🔐 लॉग-इन या रजिस्टर करें  

तोहफा वापस चाहिए

पढ़ने का समय : 7 मिनट

इस राखी पर मुझे तुमसे कुछ वापस चाहिए

रक्षाबंधन से एक दिन पहले आदित्य के मोबाइल पर अपनी बहन पूजा का फोन आया।

 

“भैया, कल समय पर घर आ जाना।”

 

आदित्य मुस्कुराया।

 

“हर साल आता हूं।”

 

“इस बार देर मत करना।”

 

“अच्छा बाबा, नहीं करूंगा।”

 

पूजा कुछ पल चुप रही, फिर बोली,

 

“और हां, इस बार मेरे लिए कोई गिफ्ट मत लाना।”

 

आदित्य हैरान हो गया।

 

“क्या?”

 

“सुना नहीं? कोई गिफ्ट नहीं चाहिए।”

 

“ये कैसे हो सकता है? मेरी बहन और गिफ्ट न मांगे?”

 

पूजा हंसने की कोशिश करने लगी।

 

“इस बार मुझे कुछ और चाहिए।”

 

“क्या?”

 

“कल बताऊंगी।”

 

फोन कट गया।

 

आदित्य कुछ देर तक मोबाइल को देखता रहा।

 

उसे पूजा की आवाज अजीब लगी थी।

 

वह हंस तो रही थी, लेकिन जैसे उसकी हंसी के पीछे कोई चिंता छिपी हुई थी।

 

अगली सुबह आदित्य जल्दी घर पहुंच गया।

 

दरवाजा पूजा ने खोला।

 

वह हल्के पीले रंग का सूट पहने हुए थी। हाथ में पूजा की थाली थी।

 

आदित्य ने उसे देखते ही कहा,

 

“वाह! आज तो मेरी बहन बहुत खुश लग रही है।”

 

पूजा ने मुस्कुराकर कहा,

 

“अंदर आओ भैया।”

 

घर में माँ भी बैठी थीं।

 

लेकिन आदित्य ने तुरंत महसूस किया कि माहौल सामान्य नहीं था।

 

माँ की आंखें बार-बार पूजा की तरफ जा रही थीं।

 

पूजा जरूरत से ज्यादा चुप थी।

 

आदित्य ने पूछा,

 

“सब ठीक है?”

 

माँ ने जल्दी से कहा,

 

“हां बेटा, सब ठीक है।”

 

पूजा ने बात बदल दी।

 

“पहले राखी बांध लूं।”

 

आदित्य उसके सामने बैठ गया।

 

पूजा ने तिलक लगाया।

 

मिठाई खिलाई।

 

फिर राखी उठाई।

 

लेकिन राखी बांधते समय उसके हाथ कांप रहे थे।

 

आदित्य ने धीरे से पूछा,

 

“क्या हुआ?”

 

“कुछ नहीं।”

 

“तू मुझसे झूठ बोल रही है।”

 

पूजा की आंखें भर आईं।

 

“पहले राखी बांध लेने दो।”

 

उसने राखी बांध दी।

 

कुछ सेकंड तक दोनों चुप रहे।

 

फिर आदित्य ने मुस्कुराकर कहा,

 

“अब बता, इस बार क्या चाहिए?”

 

पूजा ने उसकी तरफ देखा।

 

“आप वादा करोगे?”

 

“पहले मांग तो सही।”

 

“नहीं, पहले वादा।”

 

आदित्य ने कहा,

 

“ठीक है, वादा।”

 

पूजा ने गहरी सांस ली।

 

“मुझे मेरा भाई वापस चाहिए।”

 

आदित्य की मुस्कान गायब हो गई।

 

“क्या मतलब?”

 

पूजा की आंखों से आंसू निकल आए।

 

“मुझे वही भाई वापस चाहिए जो पहले था।”

 

आदित्य चुप रह गया।

 

पूजा ने पहली बार उसके सामने अपने मन की सारी बातें रख दीं।

 

“पहले आप मुझे रोज फोन करते थे।”

 

आदित्य नजरें झुकाकर सुनता रहा।

 

“मैं बीमार होती थी तो आप सबसे पहले आते थे।”

 

उसकी आवाज कांपने लगी।

 

“मैं किसी बात से परेशान होती थी तो आप कहते थे—पूजा, बता क्या हुआ?”

