“माँ, इस बार मैं आर्यन भैया को राखी नहीं बांधूंगी।”
सुबह-सुबह नैना की यह बात सुनकर माँ के हाथ रुक गए।
रसोई में कुछ पल के लिए बिल्कुल शांति छा गई।
माँ ने धीरे से उसकी तरफ देखा।
“क्या कहा तूने?”
नैना ने अपनी नजरें झुका लीं।
“मैंने कहा, इस बार मैं उन्हें राखी नहीं बांधूंगी।”
“लेकिन क्यों?”
नैना की आंखों में गुस्सा भर आया।
“क्योंकि शायद अब उन्हें मेरी जरूरत ही नहीं है।”
माँ कुछ समझ नहीं पाईं।
“ऐसा क्या हो गया?”
नैना ने जवाब नहीं दिया।
वह अपना बैग उठाकर कमरे में चली गई।
बिस्तर पर बैठते ही उसकी नजर सामने रखी राखी पर गई।
उसने वह राखी कई दिन पहले खरीदी थी।
बहुत सोच-समझकर।
आर्यन को हमेशा साधारण चीजें पसंद थीं, इसलिए उसने एक सुंदर लेकिन सादी राखी चुनी थी।
लेकिन अब वह राखी मेज पर पड़ी थी।
अनछुई।
नैना और आर्यन के बीच कभी ऐसा रिश्ता नहीं था कि दोनों एक-दूसरे से बातें छिपाएं।
आर्यन उससे पांच साल बड़ा था।
बचपन में दोनों बहुत लड़ते थे।
नैना उसकी किताबें छिपा देती।
आर्यन उसकी चॉकलेट खा जाता।
नैना शिकायत करती,
“माँ! भैया ने मेरी चॉकलेट खा ली।”
आर्यन तुरंत कहता,
“इसने मेरी किताब फाड़ी है।”
फिर माँ दोनों को डांटतीं और कुछ देर बाद दोनों फिर साथ बैठकर हंस रहे होते।
लेकिन पिछले एक साल से सब बदल गया था।
आर्यन की नौकरी लग गई थी।
वह घर से दूर नहीं रहता था, लेकिन उसका समय बदल गया था।
सुबह जल्दी निकलता।
रात को देर से आता।
घर आकर भी अक्सर फोन और काम में व्यस्त रहता।
नैना को धीरे-धीरे लगने लगा कि उसका भाई बदल गया है।
पहले वह उसकी हर बात सुनता था।
अब वह अक्सर कहता,
“नैना, बाद में बात करना।”
पहले वह उसे बाजार ले जाता था।
अब कहता,
“तू माँ के साथ चली जाना।”
पहले रक्षाबंधन से एक हफ्ता पहले ही वह पूछना शुरू कर देता था—
“इस बार क्या चाहिए?”
लेकिन इस बार उसने एक बार भी नहीं पूछा।
नैना को सबसे ज्यादा दुख उस दिन हुआ जब उसने भाई को किसी से फोन पर बात करते सुना।
“हां, इस बार रक्षाबंधन पर मैं शायद घर नहीं आ पाऊंगा।”
नैना दरवाजे के बाहर खड़ी थी।
उसका दिल जैसे बैठ गया।
उसने कमरे में जाकर खुद को बंद कर लिया।
आर्यन ने शायद उसे जाते हुए नहीं देखा।
उस दिन से नैना ने उससे बात करना कम कर दिया।
आर्यन ने भी ज्यादा नहीं पूछा।
और यही बात नैना को सबसे ज्यादा चुभती थी।
“उन्हें फर्क ही नहीं पड़ता।”
रक्षाबंधन की सुबह आर्यन जल्दी तैयार होकर घर से निकलने लगा।
माँ ने पूछा,
“इतनी सुबह कहां जा रहा है?”
आर्यन ने कहा,
“थोड़ा जरूरी काम है।”
नैना कमरे से बाहर आई।
उसने भाई की तरफ देखा तक नहीं।
आर्यन कुछ पल उसके सामने खड़ा रहा।
“नैना…”
“हां?”
