अपनों के बीच होकर भी गैर हो गया हूं मैं,
क्या कहूं ऐ जिन्दगी कितना मजबूर हो गया हूं मैं ,
हंसी होंठों से जाने नहीं देता
इस दिल से कितना बेगैरत हो गया हूं मैं ,
यादों की लाली मेरी आंखों से जाती नहीं,
बस कह नहीं सकता कितना टूट गया हूं मैं,
अकेलापन अब तो सालता है मुझे ,
आ देख! मुझे आकर तेरे बगैर कैसे जी रहा हूं मैं ,
अकेलापन महसूस किया है मैंने अब तेरी पनाहों में,
क्या कहूं दिल से कितना मजबूर हो गया हूं मैं …!!

NSW उभरते लेखक – 🥈
लेखक नहीं हूं फिर भी कुछ ना कुछ लिखती हूं ,
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