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मक्खन की रहस्यमई चोरी

पढ़ने का समय : 8 मिनट

 नन्हे कान्हा की बाल लीलाएँ

 

 — मक्खन की रहस्यमयी चोरी

 

वृंदावन की उस सुबह नंद भवन के आँगन में बच्चों की टोली जमा थी। कल तक सबकी चर्चा छोटू और चंदू के जंगल में चले जाने की थी, लेकिन आज गाँव में एक नई बात फैल गई थी।

 

गाँव की कई गोपियाँ परेशान थीं।

 

उनकी मटकी में रखा मक्खन हर दिन थोड़ा-थोड़ा कम हो रहा था।

 

सबसे ज्यादा परेशान थीं रोहिणी चाची की पड़ोसन गोपी, जो सुबह-सुबह नंद भवन पहुँच गई थीं।

 

उन्होंने यशोदा मैया से कहा—

 

“बहन, समझ नहीं आता मेरे घर से मक्खन कौन ले जाता है।”

 

यशोदा ने पूछा—

 

“तुमने किसी को देखा?”

 

गोपी ने सिर हिलाया।

 

“नहीं। लेकिन आज सुबह मटकी का ढक्कन खुला मिला।”

 

पास खड़े कान्हा ध्यान से उनकी बातें सुन रहे थे।

 

उनके दोस्त भी वहीं थे।

 

एक दोस्त ने धीरे से कान्हा के कान में कहा—

 

“मुझे तो पता है मक्खन कौन खाता है।”

 

कान्हा ने उसे आँख दिखाई।

 

“चुप!”

 

गोपी ने कान्हा की तरफ देखा।

 

“क्यों कान्हा? तुम्हें कुछ पता है?”

 

कान्हा ने मासूम चेहरा बनाकर कहा—

 

“मुझे? नहीं।”

 

यशोदा मुस्कुरा दीं।

 

उन्हें कान्हा का यह चेहरा देखकर समझ आ गया कि उसके मन में जरूर कुछ चल रहा है।

 

गोपी बोलीं—

 

“मैं आज पता लगाकर रहूँगी कि मक्खन कौन ले जाता है।”

 

कान्हा ने तुरंत कहा—

 

“हम भी मदद करेंगे।”

 

गोपी ने पूछा—

 

“तुम?”

 

“हाँ।”

 

कान्हा के दोस्त एक-दूसरे को देखने लगे।

 

उन्हें पता था कि अगर कान्हा जाँच में शामिल हुए तो मक्खन की कहानी और भी मजेदार होने वाली है।

 

कुछ देर बाद कान्हा अपने दोस्तों को लेकर बाहर आए।

 

एक दोस्त ने पूछा—

 

“अब क्या करेंगे?”

 

कान्हा ने गंभीर चेहरा बनाया।

 

“सबसे पहले सुराग ढूँढ़ेंगे।”

 

दूसरे ने पूछा—

 

“सुराग क्या होता है?”

 

कान्हा बोले—

 

“जिससे हमें पता चले कि मक्खन कौन ले जाता है।”

 

वे उस गोपी के घर पहुँचे।

 

मटकी वहीं रखी थी।

 

कान्हा ने जमीन देखी।

 

उन्हें मिट्टी पर छोटे-छोटे पैरों के निशान दिखाई दिए।

 

“देखो!”

 

सभी बच्चे नीचे झुक गए।

 

एक दोस्त बोला—

 

“ये तो पैरों के निशान हैं।”

 

कान्हा बोले—

 

“हाँ।”

 

उन्होंने उन निशानों को ध्यान से देखा।

 

“लेकिन ये इंसान के नहीं लग रहे।”

 

एक दोस्त बोला—

 

“तो किसके हैं?”

 

कान्हा ने कहा—

 

“अभी पता लगाएँगे।”

 

निशान रसोई से बाहर निकलकर पिछवाड़े की तरफ जा रहे थे।

 

बच्चे उनके पीछे चल पड़े।

 

वहाँ उन्हें कुछ गिरे हुए मक्खन के छोटे-छोटे निशान मिले।

 

एक दोस्त ने कहा—

 

“मक्खन यहाँ तक आया है।”

 

कान्हा बोले—

 

“इसका मतलब चोर मक्खन लेकर इधर गया।”

 

वे आगे बढ़े।

 

निशान एक पुराने पेड़ के पास जाकर खत्म हो गए।

 

कान्हा ने पेड़ के नीचे देखा।

 

वहाँ एक टूटी हुई पत्तों की टोकरी पड़ी थी।

 

उसमें मक्खन के कुछ छोटे टुकड़े चिपके हुए थे।

 

कान्हा ने टोकरी उठाई।

 

“हमें सुराग मिल गया!”

 

एक दोस्त ने पूछा—

 

“किसका?”