 

आदित्य के चेहरे पर पछतावा दिखाई देने लगा।

 

पूजा ने कहा,

 

“लेकिन पिछले एक साल से आप बदल गए हो।”

 

“पूजा…”

 

“नहीं भैया, आज मुझे बोलने दो।”

 

आदित्य चुप हो गया।

 

“आप घर आते हो तो फोन में लगे रहते हो। मैं कुछ बताती हूं तो कहते हो बाद में। मेरे मैसेज कई-कई घंटे बाद देखते हो।”

 

पूजा की आंखों से आंसू लगातार बह रहे थे।

 

“आपने कभी सोचा कि मैं क्यों नाराज होती हूं?”

 

आदित्य के पास कोई जवाब नहीं था।

 

“मुझे आपके पैसे नहीं चाहिए थे। न महंगे गिफ्ट चाहिए थे। मुझे सिर्फ पहले वाले आप चाहिए थे।”

 

कमरे में सन्नाटा छा गया।

 

माँ की आंखें भी नम थीं।

 

आदित्य ने धीरे से कहा,

 

“मैंने सोचा था कि मैं तुम्हारे लिए काम कर रहा हूं।”

 

पूजा ने पूछा,

 

“किसने कहा कि मुझे इतना चाहिए?”

 

आदित्य ने उसकी तरफ देखा।

 

पूजा बोली,

 

“भैया, मुझे बड़ा घर नहीं चाहिए। महंगी चीजें नहीं चाहिए। मुझे बस कभी-कभी आपके साथ बैठकर चाय पीनी है।”

 

आदित्य की आंखें भर आईं।

 

वह पिछले एक साल से लगातार काम कर रहा था।

 

उसकी एक ही सोच थी—

 

“माँ और पूजा को किसी चीज की कमी नहीं होने दूंगा।”

 

वह ज्यादा पैसे कमाना चाहता था।

 

पूजा के लिए बेहतर भविष्य बनाना चाहता था।

 

लेकिन इसी कोशिश में वह भूल गया था कि उसके परिवार को सिर्फ उसके पैसों की नहीं…

 

उसकी मौजूदगी की भी जरूरत थी।

 

आदित्य ने धीरे से कहा,

 

“मुझे लगा मैं जिम्मेदारी निभा रहा हूं।”

 

पूजा ने उसके हाथ पर हाथ रखा।

 

“जिम्मेदारी सिर्फ खर्च चलाना नहीं होती भैया।”

 

यह बात सीधे आदित्य के दिल में उतर गई।

 

कुछ देर बाद उसने पूछा,

 

“अगर मैं बदलना चाहूं तो?”

 

पूजा ने आंसू पोंछे।

 

“तो?”

 

“तो क्या मेरी बहन मुझे वापस मौका देगी?”

 

पूजा मुस्कुराई।

 

“इसलिए तो राखी बांधी है।”

 

आदित्य ने उसकी राखी वाली कलाई को देखा।

 

“तो बता, सबसे पहले क्या करना होगा?”

 

पूजा ने कहा,

 

“आज अपना फोन बंद करो।”

 

“क्या?”

 

“हां।”

 

“पूरा दिन?”

 

“पूरा दिन।”

 

माँ हंस पड़ीं।

 

“सजा ठीक है।”

 

आदित्य ने फोन उठाया।

 

स्क्रीन देखी।

 

फिर उसे बंद कर दिया।

 

“अब?”

 

पूजा ने कहा,

 

“अब नाश्ता बनाओ।”

 

आदित्य ने आंखें बड़ी कीं।

 

“मैं?”

 

“हां, मेरे पुराने वाले भैया को रसोई में जाकर मेरी पसंद का नाश्ता बनाना आता था।”

 

आदित्य मुस्कुराया।

 

“आज तो मेरी परीक्षा हो रही है।”

 

पूजा ने कहा,

 

“अभी तो शुरुआत है।”

 

उस दिन वर्षों बाद तीनों ने साथ बैठकर नाश्ता किया।

 

फिर पुरानी तस्वीरें देखीं।

 

माँ ने बचपन के किस्से सुनाए।

 

पूजा और आदित्य पुरानी बातों पर हंसते रहे।

 

शाम को पूजा ने कहा,

 

“भैया, चलो बाहर।”

 

दोनों उसी पार्क में गए जहां बचपन में खेला करते थे।

 

एक बेंच पर बैठकर पूजा ने पूछा,

 

“याद है, आप मुझे साइकिल चलाना सिखाते थे?”

