए। अकेले। रिया को भी नहीं बताया। सिर्फ एक चिट लिखी – “थोड़े दिन के लिए बाहर जा रही हूं। चिंता मत करना। जल्दी लौटूंगी।”

     

    ट्रेन में बैठते वक्त प्रिया ने पेंडेंट छुआ। “मां… अब सच जानने का वक्त आ गया है।”

     

    शिमला पीछे छूट रहा था। ठाकुर हाउस, आरव, रिया – सब। लेकिन प्रिया का मन भारी था। क्या दिल्ली से लौटकर सब वही रहेगा? या सब बदल जाएगा?

     

    दूसरी तरफ ठाकुर हाउस में आरव को प्रिया की चिट मिली। वो चिंतित हो गया। “प्रिया कहां गई? अकेले?”

     

    रिया ने कहा, “शायद कुछ पर्सनल। लेकिन भैया, तू इतना टेंशन क्यों ले रहा है? प्रिया बड़ी हो गई है।”

     

    आरव ने गहरी सांस ली। “रिया, प्रिया मेरे लिए सिर्फ बहन नहीं… कुछ और भी है। समझ नहीं आ रहा।”

     

    रिया चौंकी। “मतलब?”

     

    आरव चुप हो गया। बाहर बारिश शुरू हो गई। दोनों की आंखों में एक ही सवाल – प्रिया कब लौटेगी, और लौटेगी तो क्या साथ लाएगी?

     

    दिल्ली की ट्रेन तेज़ चल रही थी। प्रिया खिड़की से बाहर देख रही थी। नया राज़ खुलने वाला था।