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  • सुनहरी छोटी चिड़िया

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    सुनहरी छोटी चिड़िया

     

    एक घने जंगल के किनारे बसे छोटे-से गाँव में गौरी नाम की एक लड़की रहती थी। गौरी बहुत दयालु थी। उसे पेड़-पौधों और जानवरों से बहुत लगाव था। उसके घर के पीछे एक पुराना बरगद का पेड़ था, जहाँ रोज तरह-तरह की चिड़ियाँ आकर बैठती थीं।

     

    एक सुबह गौरी ने पेड़ के नीचे एक अजीब-सी चमक देखी। उसने पास जाकर देखा तो वहाँ एक छोटी-सी चिड़िया बैठी थी। उसके पंख बिल्कुल सुनहरे थे। सूरज की रोशनी पड़ते ही उसके पंख ऐसे चमकते जैसे किसी ने उन पर सोना चढ़ा दिया हो।

     

    गौरी उसे देखकर हैरान रह गई।

     

    “तुम कितनी सुंदर हो!” उसने धीरे से कहा।

     

    चिड़िया ने अपनी गर्दन घुमाई और गौरी की ओर देखा। फिर वह उड़कर उसके कंधे पर आ बैठी।

     

    गौरी मुस्कुराई। “डरना मत, मैं तुम्हें कुछ नहीं करूँगी।”

     

    उस दिन से वह सुनहरी चिड़िया रोज गौरी के घर आने लगी। गौरी उसे बाजरे के दाने खिलाती और उसके लिए मिट्टी के छोटे कटोरे में पानी रखती। उसने उसका नाम रख दिया—सोना।

     

    कुछ दिनों में गौरी और सोना के बीच ऐसी दोस्ती हो गई, जैसे वे एक-दूसरे को वर्षों से जानते हों।

     

    लेकिन गाँव में एक लालची आदमी भी रहता था, जिसका नाम धनराज था। उसने एक दिन सोना को गौरी के घर के पास देखा। सुनहरे पंख देखकर उसकी आँखों में लालच आ गया।

     

    “अगर मैं इस चिड़िया को पकड़ लूँ,” धनराज मन ही मन बोला, “तो इसे शहर में बहुत पैसे में बेच सकता हूँ।”

     

    अगले दिन उसने जंगल में एक जाल बिछा दिया।

     

    सोना रोज की तरह गौरी के घर आई और फिर जंगल की ओर उड़ गई। रास्ते में वह धनराज के जाल में फँस गई।

     

    चिड़िया घबराकर फड़फड़ाने लगी।

     

    उसी समय गौरी उसे ढूँढ़ते हुए वहाँ पहुँच गई। उसने जाल देखा तो तुरंत दौड़कर सोना को बाहर निकाला।

     

    धनराज झाड़ियों के पीछे छिपा सब देख रहा था।

     

    गौरी ने सोना को अपनी हथेलियों में लेकर कहा, “तुम्हें कुछ हुआ तो नहीं?”

     

    सोना ने प्यार से उसकी उंगली पर अपनी चोंच रखी।

     

    धनराज बाहर आया और बोला, “वह चिड़िया मुझे दे दो।”

     

    गौरी ने कहा, “क्यों?”

     

    “क्योंकि उसके पंख सोने के हैं। मैं उसे बेचकर बहुत अमीर बन सकता हूँ।”

     

    गौरी ने सिर हिलाया। “वह कोई चीज नहीं है जिसे बेचा जाए। वह एक जीव है।”

     

    धनराज गुस्से में बोला, “तुम मुझे रोक नहीं सकती।”

     

    वह चला गया, लेकिन उसके मन का लालच और बढ़ गया।

     

    उस रात गाँव में तेज आँधी आई। बारिश इतनी हुई कि नदी का पानी बढ़ने लगा। गाँव के कई घरों में पानी घुसने लगा। लोग अपने सामान को सुरक्षित जगह ले जाने लगे।

     

    गौरी भी अपने माता-पिता की मदद कर रही थी। तभी सोना अचानक तेज आवाज में चहचहाने लगी। वह बार-बार गाँव के पुराने रास्ते की ओर उड़ती और फिर लौट आती।

     

    गौरी को कुछ समझ नहीं आया।

     

    “क्या हुआ सोना?”

     

    चिड़िया फिर उसी दिशा में उड़ गई।

     

    गौरी उसके पीछे चल पड़ी। थोड़ी दूर जाकर उसने देखा कि नदी का एक किनारा टूट चुका था और पानी तेजी से गाँव की ओर आ रहा था।

     

    गौरी घबराकर चिल्लाई, “सब लोग जल्दी बाहर आओ! पानी गाँव में आने वाला है!”

     

    लोगों ने उसकी बात सुनी और ऊँची जगह की ओर जाने लगे। कुछ ही देर में नदी का पानी उसी रास्ते से बहता हुआ गाँव में आ गया।

     

    गाँव वालों को समझ आ गया कि अगर उन्हें पहले चेतावनी न मिलती तो बड़ा नुकसान हो सकता था।

     

    सबने गौरी की तारीफ की।

     

    गौरी ने मुस्कुराकर सोना की ओर देखा। “मुझे नहीं, इसे धन्यवाद दो।”

     

    लेकिन धनराज चुप था। उसके मन में अभी भी लालच था।

     

    अगली सुबह उसने सोना को पकड़ने की आखिरी कोशिश की। उसने गौरी के घर के पास दाने बिखेर दिए और पीछे छिपकर बैठ गया।

     

    सोना दाने खाने आई, लेकिन तभी उसकी नजर धनराज पर पड़ गई। वह तुरंत उड़ गई।

     

    धनराज उसके पीछे भागा। भागते-भागते वह जंगल के अंदर बहुत दूर निकल गया। अचानक उसका पैर एक गड्ढे में फँस गया और वह नीचे गिर पड़ा।

     

    “बचाओ!” वह चिल्लाया।

     

    आसपास कोई नहीं था।

     

    सोना ने उसकी आवाज सुनी। वह उड़कर गाँव की ओर गई और जोर-जोर से गौरी के घर के ऊपर चक्कर लगाने लगी।

