“मैडम, ये राखी आप किसके लिए खरीद रही हैं?”
दुकानदार के सवाल पर सोनम कुछ पल चुप रही।
उसकी नजर सामने सजी रंग-बिरंगी राखियों पर थी। हर राखी चमक रही थी, लेकिन उसकी आंखें एक बहुत साधारण-सी लाल धागे वाली राखी पर टिक गईं।
उसने धीरे से कहा,
“उस भाई के लिए… जिसे मैंने कभी देखा ही नहीं।”
दुकानदार हैरानी से उसे देखने लगा।
सोनम ने राखी खरीदी और अपने बैग में रख ली।
वह हर साल ऐसा करती थी।
लेकिन इस बार उसके मन में एक अजीब-सी बेचैनी थी।
सोनम को बचपन से यही बताया गया था कि वह अपने माता-पिता की इकलौती संतान है। उसका कोई भाई या बहन नहीं था।
लेकिन जब वह लगभग दस साल की थी, तब उसने घर के पुराने संदूक में एक तस्वीर देखी थी।
तस्वीर में उसकी माँ दो छोटे बच्चों के साथ बैठी थीं।
एक बच्ची सोनम थी।
दूसरा बच्चा एक लड़का था।
सोनम ने माँ से पूछा था,
“ये कौन है?”
माँ ने तस्वीर उसके हाथ से ले ली और बस इतना कहा,
“पुरानी बात है, इसे भूल जाओ।”
लेकिन सोनम भूल नहीं पाई।
हर साल रक्षाबंधन पर उसे उस अनजान लड़के की याद आती।
वह सोचती—
क्या सच में मेरा कोई भाई था?
इस बार माँ की तबीयत काफी कमजोर थी।
एक शाम सोनम उनके पास बैठी थी।
उसने हिम्मत करके पूछा,
“माँ, मुझे एक बात पूछनी है।”
माँ ने उसकी तरफ देखा।
“पूछ।”
“उस पुरानी तस्वीर में जो लड़का था… वो कौन था?”
माँ के हाथ से पानी का गिलास छूटते-छूटते बचा।
उनकी आंखें भर आईं।
“तूने उसे अभी तक नहीं भुलाया?”
“मैं कैसे भूलूं माँ? मुझे तो पता ही नहीं कि वो कौन था।”
माँ काफी देर चुप रहीं।
फिर उन्होंने अपने तकिए के नीचे से एक पुराना लिफाफा निकाला।
“शायद अब तुझे सच जान लेना चाहिए।”
सोनम के हाथ कांपने लगे।
लिफाफे के अंदर एक पत्र था।
ऊपर लिखा था—
“मेरी बहन सोनम के नाम।”
सोनम की सांस जैसे रुक गई।
उसने माँ की तरफ देखा।
“माँ… मेरा भाई था?”
माँ की आंखों से आंसू बह निकले।
“हां।”
“कहां है वो?”
माँ ने नजरें झुका लीं।
“मुझे नहीं पता।”
सोनम ने पत्र खोला।
पत्र कई साल पुराना था।
उसमें लिखा था—
“सोनम,
जब तू ये पत्र पढ़ेगी, शायद मैं तुझे बहुत याद आऊंगा।
मुझे नहीं पता तब मैं कहां होऊंगा।
लेकिन अगर कभी तू मुझे ढूंढे, तो एक बात याद रखना।
तेरा भाई तुझसे नाराज होकर नहीं गया था।
मैंने सिर्फ इतना सोचा था कि तू हमेशा खुश रहे।
अगर कभी रक्षाबंधन आए और मैं तेरे पास न हूं, तो मेरे लिए एक राखी जरूर रखना।
क्योंकि मुझे विश्वास है कि एक दिन तू मुझे ढूंढ ही लेगी।
तेरा भाई,
अर्जुन।”
सोनम की आंखों से आंसू लगातार बह रहे थे।
उसने माँ का हाथ पकड़ लिया।
“माँ, भैया कहां गए थे?”
माँ ने कांपती आवाज में कहा,
“तेरे पापा के जाने के बाद घर की हालत बहुत खराब हो गई थी। अर्जुन तुझसे चार साल बड़ा था। उसे समझ आ गया था कि घर में पैसे नहीं हैं।”
“फिर?”
“एक दिन उसने कहा कि वह काम करने शहर जाएगा।”
सोनम की आंखें फैल गईं।
“इतनी छोटी उम्र में?”
माँ रो पड़ीं।
“मैंने उसे रोका था। बहुत रोका था। लेकिन वह नहीं माना।”
“उसने आपको क्यों नहीं बताया?”
“क्योंकि वह चाहता था कि तू रोए नहीं।”
सोनम ने पत्र को सीने से लगा लिया।
“फिर उसका कोई पता नहीं चला?”
माँ ने सिर हिला दिया।
“शुरू में पत्र आते थे। फिर बंद हो गए।”
उस रात सोनम सो नहीं पाई।
वह बार-बार उस पत्र को पढ़ती रही।
सुबह होते ही उसने भाई को ढूंढने का फैसला कर लिया।
पत्र के साथ एक पुराना पता लिखा था।
वह उसी शहर पहुंच गई।
वहां एक पुरानी फैक्ट्री थी।
सोनम ने आसपास के लोगों से पूछा,
“क्या यहां कभी अर्जुन नाम का कोई लड़का काम करता था?”
एक बूढ़े चौकीदार ने उसे ध्यान से देखा।
“अर्जुन?”
“हां।”
“उसकी छोटी बहन सोनम?”
सोनम की आंखें भर आईं।
“आप जानते हैं उन्हें?”
