मथुरा की उस रात में कुछ तो अलग था।
आसमान पर काले बादल इस तरह छाए हुए थे, जैसे पूरी धरती को अपने भीतर समेट लेना चाहते हों। चारों ओर घना अंधकार था। तेज हवाएँ महल की ऊँची दीवारों से टकराकर एक अजीब-सी आवाज पैदा कर रही थीं। यमुना भी जैसे उस रात शांत नहीं थी। उसकी लहरें बार-बार किनारों से टकरा रही थीं।
मथुरा के राजमहल में सब कुछ सामान्य दिखाई दे रहा था, लेकिन उसी महल की एक अंधेरी कोठरी में एक माँ अपने आठवें बच्चे के जन्म की प्रतीक्षा कर रही थी।
वह थीं—देवकी।
और उनके पास बैठे वसुदेव बार-बार अपनी पत्नी को देखते, फिर उस भारी लोहे के द्वार की ओर देखते, जिसके बाहर कंस के सैनिक पहरा दे रहे थे।
छह बच्चों को अपनी आँखों के सामने खोने के बाद देवकी के भीतर अब भय से भी बड़ी एक थकान थी।
सातवाँ गर्भ भी उनसे छीन लिया गया था, लेकिन उन्हें क्या पता था कि वह बालक रोहिणी की गोद में पल रहा है।
और अब… उनका आठवाँ पुत्र जन्म लेने वाला था।
वही आठवाँ पुत्र, जिसके जन्म से कंस भयभीत था।
कंस ने जिस भविष्यवाणी को मिटाने के लिए वर्षों से निर्दोष बच्चों का रक्त बहाया था, आज उसी भविष्यवाणी का समय निकट आ चुका था।
देवकी ने पीड़ा से आँखें बंद कर लीं। वसुदेव ने उनका हाथ थाम लिया।
उनके पास अपनी पत्नी को दिलासा देने के लिए शब्द नहीं थे। जिस बच्चे के आने की खुशी होनी चाहिए थी, उसके जन्म के साथ मृत्यु का भय खड़ा था।
देवकी के चेहरे पर आँसू थे, लेकिन उन आँसुओं में केवल डर नहीं था एक माँ की ममता भी थी।
वह जानती थीं कि कंस इस बच्चे को भी नहीं छोड़ेगा।
फिर भी उनके भीतर कहीं एक विश्वास था… शायद इस बार कुछ अलग होगा।
रात गहरी होती चली गई। और फिर आधी रात के समय अचानक उस कारागार में एक अद्भुत प्रकाश फैल गया।
जिस कोठरी में अब तक अंधकार था, वहाँ दिव्य आभा छा गई।
देवकी ने आँखें खोलीं, उनके सामने एक अद्भुत बालक था।
श्याम वर्ण, कमल जैसे नेत्र। मुख पर ऐसी शांति, जैसी संसार के किसी सामान्य शिशु के चेहरे पर नहीं हो सकती थी।
उसके जन्म के साथ ही जैसे पूरी प्रकृति कुछ क्षणों के लिए ठहर गई।
वसुदेव उस बालक को देखते ही भाव-विभोर हो गए।
उनके भीतर पिता का प्रेम उमड़ आया, लेकिन उसी के साथ उन्हें वह भविष्यवाणी भी याद थी , यह कोई साधारण बालक नहीं था।
यह वही था, जिसके लिए देवकी ने इतने दुख सहे थे, जिसके लिए वसुदेव ने अपनी असहायता का हर क्षण जिया था।
देवकी ने अपने पुत्र को अपनी बाँहों में भर लिया, उस क्षण उनके चेहरे पर वर्षों बाद ऐसी शांति दिखाई दी, जैसे उनके सारे दुखों को उस छोटे-से चेहरे ने अपने भीतर समेट लिया हो।
उनकी आँखों से आँसू बहते रहे, लेकिन इस बार वे आँसू दुख के नहीं थे।
वे माँ बनने की पूर्णता के आँसू थे।
कुछ ही क्षणों बाद दिव्य बालक ने अपने माता-पिता को अपने वास्तविक स्वरूप का दर्शन कराया।
देवकी और वसुदेव समझ गए कि उनके सामने स्वयं नारायण हैं।
लेकिन भगवान का उद्देश्य केवल दर्शन देना नहीं था।
उन्हें गोकुल जाना था। वहीं नंद और यशोदा के घर जन्मी कन्या को लेकर मथुरा लौटना था।
वसुदेव ने जैसे ही अपने पुत्र को उठाने के लिए हाथ बढ़ाया, उसी क्षण कारागार के सारे बंधन टूट गए।
लोहे की भारी बेड़ियाँ उनके पैरों से अलग हो गईं।
द्वार अपने आप खुल गए। बाहर पहरा दे रहे सैनिक गहरी नींद में सो गए।
वसुदेव कुछ पल उस खुले द्वार को देखते रहे।
जिस कारागार से निकलना असंभव था, आज वही उनके लिए मार्ग बन चुका था।
उन्होंने बालक को एक टोकरी में रखा और उसे अपने सिर पर उठा लिया।
देवकी की आँखें अपने पुत्र पर टिकी थीं।
एक माँ के लिए अपने नवजात बच्चे को किसी और के हाथों सौंप देना कितना कठिन होता है, यह केवल वही जान सकती थी।
देवकी जानती थीं कि यह विदाई आवश्यक है।
फिर भी उनका मन बार-बार कह रहा था, बस एक बार और उसे अपनी बाँहों में भर लूँ।