     

    गौरी समझ गई कि कुछ हुआ है।

     

    वह सोना के पीछे जंगल की ओर दौड़ी। थोड़ी देर बाद उसे धनराज गड्ढे में फँसा दिखाई दिया।

     

    गौरी ने गाँव वालों को बुलाया और सबने मिलकर धनराज को बाहर निकाल लिया।

     

    धनराज शर्म से सिर झुका कर खड़ा रहा।

     

    उसने गौरी से कहा, “जिस चिड़िया को मैं पैसे के लिए पकड़ना चाहता था, उसी ने आज मेरी जान बचाई।”

     

    गौरी बोली, “सोना ने तुम्हें इसलिए नहीं बचाया कि तुम अच्छे हो। उसने इसलिए बचाया क्योंकि उसका दिल तुम्हारी तरह लालची नहीं है।”

     

    धनराज की आँखें झुक गईं।

     

    उस दिन के बाद उसने कभी सोना को पकड़ने की कोशिश नहीं की। बल्कि उसने गाँव में पेड़ लगाने शुरू कर दिए और पक्षियों के लिए पानी के बर्तन रखने लगा।

     

    धीरे-धीरे गाँव में हर घर की छत पर पानी और दाने रखे जाने लगे।

     

    सोना अब भी रोज गौरी के घर आती थी। लेकिन एक दिन वह सुबह-सुबह गौरी के सामने आकर देर तक चहचहाती रही। फिर उसने आसमान की ओर उड़ान भरी।

     

    गौरी समझ गई कि शायद अब सोना अपने परिवार के पास लौटना चाहती है।

     

    उसने हाथ हिलाकर कहा, “जाओ सोना। जहाँ भी रहना, खुश रहना।”

     

    सोना कुछ दूर जाकर फिर वापस लौटी। उसने एक बार गौरी के सिर के ऊपर चक्कर लगाया और फिर जंगल की ओर उड़ गई।

     

    उसके जाने के बाद भी जब कभी सूरज की पहली किरण बरगद के पेड़ पर पड़ती, उसकी एक सुनहरी चमक गौरी को दिखाई देती।

     

    गौरी मुस्कुराकर कहती, “सोना कहीं गई नहीं है… वह बस आसमान के उस पार से मुझे याद करती है।”

     

    और सचमुच, उस दिन से गाँव के लोग कहते थे कि जब भी किसी के दिल में सच्ची दया होती है, जंगल में एक छोटी-सी सुनहरी चिड़िया जरूर दिखाई देती है।

     

    कहते हैं, वह चिड़िया सोने की नहीं थी।

     

    उसके पंख सुनहरे थे, लेकिन उसका दिल उससे भी ज्यादा कीमती था।

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    Auther preeti Sharma

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  • सुनहरी हिरन मायावी

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    सुनहरी हिरनी और मायावी शिकारी

     

    बहुत दूर, ऊँचे पहाड़ों और घने पेड़ों से घिरे एक जंगल में एक छोटी सी सुनहरी हिरनी रहती थी। उसका नाम कनक था। उसका शरीर हल्की सुनहरी रोशनी जैसा चमकता था और उसकी बड़ी-बड़ी आँखों में मासूमियत थी।

     

    जंगल के जानवर कहते थे कि कनक साधारण हिरनी नहीं थी। जब वह सुबह की धूप में दौड़ती, तो उसके शरीर से सुनहरी चमक फैल जाती और उसके पैरों के निशान कुछ देर तक जमीन पर चमकते रहते।

     

    लेकिन जंगल में एक मायावी शिकारी भी रहता था—मायासुर।

     

    वह किसी को नुकसान पहुँचाने के लिए जंगल में नहीं रहता था, बल्कि उसे कनक की सुनहरी शक्ति चाहिए थी। उसे विश्वास था कि अगर वह कनक को पकड़ लेगा, तो उसकी जादुई शक्ति से वह पूरे जंगल पर अपना अधिकार कर सकता है।

     

    एक सुबह कनक नदी के किनारे पानी पी रही थी। अचानक उसे झाड़ियों के पीछे किसी की आहट सुनाई दी।

     

    वह चौकन्नी हुई।

     

    जैसे ही उसने पीछे देखा, वहाँ कोई नहीं था।

     

    कनक तेजी से जंगल की ओर भागी।

     

    उसके पीछे से एक आवाज आई, “भाग लो कनक… लेकिन मुझसे ज्यादा देर तक नहीं भाग पाओगी।”

     

    कनक समझ गई कि मायासुर फिर उसके पीछे पड़ चुका है।

     

    वह जंगल के सबसे पुराने हिस्से की ओर दौड़ी। वहाँ एक विशाल बरगद का पेड़ था, जिसके बारे में कहा जाता था कि उसकी जड़ों के नीचे जंगल की रक्षा करने वाली शक्ति रहती है।

     

    कनक उस पेड़ के पीछे छिप गई।

     

    कुछ ही देर में मायासुर वहाँ पहुँचा।

     

    उसने चारों तरफ देखा और मुस्कुराया।

     

    “मुझे पता है तुम यहीं कहीं हो।”

     

    उसने अपनी जादुई छड़ी घुमाई।

     

    अचानक जंगल की सारी पगडंडियाँ बदल गईं। जहाँ रास्ता था, वहाँ घनी झाड़ियाँ उग आईं और जहाँ झाड़ियाँ थीं, वहाँ रास्ता बन गया।

     

    कनक डर गई।

     

    मायासुर बोला, “अब देखता हूँ तुम कहाँ जाती हो।”

     

    कनक ने हिम्मत जुटाई और एक संकरी पगडंडी पर दौड़ पड़ी।

     

    मायासुर ने अपनी जादुई शक्ति से उसके आगे एक ऊँची दीवार खड़ी कर दी।

     

    कनक रुक गई।

     

    मायासुर धीरे-धीरे उसके पास आने लगा।

     

    “अब तुम बच नहीं सकती।”

     

    तभी कनक ने ऊपर देखा। पेड़ की एक मजबूत डाल ठीक उसके सिर के ऊपर थी।

     

