Part 6
राजावत मेंशन से बाहर निकलते ही अग्नि अपनी कार की पिछली सीट पर आकर बैठ गया। कार का दरवाजा बंद होते ही बाहर की दुनिया की आवाजें जैसे अचानक उससे दूर हो गईं।
ड्राइवर ने रियर-व्यू मिरर से उसकी तरफ देखा। “सर, विला चलें?”
अग्नि कुछ नहीं बोला।
उसकी नजर कार की खिड़की से बाहर टिकी थी। मुंबई की सड़कें हमेशा की तरह अपनी रफ्तार से भाग रही थीं। कहीं ट्रैफिक में फँसी गाड़ियाँ थीं, कहीं सड़क किनारे भागते लोग, कहीं चमचमाती इमारतें और कहीं फुटपाथ पर अपनी जिंदगी समेटे बैठे लोग।
लेकिन अग्नि का ध्यान इनमें से किसी पर नहीं था।
उसके दिमाग में सिर्फ एक शब्द घूम रहा था।
शादी।
उसने आँखें बंद कर लीं। उसे दादाजी की आवाज़ याद आ रही थी। “तुम्हारे पास बहुत कम समय है।”
फिर उनकी दूसरी बात…
“तुम जितना समझ रहे हो, उससे भी कम।”
आखिर ऐसा क्या था जिसे दादा जी उससे छिपा रहे थे?
वो फाइल… उसमें मौजूद वो अतिरिक्त हिस्सा…
और फिर उनका इतना आसानी से उसकी शर्त मान लेना।
अग्नि ने भौंहें सिकोड़ लीं। उसे आज अपने दादा जी का व्यवहार कुछ ठीक नहीं लग रहा था। वो उन्हें सालों से जानता और समझता था। दादा जी कभी किसी बात को इतनी आसानी से नहीं मानते थे।
खासकर तब…
जब बात राजावत परिवार और उसकी विरासत की हो।
लेकिन आज उन्होंने उसकी हर शर्त बिना किसी सवाल के स्वीकार कर ली थी।
“लड़की मैं खुद चुनूँगा।”
अग्नि के अपने ही शब्द उसके कानों में गूँज गए।
उसने आँखें खोलीं।
“सर?” ड्राइवर की आवाज़ सुनकर उसका ध्यान टूटा।
अग्नि, “बोलो!”
ड्राइवर ने पूछा, “विला चलना है?”
अग्नि कुछ सेकंड चुप रहा। फिर उसने बिना किसी भाव के कहा, “नहीं।”
ड्राइवर ने रियर-व्यू मिरर से उसकी तरफ देखा। “सर?”
अग्नि ने अपनी घड़ी पर नजर डाली। शाम के करीब साढ़े आठ बज रहे थे। उसने धीमे स्वर में कहा, “कार क्लब ले चलो”
ड्राइवर ने तुरंत सिर हिलाया। “जी सर।” कहकर उसने कार की दिशा बदल दी।
वहीं अग्नि ने अपने फोन से अपने दोस्त शुभम को भी क्लब आने का मैसेज कर दिया।
क्योंकि उसे पता था उसके सामने जो दुविधा अभी है उसका हल शुभम में बेहतर कोई नहीं दे सकता। क्योंकि उसके पास हर बात का सॉल्यूशन होता है।
कुछ देर बाद…
मुंबई के सबसे प्राइवेट और एलीट क्लबों में से एक के बाहर काली कार आकर रुकी। कार के रुकते ही एक स्टाफ मेंबर तुरंत आगे बढ़ा और पीछे का दरवाजा खोल दिया।
अग्नि कार से बाहर निकला। ब्लैक शर्ट, ब्लैक ट्राउजर और उसके ऊपर पहना डार्क ब्लेजर…
उसके चेहरे पर वही ठंडा आत्मविश्वास था जिसके कारण राजावत ग्रुप में हर कोई उससे एक दूरी बनाकर रखता था।
क्लब का स्टाफ उसे देखते ही सतर्क हो गया। “Good evening, Mr. Rajawat.”
