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एपिसोड 1: प्रथम मिलन – यमुना के तट पर

पढ़ने का समय : 6 मिनट

एपिसोड 1: प्रथम मिलन – यमुना के तट प

 

वृन्दावन की भूमि उस समय स्वर्ग से भी अधिक सुंदर लगती थी। वर्षा ऋतु अभी-अभी विदा हुई थी और शरद् का स्वच्छ आकाश नीले रंग से चमक रहा था। यमुना नदी का जल स्वच्छ और शांत बह रहा था। दोनों तटों पर कदंब, तमाल और आम के वृक्ष अपनी छाया फैलाए खड़े थे। गोप-गोपियों के हंसी-खेल की गूंज दूर-दूर तक फैल रही थी, पर आज का दिन कुछ और ही विशेष होने वाला था।

 

उस दिन गोकुल के नंद बाबा के आंगन में बालक कृष्ण अपनी सखाओं के साथ खेल रहे थे। उनकी आयु लगभग ग्यारह-बारह वर्ष की थी, पर उनके नेत्रों में वह दिव्य चमक थी जो सामान्य बालक में नहीं होती। मां यशोदा ने उन्हें दूध-दही खिलाया, गले में वनमाला पहनाई और कहा, “कान्हा, आज यमुना तट पर ज्यादा देर मत लगाना। शाम होते-होते लौट आना।”

 

कृष्ण मुस्कुराए। उनके मुख पर वह मधुर मुस्कान थी जिससे सारी सृष्टि मोहित हो जाती थी। वे बांसुरी लेकर सखाओं सुदामा, मधुमंगल, श्रीदाम और सुबल के साथ यमुना की ओर चल पड़े। रास्ते में वे गायों को हांकते जा रहे थे। उनकी बांसुरी की धुन इतनी मधुर थी कि पेड़-पौधे भी झूमने लगते थे और पक्षी चुपचाप सुनने लगते थे।

 

उधर बरसाना की ओर, वृषभानु बाबा की पुत्री राधा भी अपनी सहेलियों के साथ यमुना तट पर जा रही थीं। राधा उस समय किशोरावस्था में थीं। उनका रूप ऐसा था मानो लक्ष्मी स्वयं धरती पर उतर आई हों। श्याम वर्ण के बालों में वेणी बंधी हुई, माथे पर सिंदूर की जगह चंदन का टीका, गले में मोतियों की माला और पीतांबर रंग का घाघरा-चोली। उनके नेत्रों में वह भाव था जो प्रेम और करुणा दोनों को एक साथ समेटे हुए थे।

 

राधा की सहेलियाँ – ललिता, विशाखा, चित्रा, इन्दुलेखा और रंगदेवी – उनके साथ थीं। ललिता ने कहा, “सखी, आज तुम्हारा मन किसी और ही लोक में घूम रहा है। क्या बात है?”

 

राधा ने धीरे से मुस्कुराते हुए कहा, “कुछ नहीं सखी… बस यमुना का जल आज बहुत स्वच्छ लग रहा है।” पर वास्तव में उनके हृदय में एक अजीब सी बेचैनी थी। रात भर उन्हें स्वप्न में एक श्याम वर्ण का बालक बांसुरी बजाता दिखाई दिया था। उसकी धुन इतनी मधुर थी कि जागने के बाद भी वह उनके कानों में गूंज रही थी।

 

जब राधा और उसकी सहेलियाँ यमुना के घाट पर पहुंचीं, तब कृष्ण भी दूसरी ओर से घाट पर आ चुके थे। गायें पानी पी रही थीं और सखागण पेड़ों की छाया में बैठकर फल खा रहे थे। कृष्ण ने बांसुरी अपने होठों पर रखी और एक धीमी, मधुर धुन बजानी शुरू की।

 

वह धुन…

 

जैसे ही वह स्वर यमुना के जल पर तैरता हुआ राधा तक पहुंचा, उनके कदम रुक गए। उनके हृदय की धड़कन अचानक तेज हो गई। ललिता ने पीछे से पुकारा, “राधे! क्या हुआ?” पर राधा कुछ सुन ही नहीं पा रही थीं। उनकी दृष्टि उस दिशा में चली गई जहाँ से बांसुरी की आवाज आ रही थी।

 

कृष्ण ने भी अपनी आँखें उठाईं। और उसी क्षण…

 

समय थम गया।

 

दोनों की दृष्टि एक-दूसरे से टकराई। यमुना का जल बहना बंद हो गया हो ऐसा आभास हुआ। हवा में अचानक मधु की सुगंध फैल गई। पेड़ों के पत्ते हिलना बंद हो गए। सखा और सहेलियाँ यह देखकर अचंभित रह गए कि दोनों एक-दूसरे को ऐसे देख रहे हैं मानो युगों-युगों से एक-दूसरे को खोज रहे हों।

 

कृष्ण की बांसुरी उसके होठों से अलग हो गई। उन्होंने धीरे से कहा, मानो स्वयं से बात कर रहे हों, “तुम… तुम वही हो ना?”

