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Part 3 गुरु माता की आज्ञा

पढ़ने का समय : 10 मिनट
  • अध्याय 3 — गुरु माता की आज्ञा और मित्रता की परीक्षा

 

जंगल में बिताई उस रात के बाद कृष्ण और सुदामा की मित्रता पहले से भी अधिक गहरी हो गई थी।

 

अब आश्रम के दूसरे शिष्य भी अक्सर उनकी दोस्ती की चर्चा करते थे। सभी जानते थे कि दोनों का स्वभाव अलग है, जीवन अलग है और सोचने का तरीका भी अलग है, लेकिन फिर भी दोनों हमेशा एक-दूसरे के साथ खड़े रहते हैं।

 

सुदामा शांत था और कृष्ण चंचल।

 

सुदामा किसी काम को शुरू करने से पहले कई बार सोचता था, जबकि कृष्ण मुस्कुराते हुए सबसे कठिन काम भी कर देते थे।

 

लेकिन दोनों में एक बात समान थी—वे एक-दूसरे के लिए सच्चे मन से समर्पित थे।

 

उस सुबह आश्रम में रोज की तरह काम चल रहा था। कुछ शिष्य नदी से जल भरकर ला रहे थे। कुछ पेड़ों के नीचे बैठकर पाठ याद कर रहे थे। कृष्ण और सुदामा आश्रम के आँगन की सफाई कर रहे थे।

 

कृष्ण झाड़ू चलाते हुए धीरे-धीरे कोई धुन गुनगुना रहे थे।

 

सुदामा ने कहा, “कृष्ण, तुम कोई काम बिना गाना गाए नहीं कर सकते क्या?”

 

कृष्ण ने गंभीर चेहरा बनाकर कहा, “कर सकता हूँ।”

 

सुदामा ने राहत की साँस ली।

 

लेकिन अगले ही पल कृष्ण ने कहा, “लेकिन फिर काम इतना मजेदार नहीं रहेगा।”

 

सुदामा मुस्कुरा दिया।

 

“तुम्हारे लिए हर काम खेल ही है।”

 

“और तुम्हारे लिए हर काम परीक्षा है।”

 

“क्योंकि मैं जिम्मेदारी समझता हूँ।”

 

कृष्ण ने हँसते हुए कहा, “और मैं खुशी समझता हूँ।”

 

सुदामा ने झाड़ू एक तरफ रखते हुए कहा, “जिम्मेदारी और खुशी दोनों साथ हो सकती हैं।”

 

कृष्ण ने उसकी ओर देखा।

 

“तो तुम भी धीरे-धीरे मेरी तरह समझदार हो रहे हो।”

 

“तुम्हारी तरह?”

 

“हाँ।”

 

सुदामा हँस पड़ा।

 

“कृष्ण, तुम कभी-कभी खुद को बहुत महान समझते हो।”

 

कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा, “कभी-कभी नहीं, सुदामा। हमेशा।”

 

दोनों जोर से हँस पड़े।

 

उसी समय गुरु माता वहाँ आईं।

 

दोनों तुरंत शांत हो गए और हाथ जोड़कर उनके सामने खड़े हो गए।

 

गुरु माता ने कहा, “तुम दोनों से एक काम है।”

 

कृष्ण ने तुरंत कहा, “बताइए माता।”

 

गुरु माता ने एक कपड़े की छोटी पोटली उनकी ओर बढ़ाई।

 

“इसमें कुछ भोजन है। जंगल के उस पार रहने वाले एक वृद्ध साधु कई दिनों से अस्वस्थ हैं। मैंने उनके लिए यह भोजन तैयार किया है। तुम दोनों यह उनके पास पहुँचा आओ।”

 

सुदामा ने पोटली हाथ में ली।

 

“हम अभी चले जाते हैं, माता।”

 

गुरु माता ने कहा, “ध्यान रखना, जंगल का रास्ता लंबा है। इस बार देर मत करना।”

 

कृष्ण ने सुदामा की ओर देखकर आँख दबाई।

 

सुदामा ने तुरंत कहा, “माता, मैं ध्यान रखूँगा।”

 

कृष्ण ने धीरे से कहा, “मतलब तुम मुझ पर ध्यान रखोगे।”

 

दोनों ने गुरु माता का आशीर्वाद लिया और यात्रा पर निकल पड़े।

 

सुबह का समय था।

 

रास्ते में हल्की ठंडी हवा चल रही थी।

 

सुदामा के हाथ में भोजन की पोटली थी और कृष्ण एक पतली लकड़ी हाथ में घुमाते हुए चल रहे थे।

 

कुछ दूरी चलने के बाद कृष्ण ने पूछा, “सुदामा, तुम्हें पता है इस पोटली में क्या है?”