अग्नि ने सिर्फ़ हल्का-सा सिर हिलाया और अंदर चला गया। क्लब का माहौल हमेशा की तरह शांत लेकिन आलीशान था।
हल्की रोशनी… धीमा म्यूजिक…
बार के पीछे सजी महँगी शराब की बोतलें…
और शहर के कुछ बेहद प्रभावशाली लोग अपने-अपने ग्रुप में बैठे हुए थे, तो वहीं कुछ लड़के लड़कियां फ्लोर पर डांस कर रहे थे। कही छोटे छोटे कपड़े पहने लड़कियां गेस्ट को ड्रिंक सर्व कर रहे थे।
अग्नि की नजर किसी पर नहीं गई। वह सीधे अपने हमेशा वाले प्राइवेट लाउंज की तरफ बढ़ गया।
लेकिन जैसे ही उसने दरवाजा खोला, “आ गया हमारा दूल्हा!” अंदर से आवाज आई।
अग्नि के कदम वहीं रुक गए। उसने सामने देखा।
शुभम उसका दोस्त सोफे पर आराम से बैठा हुआ था।
उसके हाथ में ड्रिंक थी और चेहरे पर हमेशा वाली शरारती मुस्कान।
अग्नि ने उसे घूरा। “बकवास बंद कर।”
शुभम ने मुस्कुराते हुए ग्लास उठाया।
“ये बकवास… बहुत ही जल्द हकीकत में बदलने वाली है मेरे दोस्त…।”
अग्नि अंदर आया और सामने वाले सोफे पर बैठ गया।
“बकवास मत कर।”
शुभम ने उसे गौर से देखा। “ कुछ बात है…?” अग्नि के फेस के रिएक्शन देखते ही वो समझ गया कि आज अग्नि के साथ कुछ तो अजीब है।
अग्नि ने कोई जवाब नहीं दिया।
शुभम ने अपना ग्लास टेबल पर रखा। “दादाजी से मिलने गया था ना?”
अग्नि ने बस सिर हिलाया।
“और?”
“वही शादी का मुद्दा।” अग्नि ने जवाब दिया।
शुभम ने गहरी साँस ली। “मुझे पता था।”
कुछ पल चुप्पी रही। फिर शुभम ने पूछा, “तो इस बार भी मना कर दिया?”
अग्नि ने उसकी तरफ देखा। “नहीं।”
शुभम की भौंहें ऊपर उठ गईं। “क्या?”
अग्नि ने बिल्कुल सपाट स्वर में कहा, “मैं शादी करने के लिए तैयार हूँ।”
शुभम के हाथ से ग्लास लगभग छूटते छूटते बचा। वो आँखें बड़ी किए अग्नि को देख रहा था। “तू?”
अग्नि ने उसे घूरा। “हाँ, मैं।”
शुभम, “तू सच में शादी करेगा?”
अग्नि, “क्यों? मैं इंसान नहीं हूँ क्या?”
शुभम हँस पड़ा। “नहीं… तू इंसान तो है। लेकिन पिछले पाँच सालों से तेरी बातें सुनकर मुझे शक होने लगा था।”
अग्नि ने आँखें बंद कर लीं। “शुभम…”
“ओके। ओके।” शुभम ने खुद को संभाला। “लेकिन अचानक ऐसा क्या हुआ?”
अग्नि कुछ पल चुप रहा। फिर बोला, “दादा जी ने कुछ ऐसी बातें बताईं जिनके बाद मेरे पास कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा।”
शुभम की मुस्कान गायब हो गई। “क्या बात है?”
“मैं अभी नहीं बता सकता।” अग्नि ने बताने से साफ इनकार कर दिया।
शुभम ने घूरा, “अग्नि…”
अग्नि ने सख्त लहजे में कहा, “मैंने कहा ना, अभी नहीं।”
शुभम ने उसकी आँखों में देखा। उसे समझ आ गया कि इस बार मामला सचमुच गंभीर है।
उसने बात बदलते हुए पूछा, “ठीक है। लेकिन एक बात बता… लड़की कौन है?”
