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टैग: #दर्द #संघर्ष #प्रेरणा

  • वक्त का फ़ैसला

    वक्त का फ़ैसला

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

     

    सेआस

    वक्त जब कोई फैसला सुनाता है,

    शुरुआत में वो समझ कहाँ आता है।

    जिसे हम अपनी हार मान बैठते हैं,

    वो अक्सर किसी बड़े दर्द से बचाता है।

    ​टूटे हुए सपनों पर जब आँखें रोती हैं,

    तब किस्मत नई राहों के बीज बोती है।

    हर बंद रास्ते के पीछे एक नई सहर होती है,

    वक्त की चाल थोड़ी धीमी पर बेअसर नहीं होती है।

    ​आज जो फैसला एक बोझ लगता है,

    कल वही हमारी सबसे बड़ी ताकत बनता है।

    इंतज़ार करो, थोड़ा भरोसा रखो उस पर,

    वक्त हर सवाल का सही जवाब गढ़ता है।

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • मैं क्यू भला इस दर्द में

    मैं क्यू भला इस दर्द में

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

     

    मैं क्यों भला इस व्यर्थ के दर्द में तड़पती रहूं,

    दूसरों की ख़ातिर खुद ही से लड़ती रहूं।

    जब आसमां ने दिए हैं पंख मुझे उड़ने को,

    तो फिर ज़मीन की बंदिशों से क्यों डरती रहूं।

    ग़म के साए में रहकर अपनी चमक खोना नहीं,

    अब किसी की बेरुखी पर बैठकर रोना नहीं।

    तोड़ फेंकी हैं मैंने खामोशी की ज़ंजीरें,

    अपनी क़िस्मत की रेखाएं अब खुद लिखूंगी।

    रौशनी मेरी अपनी है, मैं यूं ही चमकती रहूं।

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • बीता कल

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    कभी-कभी बीता कल दिल को बहुत सताता है,

    पर हर नया सवेरा नई राह दिखाता है।

    जो हुआ, उसे बदलना मेरे बस में नहीं,

    पर उससे आगे बढ़ना मुश्किल भी नहीं।

    यादों को धीरे-धीरे खुद से दूर कर दूँगी,

    एक दिन मुस्कुराकर कहूँगी …मैं फिर से जी लूँगी।

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • बचपन जो लौट कर नहीं आया

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    बचपन जो लौटकर कभी नहीं आया 

     

    “मम्मी… मुझे भी स्कूल जाना है…”

     

    तेरह साल की राधा अपने आठ महीने के बेटे को गोद में लेकर घर के बाहर बने छोटे से आँगन में बैठी थी। सामने वाली सड़क से स्कूल की वर्दी पहने बच्चे हँसते-मुस्कुराते जा रहे थे। किसी के हाथ में किताबें थीं, किसी के कंधे पर भारी बस्ता था, तो कोई अपने दोस्तों के साथ शरारत करते हुए आगे बढ़ रहा था।

     

    राधा की नज़रें उन बच्चों पर ही टिक गईं। उसकी आँखों में आँसू आ गए। कभी वह भी उन्हीं बच्चों की तरह स्कूल जाया करती थी। उसे हिंदी की कहानियाँ पढ़ना और चित्र बनाना बहुत पसंद था। वह अक्सर अपनी माँ से कहती थी, “मैं बड़ी होकर टीचर बनूँगी।”

     

    लेकिन किस्मत ने उसके लिए कुछ और ही लिख रखा था।

     

    राधा सातवीं कक्षा में पढ़ती थी। उसी स्कूल में रोहित नाम का एक लड़का भी पढ़ता था। उसकी उम्र तेईस साल थी। कई बार फेल होने के कारण वह अब भी स्कूल आता था। शुरुआत में वह राधा से सामान्य बातें करता, उसकी कॉपी उठाकर दे देता और कभी-कभी टॉफी या चॉकलेट भी दे देता।

     

    राधा मासूम थी। उसे समझ नहीं था कि एक बड़े लड़के का इस तरह उसके करीब आना ठीक नहीं है।

     

    धीरे-धीरे रोहित ने उसे यह विश्वास दिला दिया कि वही उससे सबसे ज़्यादा प्यार करता है। वह कहता, “मैं तुम्हें हमेशा खुश रखूँगा। कोई तुम्हें डाँटेगा नहीं। बस एक बार मेरे साथ चलो।”

     