    वह तेजी से पीछे हटी और छलांग लगाकर डाल के ऊपर चढ़ गई।

     

    मायासुर नीचे खड़ा रह गया।

     

    “तुम पेड़ पर चढ़ सकती हो?” वह गुस्से में बोला।

     

    कनक दूसरी डाल पर कूद गई और फिर पेड़ों के बीच से भागती हुई दूर निकल गई।

     

    लेकिन मायासुर ने हार नहीं मानी।

     

    उसने अपना रूप बदल लिया।

     

    कुछ ही क्षण में वह एक बूढ़े साधु के रूप में कनक के सामने दिखाई दिया।

     

    “बेटी, तुम बहुत डरी हुई लग रही हो। मेरे साथ चलो। मैं तुम्हें सुरक्षित जगह पहुँचा दूँगा।”

     

    कनक कुछ पल उसे देखती रही।

     

    तभी उसे साधु के पैरों के पास पड़ी छाया दिखाई दी। बूढ़े साधु की छाया के बजाय वहाँ किसी लंबे राक्षस जैसी आकृति थी।

     

    कनक समझ गई कि यह मायासुर है।

     

    वह बिना कुछ बोले दूसरी दिशा में भाग गई।

     

    मायासुर का चेहरा बदल गया।

     

    “तुम इतनी आसानी से मेरी चाल समझ गई?”

     

    कनक जंगल के अंदर और गहराई में चली गई।

     

    भागते-भागते उसे एक घायल खरगोश दिखाई दिया।

     

    खरगोश काँटों में फँसा था।

     

    कनक रुक गई।

     

    उसने अपने सींगों से काँटों को हटाया और खरगोश को बाहर निकाला।

     

    खरगोश ने कहा, “तुम्हें रुकना नहीं चाहिए था। मायासुर तुम्हारे पीछे है।”

     

    कनक ने कहा, “अगर मैं इसे छोड़ देती तो यह मर जाता। डर के कारण किसी की मदद करना नहीं छोड़ सकती।”

     

    खरगोश ने उसे जंगल के एक गुप्त रास्ते के बारे में बताया।

     

    “उस रास्ते से पहाड़ के पीछे एक पुरानी गुफा है। वहाँ जंगल की रक्षक देवी की शक्ति है। शायद वही तुम्हारी मदद कर सके।”

     

    कनक उस रास्ते पर चल पड़ी।

     

    लेकिन मायासुर को भी उसकी दिशा का पता चल गया।

     

    वह गरजते हुए बोला, “तुम उस गुफा तक नहीं पहुँचोगी!”

     

    उसने अपने मंत्र से तेज हवा पैदा कर दी।

     

    पेड़ हिलने लगे। पत्ते उड़ने लगे।

     

    कनक कई बार गिरते-गिरते बची, लेकिन उसने दौड़ना नहीं छोड़ा।

     

    आखिरकार वह गुफा तक पहुँच गई।

     

    अंदर एक बड़ा पत्थर था, जिस पर सुनहरे अक्षरों में लिखा था—

     

    “जिसके मन में डर से बड़ा साहस हो, वही इस शक्ति को जगा सकता है।”

     

    कनक ने पत्थर को छुआ।

     

    अचानक पूरी गुफा सुनहरी रोशनी से भर गई।

     

    एक शांत आवाज सुनाई दी, “कनक, तुम्हारी शक्ति तुम्हारे शरीर की चमक में नहीं, तुम्हारे दिल की अच्छाई में है।”

     

    कनक ने पूछा, “क्या मैं मायासुर को हरा सकती हूँ?”

     

    आवाज आई, “उसे उसकी ही माया से हराना होगा।”

     

    उसी समय मायासुर गुफा में पहुँच गया।

     

    “आखिर तुम यहाँ आ ही गई!”

     

    उसने हाथ उठाया और चारों तरफ अंधेरा छा गया।

     

    कनक ने आँखें बंद कर लीं।

     

    उसने डरने के बजाय अपने मन में जंगल के सभी जानवरों को याद किया—वह खरगोश जिसे उसने बचाया था, पक्षी, पेड़ और वे छोटे जीव जो हमेशा उसकी रक्षा करते थे।

     

    अचानक उसके शरीर से सुनहरी रोशनी निकलने लगी।

     

    मायासुर ने अपनी जादुई शक्ति बढ़ाई, लेकिन सुनहरी रोशनी उसके चारों तरफ फैल गई।

     

    उसकी बनाई हुई सारी मायावी तस्वीरें टूटने लगीं।

     

    मायासुर घबरा गया।

     

    “यह कैसे हो सकता है?”

     

    कनक ने कहा, “तुम दूसरों को डराकर शक्तिशाली बनना चाहते थे। लेकिन असली शक्ति किसी को डराने में नहीं, किसी की मदद करने में होती है।”

     

    मायासुर ने आखिरी बार हमला करने की कोशिश की।

     

    लेकिन इस बार जंगल के सारे जानवर गुफा के बाहर आ गए।

     

    हजारों पक्षी आसमान में उड़ने लगे। हिरणों का झुंड उसके सामने खड़ा हो गया और हाथियों ने जोर से चिंघाड़कर उसका रास्ता रोक दिया।

     

    मायासुर की माया कमजोर पड़ने लगी।

     

    उसकी जादुई छड़ी जमीन पर गिर गई।

     

    जैसे ही उसने उसे उठाने की कोशिश की, वह पत्थर बन गई।

     

    मायासुर की सारी शक्ति खत्म हो गई।

     

    वह घुटनों के बल बैठ गया।

     

    “मैं हार गया।”

     

    कनक उसके पास गई और बोली, “अगर तुम अपनी शक्ति का इस्तेमाल दूसरों की रक्षा के लिए करोगे, तो शायद जंगल तुम्हें माफ कर दे।”

     

    मायासुर ने पहली बार सिर झुका लिया।

     

    उस दिन के बाद वह जंगल छोड़कर दूर पहाड़ों में चला गया। कहते हैं कि उसने अपनी बाकी जिंदगी अपनी मायावी शक्तियों से लोगों को डराने के बजाय जरूरतमंदों की मदद करने में लगा दी।

     

    और कनक?