 

कान्हा ने कहा—

 

“पता नहीं।”

 

सभी हँस पड़े।

 

कान्हा बोले—

 

“अभी जाँच बाकी है।”

 

तभी पेड़ के पीछे से हल्की सी आवाज आई।

 

म्याऊँ…

 

सभी बच्चे चुप हो गए।

 

कान्हा ने धीरे से कहा—

 

“शांत!”

 

उन्होंने पेड़ के पीछे देखा।

 

वहाँ एक छोटी सी बिल्ली बैठी थी।

 

उसके मुँह के पास मक्खन लगा हुआ था।

 

एक दोस्त खुशी से चिल्लाया—

 

“चोर मिल गया!”

 

बिल्ली डरकर भागने लगी।

 

कान्हा उसके पीछे दौड़े।

 

“रुको!”

 

बिल्ली एक झाड़ी के पीछे जाकर छिप गई।

 

कान्हा धीरे से उसके पास बैठे।

 

“डरो मत।”

 

बिल्ली ने उन्हें देखा।

 

कान्हा ने हाथ आगे किया।

 

बिल्ली धीरे-धीरे बाहर आई।

 

कान्हा ने देखा कि उसके पास दो छोटे बच्चे भी थे।

 

वे बहुत कमजोर लग रहे थे।

 

कान्हा समझ गए।

 

“तुम अपने बच्चों के लिए मक्खन ले जा रही थी?”

 

बिल्ली चुपचाप बैठी रही।

 

कान्हा ने अपने दोस्तों से कहा—

 

“इसे चोर मत कहो।”

 

दोस्त ने पूछा—

 

“लेकिन ये मक्खन तो ले जा रही थी।”

 

कान्हा बोले—

 

“हाँ, लेकिन शायद इसके बच्चे भूखे थे।”

 

कान्हा ने बिल्ली के बच्चों को देखा।

 

फिर गोपी को बुलाया।

 

गोपी भी वहाँ आ गईं।

 

उन्होंने बिल्ली को देखा और बोलीं—

 

“अरे, तो ये मक्खन ले जाती थी?”

 

कान्हा ने कहा—

 

“हाँ। लेकिन देखो, इसके बच्चे कितने छोटे हैं।”

 

गोपी कुछ पल चुप रहीं।

 

उनका गुस्सा धीरे-धीरे कम हो गया।

 

उन्होंने कहा—

 

“बेचारी।”

 

कान्हा बोले—

 

“आप रोज थोड़ा सा मक्खन इनके लिए अलग रख सकती हैं?”

 

गोपी ने मुस्कुराकर कहा—

 

“हाँ। इतना तो कर सकती हूँ।”

 

बिल्ली जैसे कान्हा की बात समझ रही थी।

 

उसने धीरे से आवाज की।

 

म्याऊँ…

 

कान्हा हँस पड़े।

 

“देखो, धन्यवाद भी बोल रही है।”

 

सभी बच्चे मुस्कुराने लगे।

 

गोपी ने कान्हा के सिर पर हाथ रखा।

 

“तुमने आज मुझे भी एक बात सिखाई।”

 

कान्हा ने पूछा—

 

“क्या?”

 

“हर गलती के पीछे बुरी नीयत हो, यह जरूरी नहीं।”

 

कान्हा ने सिर हिलाया।

 

फिर उनके दोस्तों में से एक ने धीरे से कहा—

 

“लेकिन कान्हा…”

 

“क्या?”

 

“अगर ये मक्खन नहीं ले जाती, तो बाकी मक्खन कहाँ गया?”

 

कान्हा अचानक चुप हो गए।

 

सभी बच्चों ने एक-दूसरे को देखा।

 

गोपी भी सोच में पड़ गईं।

 

“सच!”

 

उन्होंने कहा—

 

“मेरे घर से तो बहुत ज्यादा मक्खन कम हुआ है।”

 

कान्हा ने जमीन पर फिर निशान देखे।

 

बिल्ली के पैरों के निशान बहुत छोटे थे।

 

लेकिन मक्खन की मात्रा ज्यादा थी।

 

कान्हा बोले—

 

“इसने कुछ मक्खन लिया होगा, लेकिन सारा नहीं।”

 

दोस्त ने पूछा—

 

“तो दूसरा कौन है?”

 

कान्हा ने चारों तरफ देखा।

 

“हमें दूसरी जगह देखना होगा।”

 

वे वापस घर की ओर गए।

 

रास्ते में कान्हा ने एक दीवार पर सफेद सा निशान देखा।

 

उन्होंने उंगली लगाई।

 

“ये मक्खन है।”

 

एक दोस्त बोला—

 

“मक्खन दीवार पर कैसे आया?”