 

सुदामा ने कहा, “नहीं।”

 

कृष्ण ने कहा, “तो खोलकर देख लेते हैं।”

 

सुदामा ने तुरंत पोटली को पीछे कर लिया।

 

“नहीं।”

 

“क्यों?”

 

“क्योंकि यह हमारे लिए नहीं है।”

 

कृष्ण मुस्कुराए।

 

“मैं सिर्फ देखने की बात कर रहा हूँ।”

 

“तुम्हें मैं जानता हूँ।”

 

कृष्ण ने हैरानी से पूछा, “क्या जानता हो?”

 

“पहले तुम कहोगे सिर्फ देख लेते हैं, फिर कहोगे सिर्फ थोड़ा सा चख लेते हैं।”

 

कृष्ण हँस पड़े।

 

“तुम मुझे गलत समझते हो।”

 

सुदामा ने कहा, “नहीं, मैं तुम्हें बहुत अच्छी तरह समझता हूँ।”

 

दोनों आगे बढ़ते रहे।

 

जंगल में प्रवेश करते ही रास्ता थोड़ा कठिन हो गया।

 

कुछ जगह पेड़ गिरे हुए थे। कहीं-कहीं घनी झाड़ियाँ थीं।

 

लेकिन दोनों एक-दूसरे का साथ देते हुए आगे बढ़ते रहे।

 

कुछ समय बाद कृष्ण ने कहा, “थोड़ी देर आराम कर लें?”

 

सुदामा ने कहा, “हमारे पास समय कम है।”

 

“थोड़ा सा आराम करने से समय नहीं रुक जाएगा।”

 

“और चलते रहने से समय बढ़ भी नहीं जाएगा।”

 

कृष्ण ने हँसते हुए कहा, “तुम्हारे साथ बहस करना बहुत कठिन है।”

 

“तो मत किया करो।”

 

“लेकिन तुम्हारे बिना किससे करूँ?”

 

सुदामा कुछ कह नहीं पाया।

 

उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई।

 

दोनों एक पेड़ के नीचे बैठ गए।

 

सुदामा ने पोटली को अपने पास रख दिया।

 

कृष्ण ने पोटली की ओर देखा।

 

सुदामा ने तुरंत कहा, “कृष्ण!”

 

कृष्ण ने दोनों हाथ ऊपर कर दिए।

 

“मैंने कुछ नहीं किया।”

 

सुदामा ने कहा, “तुम्हारी आँखें सब बता रही हैं।”

 

“मेरी आँखें क्या कह रही हैं?”

 

“कि तुम्हें भूख लगी है।”

 

कृष्ण कुछ क्षण चुप रहे।

 

फिर बोले, “थोड़ी सी।”

 

सुदामा ने अपनी छोटी पोटली निकाली।

 

उसमें कुछ सूखे दाने थे, जो वह सुबह अपने साथ लेकर आया था।

 

उसने उन्हें कृष्ण की ओर बढ़ाया।

 

“लो।”

 

कृष्ण ने पूछा, “और तुम?”

 

“हम दोनों बाँटकर खाएँगे।”

 

कृष्ण ने कुछ दाने लिए और बाकी सुदामा की ओर बढ़ा दिए।

 

“तुम भी।”

 

सुदामा ने कहा, “मैंने तुमसे कहा था, ये कम हैं।”

 

कृष्ण मुस्कुराए।

 

“जो चीज मित्र के साथ बाँटी जाए, वह कम नहीं लगती।”

 

सुदामा को उनकी पुरानी बात याद आ गई।

 

उसने कहा, “तुम यह बात पहले भी कह चुके हो।”

 

कृष्ण ने हँसकर कहा, “अच्छी बातें दोहराने में क्या बुराई है?”