 

राधा कुछ बोल न सकीं। उनके नेत्रों में अश्रु भर आए, पर वे अश्रु दुख के नहीं, अपार आनंद के थे। वे धीरे-धीरे आगे बढ़ीं। उनके पैर जैसे स्वयं ही उस ओर जा रहे थे। ललिता और विशाखा ने उन्हें रोकने का प्रयास किया, पर राधा ने केवल हाथ हिलाकर संकेत किया कि वे कुछ न बोलें।

 

दोनों के बीच की दूरी कम होती गई। जब वे एक-दूसरे के निकट पहुंचे तो कृष्ण ने धीरे से अपना दाहिना हाथ बढ़ाया। राधा ने भी अपना बायाँ हाथ आगे किया। दोनों के हाथ हवा में मिले… और उसी क्षण एक दिव्य प्रकाश चारों ओर फैल गया। यमुना का जल सोने के समान चमक उठा। आकाश से पुष्पों की वर्षा होने लगी।

 

कृष्ण ने धीरे से कहा, “मैंने तुम्हें युगों से खोजा है। प्रत्येक जन्म में, प्रत्येक लोक में… और आज यहाँ, यमुना के इस तट पर, मैंने तुम्हें पा लिया।”

 

राधा की आँखों से अश्रु बह निकले। उन्होंने धीरे से उत्तर दिया, “और मैंने भी तुम्हें खोजा है कान्हा… प्रत्येक श्वास में, प्रत्येक धड़कन में। आज जब तुम्हारी बांसुरी ने पुकारा, तो मेरा हृदय पहचान गया कि वह आवाज मेरी ही है।”

 

दोनों एक-दूसरे को देखते रहे। कोई और शब्द नहीं बोले। बस नेत्रों से ही सारा प्रेम कह दिया। वह प्रेम जो शरीर का नहीं, आत्मा का था। जो इस लोक का नहीं, लोकों के पार का था।

 

सखा मधुमंगल जो स्वभाव से थोड़े चंचल थे, आगे बढ़े और बोले, “अरे कान्हा! यह कौन है? इतनी सुंदर तो मैंने कभी नहीं देखी।”

 

कृष्ण ने मुस्कुराते हुए कहा, “यह राधा है… मेरी राधा।”

 

ललिता ने भी आगे बढ़कर कहा, “और यह कान्हा है… हमारी राधा के कान्हा।”

 

उस दिन दोनों ने बहुत देर तक यमुना के तट पर समय बिताया। कृष्ण ने राधा के लिए बांसुरी बजाई। राधा ने कृष्ण के बालों में फूल लगाए। उन्होंने एक-दूसरे से बचपन की बातें कीं, गोकुल और बरसाना की बातें कीं। कृष्ण ने बताया कि कैसे वे मक्खन चुराते हैं और राधा ने हँसते हुए कहा कि वे भी कभी-कभी दूध में पानी मिला देती हैं।

 

सूरज ढलने लगा था। आकाश में लालिमा फैल गई थी। यशोदा माता का डर कृष्ण के मन में था, और वृषभानु बाबा का डर राधा के मन में। दोनों को लौटना था।

 

बिछड़ने से पहले कृष्ण ने राधा का हाथ अपने हाथ में लिया और कहा, “राधे, आज जो मिलन हुआ है, वह केवल इस जन्म का नहीं है। यह तो केवल आरंभ है। तुम मेरी प्राण हो, मेरी आत्मा हो। जब तक यह सृष्टि है, तब तक हमारा यह प्रेम रहेगा।”

 

राधा ने भी उनकी आँखों में आँखें डालकर कहा, “कान्हा, मैं तुम्हारी छाया बनकर रहूँगी। चाहे तुम गोकुल में रहो या द्वारका में, चाहे तुम ग्वाला बने रहो या राजा… मेरा हृदय सदैव तुम्हारे पास रहेगा।”

 

दोनों ने एक-दूसरे को अंतिम बार देखा। फिर कृष्ण अपनी गायों और सखाओं के साथ गोकुल की ओर चल दिए, और राधा अपनी सहेलियों के साथ बरसाना की ओर।

 

पर उस दिन के बाद से…

 

हर शाम जब कृष्ण बांसुरी बजाते, तो राधा यमुना तट पर आ जातीं। और हर सुबह जब राधा दूध लेकर गोकुल जातीं, तो रास्ते में कृष्ण उनसे मिलने आ जाते। उनका प्रेम दिन-ब-दिन गहरा होता गया। वह प्रेम जो शब्दों से परे था, जो लोक-लाज से ऊपर था, जो केवल दो आत्माओं के मिलन का नाम था।

 

यमुना आज भी उस मिलन की साक्षी है। कदंब के वृक्ष आज भी उस दिन की बातें करते हैं। और जब कभी कोई भक्त वृन्दावन आता है और यमुना के तट पर बैठता है, तो उसे आज भी कभी-कभी वह मधुर बांसुरी की धुन सुनाई दे जाती है… और साथ ही राधा की हल्की सी हंसी भी।

 

क्योंकि जो मिलन दिव्य होता है, वह कभी समाप्त नहीं होता। वह तो केवल रूप बदल-बदल कर सदा बना रहता है।

 

 

 

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Lakshmi Kumari

NSW  अनुभवी लेखक -🥇

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