 

कान्हा ने निशान को ऊपर तक देखा।

 

वह दीवार के किनारे से आगे जा रहा था।

 

वे उसी रास्ते पर चल पड़े।

 

कुछ दूर जाकर उन्हें एक छोटा सा खाली कमरा मिला।

 

कमरे के दरवाजे के पास मक्खन के निशान थे।

 

कान्हा ने धीरे से दरवाजा खोला।

 

अंदर अँधेरा था।

 

उन्होंने कहा—

 

“सब धीरे से चलना।”

 

अंदर जाकर उन्होंने देखा कि एक कोने में कुछ मिट्टी के छोटे बर्तन रखे थे।

 

एक बर्तन के अंदर मक्खन था।

 

दूसरे में दही।

 

तीसरा खाली था।

 

कान्हा ने पूछा—

 

“ये किसका घर है?”

 

गोपी ने कहा—

 

“यह कमरा तो कई दिनों से खाली है।”

 

तभी अंदर से आवाज आई—

 

“छीं!”

 

सब चौंक गए।

 

एक बच्चा कान्हा के पीछे छिप गया।

 

कान्हा ने धीरे से पूछा—

 

“कौन है?”

 

कोई जवाब नहीं आया।

 

फिर आवाज आई—

 

“छीं!”

 

कान्हा ने दरवाजे के पीछे देखा।

 

वहाँ एक छोटा लड़का बैठा था।

 

उसके कपड़े पुराने थे और चेहरे पर डर साफ दिखाई दे रहा था।

 

कान्हा उसके पास गए।

 

“तुम यहाँ क्या कर रहे हो?”

 

लड़का चुप रहा।

 

गोपी गुस्से में बोलीं—

 

“तो मक्खन तुम ले जाते थे?”

 

लड़के ने सिर झुका लिया।

 

कान्हा ने उसे डाँटा नहीं।

 

उन्होंने पूछा—

 

“तुम ऐसा क्यों करते थे?”

 

लड़के की आँखों में आँसू आ गए।

 

उसने धीमी आवाज में कहा—

 

“मेरी छोटी बहन भूखी रहती है।”

 

कमरे में सन्नाटा छा गया।

 

कान्हा ने उसकी तरफ देखा।

 

“तुमने माँगा क्यों नहीं?”

 

लड़के ने कहा—

 

“डर लगता था।”

 

कान्हा कुछ पल चुप रहे।

 

फिर उन्होंने गोपी की तरफ देखा।

 

“इसे चोरी करने की जरूरत नहीं होनी चाहिए।”

 

गोपी की आँखें भी नम हो गईं।

 

उन्होंने लड़के से कहा—

 

“तुम्हें भूख लगे तो मेरे घर आना। लेकिन बिना पूछे चीज मत लेना।”

 

लड़के ने सिर हिलाया।

 

“मुझे माफ कर दीजिए।”

 

कान्हा ने मुस्कुराकर कहा—

 

“अब हम सब मिलकर तुम्हारी बहन के लिए खाना ले जाएँगे।”

 

दोस्तों ने भी हामी भर दी।

 

उस दिन गोपी ने मक्खन, रोटी और दूध दिया।

 

कान्हा खुद वह खाना लेकर उस लड़के के घर गए।

 

लड़के की छोटी बहन ने खाना देखा तो उसके चेहरे पर खुशी आ गई।

 

कान्हा मुस्कुराए।

 

“अब भूखे नहीं रहना।”

 

वापस आते समय एक दोस्त ने पूछा—

 

“कान्हा, आज हमने चोर पकड़ा या दोस्त बनाया?”

 

कान्हा हँसे।

 

“दोस्त बनाया।”

 

दोस्त बोला—

 

“लेकिन चोरी तो गलत है।”

 

कान्हा ने कहा—

 

“हाँ, चोरी गलत है। लेकिन गलती करने वाले को समझाकर सही रास्ता दिखाना भी जरूरी है।”

 

शाम को यशोदा मैया ने पूछा—

 

“आज क्या किया?”

 

कान्हा ने पूरी बात बता दी।

 

यशोदा ने कहा—

 

“तुमने अच्छा किया। लेकिन याद रखना, किसी की मदद करते समय उसकी गलती को सही नहीं मानना चाहिए।”

 

कान्हा बोले—

 

“मैं समझ गया मैया।”

 

उस रात कान्हा सोने लगे तो बाहर से बिल्ली की आवाज आई—

 

म्याऊँ…

 

कान्हा मुस्कुराए।

 

“अब तुम्हें चोरी नहीं करनी पड़ेगी।”

 

और पास ही रखी छोटी कटोरी में थोड़ा दूध देखकर उन्हें संतोष हुआ।

 

लेकिन अगले दिन वृंदावन में एक नई शरारत होने वाली थी।

 

कान्हा के दोस्तों ने तय किया कि इस बार वे यमुना किनारे पतंग उड़ाएँगे।

 

और कान्हा को क्या पता था कि पतंग उड़ाते-उड़ाते उनकी डोर सीधे एक पेड़ की सबसे ऊँची डाल में फँसने वाली है।

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