“कुछ नहीं।”
वह चला गया।
नैना के गुस्से की आखिरी दीवार भी टूट गई।
उसने मन ही मन कहा,
“आज के दिन भी इन्हें मेरी परवाह नहीं है।”
पूरा दिन बीत गया।
दोपहर हुई।
शाम होने लगी।
आर्यन घर नहीं आया।
माँ बार-बार फोन कर रही थीं।
लेकिन उसका फोन बंद था।
नैना के अंदर गुस्सा था, लेकिन अब उसके साथ चिंता भी जुड़ गई थी।
वह खुद से कह रही थी,
“आएं या ना आएं, मुझे क्या फर्क पड़ता है।”
लेकिन हर कुछ मिनट बाद दरवाजे की तरफ देखने लगती।
शाम को माँ ने कहा,
“तू राखी की थाली तैयार कर ले।”
नैना ने कहा,
“मैंने कहा ना माँ, मुझे नहीं बांधनी।”
माँ ने धीरे से कहा,
“गुस्सा रिश्तों से बड़ा नहीं होता बेटा।”
नैना ने पहली बार तेज आवाज में कहा,
“लेकिन रिश्ते भी तो दोनों तरफ से निभाए जाते हैं!”
माँ चुप हो गईं।
नैना की आंखें भर आईं।
“मैं हमेशा उनके लिए इंतजार करती रही। लेकिन अब उन्हें फर्क ही नहीं पड़ता।”
तभी दरवाजे की घंटी बजी।
नैना का दिल जोर से धड़का।
वह तेजी से दरवाजे तक गई।
सामने आर्यन नहीं था।
एक डिलीवरी वाला खड़ा था।
उसके हाथ में एक बड़ा-सा पैकेट था।
“नैना जी?”
“हां।”
“ये आपके लिए है।”
नैना ने हैरानी से पैकेट लिया।
ऊपर भेजने वाले का नाम लिखा था—
आर्यन।
उसने जल्दी से पैकेट खोला।
अंदर एक सुंदर-सा लकड़ी का फ्रेम था।
उसमें उसकी बचपन से लेकर कॉलेज तक की तस्वीरें लगी थीं।
एक तस्वीर में वह स्कूल की ड्रेस में थी।
दूसरी में भाई के कंधे पर बैठी थी।
तीसरी में दोनों लड़ रहे थे।
और आखिरी तस्वीर के नीचे लिखा था—
“मेरी छोटी बहन, जिसके बिना मेरा घर घर नहीं लगता।”
नैना की आंखों से आंसू निकल आए।
पैकेट में एक छोटा-सा कार्ड भी था।
उसने पढ़ा—
“नैना,
मुझे पता है पिछले कुछ महीनों से मैं बदल गया हूं।
लेकिन ऐसा नहीं कि तू मेरे लिए कम जरूरी हो गई है।
मैं बस एक ऐसी चीज में व्यस्त था, जिसे तुझे बताना नहीं चाहता था जब तक पूरा न कर लूं।
आज सुबह मैं उसी काम से गया हूं।
अगर मैं देर से आऊं तो नाराज मत होना।
तेरा—
आर्यन भैया।”
नैना ने कार्ड सीने से लगा लिया।
“माँ… ये क्या है?”
माँ ने मुस्कुराते हुए कहा,
“मुझे भी नहीं पता।”
रात होने लगी।
नैना अब पहले से ज्यादा परेशान थी।
तभी बाहर किसी गाड़ी की आवाज आई।
दरवाजा खुला।
आर्यन अंदर आया।
उसके कपड़े धूल से भरे थे और चेहरा थका हुआ था।
नैना ने गुस्से में पूछा,
“कहां थे आप?”
आर्यन मुस्कुराया।
“तेरे लिए।”
“मतलब?”
उसने नैना के हाथ में एक चाबी रख दी।
नैना ने हैरानी से पूछा,
“ये किसकी है?”
आर्यन उसे बाहर ले गया।
घर के सामने एक छोटी-सी स्कूटी खड़ी थी।
नैना की आंखें फैल गईं।
“भैया…!”