     

    वह जंगल की सबसे प्रिय हिरनी बन गई।

     

    अब जब वह सुबह जंगल में दौड़ती, तो उसकी सुनहरी चमक पहले से भी ज्यादा दिखाई देती।

     

    जानवर उसे देखकर कहते—

     

    “कनक सिर्फ सुनहरी हिरनी नहीं है। वह हमारे जंगल की बहादुर रक्षक है।”

     

    कनक मुस्कुराती और खुले जंगल में दौड़ जाती।

     

    उसकी चमकती हुई चाल जैसे हर किसी को एक ही बात सिखाती थी—

     

    सच्ची ताकत उस जादू में नहीं होती जो दूसरों को अपने वश में कर ले, बल्कि उस दिल में होती है जो डर के बावजूद सही काम करने का साहस रखता है।

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • पागल जादूगर

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    पागल जादूगर

     

    घने जंगल के बीच एक पुराना महल था। उस महल के बारे में आसपास के गांवों में तरह-तरह की बातें कही जाती थीं। कोई कहता था कि वहां रात में दीवारें बातें करती हैं, कोई कहता था कि महल के अंदर जाने वाला कभी वापस नहीं आता।

     

    लेकिन सबसे ज्यादा डर लोगों को वहां रहने वाले एक जादूगर से लगता था।

     

    उसका नाम था विराज।

     

    लोग उसे पागल जादूगर कहते थे।

     

    कहते थे कि वह इंसानों से नफरत करता था और अपनी जादुई किताबों के साथ घंटों अकेले बातें करता रहता था। कभी आधी रात को महल की खिड़कियों से नीली रोशनी निकलती, तो कभी जंगल में किसी अनजान जानवर की आवाज सुनाई देती।

     

    एक दिन गांव की एक लड़की तारा जंगल में अपनी छोटी बहन को ढूंढते-ढूंढते उस महल तक पहुंच गई।

     

    महल का बड़ा दरवाजा अपने आप खुल गया।

     

    तारा डरते हुए अंदर गई।

     

    “कोई है?” उसने धीमी आवाज में पूछा।

     

    अचानक पीछे से आवाज आई।

     

    “यहां इंसानों का आना मना है।”

     

    तारा पलटी।

     

    सामने एक लंबा आदमी खड़ा था। उसके बाल बिखरे हुए थे, कपड़े पुराने थे और हाथ में एक चमकती हुई छड़ी थी।

     

    “तुम… जादूगर हो?” तारा ने पूछा।

     

    विराज ने अजीब सी हंसी हंसते हुए कहा, “लोग मुझे पागल जादूगर कहते हैं।”

     

    “मेरी बहन खो गई है। मैंने उसे पूरे जंगल में ढूंढा, लेकिन वह नहीं मिली।”

     

    विराज की हंसी अचानक रुक गई।

     

    “तुम्हारी बहन कैसी दिखती है?”

     

    “उसकी उम्र दस साल है। उसने लाल रंग की पोशाक पहनी है। उसके हाथ में एक लकड़ी की गुड़िया है।”

     

    विराज ने आंखें बंद कर लीं।

     

    कुछ पल बाद उसने छड़ी जमीन पर रखी।

     

    महल की फर्श पर एक चमकता हुआ गोल निशान बन गया।

     

    उसमें जंगल का दृश्य दिखाई देने लगा।

     

    तारा हैरान रह गई।

     

    “ये… ये क्या है?”

     

    “जादू,” विराज ने कहा।

     

    दृश्य में तारा की बहन एक पेड़ के नीचे बैठी दिखाई दी।

     

    “वो वहां है!”

     

    तारा तुरंत बाहर भागने लगी।

     

    विराज ने उसका हाथ रोक लिया।

     

    “रुको।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि वो पेड़ साधारण पेड़ नहीं है।”

     

    तारा ने उसकी तरफ देखा।

     

    विराज ने कहा, “तुम्हारी बहन अकेली वहां नहीं है।”

     

    दोनों जंगल की ओर चल पड़े।

     

    कुछ दूर पहुंचने के बाद उन्हें बच्ची दिखाई दी।

     

    “दीदी!”

     

    तारा दौड़कर अपनी बहन के पास पहुंची और उसे गले लगा लिया।

     

    लेकिन तभी जमीन हिलने लगी।

     

    पेड़ की जड़ें जमीन से बाहर निकल आईं और चारों तरफ फैलने लगीं।

     

    तारा डर गई।

     

    “विराज!”

     

    जादूगर ने अपनी छड़ी उठाई।

     

    “पीछे हटो!”

     

    उसने मंत्र पढ़ा और छड़ी से रोशनी निकली। जड़ें पीछे हट गईं।

     

    बच्ची रोते हुए तारा से चिपक गई।

     

    तारा ने पहली बार गौर किया कि विराज के हाथ पर गहरा निशान था।

     

    “आपने हमें बचाया… फिर लोग आपको पागल क्यों कहते हैं?”

     

    विराज कुछ देर चुप रहा।

     

    फिर बोला, “क्योंकि लोग सच से ज्यादा डरावनी कहानी पर विश्वास करते हैं।”

     

    “क्या मतलब?”

     

    विराज ने नजरें झुका लीं।

     

    “मैं हमेशा से ऐसा नहीं था।”

     

    उसने उन्हें महल में वापस लाकर एक पुराना कमरा खोला।

     

    कमरे में सैकड़ों किताबें थीं।

     

    बीच में एक बड़ी तस्वीर लगी थी।

     

    तारा ने तस्वीर देखते ही पूछा, “ये कौन हैं?”

     

    विराज ने धीरे से कहा, “मेरा परिवार।”

     

    तस्वीर में विराज अपनी पत्नी और छोटी बेटी के साथ खड़ा था।

     

    “मैं कभी इस राज्य का राज जादूगर था। लोग मुझ पर भरोसा करते थे। लेकिन एक रात कुछ लालची जादूगरों ने मेरी सबसे शक्तिशाली किताब चुराने की कोशिश की। उस किताब में ऐसा जादू था जो पूरे राज्य को बचा सकता था।”

     

    “फिर?”