    राधा ने बिना कुछ समझे उसकी बातों पर भरोसा कर लिया।

     

    एक दिन वह घर से उसके साथ चली गई। दोनों ने कुछ लोगों की मौजूदगी में शादी जैसा एक दिखावा कर लिया। किसी ने यह नहीं सोचा कि राधा अभी सिर्फ तेरह साल की बच्ची है। उसके हाथों में अभी किताबें होनी चाहिए थीं, घर-गृहस्थी की जिम्मेदारियाँ नहीं।

     

    कुछ महीनों बाद राधा को पता चला कि वह गर्भवती है।

     

    यह खबर सुनकर उसके पैरों तले जमीन खिसक गई। उसे खुद समझ नहीं आ रहा था कि उसके साथ क्या हो रहा है। उसका शरीर अभी पूरी तरह विकसित भी नहीं हुआ था। गर्भावस्था उसके लिए बेहद कठिन रही। उसे बार-बार कमजोरी, चक्कर और तेज़ बुखार आने लगा। कई बार डॉक्टरों के पास ले जाना पड़ा।

     

    आख़िरकार उसने एक बेटे को जन्म दिया।

     

    सब लोग बच्चे को देखकर खुश थे, लेकिन किसी ने उस छोटी बच्ची के चेहरे की थकान नहीं देखी, जिसने अपना बचपन खो दिया था।

     

    आज उसका बेटा आठ महीने का हो चुका था।

     

    रात में जब बच्चा रोता, तो राधा भी उसके साथ रो पड़ती। कई बार उसे खुद तेज़ बुखार होता, फिर भी वह बेटे को सीने से लगाए रखती। उसे समझ नहीं आता कि पहले बच्चे को संभाले या खुद को।

     

    रोहित भी अब पहले जैसा नहीं रहा था। शादी से पहले जो हर वक्त प्यार और साथ निभाने की बातें करता था, वही अब छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा करने लगा था। काम ठीक से नहीं चलता था, पैसों की तंगी रहती थी और घर में रोज़ झगड़े होने लगे थे।

     

    एक दिन राधा ने हिम्मत करके कहा, “क्या मैं फिर से स्कूल जा सकती हूँ?”

     

    रोहित ने बिना उसकी तरफ देखे जवाब दिया, “अब स्कूल जाकर क्या करोगी? अब तुम एक बच्चे की माँ हो।”

     

    ये शब्द सुनकर राधा का दिल टूट गया। उसे पहली बार एहसास हुआ कि उसने बहुत छोटी उम्र में ऐसा फैसला लिया था, जिसकी कीमत उसे पूरी जिंदगी चुकानी पड़ सकती है।

     

    उस रात वह देर तक जागती रही। बेटा उसकी गोद में सो रहा था और उसकी आँखों से लगातार आँसू बह रहे थे। उसे अपनी पुरानी किताबें, अपनी सहेलियाँ, स्कूल का मैदान और अपने अधूरे सपने याद आने लगे।अगले भाग में कहानी आगे बढ़ेगी, जहाँ राधा की ज़िंदगी में एक नया मोड़ आएगा और वह अपने बेटे के भविष्य के लिए एक बड़ा फैसला लेगी।

     

    अगली सुबह राधा अपने बेटे को गोद में लेकर चुपचाप बैठी थी। तभी उसके गाँव में रहने वाली उसकी पुरानी स्कूल टीचर, सीमा मैडम, किसी काम से वहाँ आईं। उनकी नज़र जैसे ही राधा पर पड़ी, वे उसे पहचान ही नहीं पाईं।

    “राधा… तुम?”

    राधा ने सिर झुका लिया। उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। सीमा मैडम ने जब उसकी गोद में छोटा-सा बच्चा देखा तो वे सब समझ गईं। उन्होंने राधा का हाथ पकड़ लिया और पास बैठ गईं।

     

    “बेटी, तुम्हारे साथ जो हुआ, उसे बदला नहीं जा सकता। लेकिन तुम्हारा भविष्य अभी भी खत्म नहीं हुआ है।”

     

    राधा फूट-फूटकर रो पड़ी।

     

    “मैडम… मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई। मुझे लगा था कि प्यार ही सब कुछ होता है। मुझे नहीं पता था कि मेरी पूरी जिंदगी बदल जाएगी।”

     

