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बंद कमरे का राज

पढ़ने का समय : 7 मिनट

शौर्य की नादानियां — पार्ट 2: बंद कमरे का राज

 

अंदर से दरवाजा खटखटाने की आवाज सुनकर शौर्य कुछ पल के लिए बिल्कुल शांत खड़ा रहा।

 

कबीर ने फुसफुसाकर कहा, “भाई… अंदर कोई है।”

 

शौर्य ने धीरे से सिर हिलाया।

 

“मुझे भी यही लग रहा है।”

 

अनाया ने उसका हाथ रोकते हुए कहा, “दरवाजा मत खोलो।”

 

शौर्य बोला, “लेकिन अगर अंदर कोई फंसा हुआ है तो?”

 

कबीर ने माथा पीट लिया।

 

“तू सुधरने वाला नहीं है।”

 

शौर्य ने धीरे से दरवाजा खोल दिया।

 

दरवाजा खुलते ही तीनों की नजर कमरे के अंदर गई।

 

कमरा बिल्कुल खाली था।

 

अंदर पुरानी अलमारी, एक मेज और कुछ लकड़ी के बक्से रखे थे। खिड़की आधी खुली हुई थी और हवा के कारण पर्दा हिल रहा था।

 

कबीर ने तुरंत कहा, “मैंने कहा था ना, यहां कुछ गड़बड़ है।”

 

शौर्य खिड़की के पास गया।

 

“शायद हवा से कोई चीज हिली होगी।”

 

कबीर बोला, “और दरवाजा किसने खटखटाया?”

 

शौर्य ने मजाक करते हुए कहा, “शायद इस घर का चौकीदार भूत होगा।”

 

“भाई!”

 

अनाया ने दोनों को चुप कराया।

 

“मजाक बंद करो। हमें यहां कुछ ढूंढना है।”

 

वह धीरे-धीरे कमरे में आगे बढ़ी। तभी उसकी नजर मेज पर रखी एक पुरानी डायरी पर पड़ी।

 

डायरी के ऊपर उसके पिता का नाम लिखा था।

 

अनाया ने डायरी उठा ली।

 

उसके हाथ कांप रहे थे।

 

शौर्य उसके पास आकर बोला, “खोलो।”

 

अनाया ने पहला पन्ना खोला।

 

उस पर लिखा था—

 

“अगर यह डायरी मेरी बेटी के हाथ लगे, तो उसे सच जरूर बताना।”

 

अनाया की आंखें भर आईं।

 

“ये मेरे पापा की लिखावट है।”

 

शौर्य चुपचाप उसके पास खड़ा रहा।

 

डायरी के अगले पन्नों में कई साल पुरानी बातें लिखी थीं। उसके पिता और शौर्य के पिता बहुत अच्छे दोस्त थे। दोनों ने मिलकर एक छोटा कारोबार शुरू किया था। शुरुआत में सब ठीक चल रहा था, लेकिन कुछ साल बाद अचानक कारोबार में बड़ा नुकसान हो गया।

 

सारा दोष दोनों दोस्तों पर लगाया गया।

 

अनाया के पिता ने खुद को दोषी समझ लिया और परिवार से दूर चले गए।

 

लेकिन डायरी में आगे लिखा था कि उन्हें बाद में पता चला था कि कारोबार में असली गड़बड़ी किसी तीसरे आदमी ने की थी।

 

अनाया ने पन्ना पलटा।

 

एक जगह लिखा था—

 

“गलती मेरी नहीं थी। असली धोखा उस आदमी ने दिया था जिस पर हमने सबसे ज्यादा भरोसा किया।”

 

शौर्य ने पूछा, “कौन आदमी?”

