सावन का पावन महीना
सावन का महीना शुरू होते ही देवपुर गाँव का माहौल बिल्कुल बदल गया था। चारों तरफ हरियाली दिखाई देने लगी थी। सुबह-सुबह मंदिर की घंटियाँ सुनाई देतीं और गलियों में “हर हर महादेव” की आवाज गूंजती रहती। गाँव के लोग भगवान शिव के मंदिर में जल चढ़ाने के लिए दूर-दूर से आते थे।
इसी गाँव में 19 साल की गौरी अपनी माँ के साथ रहती थी। गौरी भगवान शिव की बहुत बड़ी भक्त थी। हर सावन वह सुबह जल्दी उठकर मंदिर जाती और शिवलिंग पर जल चढ़ाती।
उस साल सावन शुरू होते ही गौरी ने अपनी माँ से कहा, “माँ, इस बार मैं पूरे महीने रोज मंदिर जाऊँगी।”
माँ मुस्कुराकर बोलीं, “जा बेटा, लेकिन पूजा के साथ घर के काम और अपनी पढ़ाई भी मत भूलना।”
गौरी हँसकर बोली, “सब संभाल लूँगी माँ।”
गाँव के पुराने शिव मंदिर के बारे में एक मान्यता थी कि सावन में सच्चे मन से की गई प्रार्थना कभी व्यर्थ नहीं जाती। मंदिर बहुत पुराना था। लोग कहते थे कि वर्षों पहले एक साधु ने वहाँ तपस्या की थी और तभी से उस स्थान पर भगवान शिव की विशेष कृपा बनी हुई है।
सावन के पहले सोमवार को मंदिर में बहुत भीड़ थी। गौरी भी हाथ में जल का लोटा लेकर लाइन में खड़ी थी।
उसके आगे एक बूढ़ी महिला खड़ी थी। महिला बहुत कमजोर लग रही थी और उसके हाथ में पूजा की छोटी-सी थाली थी।
अचानक भीड़ में किसी ने उसे धक्का दे दिया।
उसकी थाली जमीन पर गिर गई।
गौरी तुरंत झुक गई और सारी चीजें उठाकर थाली में रख दीं।
बूढ़ी महिला ने कहा, “बेटी, भगवान तुम्हारा भला करें।”
गौरी मुस्कुराकर बोली, “अम्मा, इसमें भला करने वाली क्या बात है? आप अकेली हैं, इसलिए आपकी मदद करना मेरा फर्ज है।”
बूढ़ी महिला ने गौरी की तरफ ध्यान से देखा और कहा, “याद रखना बेटी, भगवान को चढ़ाया हुआ जल तभी सार्थक होता है जब किसी प्यासे के लिए दिल में पानी बचा हो।”
गौरी को यह बात थोड़ी अजीब लगी, लेकिन उसने उसे मन में रख लिया।
कुछ दिनों बाद गाँव में बारिश बहुत कम होने लगी।
सावन का महीना था, लेकिन बादल आते और बिना बरसे चले जाते। खेतों में पानी की कमी होने लगी। गाँव के किसान परेशान हो गए।
गौरी के पिता भी किसान थे।
एक शाम उन्होंने चिंता में कहा, “अगर कुछ दिनों में बारिश नहीं हुई तो फसल खराब हो जाएगी।”
माँ बोलीं, “भोलेनाथ सब ठीक करेंगे।”
पिता ने कहा, “विश्वास तो है, लेकिन हमें अपनी तरफ से भी कोशिश करनी होगी।”
अगले दिन गाँव के मंदिर में विशेष पूजा रखी गई। सभी लोग भगवान शिव से अच्छी बारिश की प्रार्थना करने लगे।
गौरी भी मंदिर पहुँची।
पूजा के बाद उसने देखा कि मंदिर के बाहर कुछ बच्चे प्यास से परेशान बैठे थे।
गौरी ने तुरंत अपने घर से पानी लाकर बच्चों को पिलाया।
उसकी माँ ने पूछा, “तुम अपना पानी बच्चों को क्यों दे आई?”
गौरी ने कहा, “माँ, भगवान के लिए तो हमने जल चढ़ा दिया। अब अगर सामने कोई प्यासा हो और हम उसे पानी न दें तो हमारी पूजा का क्या मतलब?”
माँ कुछ पल उसे देखती रहीं।
फिर मुस्कुराईं।
“तू सही समझने लगी है बेटी।”
अगले दिन गौरी ने गाँव के कुछ युवाओं को इकट्ठा किया।
उसने कहा, “हम सिर्फ बारिश का इंतजार क्यों करें? गाँव का पुराना तालाब साफ कर लेते हैं। अगर बारिश हुई तो पानी बचा रहेगा।”
कुछ लोगों ने उसका मजाक उड़ाया।
एक आदमी बोला, “तुम बच्चों से गाँव चलेगा?”
गौरी ने शांत होकर कहा, “गाँव किसी एक आदमी से नहीं चलता काका। सब मिलकर काम करें तो मुश्किल भी छोटी हो जाती है।”
शुरुआत में केवल चार लोग उसके साथ आए।
उन्होंने तालाब की सफाई शुरू कर दी।
धीरे-धीरे दूसरे लोग भी जुड़ते गए।
तीन दिन में आधा तालाब साफ हो चुका था।
चौथे दिन सुबह आसमान में काले बादल दिखाई दिए।
गाँव के लोग खुशी से बाहर निकल आए।
लेकिन बारिश नहीं हुई।
शाम तक बादल छंट गए।
कुछ लोग निराश हो गए।
एक किसान बोला, “शायद भगवान हमसे नाराज हैं।”
गौरी ने कहा, “भगवान नाराज हैं या नहीं, यह हम नहीं जानते। लेकिन हमें अपना काम नहीं छोड़ना चाहिए।”
उस रात गौरी मंदिर गई।
वहाँ वही बूढ़ी महिला बैठी थी, जिससे वह सावन के पहले सोमवार को मिली थी।
महिला ने पूछा, “बेटी, परेशान क्यों है?”