     

    “मैंने किताब बचा ली, लेकिन उसी रात मेरी बेटी गायब हो गई।”

     

    तारा चौंक गई।

     

    “क्या वो मर गई?”

     

    विराज की आंखें भर आईं।

     

    “मुझे नहीं पता।”

     

    कमरे में अचानक एक किताब अपने आप खुल गई।

     

    उसके पन्नों पर चमकते अक्षर दिखाई दिए।

     

    “जिसे तुम खोया समझ रहे हो, वह अभी भी जीवित है।”

     

    विराज का चेहरा बदल गया।

     

    “ये कैसे हो सकता है?”

     

    किताब के पन्ने तेजी से पलटने लगे।

     

    अचानक एक नक्शा सामने आया।

     

    उस पर जंगल के बीच एक लाल निशान चमक रहा था।

     

    तारा ने कहा, “शायद आपकी बेटी वहीं है।”

     

    विराज ने सिर हिलाया।

     

    “वह जगह… निषिद्ध जंगल है। वहां कोई जिंदा वापस नहीं आता।”

     

    तारा ने उसकी तरफ देखा।

     

    “आपने मेरी बहन को बचाया। अब मैं आपकी बेटी को ढूंढने में आपकी मदद करूंगी।”

     

    विराज ने पहली बार हल्की मुस्कान दी।

     

    “तुम जानती भी हो कि तुम किस मुसीबत में पड़ रही हो?”

     

    “नहीं। लेकिन किसी को अपने परिवार से दूर रहने का दर्द मैं समझ सकती हूं।”

     

    अगली सुबह दोनों निषिद्ध जंगल की ओर निकल पड़े।

     

    जंगल के बीच उन्हें एक टूटा हुआ मंदिर मिला।

     

    मंदिर के अंदर एक काला दरवाजा था।

     

    दरवाजे पर वही निशान बना था जो विराज की किताब में था।

     

    विराज ने छड़ी उठाई।

     

    दरवाजा खुल गया।

     

    अंदर अंधेरा था।

     

    अचानक किसी बच्ची की आवाज आई—

     

    “पापा…”

     

    विराज के हाथ से छड़ी गिर गई।

     

    उसकी आंखों में आंसू आ गए।

     

    “नहीं… ये आवाज…”

     

    तारा ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “वो आपकी बेटी है।”

     

    दोनों आगे बढ़े।

     

    लेकिन जैसे ही वे आखिरी कमरे में पहुंचे, वहां एक बूढ़ा जादूगर खड़ा था।

     

    उसने हंसकर कहा—

     

    “आखिर तुम यहां आ ही गए, विराज।”

     

    विराज का चेहरा सख्त हो गया।

     

    “तुम!”

     

    बूढ़ा जादूगर बोला, “जिसे तुमने सालों से मृत समझा, उसे मैंने जिंदा रखा। अब तुम्हारी सबसे शक्तिशाली जादुई किताब मुझे दे दो।”

     

    तभी पीछे से वही बच्ची दौड़ती हुई आई।

     

    “पापा!”

     

    विराज घुटनों पर बैठ गया।

     

    बाप-बेटी एक-दूसरे से लिपट गए।

     

    तारा की आंखों में भी आंसू आ गए।

     

    लेकिन बूढ़े जादूगर ने अपनी छड़ी उठा ली।

     

    “अब असली खेल शुरू होगा।”

     

    विराज धीरे-धीरे खड़ा हुआ।

     

    उसकी आंखों में इस बार पागलपन नहीं था।

     

    सिर्फ अपनी बेटी को बचाने का फैसला था।

     

    उसने छड़ी उठाई और कहा—

     

    “आज दुनिया देखेगी कि जिसे तुम पागल कहते रहे… वह असल में कितना शक्तिशाली जादूगर है।”

     

    और अगले ही पल पूरा जंगल तेज रोशनी से भर गया।

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    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • बारिश की श्रापित मेढकी

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    बारिश का मेढ़क और सात जन्मों की मेढ़की

     

    शहर से थोड़ा दूर एक पुराना जंगल था। उस जंगल के बीचों-बीच एक टूटी हुई हवेली थी, जिसके बारे में कहा जाता था कि वहां कभी एक बहुत ही घमंडी राजकुमार रहता था।

     

    उस राजकुमार का नाम था एडविन।

     

    एडविन देखने में बेहद सुंदर और राजसी था, लेकिन उसके अंदर घमंड कूट-कूटकर भरा हुआ था। उसे अपनी दौलत, अपने महल और अपनी खूबसूरती पर बहुत नाज था।

     

    एक दिन तेज बारिश हो रही थी। एडविन अपने घोड़े पर बैठकर जंगल के रास्ते से गुजर रहा था। रास्ते में उसे एक बूढ़ी औरत दिखाई दी, जो बारिश में भीगती हुई सड़क किनारे बैठी थी।

     

    बूढ़ी औरत ने हाथ उठाकर कहा,

     

    “बेटा, मुझे थोड़ा सहारा दे दो। बारिश रुकने तक मुझे कहीं बैठने की जगह चाहिए।”

     

    एडविन ने घमंड से उसकी तरफ देखा।

     

    “मेरे पास तुम्हारे लिए समय नहीं है। रास्ते से हटो।”

     

    बूढ़ी औरत ने फिर कहा,

     

    “बस थोड़ी देर के लिए मुझे अपने महल में जगह दे दो।”

     

    एडविन हंस पड़ा।

     

    “तुम जैसी गरीब औरत मेरे महल में? वहां तुम्हारे लिए जगह नहीं है।”

     

    बूढ़ी औरत की आंखों में अचानक एक अजीब सी चमक आई।

     

    उसने शांत आवाज में कहा,”जिस खूबसूरती और राजसी जिंदगी पर तुम्हें इतना घमंड है, वही तुमसे छिन जाएगी। अब तुम तब तक इंसान नहीं बनोगे, जब तक तुम्हें सच्चा प्यार नहीं मिल जाता।”

     

    एडविन कुछ समझ पाता, उससे पहले ही आसमान में बिजली चमकी।

     

    अगले ही पल वह गायब हो गया।

    जब उसकी आंख खुली तो वह एक छोटे से गंदे पानी के गड्ढे में पड़ा था।

    वह अब राजकुमार नहीं था।वह एक मेढ़क बन चुका था।

     

    एडविन ने पानी में अपना चेहरा देखा और घबरा गया।

     

    “ये क्या हो गया?”