 

डायरी में नाम नहीं था।

 

अनाया ने अगले पन्ने पलटे, लेकिन कई पन्ने फाड़े हुए थे।

 

शौर्य बोला, “किसी ने जानबूझकर ये पन्ने निकाले हैं।”

 

तभी कमरे के बाहर किसी के कदमों की आवाज सुनाई दी।

 

ठक… ठक… ठक…

 

तीनों चुप हो गए।

 

कबीर ने धीरे से दरवाजा बंद कर दिया।

 

“कोई बाहर है।”

 

शौर्य ने इशारे से उसे शांत रहने को कहा।

 

वह धीरे-धीरे दरवाजे के पास गया और बाहर झांका।

 

गलियारा खाली था।

 

शौर्य वापस कमरे में आया।

 

“कोई नहीं है।”

 

कबीर बोला, “अभी मैंने साफ कदमों की आवाज सुनी थी।”

 

अनाया ने डायरी बंद करते हुए कहा, “हमें यहां ज्यादा देर नहीं रुकना चाहिए।”

 

शौर्य ने कहा, “पहले देखते हैं कि इस कमरे में और क्या है।”

 

वह पुराने बक्से खोलने लगा।

 

पहले बक्से में पुराने कपड़े थे।

 

दूसरे में कुछ तस्वीरें।

 

तीसरे बक्से में एक लिफाफा था।

 

शौर्य ने लिफाफा उठाया।

 

उस पर लिखा था—

 

“शौर्य के पिता के लिए।”

 

शौर्य का चेहरा गंभीर हो गया।

 

उसने लिफाफा खोला।

 

अंदर एक पुराना कागज था।

 

उसमें लिखा था कि अगर कभी सच्चाई सामने लानी पड़े तो कुछ खास दस्तावेज एक पुराने पुल के पास छिपाए गए हैं।

 

कबीर ने पूछा, “पुराना पुल?”

 

शौर्य ने सिर हिलाया।

 

“हां।”

 

तभी नीचे से अचानक किसी ने आवाज लगाई।

 

“शौर्य!”

 

शौर्य चौंक गया।

 

“ये मां की आवाज है।”

 

वह जल्दी से नीचे भागा।

 

लेकिन दरवाजे के बाहर उसकी मां नहीं थीं।

 

बल्कि एक अधेड़ उम्र का आदमी खड़ा था।

 

उसने शौर्य को देखते ही कहा, “तुम यहां क्या कर रहे हो?”

 

शौर्य ने पूछा, “आप कौन हैं?”

 

आदमी ने अपना नाम रघुवीर बताया।

 

“मैं तुम्हारे पिता का पुराना दोस्त हूं।”

 

शौर्य ने तुरंत पूछा, “आप मेरे पापा को जानते थे?”

 

रघुवीर ने नजरें झुका लीं।

 

“बहुत अच्छी तरह।”

 

अनाया भी नीचे आ गई।

 

रघुवीर उसे देखते ही चौंक गया।

 

“तुम…?”

 

अनाया ने कहा, “मैं अपने पिता का सच जानने आई हूं।”

 

रघुवीर कुछ देर तक चुप रहा।

 

उसके चेहरे से लग रहा था कि वह कुछ ऐसा जानता है जो इतने सालों से किसी से छिपा रहा था।

 

आखिर उसने धीमी आवाज में कहा, “तुम्हारे पिता बुरे आदमी नहीं थे।”

 

“फिर उन्होंने घर क्यों छोड़ा?”

 

रघुवीर ने लंबी सांस ली।

 

“क्योंकि उन्हें फंसाया गया था।”

 

शौर्य का चेहरा गंभीर हो गया।

 

“किसने?”

 

रघुवीर ने तुरंत जवाब नहीं दिया।

 

उसने पहले कमरे की तरफ देखा, फिर खिड़की के बाहर।

 

“यह बात यहां नहीं होनी चाहिए।”

 

शौर्य ने पूछा, “क्यों?”

 

रघुवीर बोला, “क्योंकि जिस आदमी ने तुम्हारे परिवार को तोड़ा था, उसे पता चल चुका है कि तुम इस घर में आए हो।”

 

कबीर घबरा गया।

 

“लेकिन उसे कैसे पता चला?”

 

रघुवीर ने कहा, “क्योंकि इस घर पर इतने सालों से नजर रखी जा रही है।”

 

शौर्य ने हैरानी से पूछा, “किसकी?”

