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भाग 2 — पुरानी डायरी का राज

पढ़ने का समय : 6 मिनट

 

सुबह हो चुकी थी, लेकिन आरव के मन में रात का डर अभी भी जिंदा था।

पापा ने नाश्ता तक नहीं किया। वह लगातार घर के अंदर इधर-उधर घूम रहे थे। बार-बार ऊपर वाली मंजिल की तरफ देखते और फिर नजरें झुका लेते।

आरव ने पहली बार अपने पिता के चेहरे पर इतना डर देखा था।

उसने फिर पूछा, “पापा, मेरी माँ की मौत उस औरत की वजह से हुई थी?”

पापा कुछ देर चुप रहे।

फिर उन्होंने कहा, “आरव, कुछ बातें ऐसी होती हैं जिन्हें जितना छिपाओ, उतना ही अच्छा लगता है।”

“लेकिन मुझे सच जानना है।”

पापा ने उसकी तरफ देखा।

“तुम अभी बच्चे हो।”

“मैं बच्चा नहीं हूँ। मैंने कल रात उसे देखा है।”

यह सुनते ही पापा के हाथ से गिलास गिर गया।

गिलास फर्श पर टूट गया।

पापा ने कांपती आवाज में पूछा, “तुमने उसे देखा?”

आरव ने सिर हिला दिया।

“उसका चेहरा कैसा था?”

“माँ जैसा।”

पापा ने आँखें बंद कर लीं।

कुछ देर बाद उन्होंने कहा, “आज शाम मैं तुम्हें सब बताऊंगा।”

लेकिन शाम तक इंतजार करना आरव के लिए मुश्किल था।

दोपहर में पापा किसी काम से बाहर गए।

आरव अकेला था।

तभी उसकी नजर पापा की अलमारी पर पड़ी।

उसे याद आया कि पापा ने पिछली रात एक पुरानी तस्वीर दिखाई थी।

उसने अलमारी खोली।

कपड़ों के पीछे एक पुराना लकड़ी का डिब्बा रखा था।

डिब्बे पर धूल जमी थी।

आरव ने उसे बाहर निकाला।

अंदर कुछ तस्वीरें, पुराने कागज और एक डायरी थी।

डायरी के पहले पन्ने पर लिखा था—

“मीरा की डायरी।”

मीरा आरव की माँ का नाम था।

आरव ने कांपते हाथों से डायरी खोली।

पहले कुछ पन्नों में सामान्य बातें थीं।

फिर एक जगह लिखा था—

“आज घर में फिर किसी के चलने की आवाज आई। मैंने अरुण से कहा कि घर में कोई है, लेकिन उसने मेरी बात नहीं मानी।”

आरव आगे पढ़ता गया।

एक और पन्ने पर लिखा था—

“मुझे लगता है कि यह घर खाली नहीं है। रात को कोई मेरे कमरे के बाहर खड़ा रहता है। जब मैं दरवाजा खोलती हूँ तो कोई नहीं होता।”

अगले पन्ने पर शब्दों के बीच कई जगह स्याही फैली हुई थी।

“कल रात उसने पहली बार मेरा नाम लिया। उसने कहा—‘मीरा, तुम मेरे बेटे को मुझसे नहीं छीन सकती।’”

आरव का दिल जोर से धड़कने लगा।

उसने अगला पन्ना पलटा।

“आज मैंने अरुण से सच पूछा। उसने बताया कि इस घर में रहने वाली पिछली महिला का नाम सावित्री था। उसका एक बेटा था, जो बहुत कम उम्र में मर गया था। उसके बाद सावित्री पागल हो गई। वह हर बच्चे को अपना बेटा समझने लगी।”

आरव ने पढ़ना जारी रखा।

“लोग कहते हैं कि सावित्री ने इसी घर के ऊपर वाले कमरे में आत्महत्या की थी।”

आरव की उंगलियां ठंडी हो गईं।

अब उसे समझ आ रहा था कि ऊपर वाला कमरा क्यों बंद रहता था।

लेकिन डायरी में आगे जो लिखा था, उसने उसे और डरा दिया।

“सावित्री की मृत्यु के बाद भी उसकी आत्मा घर में दिखाई देती रही। कई लोगों ने कहा कि वह बच्चों को बुलाती है। लेकिन सबसे डरावनी बात यह है कि वह अपना चेहरा उस व्यक्ति की माँ जैसा बना सकती है, जिसे वह अपने साथ ले जाना चाहती है।”

आरव ने डायरी बंद कर दी।

उसकी सांस तेज हो गई।

उसी समय घर के बाहर किसी ने दरवाजा खटखटाया।

ठक… ठक…

आरव चौंक गया।

उसने खिड़की से बाहर देखा।

कोई नहीं था।

फिर दरवाजे पर दस्तक हुई।

ठक… ठक… ठक…

आरव पीछे हट गया।

तभी दरवाजे के दूसरी तरफ से आवाज आई—

“बेटा…”