वह महीनों से कॉलेज आने-जाने के लिए स्कूटी लेना चाहती थी।
लेकिन घर की हालत ऐसी नहीं थी कि माँ तुरंत खरीद सकें।
आर्यन ने कहा,
“मैं पिछले कई महीनों से इसके लिए पैसे बचा रहा था।”
नैना की आंखों से आंसू बहने लगे।
“लेकिन आपने मुझसे बातें करना क्यों कम कर दीं?”
आर्यन कुछ पल चुप रहा।
“क्योंकि अगर मैं तुझसे बात करता तो तू पूछती कि मैं इतना काम क्यों कर रहा हूं।”
“तो आप बता देते।”
“फिर सरप्राइज कैसे रहता?”
नैना रोते हुए हंस पड़ी।
“आपको पता है मैंने क्या सोचा?”
“क्या?”
“कि अब आपको मेरी जरूरत नहीं।”
आर्यन का चेहरा बदल गया।
उसने धीरे से कहा,
“पगली… बहन की जरूरत कभी खत्म होती है क्या?”
नैना ने पूछा,
“तो आप इतने दूर क्यों हो गए थे?”
आर्यन ने कहा,
“दूर नहीं हुआ था। बस कुछ दिनों के लिए चुप हो गया था।”
उसने अपनी कलाई आगे की।
“लेकिन लगता है मेरी चुप्पी की सजा मिल गई।”
नैना ने उसकी कलाई देखी।
“क्या?”
“इस बार राखी नहीं बांधेगी ना?”
नैना कुछ पल चुप रही।
फिर वह अंदर दौड़ी।
मेज पर रखी राखी उठाई।
जब वह वापस आई तो उसकी आंखों में आंसू थे।
आर्यन ने मुस्कुराते हुए कहा,
“मैं जानता था तू राखी खरीदेगी।”
नैना ने कहा,
“और मैं जानती थी आप आओगे।”
“सच?”
“नहीं।”
दोनों हंस पड़े।
नैना ने भाई के माथे पर तिलक लगाया।
राखी बांधते समय उसने कहा,
“भैया, अगली बार अगर कोई सरप्राइज देना हो ना… तो इतना दूर मत हो जाना।”
आर्यन ने कहा,
“और तू अगली बार बिना पूरी बात जाने फैसला मत कर लेना।”
“पक्का नहीं।”
“क्यों?”
“क्योंकि मैं आपकी बहन हूं।”
आर्यन हंस पड़ा।
“ये तो कभी नहीं बदलेगा।”
राखी बंधने के बाद नैना ने उसकी कलाई पकड़ ली।
“भैया, आज मैं आपको एक बात बताना चाहती हूं।”
“क्या?”
“मैं राखी इसलिए नहीं बांधती कि आप मुझे महंगे गिफ्ट दो।”
आर्यन ने कहा,
“तो?”
नैना ने उसकी आंखों में देखकर कहा,
“मैं राखी इसलिए बांधती हूं क्योंकि मुझे पता है कि चाहे हम कितना भी लड़ें… दुनिया कितनी भी बदल जाए… मेरे लिए एक इंसान हमेशा मेरा रहेगा।”
आर्यन की आंखें भर आईं।
“और वो कौन?”
नैना मुस्कुराई।
“मेरा परेशान करने वाला, बातूनी और कभी-कभी बहुत ज्यादा चुप रहने वाला भाई।”
आर्यन ने कहा,
“और तू मेरी सबसे बड़ी कमजोरी और सबसे बड़ी ताकत।”
उस रात नैना ने अपनी डायरी में लिखा—
“आज मैंने समझा कि कभी-कभी रिश्तों में दूरी प्यार खत्म होने से नहीं आती। कभी-कभी हम बिना पूछे अपने मन में जवाब बना लेते हैं। और एक छोटी-सी राखी हमें याद दिलाती है कि कुछ रिश्तों को समझने के लिए गुस्से से ज्यादा बातचीत जरूरी होती है।”
और इस बार…
वह राखी, जो नैना ने सुबह भाई को नहीं बांधने का फैसला किया था…
रात तक उसकी कलाई पर सबसे मजबूती से बंधी हुई थी।

मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं
अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं
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