 

रघुवीर कुछ बोलता, उससे पहले बाहर एक गाड़ी आकर रुकी।

 

रघुवीर ने खिड़की से बाहर देखा।

 

उसका चेहरा अचानक घबरा गया।

 

“तुम दोनों को यहां से जाना होगा।”

 

शौर्य ने मना कर दिया।

 

“नहीं। इस बार मैं भागूंगा नहीं।”

 

रघुवीर ने उसकी तरफ देखा।

 

“तुम्हारे पिता भी यही कहते थे।”

 

शौर्य चुप हो गया।

 

रघुवीर ने जेब से एक छोटी सी चाबी निकाली और शौर्य को देते हुए कहा, “इसे संभालकर रखना। इसमें तुम्हारे पिता के सच तक पहुंचने का रास्ता है।”

 

शौर्य ने चाबी को देखा।

 

“ये किसकी है?”

 

रघुवीर ने जवाब नहीं दिया।

 

उसी समय बाहर किसी ने दरवाजा खटखटाया।

 

ठक… ठक…

 

रघुवीर फुसफुसाया, “पीछे के रास्ते से निकलो।”

 

शौर्य ने पूछा, “और आप?”

 

“मैं संभाल लूंगा।”

 

शौर्य जाना नहीं चाहता था, लेकिन रघुवीर ने उसे धक्का देकर पीछे वाले रास्ते की तरफ भेज दिया।

 

तीनों किसी तरह घर से बाहर निकल गए।

 

कुछ दूर जाकर शौर्य ने पीछे मुड़कर देखा।

 

पुराना घर बिल्कुल शांत खड़ा था।

 

लेकिन उसे महसूस हो रहा था कि कोई खिड़की से उन्हें देख रहा है।

 

रात को शौर्य घर लौटा तो उसकी मां दरवाजे पर खड़ी थीं।

 

“कहां था?”

 

शौर्य ने पहली बार अपनी मां से सब कुछ पूछने की ठानी।

 

“मां, पापा और अनाया के पिता के बीच क्या हुआ था?”

 

मां का चेहरा उतर गया।

 

कुछ देर तक वह चुप रहीं।

 

फिर बोलीं, “तुम्हारे पापा ने हमेशा कहा था कि उस मामले को दोबारा मत छेड़ना।”

 

“क्यों?”

 

मां की आंखों में आंसू आ गए।

 

“क्योंकि तुम्हारे पापा को डर था कि अगर सच बाहर आया, तो तुम्हारी जान खतरे में पड़ सकती है।”

 

शौर्य सन्न रह गया।

 

“मां, क्या आपको पता है कि असली गुनहगार कौन था?”

 

मां ने कुछ पल उसे देखा।

 

फिर बोलीं, “नाम तो नहीं बता सकती… लेकिन एक आदमी था जिस पर तुम्हारे पापा आंख बंद करके भरोसा करते थे।”

 

शौर्य को तुरंत रघुवीर की बात याद आई।

 

उसने पूछा, “क्या वो आदमी अब भी हमारे आसपास है?”

 

मां ने जवाब देने के बजाय कमरे का दरवाजा बंद कर दिया।

 

“शौर्य, अब इस मामले से दूर रहो।”

 

शौर्य ने कहा, “मां, मैं अब पीछे नहीं हट सकता।”

 

उसी रात उसके फोन पर एक संदेश आया।

 

“अगर अपने पिता का सच जानना चाहते हो, तो कल सुबह पुराने पुल पर अकेले आना।”

 

शौर्य ने संदेश पढ़ा।

 

कबीर ने पूछा, “किसका मैसेज है?”

 

शौर्य ने फोन बंद कर दिया।

 

“पता नहीं।”

 

लेकिन उसके चेहरे से साफ था कि वह जानता था—ये उसी राज से जुड़ा था।

 

उसने खिड़की से बाहर देखा और मन ही मन कहा—

 

“अब चाहे कुछ भी हो जाए, मैं पापा का नाम साफ करके रहूंगा।”

 

उसे नहीं पता था कि अगले दिन पुराने पुल पर उसका सामना उस इंसान से होने वाला था, जिसका नाम उसकी पूरी जिंदगी बदल देने वाला था।

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