    उसने बोलने की कोशिश की, लेकिन उसके मुंह से सिर्फ टर्र-टर्र की आवाज निकली।

    दिन बीतते गए।

     

    बारिश आती तो नालियों और सड़कों का पानी बहकर जंगल के उस हिस्से में जमा हो जाता। वही गंदा पानी अब एडविन का घर बन गया था।

     

    महल की जगह कीचड़ थी।

    मखमली बिस्तर की जगह गीली मिट्टी थी।

     

    और राजसी भोजन की जगह छोटे-छोटे कीड़े।

     

    एडविन को धीरे-धीरे अपनी पुरानी जिंदगी याद आती और वह दुखी हो जाता।

     

    उधर उसी जंगल में एक छोटी सी मेढ़की रहती थी।

     

    उसका नाम था लिली।

     

    लेकिन लिली भी कोई साधारण मेढ़की नहीं थी।

     

    वह एक जादुई मेढ़की थी, जिसे भी एक श्राप मिला हुआ था।

     

    उसे अपनी जिंदगी के सात जन्म मेढ़की बनकर बिताने थे।

     

    लेकिन उसके श्राप में एक शर्त थी।

     

    “जब तक कोई इंसान तुम्हें तुम्हारे रूप के कारण नहीं, बल्कि तुम्हारे दिल के कारण सच्चा प्यार नहीं देगा, तब तक तुम अपने असली रूप में वापस नहीं आ पाओगी।”

     

    लिली को यह बात बचपन से पता थी।

     

    इसीलिए वह हमेशा सोचती थी कि शायद उसके लिए इंसानी प्यार कभी लिखा ही नहीं गया।

     

    एक शाम बहुत तेज बारिश हुई।

     

    बारिश का पानी बहते-बहते उसी गंदे गड्ढे में आ गया जहां एडविन रहता था।

     

    अचानक एक छोटी सी आवाज आई।

     

    “बचाओ!”

     

    एडविन ने देखा, लिली तेज पानी में बह रही थी।

     

    वह तुरंत पानी में कूद पड़ा।

     

    उसने अपनी पूरी ताकत लगाकर लिली को एक पत्थर के पीछे पहुंचा दिया।

     

    लिली ने कांपते हुए उसकी तरफ देखा।

     

    “तुमने मुझे बचाया?”

     

    एडविन ने कुछ नहीं कहा।

     

    वह बस चुपचाप दूसरी तरफ देखने लगा।

     

    लिली मुस्कुराई।

     

    “तुम बाकी मेढ़कों जैसे नहीं हो।”

     

    एडविन के मन में पहली बार किसी ने उसके लिए अच्छी बात कही थी।

     

    अगले दिन से दोनों साथ रहने लगे।

     

    लिली बहुत बातूनी थी।

     

    वह हर छोटी-बड़ी बात एडविन को बताती।

     

    कभी कहती,

     

    “देखो, आज बारिश का पानी कितना साफ है।”

     

    कभी कहती,

     

    “उस पेड़ पर जो पीला फूल खिला है, वो मुझे बहुत पसंद है।”

     

    एडविन पहले उसकी बातें सुनकर परेशान होता, लेकिन धीरे-धीरे उसे लिली की आवाज अच्छी लगने लगी।

     

    एक दिन लिली ने पूछा,

     

    “तुम हमेशा इतने उदास क्यों रहते हो?”

     

    एडविन कुछ देर चुप रहा।

     

    फिर उसने कहा,

     

    “क्योंकि मैं पहले कोई और था।”

     

    “कौन?”

     

    “एक राजकुमार।”

     

    लिली हंस पड़ी।

     

    “तुम? राजकुमार?”

     

    एडविन को बुरा लगा।

     

    “हंस क्यों रही हो?”

     

    लिली ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “क्योंकि राजकुमार तो बहुत घमंडी होते हैं। तुम तो इतने शांत हो।”

     

    एडविन ने नजरें झुका लीं।

     

    “मैं भी घमंडी था। बहुत ज्यादा।”

     

    फिर उसने उसे अपना पूरा सच बता दिया।

     

    लिली काफी देर तक चुप रही।

     

    उसने कहा,

     

    “शायद तुम्हें ये श्राप सजा देने के लिए नहीं, बदलने के लिए मिला है।”

     

    ये बात एडविन के दिल में उतर गई।

     

    समय गुजरता गया।

     

    बारिश का मौसम खत्म होने लगा।

     

    लेकिन एडविन और लिली की दोस्ती गहरी होती गई।

     

    एक रात अचानक जंगल में भयंकर बारिश शुरू हो गई।

     

    नाले का पानी तेजी से बढ़ने लगा।

     

    लिली पानी में फंस गई।

     

    एडविन उसे बचाने के लिए दौड़ा, लेकिन तेज बहाव में खुद भी बहने लगा।

     

    लिली चिल्लाई,

     

    “एडविन!”

     

    उसने पास की एक बेल पकड़ ली और पूरी ताकत से एडविन की तरफ बढ़ी।

     

    दोनों ने एक-दूसरे को पकड़ लिया।

     

    काफी कोशिश के बाद वे एक बड़े पत्थर पर पहुंच गए।

     

    बारिश में दोनों चुपचाप बैठे रहे।

     

    लिली ने धीरे से कहा,

     

    “अगर तुम कभी इंसान बन गए तो मुझे भूल तो नहीं जाओगे?”