 

कुछ देर बाद दोनों फिर चल पड़े।

 

दोपहर होते-होते मौसम बदलने लगा।

 

आसमान में बादल आ गए।

 

सुदामा ने ऊपर देखा।

 

“कृष्ण, लगता है बारिश आने वाली है।”

 

कृष्ण ने कहा, “इस बार हम रास्ता नहीं भूलेंगे।”

 

सुदामा ने कहा, “इस बार भूलना ही मत।”

 

लेकिन कुछ ही समय बाद तेज हवा चलने लगी।

 

पेड़ों की शाखाएँ हिलने लगीं।

 

सुदामा ने भोजन की पोटली को अपने सीने से लगा लिया।

 

“हमें जल्दी चलना चाहिए।”

 

कृष्ण ने कहा, “हाँ।”

 

दोनों तेज कदमों से आगे बढ़ने लगे।

 

तभी रास्ते में एक बूढ़े व्यक्ति दिखाई दिए।

 

वह एक पेड़ के नीचे बैठे थे।

 

उनके कपड़े गीले हो चुके थे और वह बहुत कमजोर लग रहे थे।

 

सुदामा तुरंत उनके पास गया।

 

“बाबा, आप ठीक हैं?”

 

वृद्ध ने कमजोर आवाज में कहा, “मैं कई घंटों से यहाँ बैठा हूँ। मेरे पैर में चोट लग गई है।”

 

कृष्ण ने उनके पैर की ओर देखा।

 

“आप अकेले हैं?”

 

वृद्ध ने सिर हिला दिया।

 

सुदामा ने चिंता से कृष्ण की ओर देखा।

 

“हमें साधु के पास भी पहुँचना है।”

 

कृष्ण कुछ क्षण चुप रहे।

 

फिर बोले, “पहले इनकी सहायता करते हैं।”

 

सुदामा ने कहा, “लेकिन गुरु माता ने भोजन समय पर पहुँचाने को कहा था।”

 

कृष्ण ने शांत स्वर में कहा, “और अगर किसी जरूरतमंद को हमारे सामने सहायता चाहिए, तो क्या हम उसे छोड़कर आगे बढ़ जाएँ?”

 

सुदामा चुप हो गया।

 

उसे कृष्ण की बात सही लगी।

 

दोनों ने वृद्ध को सहारा देकर सुरक्षित जगह बैठाया।

 

सुदामा ने अपनी पोटली से थोड़ा पानी उन्हें दिया।

 

कृष्ण ने आसपास से कुछ पत्ते और लकड़ी लाकर उनके पैर को सहारा दिया।

 

बारिश शुरू हो चुकी थी।

 

अब दोनों को चिंता होने लगी कि भोजन की पोटली भीग न जाए।

 

सुदामा ने उसे अपने कपड़े के अंदर सुरक्षित कर लिया।

 

कुछ देर बाद वृद्ध ने कहा, “तुम दोनों कौन हो?”

 

कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा, “दो मित्र।”

 

वृद्ध ने पूछा, “और कहाँ जा रहे हो?”

 

सुदामा ने बताया कि वे गुरु माता के कहने पर भोजन लेकर जा रहे हैं।

 

वृद्ध ने उनकी ओर ध्यान से देखा।

 

“तुम दोनों पहले अपने काम पर जा सकते थे।”

 

कृष्ण ने कहा, “अगर हम ऐसा करते, तो हमारा काम अधूरा रहता।”

 

वृद्ध की आँखों में चमक आ गई।

 

उन्होंने कहा, “याद रखना, बेटा। दूसरों के लिए किया गया छोटा सा कार्य भी जीवन की सबसे बड़ी शिक्षा बन सकता है।”

 

कुछ समय बाद रास्ते से कुछ लोग गुजरे।

 

कृष्ण और सुदामा ने उनसे वृद्ध की सहायता करने को कहा।

 

अब दोनों फिर अपने रास्ते पर आगे बढ़े।

 

लेकिन बारिश तेज हो चुकी थी।

 

रास्ता कीचड़ से भर गया था।

 

सुदामा कई बार फिसलते-फिसलते बचा।

 

कृष्ण ने उसका हाथ पकड़ लिया।

 

“धीरे चलो।”

 

सुदामा ने कहा, “तुमने ही तो जल्दी चलने को कहा था।”

 

“जल्दी का मतलब उड़ना नहीं होता।”

 

सुदामा हँस पड़ा।

 

कठिन रास्ते के बाद आखिरकार दोनों उस स्थान पर पहुँचे जहाँ वृद्ध साधु रहते थे।

 

साधु एक छोटी सी कुटिया के बाहर बैठे थे।

 

उन्हें देखकर सुदामा ने राहत की साँस ली।

 

दोनों ने हाथ जोड़कर प्रणाम किया।

 

“गुरु माता ने आपके लिए भोजन भेजा है।”

 

साधु ने पोटली स्वीकार की।

 

उन्होंने दोनों को ध्यान से देखा।

 