चौकीदार ने धीरे से कहा,
“वह तुझे बहुत याद करता था।”
सोनम की धड़कन तेज हो गई।
“वो कहां हैं?”
बूढ़े आदमी ने एक छोटे से कमरे की तरफ इशारा किया।
“पहले वहां रहता था।”
सोनम दौड़कर उस कमरे तक पहुंची।
कमरा अब खाली था।
दीवार पर पुराने निशान थे।
एक कोने में लकड़ी का टूटा हुआ बक्सा पड़ा था।
चौकीदार ने कहा,
“जाने से पहले उसने ये सामान यहीं छोड़ दिया था।”
सोनम ने बक्सा खोला।
अंदर दर्जनों राखियां थीं।
हर साल की एक।
कुछ नई थीं।
कुछ बहुत पुरानी।
सोनम एकदम बैठ गई।
हर राखी के साथ एक छोटी-सी पर्ची थी।
पहली पर्ची—
“सोनम शायद इस साल पहली बार स्कूल गई होगी।”
दूसरी—
“आज उसकी उम्र दस साल होगी। पता नहीं उसे चॉकलेट पसंद है या अब बदल गई होगी।”
तीसरी—
“आज रक्षाबंधन है। काश, मेरी कलाई पर उसकी राखी होती।”
सोनम रोने लगी।
वह राखियां अपनी हथेली में पकड़कर बोली,
“भैया… आप मुझे भूल नहीं पाए थे।”
बूढ़े चौकीदार ने कहा,
“वो हर साल एक राखी खरीदता था।”
सोनम ने पूछा,
“कहां गए वो?”
चौकीदार कुछ पल चुप रहा।
फिर बोला,
“कुछ साल पहले उसकी तबीयत खराब रहने लगी थी। फिर उसने यहां काम छोड़ दिया।”
“कहां गया?”
“मुझे नहीं पता।”
सोनम की उम्मीद फिर टूटने लगी।
तभी बूढ़े आदमी ने कहा,
“लेकिन जाते समय उसने कहा था कि अगर कभी उसकी बहन आए, तो उसे एक जगह जरूर बताना।”
उसने एक छोटा-सा कागज सोनम को दिया।
उस पर लिखा था—
“पुराने नदी किनारे वाला मंदिर।”
सोनम उसी समय वहां पहुंची।
मंदिर के पास एक छोटी-सी दुकान थी।
दुकान पर एक आदमी बैठा था।
सोनम ने पूछा,
“क्या आप अर्जुन को जानते हैं?”
उस आदमी ने उसे गौर से देखा।
फिर मुस्कुराया।
“तुम सोनम हो?”
सोनम हैरान रह गई।
“आपको मेरा नाम कैसे पता?”
उस आदमी ने पीछे की तरफ इशारा किया।
“वो तुम्हारा इंतजार कर रहा है।”
सोनम के कदम रुक गए।
उसका दिल इतनी तेजी से धड़क रहा था कि उसे अपनी सांसें सुनाई दे रही थीं।
वह धीरे-धीरे पीछे गई।
एक पेड़ के नीचे एक आदमी बैठा था।
बालों में हल्की सफेदी।
चेहरे पर थकान।
लेकिन आंखों में वही अपनापन।
सोनम ने कांपती आवाज में कहा,
“अर्जुन भैया?”
वह आदमी धीरे से उठा।
उसकी आंखें भर आईं।
“सोनम?”
बस इतना सुनते ही सोनम दौड़कर उसके गले लग गई।
“भैया!”
अर्जुन ने उसे कसकर पकड़ लिया।
दोनों रो रहे थे।
“आप चले क्यों गए थे?”
अर्जुन ने कहा,
“ताकि तू रह सके।”
“लेकिन मुझे भाई चाहिए था!”
“मुझे पता था।”
“तो वापस क्यों नहीं आए?”
अर्जुन की आंखें झुक गईं।
“जब वापस आने की हिम्मत जुटाई… तब लगा शायद तू मुझे पहचान भी नहीं पाएगी।”
सोनम ने उसका चेहरा पकड़ लिया।
“भैया को बहन कैसे नहीं पहचानेगी?”
कुछ देर बाद सोनम ने अपने बैग से राखी निकाली।
वही साधारण लाल धागे वाली राखी।
उसने कहा,
“ये आपके लिए है।”
अर्जुन ने अपनी कलाई आगे कर दी।
सोनम राखी बांधते हुए रो रही थी।
“इतने सालों की सारी राखियां आज पूरी हो गईं।”
अर्जुन ने कहा,
“नहीं।”
“क्यों?”
“क्योंकि हर साल की राखी नहीं बांधी जा सकती।”
सोनम ने उसके पास रखे बक्से को देखा।
फिर एक राखी उठाई और अपनी कलाई पर बांध ली।
अर्जुन ने हैरानी से पूछा,
“ये क्या कर रही है?”
सोनम ने कहा,
“जो राखियां आपकी कलाई तक नहीं पहुंच सकीं, वो आज हमारे रिश्ते तक पहुंच गईं।”
अर्जुन रो पड़ा।
सोनम ने कहा,
“आज से कोई राखी अधूरी नहीं रहेगी।”
अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।
“वादा?”
सोनम ने कहा,
“वादा।”
उस दिन एक बहन को अपना अनजान भाई मिला।
और एक भाई को…
वह राखी, जिसका वह वर्षों से इंतजार कर रहा था।
कभी-कभी एक राखी सिर्फ त्योहार नहीं होती।
कभी वह सालों से बिछड़े दो लोगों के बीच बचा हुआ आखिरी धागा होती है…
जिसे पकड़कर वे एक-दूसरे तक वापस पहुंच जाते हैं।

मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं
अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं
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