     

    एडविन ने उसकी तरफ देखा।

     

    पहली बार उसके मन में अपने पुराने महल, सोने और राजगद्दी से ज्यादा किसी और की चिंता थी।

     

    उसने कहा,

     

    “मुझे नहीं पता मैं इंसान बनूंगा या नहीं। लेकिन इतना जानता हूं कि तुम्हें भूलना मेरे लिए सबसे मुश्किल होगा।”

     

    लिली की आंखों में चमक आ गई।

     

    अगली सुबह सूरज निकला।

     

    दोनों गंदे पानी के उसी छोटे से तालाब के किनारे बैठे थे।

     

    अचानक आसमान से सुनहरी रोशनी उतरी।

     

    वही बूढ़ी औरत उनके सामने आ खड़ी हुई।

     

    लिली डर गई।

     

    एडविन तुरंत उसके आगे आ गया।

     

    बूढ़ी औरत मुस्कुराई।

     

    “डरो मत। मैं तुम्हें सजा देने नहीं आई।”

     

    उसने एडविन की तरफ देखा।

     

    “राजकुमार, तुम्हारा घमंड खत्म हो चुका है। अब तुमने समझ लिया है कि किसी की कीमत उसके रूप या हैसियत से नहीं होती।”

     

    फिर उसने लिली की तरफ देखा।

     

    “और तुम्हारा श्राप भी अब खत्म हो सकता है।”

     

    अचानक दोनों के चारों तरफ सुनहरी रोशनी फैल गई।

     

    कुछ ही पलों में वहां दो इंसान खड़े थे।

     

    एडविन फिर से राजकुमार बन चुका था।

     

    और लिली एक सुंदर लड़की के रूप में उसके सामने खड़ी थी।

     

    दोनों एक-दूसरे को देखकर हैरान रह गए।

     

    बूढ़ी औरत ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “सच्चा प्यार वही है जो बुरे समय में साथ रहे। तुम्हें इंसान बनाने वाली चीज कोई जादू नहीं, बल्कि तुम्हारा बदला हुआ दिल था।”

     

    इतना कहकर वह गायब हो गई।

     

    एडविन ने लिली की तरफ देखा।

     

    अब उसके सामने एक राजकुमार नहीं, बल्कि वही साधारण दिल वाला लड़का खड़ा था जिसे लिली ने गंदे पानी के बीच जाना था।

     

    एडविन ने कहा,

     

    “मुझे राजमहल वापस मिल गया, लेकिन अगर तुम मेरे साथ नहीं हो तो वो महल मेरे लिए फिर से खाली है।”

     

    लिली मुस्कुराई।

     

    “और मुझे अपने सात जन्मों का श्राप खत्म होने की खुशी से ज्यादा इस बात की खुशी है कि मुझे मेरा दोस्त वापस मिल गया।”

     

    उस दिन के बाद एडविन ने कभी अपनी दौलत और हैसियत पर घमंड नहीं किया।

     

    उसने जंगल के पास रहने वाले गरीब लोगों के लिए एक बड़ा आश्रय बनवाया, जहां बारिश के दिनों में कोई भी इंसान भीगने के लिए मजबूर न हो।

     

    और जब भी बारिश होती, एडविन और लिली उस पुराने तालाब के पास जरूर जाते।

     

    क्योंकि वहीं गंदे पानी के बीच एक घमंडी राजकुमार ने अपना घमंड खोया था…

     

    और वहीं एक मेढ़की ने उसे सिखाया था कि सच्चा प्यार चेहरे से नहीं, दिल से पहचाना जाता है।

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  • जादुई दुनियां का अनचाहा मेहमान

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    जादुई दुनिया का अनचाहा मेहमान

     

    रवि एक साधारण लड़का था। उसकी उम्र लगभग पच्चीस साल थी। वह अपने छोटे से गांव में अपनी माँ के साथ रहता था। खेती करके और कभी-कभी शहर जाकर मजदूरी करके घर चलाता था। उसकी जिंदगी बिल्कुल आम थी। लेकिन उसे बचपन से ही रहस्यमयी जगहों की कहानियां सुनना बहुत पसंद था।

     

    एक दिन शाम के समय रवि जंगल की तरफ लकड़ियां लेने गया। उस दिन मौसम भी कुछ अजीब था। आसमान पर काले बादल थे, लेकिन बारिश नहीं हो रही थी। जंगल के अंदर जाते-जाते उसे एक ऐसी जगह दिखी जहां वह पहले कभी नहीं गया था।

     

    उसके सामने दो बहुत बड़े पत्थर खड़े थे। दोनों पत्थरों के बीच एक चमकता हुआ गोल दरवाजा दिखाई दे रहा था। उस दरवाजे से नीली और सुनहरी रोशनी निकल रही थी। रवि ने सोचा कि शायद कोई सपना देख रहा है।

     

    उसने धीरे से हाथ बढ़ाकर दरवाजे को छुआ।

     

    जैसे ही उसका हाथ दरवाजे से लगा, तेज हवा चली और अगले ही पल वह दरवाजे के अंदर खिंच गया।

     

    जब रवि ने आंखें खोलीं तो वह किसी दूसरी ही दुनिया में था।

     

    चारों तरफ सुंदर महल थे। पेड़ चमक रहे थे। आसमान हल्के बैंगनी रंग का था। नदियों का पानी चांदी की तरह चमक रहा था। वहां के लोग रंग-बिरंगे कपड़े पहने हुए थे और हर किसी के हाथ में एक चमकती हुई जादुई छड़ी थी।

     

    रवि हैरानी से सब कुछ देख रहा था।

     

    उसी समय कुछ लोग उसके पास आए।

     

    एक आदमी बोला, “तुम कौन हो? तुम्हारे पास जादुई छड़ी क्यों नहीं है?”

     

    रवि घबरा गया।

     

    “मैं… मैं रवि हूं। मैं तो बस जंगल में गया था। पता नहीं यहां कैसे आ गया।”

     

    सब लोग एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।

     

    उनमें से एक बूढ़ा आदमी बोला, “लगता है जादुई दरवाजा गलती से किसी इंसानी दुनिया के व्यक्ति को यहां ले आया है।”

     

    रवि को वे लोग अपने राजा के महल में ले गए।

     

    महल बहुत बड़ा था। वहां का राजा उम्र में लगभग पचास साल का था। उसके सिर पर चमकता हुआ मुकुट था।

     

    राजा ने रवि से पूछा,

    “क्या तुम्हारी दुनिया में सचमुच जादू नहीं होता?”

     

    रवि मुस्कुराया।

     

    “नहीं महाराज। वहां लोग मेहनत करके अपना काम करते हैं। खेत जोतते हैं, खाना बनाते हैं, पढ़ाई करते हैं और काम करके पैसे कमाते हैं।”

     

    पूरे दरबार में शांति का माहौल छा गया 

     

    क्योंकि वहां तो हर छोटा-बड़ा काम जादू से होता था।

     

    खाना बनाना हो तो जादू।

     

    घर साफ करना हो तो जादू।

     

    खेती करनी हो तो जादू।

     

    यहां तक कि बच्चे पढ़ाई भी जादू से याद कर लेते थे।

     

    राजा ने कहा,

    “तुम कुछ दिन हमारे मेहमान बनकर रहो।”

     

    रवि ने हां कर दी।

     

    धीरे-धीरे उसने उस दुनिया को समझना शुरू किया।

     

    वहां किसी को मेहनत करने की आदत ही नहीं थी।

     

    अगर किसी की किताब गिर जाए तो जादू।

     

    अगर कपड़े गंदे हो जाएं तो जादू।

     

    अगर किसी को कहीं जाना हो तो जादू।

     

    रवि को यह सब देखकर अजीब लगता था।

     

    एक दिन वह महल के बगीचे में गया।

     

    वहां उसने देखा कि एक छोटा बच्चा रो रहा था।

     

    रवि ने पूछा,

    “क्या हुआ?”

     

    बच्चे ने कहा,

    “मेरी जादुई छड़ी खो गई है। अब मैं कुछ भी नहीं कर सकता।”

     

    रवि मुस्कुराया।

     

    उसने बच्चे का हाथ पकड़ा और बोला,

    “आओ, बिना जादू के खेलते हैं।”

     

    दोनों ने मिट्टी से छोटे-छोटे घर बनाए। पत्थरों से खेल खेले और पेड़ के नीचे बैठकर बातें कीं।

     

    बच्चा पहली बार इतना खुश हुआ।

     

    धीरे-धीरे दूसरे बच्चे भी वहां आ गए।

     

    सब बिना जादू के खेलने लगे।

     

    महल की रानी ने यह सब देखा तो वह भी हैरान रह गई।

     

    कुछ दिनों बाद उस दुनिया में एक बड़ी परेशानी आ गई।

     

    हर साल वहां एक जादुई ऊर्जा का स्रोत पूरे राज्य को शक्ति देता था।

     

    लेकिन इस बार वह अचानक बंद हो गया।

     

    अब किसी का जादू काम नहीं कर रहा था।

     

    पूरा राज्य घबरा गया।

     

    लोग खाना तक नहीं बना पा रहे थे।

     

    किसानों को समझ नहीं आ रहा था कि खेती कैसे करें।

     

    बच्चे रोने लगे।

     

    राजा परेशान हो गया।

     

    तभी रवि ने कहा,

    “अगर आप लोग चाहें तो मैं एक तरीका बता सकता हूं।”

     

    राजा ने तुरंत कहा,

    “बताओ।”

     

    रवि लोगों को खेतों में ले गया।

     

    उसने अपने हाथ से मिट्टी खोदी।

     

    बीज बोए।

     

    लोगों को सिखाया कि बिना जादू के भी खेती की जा सकती है।

     

    फिर उसने कुछ लोगों के साथ मिलकर लकड़ियां इकट्ठी कीं और आग जलाकर खाना बनाया।

     

    औरतों ने पहली बार अपने हाथों से रोटी बनाई।

     

    बच्चों ने मिलकर पानी भरा।

     

    सभी लोग एक-दूसरे की मदद करने लगे।

     

    शुरुआत में सबको मुश्किल हुई।

     

    लेकिन कुछ ही दिनों में पूरा राज्य मेहनत करना सीख गया।

    सबको समझ आने लगा कि केवल जादू ही सब कुछ नहीं होता।

    मेहनत की अपनी अलग ताकत होती है।

    राजा रोज रवि को देखता और मन ही मन उसकी इज्जत करने लगा।

    कुछ दिनों बाद अचानक पूरे राज्य में फिर वही सुनहरी रोशनी फैल गई।

    जादुई ऊर्जा वापस लौट आई।

    सबका जादू फिर से चलने लगा।

    लेकिन इस बार किसी ने पहले की तरह हर काम जादू से नहीं किया।

    लोग जरूरत पड़ने पर ही जादू का इस्तेमाल करने लगे।

    बाकी काम अपने हाथों से करने लगे।

    राजा ने पूरे राज्य के सामने कहा,

    “आज हमने सीखा है कि जादू हमें सुविधा दे सकता है, लेकिन मेहनत हमें मजबूत बनाती है।”

    अब रवि के वापस जाने का समय आ गया था।

    वही जादुई दरवाजा फिर से खुल चुका था।

    राजा, रानी और पूरे राज्य के लोग उसे विदा करने आए।

    राजा ने कहा,

    “तुम हमारे लिए किसी जादूगर से कम नहीं हो। तुमने हमें मेहनत की असली ताकत सिखाई है।”

    रवि मुस्कुराया।

    “मैंने तो सिर्फ वही सिखाया जो हमारी दुनिया का हर इंसान बचपन से सीखता है।”

    रवि दरवाजे के अंदर चला गया।

    अगले ही पल वह फिर उसी जंगल में था।

    ऐसा लग रहा था जैसे केवल कुछ मिनट ही बीते हों।

    वह घर पहुंचा तो उसकी माँ ने पूछा,

    “इतनी देर कहां रह गए थे?”

    रवि मुस्कुराया और बोला,

    “माँ… आज बहुत दूर चला गया था।”

    उसने पूरी बात किसी को नहीं बताई।

    क्योंकि उसे पता था कि कोई उसकी बात पर विश्वास नहीं करेगा।

     

    लेकिन जब भी वह उस जंगल के पास से गुजरता, एक पल के लिए रुककर मुस्कुरा देता।

     

    शायद कहीं न कहीं वह जादुई दरवाजा आज भी उसका इंतजार कर रहा था।

     

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