वसुदेव ने उन्हें आश्वासन भरी दृष्टि से देखा। फिर वह भारी मन से बाहर निकल पड़े। कारागार के बाहर मथुरा सो रही थी।
लेकिन प्रकृति जाग रही थी। बारिश तेज हो चुकी थी।
वसुदेव बालक को सिर पर उठाए यमुना की ओर बढ़ते रहे।
हर कदम के साथ पानी बढ़ता जा रहा था। यमुना अपने पूरे उफान पर थी।
एक ओर नवजात शिशु। दूसरी ओर गहरी नदी।
और पीछे कंस का भय। लेकिन वसुदेव के कदम नहीं रुके।
वह पानी में उतर गए। धीरे-धीरे पानी उनके घुटनों तक पहुँचा।
फिर कमर तक। फिर और ऊपर।
वसुदेव अपने बच्चे को दोनों हाथों से संभाले हुए आगे बढ़ते रहे।
उनकी चिंता अपने लिए नहीं थी। उनकी आँखों में केवल एक डर था, कहीं उनके नवजात शिशु को कुछ हो न जाए।
उसी समय आकाश में बिजली चमकी, बारिश और तेज हो गई।
तभी एक अद्भुत घटना हुई। शेषनाग ने अपना विशाल फन फैलाकर बालक के ऊपर छत्र बना दिया।
तेज बारिश अब उस दिव्य शिशु को छू भी नहीं पा रही थी।
वसुदेव ने एक पल ऊपर देखा। उनके भीतर श्रद्धा और आश्चर्य एक साथ उमड़ पड़े।
मानो स्वयं प्रकृति उस बालक की रक्षा कर रही हो।
और तभी यमुना का जल धीरे-धीरे शांत होने लगा।
वसुदेव आगे बढ़ते गए। कुछ ही समय बाद वह नदी पार कर गोकुल की सीमा तक पहुँच गए।
गोकुल उस समय गहरी नींद में था। नंद भवन में भी सब शांत था।
यशोदा प्रसव के बाद अचेत अवस्था में थीं। वसुदेव धीरे से भीतर पहुँचे।
उन्होंने देखा, यशोदा के पास एक नवजात कन्या थी।
वसुदेव का हृदय भारी हो गया। उन्होंने अपने पुत्र को अंतिम बार देखा।
वह छोटा-सा श्याम चेहरा… शांत आँखें… और वह मासूम मुस्कान…
वसुदेव के हाथ काँप उठे।
जिस पुत्र को पाने के लिए उन्होंने वर्षों तक प्रतीक्षा की थी, उसे अपनी आँखों से दूर करना पड़ रहा था।
लेकिन यह संसार के कल्याण का मार्ग था।
उन्होंने कान्हा को धीरे से यशोदा के पास सुला दियाऔर वहाँ से उस कन्या को उठाकर वापस मथुरा की ओर चल पड़े।
कुछ ही देर बाद वह फिर उसी कारागार में पहुँच गए।
जैसे ही उन्होंने कन्या को देवकी के पास रखा, कारागार के द्वार अपने आप बंद हो गए।
बेड़ियाँ फिर से उनके पैरों में पड़ गईं, सैनिकों की नींद टूट गई और नवजात कन्या के रोने की आवाज पूरे कारागार में गूँज उठी।
उस रोने की आवाज सुनकर कंस को खबर दी गई, कंस दौड़ता हुआ कारागार में पहुँचा, उसके चेहरे पर भय साफ दिखाई दे रहा था।
वह जिस आठवें पुत्र से डरता था, उसके जन्म की खबर मिल चुकी थी।
लेकिन जब उसने देखा कि देवकी की गोद में पुत्र नहीं, बल्कि एक कन्या है, तो उसके भीतर का भय कुछ क्षणों के लिए उलझन में बदल गया।
फिर भी उसका क्रूर मन नहीं बदला, वह उस बच्ची को उठाने के लिए आगे बढ़ा।
देवकी ने उसे रोकने की बहुत कोशिश की।
एक माँ अपने बच्चे के लिए पहली बार नहीं, बल्कि आठवीं बार मृत्यु के सामने खड़ी थी।
लेकिन तभी वह कन्या कंस के हाथों से छूटकर आकाश में प्रकट हो गई। दिव्य प्रकाश से पूरा कारागार भर गया।
कंस भय से पीछे हट गया, उसे समझ आ गया, जिससे वह डर रहा था… वह जन्म ले चुका है।
और मथुरा से बहुत दूर, गोकुल में, उसी समय एक नन्हा श्याम बालक अपनी नई माँ की गोद में सो रहा था। बाहर बारिश अब भी हो रही थी।
लेकिन गोकुल की उस रात में जैसे एक नई सुबह जन्म ले चुकी थी।
यशोदा को अभी पता नहीं था कि उनकी गोद में कौन आया है।
नंद को अभी पता नहीं था कि उनके घर कौन-सा अतिथि आया है।
गोकुल को अभी पता नहीं था कि उसका कान्हा कौन है।
लेकिन उस रात से संसार की दिशा बदल चुकी थी। एक कारागार में जन्मा बालक… एक माँ की गोद से दूसरी माँ की गोद तक पहुँचा था।
- और शायद यही भगवान की लीला थी, जिसे संसार ने देवकी का पुत्र समझकर खोजा…
वह यशोदा का कान्हा बनकर पूरे गोकुल के हृदय में बस गया।
समाप्त
आगे और कहानियां आती रहेगी।
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