आरव की आँखें फैल गईं।

यह उसकी माँ की आवाज थी।

“दरवाजा खोलो…”

आरव ने दरवाजा नहीं खोला।

आवाज फिर आई—

“आरव, मैं हूँ… तुम्हारी माँ।”

उसकी आँखों में आंसू आ गए।

वह अपनी माँ की आवाज पहचानता था।

लेकिन डायरी की बात उसे याद थी।

वह धीरे से पीछे हट गया।

“तुम मेरी माँ नहीं हो।”

कुछ सेकंड तक बिल्कुल शांति रही।

फिर बाहर से धीमी हंसी सुनाई दी।

“तुम्हें सच पता चल गया है…”

आरव के शरीर में सिहरन दौड़ गई।

“लेकिन तुम्हारे पापा ने अभी पूरा सच नहीं बताया।”

दरवाजे के नीचे से एक काला साया दिखाई दिया।

वह साया इंसान के पैरों जैसा नहीं था।

वह धीरे-धीरे दरवाजे के नीचे से लंबा होता गया।

आरव दौड़कर दूसरे कमरे में छिप गया।

कुछ मिनट बाद पापा घर लौटे।

उन्होंने आरव को डर के मारे कोने में बैठा देखा।

आरव ने सारी बात बताई।

पापा ने डायरी अपने हाथ में ली।

“तुमने इसे पढ़ लिया?”

“हाँ।”

पापा ने गहरी सांस ली।

“अब तुम्हें सब बताना ही पड़ेगा।”

उन्होंने कहा—

“सावित्री सच में इस घर में रहती थी। लेकिन वह सिर्फ पागल नहीं थी। उसका बेटा रवि एक हादसे में मरा था। सावित्री को लगता था कि उसकी मौत के लिए घर के मालिक जिम्मेदार हैं। वह बदला लेना चाहती थी।”

“लेकिन माँ की मौत?”

“तुम्हारी माँ ने इस घर का सच जान लिया था।”

पापा की आवाज कांपने लगी।

“तुम्हारी माँ को पता चला था कि सावित्री की आत्मा किसी बच्चे के शरीर पर कब्जा करने की कोशिश करती है। तुम्हारे जन्म के बाद वह तुम्हें अपना रवि समझने लगी।”

आरव चुप रहा।

पापा ने आगे कहा—

“तुम्हारी माँ ने तुम्हें बचाने के लिए उससे मुकाबला किया।”

“फिर?”

“एक रात तुम्हारी माँ ऊपर वाले कमरे में गई। सुबह वह बेहोश मिली। अस्पताल में उसकी मौत हो गई।”

आरव की आँखों से आंसू निकलने लगे।

“तो आपने उस कमरे को बंद क्यों कर दिया?”

पापा ने कहा—

“क्योंकि मुझे लगा था कि ताला लगाने से सब खत्म हो जाएगा।”

तभी ऊपर से तेज आवाज आई।

धड़ाम!

दोनों ने ऊपर देखा।

ऊपर वाला दरवाजा अपने आप खुल चुका था।

फिर किसी बच्चे के रोने की आवाज आई।

“माँ…”

आरव के पापा का चेहरा बदल गया।

“यह आवाज…”

उन्होंने कांपते हुए कहा—

“यह सावित्री के बेटे रवि की आवाज है।”

आरव ने पूछा, “लेकिन वह तो मर चुका था।”

पापा ने धीरे से कहा—

“हाँ। और यही सबसे बड़ा डर है।”

तभी सीढ़ियों पर किसी के कदमों की आवाज आने लगी।

ठक…

ठक…

ठक…

एक औरत धीरे-धीरे नीचे उतर रही थी।

सफेद साड़ी।

लंबे बाल।

और हाथ में एक पुरानी लाल गुड़िया।

वह आरव को देखकर मुस्कुराई।

“रवि…”

आरव पीछे हट गया।

“मेरा नाम आरव है!”

औरत ने गर्दन टेढ़ी की।

“तुम्हारी माँ ने भी यही कहा था…”

उसने लाल गुड़िया फर्श पर फेंकी।

गुड़िया का सिर अपने आप घूम गया।

और उसके मुंह से आवाज निकली—

“आरव… ऊपर आओ।”

पापा ने आरव का हाथ पकड़ा और उसे बाहर की ओर खींचा।

लेकिन जैसे ही दोनों दरवाजे तक पहुंचे, मुख्य दरवाजा अपने आप बंद हो गया।

घर के अंदर अंधेरा छा गया।

और पीछे से सावित्री की आवाज आई—

“आज कोई इस घर से बाहर नहीं जाएगा।”

 

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