 

आदित्य हंस पड़ा।

 

“और तू हर बार गिरने के बाद मुझे ही दोष देती थी।”

 

“क्योंकि गलती आपकी होती थी।”

 

“बिल्कुल नहीं।”

 

दोनों हंस पड़े।

 

कुछ देर बाद पूजा गंभीर हो गई।

 

“भैया?”

 

“हां?”

 

“आज मैं बहुत खुश हूं।”

 

आदित्य ने पूछा,

 

“क्यों?”

 

पूजा ने उसकी कलाई पर बंधी राखी की तरफ देखा।

 

“क्योंकि आज मेरा गिफ्ट मिल गया।”

 

आदित्य ने कहा,

 

“लेकिन मैंने तो कुछ दिया ही नहीं।”

 

पूजा मुस्कुराई।

 

“दिया है।”

 

“क्या?”

 

“अपना समय।”

 

आदित्य चुप हो गया।

 

पूजा ने कहा,

 

“कभी-कभी इंसान को दुनिया की सबसे महंगी चीज नहीं चाहिए होती।”

 

“फिर क्या चाहिए होता है?”

 

“अपनों के साथ कुछ सच्चे पल।”

 

आदित्य की आंखें नम हो गईं।

 

उसने बहन के सिर पर हाथ रखा।

 

“मुझे माफ कर दे।”

 

पूजा ने कहा,

 

“एक शर्त पर।”

 

“अब क्या?”

 

“अगले हफ्ते रविवार को घर आना।”

 

“आऊंगा।”

 

“फोन बंद करके।”

 

आदित्य हंस पड़ा।

 

“ठीक है।”

 

“हर महीने कम से कम एक दिन।”

 

“पक्का।”

 

पूजा ने हाथ आगे किया।

 

“वादा?”

 

आदित्य ने अपनी राखी वाली कलाई उसके सामने कर दी।

 

“इस राखी की कसम।”

 

उस रात आदित्य घर से वापस जाने लगा।

 

माँ ने पूछा,

 

“आज तो गिफ्ट लेकर आया था?”

 

आदित्य ने कहा,

 

“इस बार गिफ्ट मैं नहीं लाया।”

 

पूजा ने मुस्कुराकर पूछा,

 

“तो कौन लाया?”

 

आदित्य ने बहन की तरफ देखकर कहा,

 

“मेरी बहन।”

 

पूजा हैरान हुई।

 

“मैंने?”

 

“हां।”

 

“क्या दिया?”

 

आदित्य ने कहा,

 

“याद दिलाया कि जिंदगी में सबसे बड़ी कमाई क्या होती है।”

 

पूजा चुप रही।

 

आदित्य ने उसकी तरफ देखकर कहा,

 

“अपने लोगों के पास होने का समय।”

 

पूजा की आंखें भर आईं।

 

उसने कहा,

 

“तो फिर इस बार मेरी राखी का वादा?”

 

आदित्य ने जवाब दिया,

 

“मैं सिर्फ तुम्हारी जरूरतों का नहीं, तुम्हारे समय का भी भाई रहूंगा।”

 

पूजा मुस्कुराई।

 

उस दिन एक बहन ने अपने भाई से कोई महंगा गिफ्ट नहीं मांगा था।

 

उसने बस कहा था—

 

“मुझे मेरा भाई वापस चाहिए।”

 

और शायद रक्षाबंधन का सबसे खूबसूरत मतलब भी यही है।

 

राखी सिर्फ भाई से बहन की रक्षा का वादा नहीं लेती…

 

कभी-कभी वह रिश्तों को फिर से समय देने का वादा भी लेती है।

 

क्योंकि कुछ रिश्ते पैसे से नहीं टूटते,

 

दूरी से भी नहीं टूटते…

 

वे बस तब कमजोर पड़ने लगते हैं, जब हम अपनों के लिए समय निकालना भूल जाते हैं।

 

और उस दिन पूजा को उसका सबसे बड़ा रक्षाबंधन का तोहफा मिल गया था—

 

उसका वही पुराना भाई… जो उसके पास बैठकर बिना किसी जल्दी के मुस्कुरा रहा था।

Comments

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *