सुनहरी छोटी चिड़िया
एक घने जंगल के किनारे बसे छोटे-से गाँव में गौरी नाम की एक लड़की रहती थी। गौरी बहुत दयालु थी। उसे पेड़-पौधों और जानवरों से बहुत लगाव था। उसके घर के पीछे एक पुराना बरगद का पेड़ था, जहाँ रोज तरह-तरह की चिड़ियाँ आकर बैठती थीं।
एक सुबह गौरी ने पेड़ के नीचे एक अजीब-सी चमक देखी। उसने पास जाकर देखा तो वहाँ एक छोटी-सी चिड़िया बैठी थी। उसके पंख बिल्कुल सुनहरे थे। सूरज की रोशनी पड़ते ही उसके पंख ऐसे चमकते जैसे किसी ने उन पर सोना चढ़ा दिया हो।
गौरी उसे देखकर हैरान रह गई।
“तुम कितनी सुंदर हो!” उसने धीरे से कहा।
चिड़िया ने अपनी गर्दन घुमाई और गौरी की ओर देखा। फिर वह उड़कर उसके कंधे पर आ बैठी।
गौरी मुस्कुराई। “डरना मत, मैं तुम्हें कुछ नहीं करूँगी।”
उस दिन से वह सुनहरी चिड़िया रोज गौरी के घर आने लगी। गौरी उसे बाजरे के दाने खिलाती और उसके लिए मिट्टी के छोटे कटोरे में पानी रखती। उसने उसका नाम रख दिया—सोना।
कुछ दिनों में गौरी और सोना के बीच ऐसी दोस्ती हो गई, जैसे वे एक-दूसरे को वर्षों से जानते हों।
लेकिन गाँव में एक लालची आदमी भी रहता था, जिसका नाम धनराज था। उसने एक दिन सोना को गौरी के घर के पास देखा। सुनहरे पंख देखकर उसकी आँखों में लालच आ गया।
“अगर मैं इस चिड़िया को पकड़ लूँ,” धनराज मन ही मन बोला, “तो इसे शहर में बहुत पैसे में बेच सकता हूँ।”
अगले दिन उसने जंगल में एक जाल बिछा दिया।
सोना रोज की तरह गौरी के घर आई और फिर जंगल की ओर उड़ गई। रास्ते में वह धनराज के जाल में फँस गई।
चिड़िया घबराकर फड़फड़ाने लगी।
उसी समय गौरी उसे ढूँढ़ते हुए वहाँ पहुँच गई। उसने जाल देखा तो तुरंत दौड़कर सोना को बाहर निकाला।
धनराज झाड़ियों के पीछे छिपा सब देख रहा था।
गौरी ने सोना को अपनी हथेलियों में लेकर कहा, “तुम्हें कुछ हुआ तो नहीं?”
सोना ने प्यार से उसकी उंगली पर अपनी चोंच रखी।
धनराज बाहर आया और बोला, “वह चिड़िया मुझे दे दो।”
गौरी ने कहा, “क्यों?”
“क्योंकि उसके पंख सोने के हैं। मैं उसे बेचकर बहुत अमीर बन सकता हूँ।”
गौरी ने सिर हिलाया। “वह कोई चीज नहीं है जिसे बेचा जाए। वह एक जीव है।”
धनराज गुस्से में बोला, “तुम मुझे रोक नहीं सकती।”
वह चला गया, लेकिन उसके मन का लालच और बढ़ गया।
उस रात गाँव में तेज आँधी आई। बारिश इतनी हुई कि नदी का पानी बढ़ने लगा। गाँव के कई घरों में पानी घुसने लगा। लोग अपने सामान को सुरक्षित जगह ले जाने लगे।
गौरी भी अपने माता-पिता की मदद कर रही थी। तभी सोना अचानक तेज आवाज में चहचहाने लगी। वह बार-बार गाँव के पुराने रास्ते की ओर उड़ती और फिर लौट आती।
गौरी को कुछ समझ नहीं आया।
“क्या हुआ सोना?”
चिड़िया फिर उसी दिशा में उड़ गई।
गौरी उसके पीछे चल पड़ी। थोड़ी दूर जाकर उसने देखा कि नदी का एक किनारा टूट चुका था और पानी तेजी से गाँव की ओर आ रहा था।
गौरी घबराकर चिल्लाई, “सब लोग जल्दी बाहर आओ! पानी गाँव में आने वाला है!”
लोगों ने उसकी बात सुनी और ऊँची जगह की ओर जाने लगे। कुछ ही देर में नदी का पानी उसी रास्ते से बहता हुआ गाँव में आ गया।
गाँव वालों को समझ आ गया कि अगर उन्हें पहले चेतावनी न मिलती तो बड़ा नुकसान हो सकता था।
सबने गौरी की तारीफ की।
गौरी ने मुस्कुराकर सोना की ओर देखा। “मुझे नहीं, इसे धन्यवाद दो।”
लेकिन धनराज चुप था। उसके मन में अभी भी लालच था।
अगली सुबह उसने सोना को पकड़ने की आखिरी कोशिश की। उसने गौरी के घर के पास दाने बिखेर दिए और पीछे छिपकर बैठ गया।
सोना दाने खाने आई, लेकिन तभी उसकी नजर धनराज पर पड़ गई। वह तुरंत उड़ गई।
धनराज उसके पीछे भागा। भागते-भागते वह जंगल के अंदर बहुत दूर निकल गया। अचानक उसका पैर एक गड्ढे में फँस गया और वह नीचे गिर पड़ा।
“बचाओ!” वह चिल्लाया।
आसपास कोई नहीं था।
सोना ने उसकी आवाज सुनी। वह उड़कर गाँव की ओर गई और जोर-जोर से गौरी के घर के ऊपर चक्कर लगाने लगी।
गौरी समझ गई कि कुछ हुआ है।
वह सोना के पीछे जंगल की ओर दौड़ी। थोड़ी देर बाद उसे धनराज गड्ढे में फँसा दिखाई दिया।
गौरी ने गाँव वालों को बुलाया और सबने मिलकर धनराज को बाहर निकाल लिया।
धनराज शर्म से सिर झुका कर खड़ा रहा।
उसने गौरी से कहा, “जिस चिड़िया को मैं पैसे के लिए पकड़ना चाहता था, उसी ने आज मेरी जान बचाई।”
गौरी बोली, “सोना ने तुम्हें इसलिए नहीं बचाया कि तुम अच्छे हो। उसने इसलिए बचाया क्योंकि उसका दिल तुम्हारी तरह लालची नहीं है।”
धनराज की आँखें झुक गईं।
उस दिन के बाद उसने कभी सोना को पकड़ने की कोशिश नहीं की। बल्कि उसने गाँव में पेड़ लगाने शुरू कर दिए और पक्षियों के लिए पानी के बर्तन रखने लगा।
धीरे-धीरे गाँव में हर घर की छत पर पानी और दाने रखे जाने लगे।
सोना अब भी रोज गौरी के घर आती थी। लेकिन एक दिन वह सुबह-सुबह गौरी के सामने आकर देर तक चहचहाती रही। फिर उसने आसमान की ओर उड़ान भरी।
गौरी समझ गई कि शायद अब सोना अपने परिवार के पास लौटना चाहती है।
उसने हाथ हिलाकर कहा, “जाओ सोना। जहाँ भी रहना, खुश रहना।”
सोना कुछ दूर जाकर फिर वापस लौटी। उसने एक बार गौरी के सिर के ऊपर चक्कर लगाया और फिर जंगल की ओर उड़ गई।
उसके जाने के बाद भी जब कभी सूरज की पहली किरण बरगद के पेड़ पर पड़ती, उसकी एक सुनहरी चमक गौरी को दिखाई देती।
गौरी मुस्कुराकर कहती, “सोना कहीं गई नहीं है… वह बस आसमान के उस पार से मुझे याद करती है।”
और सचमुच, उस दिन से गाँव के लोग कहते थे कि जब भी किसी के दिल में सच्ची दया होती है, जंगल में एक छोटी-सी सुनहरी चिड़िया जरूर दिखाई देती है।
कहते हैं, वह चिड़िया सोने की नहीं थी।
उसके पंख सुनहरे थे, लेकिन उसका दिल उससे भी ज्यादा कीमती था।

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