🔐 लॉग-इन या रजिस्टर करें  

“तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 21

पढ़ने का समय : 10 मिनट

एपिसोड – 21 : नीलगिरी हवेली का रहस्य

 

माधवी की बात सुनते ही मंदिर के बाहर खड़े सभी लोग जैसे पत्थर के हो गए।

 

“नीलगिरी हवेली में नंदिनी कैद है।”

 

आरोही के होंठ कांपने लगे।

 

“मां… आपको पक्का पता है?”

 

माधवी ने उसकी तरफ देखा।

 

“हां बेटा। मुझे अपनी आंखों से नंदिनी को वहां जाते हुए देखा था।”

 

आरोही की आंखों से आंसू निकल पड़े।

 

“तो मेरी मां जिंदा है…”

 

माधवी ने उसे गले लगा लिया।

 

“हां।”

 

आरोही उनके सीने से लगकर रोने लगी।

 

“मुझे उन्हें बचाना है।”

 

आरव उसके पास आया।

 

“हम उन्हें बचाएंगे।”

 

आरोही ने उसकी तरफ देखा।

 

“लेकिन तुम्हें अकेले बुलाया गया है।”

 

“मैं अकेला नहीं जाऊंगा।”

 

“लेकिन उस आदमी ने धमकी दी है।”

 

आरव ने शांत आवाज में कहा,

 

“अगर उसने नंदिनी मां को सच में कैद कर रखा है, तो वो चाहता है कि मैं अकेला जाऊं। लेकिन हम उसकी शर्तों पर नहीं चलेंगे।”

 

अर्जुन ने सिर हिलाया।

 

“बिल्कुल।”

 

देवेंद्र ने कहा,

 

“विराज और शेखर दोनों खेल खेल रहे हैं। हमें बहुत सावधानी से कदम उठाना होगा।”

 

आरव ने पूछा,

 

“और अगर शेखर सच में मेरे पिता हैं?”

 

राघव ने उसकी तरफ देखा।

 

“तो इस बार तुम्हें फैसला करना होगा कि तुम किसे अपना पिता मानते हो।”

 

आरव की नजर राघव पर टिक गई।

 

कुछ पल दोनों के बीच खामोशी रही।

 

फिर आरव ने धीरे से कहा,

 

“जिसने मुझे पाला… मेरे लिए वो हमेशा मेरे पिता रहेंगे।”

 

राघव की आंखें भर आईं।

 

उन्होंने आरव को गले लगा लिया।

 

कुछ घंटों बाद सभी लोग नीलगिरी हवेली के लिए निकल पड़े।

 

इस बार आरव ने साफ कह दिया था कि कोई भी उसे अकेला नहीं छोड़ेगा।

 

अद्वैत गाड़ी चला रहा था।

 

कबीर उसके साथ बैठा था।

 

पीछे आरव, आरोही, राघव, माधवी और अर्जुन बैठे थे।

 

रास्ते में अचानक आरोही ने आरव का हाथ पकड़ लिया।

 

“तुम बहुत चुप हो।”

 

आरव ने उसकी तरफ देखा।

 

“सोच रहा हूं।”

 

“क्या?”

 

“अगर वो आदमी सच में मेरा पिता निकला तो?”

 

आरोही ने कहा,

 

“तब भी तुम वही रहोगे।”

 

“क्या मतलब?”

 

“आरव, तुम्हारी पहचान सिर्फ इस बात से तय नहीं होती कि तुम्हारे पिता कौन हैं।”

 

वह उसका हाथ दबाते हुए बोली,

 

“तुम्हारी पहचान तुम्हारे कर्मों से है।”

 

आरव मुस्कुरा दिया।

 

“तुम्हें पता है, तुम जब समझाती हो तो बहुत समझदार लगती हो।”

 

“और?”

 

“जब गुस्सा करती हो तो बिल्कुल नहीं।”

 

आरोही ने उसे घूरा।

 

“मैं अभी गुस्सा कर दूंगी।”

 

आरव हंस पड़ा।

 

“यही तो कह रहा था।”

 

आरोही भी मुस्कुरा दी।

 

लेकिन अगले ही पल उसकी नजर आरव के हाथ पर गई।

 

“आरव…”

 

“क्या?”

 

“तुम्हारा हाथ कांप रहा है।”

 

आरव ने नजरें चुरा लीं।

 

“थोड़ा डर लग रहा है।”

 

आरोही ने अपना हाथ उसके हाथ पर रख दिया।

 

“अब?”