अग्नि ने उसकी तरफ देखा। “कोई लड़की नहीं है।”
शुभम, “मतलब?”
अग्नि, “मैंने अभी तक किसी को चुना ही नहीं।”
शुभम ने हैरानी से कहा, “तो फिर शादी करेगा किससे?”
अग्नि ने धीमे स्वर में कहा, “ इसलिए ही तो तुझे यहाँ बुलाया है?”
शुभम उसकी बात समझने की कोशिश करने लगा। “मतलब? मेरा मैरिज breau नहीं है।”
अग्नि आगे झुक गया। “ उसकी जरूरत भी नहीं। देख, मुझे प्यार नहीं चाहिए। मुझे कोई ऐसी लड़की नहीं चाहिए जो मेरे पैसे, मेरे नाम या राजावत परिवार की जिंदगी का हिस्सा बनने के सपने देखे।”
“मुझे सिर्फ़ एक समझदार लड़की चाहिए। जो छह महीने के बाद अपनी जिंदगी में वापस चली जाए।”
शुभम कुछ पल उसे देखता रहा। फिर उसने धीरे से पूछा, “तू कॉन्ट्रैक्ट मैरिज की बात कर रहा है?”
अग्नि की आँखों में हल्की-सी ठंडक उतर आई। “Exactly.”
शुभम कुछ सेकंड चुप रहा। फिर अचानक हँस पड़ा।
“तू पागल हो गया है!”
अग्नि ने उसे घूरा। “मुझे इसमें मजाक की कोई बात नहीं दिख रही।”
“मुझे दिख रही है।” शुभम ने हँसी रोकते हुए कहा, “तू शादी से इतना नफरत करता था कि अब तूने शादी को बिजनेस डील बना दिया।”
अग्नि ने बिना मुस्कुराए कहा, “मेरे लिए शादी हमेशा से एक डील ही थी।”
शुभम उसकी बात सुनकर गंभीर हो गया। उसे मालूम था कि अग्नि शादी को लेकर इतना कठोर क्यों था।
उसने धीरे से पूछा, “और अगर वो लड़की तुझसे प्यार कर बैठी तो?”
अग्नि ने तुरंत जवाब दिया, “नहीं करेगी।”
शुभम, “तुझे इतना यकीन कैसे है?”
अग्नि कुछ पल शांत रहा। फिर बोला, “क्योंकि कॉन्ट्रैक्ट में साफ लिखा होगा… छह महीने बाद कोई रिश्ता नहीं रहेगा।”
शुभम ने सिर हिलाया। ” चल मान लिया उसे प्यार नहीं भी हुआ लेकिन अगर तू प्यार कर बैठा तो?”
इस बार अग्नि चुप हो गया। कुछ सेकंड तक उसने कोई जवाब नहीं दिया।
फिर उसकी आवाज़ बेहद ठंडी थी। “ऐसा नहीं होगा।”
शुभम ने उसकी आँखों में देखा। “तुझे खुद पर इतना भरोसा है?”
अग्नि ने बिना झिझके कहा, “हाँ।”
शुभम हल्का-सा मुस्कुराया। “ठीक है… फिर देखते हैं छह महीने बाद कौन सही साबित होता है।”
अग्नि ने उसकी बा
त को नजरअंदाज कर दिया। उसने टेबल पर रखा अपना फोन उठाया। स्क्रीन पर कई नोटिफिकेशन थे। उसने एक-एक करके उन्हें देखा।
फिर अचानक उसकी उंगली एक नाम पर जाकर रुक गई।
Veda Sharma.

मेरा नाम नेहा गोयल है।
और पिछले दो वर्ष से मैं प्रतिलिपि पर कहानियां लिखती आ रही हूँ।
मुझे लेखन करते हुए बहुत ही अच्छा लगता है।
वैसे मुझे लिखने से पढ़ना ज्यादा पसंद है।


प्रातिक्रिया दे