आरव ने आंखें बंद कर लीं।
उसके कंधे पर रखा हाथ धीरे-धीरे ठंडा होता जा रहा था।
कबीर सामने खड़ा चिल्लाया—
“भैया! पीछे मत देखना!”
आरव ने पूछा—
“कबीर, ये औरत कौन है?”
कबीर ने जवाब दिया—
“ये कोई औरत नहीं है।”
आरव की सांस अटक गई।
कबीर बोला—
“ये उस मकान की रखवाली करने वाली आत्मा है। जो भी इंसान इसे पीछे मुड़कर देखता है, उसकी परछाई उससे अलग हो जाती है।”
आरव ने नीचे जमीन की तरफ देखा।
उसकी अपनी परछाई वहां नहीं थी।
वह गायब हो चुकी थी।
तभी पीछे खड़ी चीज ने हंसते हुए कहा—
“अब तुम मेरे हो।”
आरव ने अचानक जेब से मोबाइल निकाला और कैमरा ऑन कर दिया।
मोबाइल की स्क्रीन में उसने देखा…
उसके पीछे कोई बूढ़ी औरत नहीं थी।
बल्कि एक बहुत लंबी, काली आकृति खड़ी थी।
उसका चेहरा नहीं था।
सिर्फ दो चमकती हुई आंखें थीं।
आरव ने हिम्मत करके आंखें बंद कीं और कबीर की तरफ दौड़ पड़ा।
कबीर ने उसका हाथ पकड़ा और दोनों मकान से बाहर भागने लगे।
जैसे ही वे दरवाजे से बाहर निकले, पीछे से जोरदार चीख सुनाई दी—
“आरव… तुम जा सकते हो, लेकिन अपनी परछाई यहीं छोड़कर!”
आरव ने जमीन पर देखा।
उसकी परछाई अब भी मकान के अंदर खड़ी थी।
और वह…
उसे हाथ हिला रही थी।

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇
चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं
शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।
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