 

आरव ने उसकी तरफ देखा।

 

“अब नहीं।”

 

शाम ढलते-ढलते वे समुद्र के किनारे पहुंच गए।

 

सामने एक बहुत बड़ी, पुरानी हवेली थी।

 

चारों तरफ घना जंगल था।

 

समुद्र की लहरें हवेली के पीछे चट्टानों से टकरा रही थीं।

 

हवेली का मुख्य दरवाजा खुला हुआ था।

 

कबीर ने गाड़ी रोक दी।

 

“दरवाजा खुला है।”

 

अर्जुन ने कहा,

 

“ये अच्छी बात नहीं है।”

 

आरव ने पूछा,

 

“क्यों?”

 

“क्योंकि इस हवेली का दरवाजा पिछले दस सालों से किसी ने नहीं खोला।”

 

आरोही ने धीरे से कहा,

 

“तो फिर आज किसने खोला?”

 

किसी के पास जवाब नहीं था।

 

आरव गाड़ी से उतर गया।

 

“चलो।”

 

राघव ने उसे रोकते हुए कहा,

 

“सावधान रहना।”

 

आरव ने सिर हिलाया।

 

सभी लोग हवेली के अंदर गए।

 

अंदर अंधेरा था।

 

दीवारों पर पुराने चित्र लगे थे।

 

एक बड़ी घड़ी बंद पड़ी थी।

 

फर्श पर धूल जमा थी।

 

लेकिन बीच कमरे में…

 

एक दीपक जल रहा था।

 

आरोही ने कहा,

 

“कोई यहां है।”

 

तभी ऊपर से आवाज आई “स्वागत है, आरव।”

 

सबने ऊपर देखा।

 

बालकनी खाली थी।

 

फिर आवाज आई “तुम्हें अकेले आना था।”

 

आरव ने जवाब दिया,

 

“मैं अकेला नहीं आया।”

 

आवाज में हंसी थी।

 

“मुझे पता था।”

 

अचानक हवेली के दूसरे हिस्से से किसी महिला की चीख सुनाई दी।

 

“बचाओ!”

 

आरोही तुरंत उस तरफ दौड़ने लगी।

 

आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

 

“रुको!”

 

“वो मां की आवाज थी।”

 

“हो सकता है जाल हो।”

 

आरोही की आंखों में आंसू थे।

 

“अगर सच में मां हुई तो?”

 

आरव कुछ पल चुप रहा।

 

फिर बोला,

 

“हम साथ जाएंगे।”

 

दोनों आगे बढ़े।

 

एक लंबे गलियारे के आखिर में लोहे का दरवाजा था।

 

दरवाजे के पीछे से फिर आवाज आई “आरोही!”

 

आरोही रो पड़ी।

 

“मां!”

 

उसने दरवाजा खोलने की कोशिश की।

 

ताला लगा था।

 

कबीर ने ताला तोड़ने की कोशिश की।

 

लेकिन तभी राघव ने कहा,

 

“रुको।”

 

“क्यों?”

 

“इस दरवाजे के नीचे बिजली की वायर जा रही है।”

 

अद्वैत ने जमीन देखी।

 

“ये जाल है।”

 

आरव ने कहा,

 

“तो असली कमरा कौन सा है?”

 

तभी अर्जुन ने दीवार पर हाथ रखा।

 

“यहां।”

 

उन्होंने एक खास पत्थर दबाया।

 

दीवार का एक हिस्सा खुल गया।

 

पीछे एक गुप्त रास्ता था।

 

आरोही ने हैरानी से कहा,

 

“आपको ये कैसे पता?”

 

अर्जुन ने कहा,

 

“क्योंकि मैंने ये हवेली बनवाई थी।”

 

सब चौंक गए।

 

गुप्त रास्ते से नीचे उतरने के बाद वे एक छोटे कमरे में पहुंचे।

 

कमरे में एक कुर्सी थी।

 

और उस कुर्सी पर…

 

एक महिला बैठी थी।

 

उसके हाथ बंधे हुए थे।

 

बाल बिखरे हुए थे।

 

लेकिन चेहरा…

 

वही था।

 

आरोही की आंखों से आंसू बह निकले।

 

“मां…”

 

महिला ने धीरे से सिर उठाया।

 

कुछ पल तक वह आरोही को देखती रही।

 

फिर उसकी आंखें भर आईं।

 

“आरोही…”

 

आरोही दौड़कर उनके पास गई।

 

“मां!”

 

नंदिनी ने उसे कसकर गले लगा लिया।

 

दोनों रोने लगीं।

 

“मुझे पता था तुम एक दिन मुझे ढूंढते हुए यहां जरूर आओगी।”

 

आरोही रोते हुए बोली,

 

“आपने मुझे छोड़ क्यों दिया?”

