मैं क्यों भला इस व्यर्थ के दर्द में तड़पती रहूं,
दूसरों की ख़ातिर खुद ही से लड़ती रहूं।
जब आसमां ने दिए हैं पंख मुझे उड़ने को,
तो फिर ज़मीन की बंदिशों से क्यों डरती रहूं।
ग़म के साए में रहकर अपनी चमक खोना नहीं,
अब किसी की बेरुखी पर बैठकर रोना नहीं।
तोड़ फेंकी हैं मैंने खामोशी की ज़ंजीरें,
अपनी क़िस्मत की रेखाएं अब खुद लिखूंगी।
रौशनी मेरी अपनी है, मैं यूं ही चमकती रहूं।


प्रातिक्रिया दे