गौरी ने कहा, “गाँव में पानी की बहुत जरूरत है। हम कोशिश कर रहे हैं, लेकिन बारिश नहीं हो रही।”
बूढ़ी महिला मुस्कुराई।
“तुमने अपना काम कर दिया?”
“हाँ।”
“फिर चिंता क्यों?”
गौरी चुप रही।
बूढ़ी महिला ने कहा, “भक्ति का मतलब केवल मांगना नहीं होता। कभी-कभी भगवान हमें किसी की मदद करने का मौका देकर हमारी परीक्षा लेते हैं।”
गौरी को अचानक पहले दिन कही गई उनकी बात याद आई।
“भगवान को चढ़ाया हुआ जल तभी सार्थक होता है जब किसी प्यासे के लिए दिल में पानी बचा हो।”
अगली सुबह गौरी ने गाँव वालों से कहा कि हर घर अपने हिस्से का थोड़ा पानी बचाए और तालाब में पानी जमा करने की व्यवस्था करे।
लोगों ने उसकी बात मान ली।
कुछ ही दिनों में तालाब तैयार हो गया।
और फिर सावन की एक रात अचानक तेज बारिश शुरू हो गई।
बादल जमकर बरसे।
गाँव की गलियाँ पानी से भर गईं।
तालाब पानी से लबालब हो गया।
किसानों के चेहरे पर खुशी लौट आई।
गौरी के पिता ने आसमान की तरफ हाथ जोड़कर कहा, “भोलेनाथ की कृपा हो गई।”
गौरी मुस्कुराई।
“हाँ पिताजी, लेकिन अगर हमने तालाब साफ नहीं किया होता तो इतना पानी भी हमारे काम नहीं आता।”
पिता ने बेटी के सिर पर हाथ रखा।
“तूने हमें बड़ी बात सिखा दी।”
सावन का आखिरी सोमवार आया।
मंदिर में पहले से भी ज्यादा भीड़ थी।
गौरी शिवलिंग पर जल चढ़ाने पहुँची।
इस बार उसके हाथ में जल का लोटा था, लेकिन उसके मन में एक अलग ही शांति थी।
उसने आँखें बंद करके कहा—
“भोलेनाथ, मुझे धन या बड़ी खुशी नहीं चाहिए। बस इतनी शक्ति देना कि जब कोई दुखी हो तो मैं उसकी मदद कर सकूँ और जब मुश्किल आए तो हार न मानूँ।”
मंदिर के बाहर वही बूढ़ी महिला खड़ी थी।
गौरी ने उसे देखकर मुस्कुराया।
महिला ने कहा, “अब समझी सावन का असली अर्थ?”
गौरी ने सिर हिलाया।
“हाँ अम्मा। सावन सिर्फ भगवान शिव को जल चढ़ाने का महीना नहीं है। यह अपने भीतर करुणा, सेवा और विश्वास जगाने का महीना भी है।”
बूढ़ी महिला मुस्कुराई।
“यही तो शिव भक्ति है।”
गौरी ने उनके पैर छूने चाहे, लेकिन महिला ने उसे रोक दिया।
अगले ही पल गौरी ने देखा कि वहाँ कोई नहीं था।
वह हैरान होकर आसपास देखने लगी।
मंदिर के पुजारी ने पूछा, “किसे ढूंढ रही हो?”
गौरी ने बूढ़ी महिला के बारे में बताया।
पुजारी कुछ देर चुप रहे।
फिर बोले, “बेटी, उस उम्र की एक महिला कई साल पहले इसी मंदिर में आया करती थीं। कहते हैं, वह हर सावन जरूरतमंदों को पानी पिलाती थीं। अब तो उन्हें गुजरे बहुत साल हो गए।”
गौरी स्तब्ध रह गई।
उसने मंदिर के शिवलिंग की ओर देखा।
उसके हाथ अपने आप जुड़ गए।
उस दिन उसे लगा कि शायद भगवान हमेशा किसी चमत्कार के रूप में सामने नहीं आते।
कभी वे किसी भूखे के रूप में आते हैं।
कभी किसी प्यासे के रूप में।
कभी किसी बूढ़े की सीख बनकर।
और कभी किसी छोटे-से काम के जरिए हमें सही रास्ता दिखाते हैं।
सावन का महीना समाप्त हो गया, लेकिन देवपुर गाँव में एक नई परंपरा शुरू हो गई।
अब हर सावन गाँव के लोग मंदिर में जल चढ़ाने के साथ-साथ गरीबों के लिए पानी की व्यवस्था करते, तालाब साफ करते और जरूरतमंदों की मदद करते।
गौरी हर साल सबसे आगे रहती।
और जब कोई उससे पूछता कि “सावन इतना पावन क्यों है?”
तो वह मुस्कुराकर कहती—
“क्योंकि सावन हमें सिर्फ भोलेनाथ के चरणों में झुकना नहीं सिखाता, बल्कि किसी जरूरतमंद के सामने अपना हाथ बढ़ाना भी सिखाता है। भगवान शिव को सच्ची श्रद्धा वही है, जिसमें पूजा के साथ सेवा और विश्वास भी हो।”
और फिर पूरे गाँव में एक साथ आवाज गूंजती—
“हर हर महादेव!”

मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं
अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं
प्रातिक्रिया दे