 

नंदिनी ने उसके चेहरे को छुआ।

 

“मैंने तुम्हें कभी नहीं छोड़ा।”

 

“फिर इतने साल?”

 

“मैं मजबूर थी।”

 

आरव भी कुछ दूरी पर खड़ा उन्हें देख रहा था।

 

नंदिनी की नजर आरव पर पड़ी।

 

उनकी आंखें भर आईं।

 

“आरव…”

 

आरव चौंका।

 

“आप मुझे जानती हैं?”

 

नंदिनी ने कहा,

 

“तुम्हें कैसे नहीं पहचानूंगी?”

 

आरव उनके पास गया।

 

नंदिनी ने उसका चेहरा दोनों हाथों में ले लिया।

 

“तुम बिल्कुल अपने पिता जैसे दिखते हो।”

 

आरव की आंखों में सवाल था।

 

“मेरे पिता कौन हैं?”

 

नंदिनी चुप हो गईं।

 

आरव ने पूछा,

 

“मुझे सच बताइए।”

 

नंदिनी ने उसकी तरफ देखा।

 

“तुम्हारे पिता का नाम शेखर है।”

 

कमरे में सन्नाटा छा गया।

 

आरव की सांस रुक गई।

 

“तो शेखर सच में मेरे पिता हैं?”

 

नंदिनी ने सिर हिलाया।

 

“हां।”

 

आरव ने पीछे मुड़कर राघव की तरफ देखा।

 

राघव की आंखें नम थीं।

 

“तो इतने सालों तक…”

 

नंदिनी ने कहा,

 

“राघव ने तुम्हें अपने बेटे से भी ज्यादा प्यार किया।”

 

आरव ने राघव की तरफ देखा।

 

राघव ने कहा,

 

“मैंने तुम्हें कभी किसी और का बेटा नहीं समझा।”

 

आरव की आंखों में आंसू आ गए।

 

“मुझे आपसे कभी शिकायत नहीं थी।”

 

राघव ने कहा,

 

“लेकिन अब तुम्हें अपने पिता को जानना होगा।”

 

आरव ने पूछा,

 

“शेखर कहां हैं?”

 

नंदिनी ने नजरें झुका लीं।

 

“यहीं।”

 

आरव चौंक गया।

 

“क्या?”

 

नंदिनी ने कहा,

 

“इस हवेली में।”

 

अचानक कमरे की लाइट जल गई।

 

सामने दीवार पर एक प्रोजेक्टर चल पड़ा।

 

स्क्रीन पर एक आदमी दिखाई दिया।

 

आरव उसे देखते ही ठहर गया।

 

चेहरा गंभीर था।

 

आंखों में अजीब-सी गहराई।

 

नंदिनी ने धीमे से कहा,

 

“शेखर।”

 

स्क्रीन पर आदमी बोला “आरव…”

 

आरव की आंखें भर आईं।

 

“पापा?”

 

शेखर कुछ पल उसे देखते रहे।

 

फिर बोले,

 

“मुझे पता था तुम एक दिन यहां जरूर आओगे।”

 

आरव ने कहा,

 

“तो सामने क्यों नहीं आते?”

 

शेखर ने जवाब दिया,

 

“क्योंकि मैं चाहता हूं कि तुम पहले पूरी सच्चाई जानो।”

 

“क्या सच्चाई?”

 

“तुम्हारी मां माधवी ने तुमसे बहुत कुछ छुपाया।”

 

माधवी आगे आईं।

 

“शेखर, अब ये सब बंद करो।”

 

शेखर ने कहा,

 

“माधवी… तुमने आरव को बताया कि मैं मर गया हूं।”

 

माधवी रोते हुए बोलीं,

 

“मैंने उसे बचाने के लिए कहा था।”

 

शेखर ने कहा,

 

“और मैंने उसे दूर रहकर बचाया।”

 

आरव ने गुस्से में कहा,

 

“दोनों ने मुझे बचाने के नाम पर मुझसे मेरा बचपन छीन लिया।”

 

कमरे में सन्नाटा छा गया।

 

शेखर ने अचानक गंभीर आवाज में कहा,

 

“आरव, मेरी बात ध्यान से सुनो।”

 

“क्या?”

 

“तुम्हारे जन्म की रात अस्पताल से दो बच्चों को बाहर ले जाया गया था।”

 

आरव ने आरोही की तरफ देखा।

 

“हम दोनों?”

 

“हां।”

 

“लेकिन क्यों?”

 

“क्योंकि तुम्हारे जन्म के समय अस्पताल में एक ऐसा दस्तावेज तैयार हुआ था, जिसमें एक बहुत बड़े अपराध का सबूत था।”

 

आरोही ने पूछा,

 

“किस अपराध का?”

 

शेखर ने कहा,

 

“एक ऐसा अपराध… जिसमें राजवंशी परिवार, सूद परिवार और कई बड़े लोग शामिल थे।”

 

देवेंद्र ने सिर झुका लिया।

 

विराज का नाम सुनते ही राघव की मुट्ठियां भींच गईं।

 

शेखर ने कहा,

 

“विराज उस अपराध का हिस्सा था।”

 

आरव ने पूछा,

 

“और आप?”

 

“मैं उस अपराध को रोकना चाहता था।”

 

“फिर?”

 

शेखर ने कहा,

 

“मुझे धोखा दिया गया।”

 

“किसने?”

 

स्क्रीन कुछ सेकंड के लिए बंद हो गई।

 

फिर दोबारा चालू हुई।

 

शेखर ने कहा “जिसे तुम अपना सबसे भरोसेमंद दोस्त समझते हो।”

 

आरव का चेहरा बदल गया।

 

उसकी नजर धीरे-धीरे कबीर पर गई।

 

कबीर चौंक गया।

 

“आरव, मेरी तरफ ऐसे मत देखो।”

 

आरव कुछ बोल पाता, उससे पहले शेखर ने कहा—

 

“कबीर तुम्हारा दुश्मन नहीं है।”

 

आरव ने राहत की सांस ली।

 

लेकिन अगली बात सुनकर सब स्तब्ध रह गए।

 

“कबीर के पिता तुम्हारे पिता के दुश्मन थे।”

 

कबीर ने सिर झुका लिया।

 

“मुझे पता था।”

 

आरव ने पूछा,

 

“तो तुम मेरे पास क्यों आए?”

 

कबीर ने कहा,

 

“क्योंकि मेरे पिता ने जो किया था… उसका प्रायश्चित मैं करना चाहता था।”

 

नंदिनी अचानक घबरा गईं।

 

“शेखर, उन्हें जल्दी यहां से निकालो।”

 

शेखर ने पूछा,

 

“क्यों?”

 

नंदिनी ने कांपती आवाज में कहा,

 

“क्योंकि वो आ चुका है।”

 

सबने उनकी तरफ देखा।

 

“कौन?”

 

नंदिनी ने धीरे से कहा “विराज नहीं…”

 

वह दरवाजे की तरफ देखने लगीं।

 

“वो आदमी… जिससे हम पच्चीस साल से भाग रहे हैं।”

 

तभी ऊपर से जोरदार धमाका हुआ।

 

धड़ाम!

 

दीवार हिल गई।

 

अर्जुन ने बंदूक निकाल ली।

 

राघव ने कहा,

 

“सब पीछे हटो।”

 

फिर किसी के कदमों की आवाज सुनाई दी।

 

धीरे-धीरे…

 

सीढ़ियों से कोई नीचे उतर रहा था।

 

ठक… ठक… ठक…

 

आरोही ने आरव का हाथ पकड़ लिया।

 

“कौन है?”

 

कोई जवाब नहीं आया।

 

कदमों की आवाज और करीब आई।

 

फिर एक आदमी कमरे में दाखिल हुआ।

 

उसे देखते ही शेखर की स्क्रीन पर मौजूद तस्वीर गायब हो गई।

 

माधवी के मुंह से चीख निकल गई “नहीं…”

 

आरव ने उस आदमी को देखा।

 

वह आदमी मुस्कुराया।

 

“बहुत सालों से तुम लोग मेरा नाम सुनते आए हो।”

 

वह धीरे-धीरे आगे बढ़ा।

 

“आज पहली बार मुझे देख भी लो।”

 

आरव ने पूछा,

 

“तुम कौन हो?”

 

आदमी ने मुस्कुराकर कहा “मैं शेखर का भाई हूं।”

 

सबके चेहरे पर हैरानी छा गई।

 

राघव ने कांपती आवाज में कहा “नहीं… ये संभव नहीं है।”

 

आदमी हंसा।

 

“क्यों राघव?”

 

फिर उसने आरव की तरफ देखा।

 

“क्योंकि तुम्हें बचाने के लिए शेखर ने जिसे मरा हुआ बताया था… वो मैं था।”

 

आरोही ने आरव का हाथ पकड़ लिया।

 

और तभी उस आदमी ने आखिरी बात कही “आरव, तुम्हें अपने पिता की तलाश करने की जरूरत नहीं है…”

 

वह मुस्कुराया।

 

“क्योंकि शेखर अभी इसी हवेली में है।”

 

जारी रहेगा…

Comments

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *