शहर से करीब पंद्रह किलोमीटर दूर एक छोटा-सा गाँव था—रामपुरा।
गाँव के आखिरी छोर पर एक बहुत पुरानी हवेली थी।
लोग उसे काली हवेली कहते थे।
हवेली इतनी पुरानी थी कि उसकी दीवारों पर उगी काई ने पूरी इमारत को हरे और काले रंग में ढक दिया था। खिड़कियों के शीशे टूटे हुए थे और मुख्य दरवाजे पर लोहे की बड़ी-बड़ी कीलें लगी थीं।
लेकिन उस हवेली की सबसे डरावनी बात उसका बंद पड़ा तीसरा कमरा था।
गाँव के बुजुर्ग कहते थे कि उस कमरे का दरवाजा पिछले पैंतीस साल से नहीं खुला था।
और जो भी उसे खोलने की कोशिश करता…
वह रात में गायब हो जाता।
इसी गाँव में आरव नाम का एक लड़का रहता था।
आरव को पुरानी जगहों और रहस्यमयी कहानियों में बहुत दिलचस्पी थी। वह हमेशा अपने दोस्तों से कहता था—
“भूत होते तो आज तक किसी ने वीडियो बना लिया होता।”
उसके तीन दोस्त थे—निखिल, करण और मोहित।
एक दिन चारों स्कूल से लौट रहे थे।
रास्ते में निखिल ने काली हवेली की तरफ देखते हुए कहा—
“तुझे पता है, कल रात वहाँ से किसी लड़की के रोने की आवाज आई थी।”
आरव हँस पड़ा।
“तू भी दादी-नानी वाली कहानियों पर विश्वास करता है?”
करण ने कहा—
“मजाक मत कर। मेरे चाचा ने भी सुना है।”
आरव ने हवेली की तरफ देखा।
उसकी तीसरी मंजिल की एक खिड़की खुली थी।
“अगर वहाँ कोई है, तो आज रात पता कर लेते हैं।”
मोहित तुरंत बोला—
“तू पागल है क्या?”
आरव मुस्कुराया।
“डर गया?”
“डर नहीं लगा…”
मोहित ने धीमे से कहा।
“लेकिन उस हवेली के बारे में एक बात सच है।”
“क्या?”
“उसमें रात के बारह बजे कोई दरवाजा खटखटाता है।”
चारों कुछ पल चुप रहे।
आरव ने पूछा—
“कौन?”
मोहित ने सिर हिलाया।
“किसी को नहीं पता।”
उस रात करीब साढ़े ग्यारह बजे चारों दोस्त हवेली के बाहर पहुँच गए।
आसमान में बादल थे।
चाँद कभी बादलों के पीछे छिप जाता, कभी दिखाई देता।
हवेली का मुख्य दरवाजा आधा खुला था।
आरव ने टॉर्च जलाई।
“चलो।”
अंदर कदम रखते ही ठंडी हवा का झोंका आया।
हवेली के अंदर धूल की मोटी परत थी।
दीवारों पर पुराने चित्र लगे थे।
एक चित्र में हवेली के मालिक का परिवार दिखाई दे रहा था।
एक आदमी…
एक औरत…
और उनके बीच करीब दस साल की एक लड़की।
मोहित ने तस्वीर पर टॉर्च डाली।
“इस लड़की के चेहरे पर खरोंच क्यों है?”
आरव ने पास जाकर देखा।
लड़की के चेहरे को किसी नुकीली चीज से इतनी बार खरोंचा गया था कि चेहरा पहचान में नहीं आ रहा था।
तभी ऊपर से आवाज आई।
ठक…
चारों ने सिर उठाया।
फिर—
ठक… ठक…
जैसे कोई ऊपर की मंजिल पर चल रहा हो।
करण ने फुसफुसाकर कहा—
“कोई है।”
आरव ने कहा—
“चलकर देखते हैं।”
वे सीढ़ियों की तरफ बढ़े।
हर कदम के साथ लकड़ी की सीढ़ियाँ चरमरातीं।
ऊपर पहुँचकर उन्हें एक लंबा गलियारा दिखाई दिया।
गलियारे के आखिर में तीन दरवाजे थे।
पहला कमरा खुला था।
दूसरा बंद था।
और तीसरे कमरे पर मोटी लोहे की जंजीर बंधी थी।
जंजीर पर लाल रंग से कुछ लिखा था—
“इसे मत खोलना।”
आरव ने टॉर्च उस लिखावट पर डाली।
मोहित पीछे हट गया।
“हमें वापस जाना चाहिए।”
तभी तीसरे कमरे के अंदर से आवाज आई।
बहुत धीमी।
एक लड़की की आवाज।
“भैया…”
चारों जम गए।
फिर आवाज आई—
“मुझे बाहर निकालो…”
मोहित की साँसें तेज हो गईं।
“यहाँ कोई बच्ची बंद है!”
आरव ने जंजीर को देखा।
“अगर सच में कोई अंदर है तो हमें मदद करनी चाहिए।”
करण ने कहा—
“लेकिन यह जंजीर…”
आरव ने उसे पकड़ लिया।
जंजीर बर्फ जैसी ठंडी थी।
अचानक अंदर से जोर की आवाज आई।
धड़ाम!
चारों पीछे हट गए।
फिर दरवाजे के नीचे से किसी की उंगलियाँ दिखाई दीं।
पतली…
सफेद…
और असामान्य रूप से लंबी।
वे उंगलियाँ धीरे-धीरे दरवाजे के नीचे से बाहर आईं।
मोहित चीखने ही वाला था कि आरव ने उसका मुँह दबा दिया।
अंदर से लड़की की आवाज आई—
“भैया… तुम आ गए।”
आरव का दिल तेजी से धड़कने लगा।
“तुम कौन हो?”
कुछ सेकंड कोई जवाब नहीं आया।
फिर अंदर से आवाज आई—
“मैं वही हूँ… जिसे इस हवेली ने पैंतीस साल पहले बंद कर दिया था।”
आरव ने करण की तरफ देखा।
“पैंतीस साल?”
तभी उसके पीछे लगे पुराने आईने में कुछ दिखाई दिया।
चारों लड़के वहाँ खड़े थे।
लेकिन आईने में…
पाँच लोग दिखाई दे रहे थे।
उनके पीछे एक छोटी लड़की खड़ी थी।
उसका चेहरा बिल्कुल काला था।
और वह धीरे-धीरे अपना हाथ उठाकर तीसरे कमरे की तरफ इशारा कर रही थी।
आरव ने पलटकर पीछे देखा।
वहाँ कोई नहीं था।
फिर आईने की तरफ देखा।
लड़की अब भी वहाँ थी।
उसने अपने होंठ खोले।
और बिना आवाज के सिर्फ इतना कहा—
“दरवाजा मत खोलना।”
अचानक तीसरे कमरे के अंदर से जोर-जोर से दरवाजा पीटने की आवाज आने लगी।
धड़ाम!
धड़ाम!
धड़ाम!
और फिर एक आदमी की भारी आवाज गूँजी—
“उसे बाहर मत निकालना!”
चारों लड़के डरकर सीढ़ियों की तरफ भागे।
लेकिन सीढ़ियों के पास पहुँचते ही आरव रुक गया।
नीचे जाने वाली सीढ़ियाँ गायब थीं।
उनकी जगह…
एक लंबी, काली दीवार थी।
और दीवार पर ताजा खून से लिखा था—
“अब तुम पाँच हो।”

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇
चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं
शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।
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