“तुम दोनों बहुत देर से आए हो।”

 

सुदामा तुरंत परेशान हो गया।

 

“क्षमा कीजिए, रास्ते में…”

 

कृष्ण ने कहा, “रास्ते में एक वृद्ध व्यक्ति घायल मिले थे। हम उनकी सहायता करने के लिए रुक गए।”

 

साधु कुछ देर शांत रहे।

 

फिर उनके चेहरे पर मुस्कान आ गई।

 

“तो तुम देर से नहीं आए, पुत्रों। तुम सही समय पर पहुँचे।”

 

सुदामा ने आश्चर्य से उनकी ओर देखा।

 

साधु बोले, “जो व्यक्ति दूसरों की पीड़ा देखकर रुकना जानता है, वह जीवन का सबसे बड़ा पाठ सीख चुका होता है।”

 

सुदामा के मन में खुशी हुई।

 

लेकिन अब एक नई चिंता थी।

 

शाम होने लगी थी।

 

उन्हें वापस आश्रम पहुँचना था।

 

दोनों जल्दी से वापस चल पड़े।

 

रास्ते में सुदामा ने कहा, “कृष्ण, अगर गुरु माता हमसे नाराज़ हुईं तो?”

 

कृष्ण ने कहा, “तो हम सच बता देंगे।”

 

“और अगर उन्होंने कहा कि हमें पहले अपना काम पूरा करना चाहिए था?”

 

कृष्ण मुस्कुराए।

 

“तो हम उनसे सीखेंगे।”

 

सुदामा ने कहा, “तुम हर बात को इतना आसान कैसे बना देते हो?”

 

कृष्ण ने उसकी ओर देखकर कहा, “क्योंकि कठिन बातों को कठिन सोचते रहने से वे और कठिन हो जाती हैं।”

 

दोनों चलते रहे।

 

रात होने से पहले वे आश्रम पहुँच गए।

 

गुरु माता उनकी प्रतीक्षा कर रही थीं।

 

सुदामा का दिल तेजी से धड़क रहा था।

 

“माता…”

 

गुरु माता ने पूछा, “तुम दोनों देर से क्यों आए?”

 

सुदामा कुछ कहता, उससे पहले कृष्ण ने सारी बात सच-सच बता दी।

 

गुरु माता ध्यान से सुनती रहीं।

 

सुदामा सिर झुकाए खड़ा रहा।

 

कुछ क्षणों तक वहाँ शांति रही।

 

फिर गुरु माता ने दोनों के सिर पर हाथ रखा।

 

“तुम दोनों ने आज वही किया, जो एक सच्चे विद्यार्थी को करना चाहिए।”

 

सुदामा ने राहत की साँस ली।

 

कृष्ण ने मुस्कुराकर उसकी ओर देखा।

 

उस रात दोनों आश्रम के बाहर बैठे थे।

 

आसमान साफ हो चुका था।

 

तारे चमक रहे थे।

 

सुदामा ने कहा, “आज अगर तुम न होते तो शायद मैं उस वृद्ध की सहायता किए बिना आगे बढ़ जाता।”

 

कृष्ण ने कहा, “और अगर तुम न होते, तो शायद मैं उसे अकेले सहारा नहीं दे पाता।”

 

सुदामा ने पूछा, “तुम हमेशा मुझे अपने बराबर क्यों समझते हो?”

 

कृष्ण ने उसकी ओर देखा।

 

“क्योंकि मित्रता में बराबरी नहीं समझनी पड़ती, सुदामा। मित्र बस मित्र होता है।”

 

सुदामा की आँखें नम हो गईं।

 

उसने धीरे से कहा, “मैं हमेशा तुम्हारा मित्र रहूँगा।”

 

कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा, “मैं जानता हूँ।”

 

दोनों कुछ देर तक शांत बैठे रहे।

 

उन्हें नहीं पता था कि समय धीरे-धीरे उन्हें उनके जीवन की अलग-अलग राहों की ओर ले जा रहा था।

 

अभी उनके पास साथ बिताने के लिए कई दिन थे।

 

कई बातें थीं।

 

कई यादें थीं।

 

लेकिन एक दिन ऐसा भी आने वाला था, जब गुरुकुल की शिक्षा पूरी होगी और दोनों को अलग-अलग दिशाओं में जाना पड़ेगा।

 

और उस दिन…

 

उनकी मित्रता की सबसे बड़ी परीक्षा शुरू होगी।

 

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Auther preeti Sharma

मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

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