    सीमा मैडम ने उसके आँसू पोंछते हुए कहा, “गलती से सीखना ही सबसे बड़ी समझदारी होती है। तुम अभी भी पढ़ सकती हो।”

     

    उनकी बातें राधा के दिल में उतर गईं।

     

    कुछ दिनों बाद गाँव में बच्चों की शिक्षा और बाल विवाह के प्रति जागरूकता का एक शिविर लगा। राधा भी अपने बेटे को लेकर वहाँ पहुँची। मंच पर एक अधिकारी कह रहे थे, “हर बच्चे को बचपन, शिक्षा और सुरक्षित भविष्य का अधिकार है। कम उम्र में शादी और गर्भावस्था बच्चों के जीवन पर गहरा असर डाल सकती है।”

     

    ये शब्द सुनकर राधा की आँखें भर आईं। उसे अपनी पुरानी कक्षा, ब्लैकबोर्ड, सहेलियाँ और स्कूल की घंटी याद आने लगी। उसने महसूस किया कि उसने जिस उम्र में सपने देखने थे, उस उम्र में जिम्मेदारियों का बोझ उठा लिया।

     

    शिविर के बाद सीमा मैडम फिर उससे मिलीं। उन्होंने कहा, “राधा, अगर तुम चाहो तो घर से पढ़ाई शुरू कर सकती हो। मैं तुम्हारी मदद करूँगी।”

     

    उस दिन राधा ने पहली बार उम्मीद की एक किरण महसूस की।

     

    उसने अपनी पुरानी किताबें निकालीं। जब उसका बेटा सो जाता, वह पढ़ने बैठ जाती। कभी-कभी थकान से उसकी आँखें बंद होने लगतीं, लेकिन फिर वह अपने सपने याद करके दोबारा किताब खोल लेती।

     

    धीरे-धीरे उसके माता-पिता का भी दिल पिघलने लगा। उन्होंने महसूस किया कि उनकी बेटी अभी खुद भी बच्ची है। वे समय-समय पर उसके बेटे को संभाल लेते ताकि राधा कुछ घंटे पढ़ सके।

     

    एक दिन राधा अपने बेटे को गोद में लेकर आईने के सामने खड़ी थी। उसने मुस्कुराकर कहा, “मैंने अपना बचपन खो दिया, लेकिन तुम्हारा कभी नहीं खोने दूँगी।”

     

    उसने तय कर लिया कि उसका बेटा सही उम्र में स्कूल जाएगा, खूब पढ़ेगा और अपने जीवन के फैसले समझदारी से लेगा।

     

    समय बीतता गया। राधा ने अपनी पढ़ाई दोबारा शुरू कर दी। रास्ता आसान नहीं था। घर के काम, बच्चे की देखभाल और पढ़ाई—सब कुछ साथ संभालना पड़ता था। कई बार लोग ताने भी मारते, “अब पढ़कर क्या करेगी?”

     

    लेकिन इस बार राधा चुप नहीं रहती। वह मुस्कुराकर कहती, “पढ़ाई की कोई उम्र नहीं होती।”

     

    उसकी यही बात धीरे-धीरे दूसरी लड़कियों के लिए भी हिम्मत बन गई। गाँव की कई बच्चियाँ, जो पढ़ाई छोड़ने वाली थीं, उन्होंने अपने माता-पिता से पढ़ने की जिद की।

     

    कुछ साल बाद वही राधा एक कार्यक्रम में बच्चों और अभिभावकों के सामने खड़ी थी। उसने अपनी कहानी सुनाते हुए कहा,

     

    “एक गलत फैसला मेरा बचपन छीन ले गया। लेकिन मैंने ठान लिया कि मेरी गलती किसी और बच्ची की किस्मत नहीं बनेगी। हर बेटी को पढ़ने का अधिकार है और हर बच्चे को अपना बचपन जीने का हक है।”

     

    तालियों की गूँज पूरे हॉल में फैल गई।

     

    राधा ने अपने बेटे की ओर देखा। वह मुस्कुराते हुए अपनी किताब हाथ में पकड़े बैठा था।

     

    राधा की आँखें नम थीं, लेकिन इस बार उन आँसुओं में दर्द नहीं, बल्कि सुकून था। उसे विश्वास था कि भले ही उसका बचपन लौटकर कभी नहीं आया, लेकिन उसने अपने बेटे और कई दूसरी बच्चियों का भविष्य ज़रूर बदल दिया।

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    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं