नन्हे कान्हा की बाल लीलाएँ
कान्हा और शरारती सफेद बछड़ा
अगली सुबह नंद भवन में सूरज की पहली किरण पड़ते ही कान्हा उठ गए। उन्हें रात से ही उस नन्हे सफेद बछड़े की चिंता थी, जो कल पहली बार उनके पास आया था।
कान्हा आँगन में दौड़ते हुए पहुँचे।
“छोटू!”
छोटू ने तुरंत घंटी बजाई।
टन… टन…
कान्हा हँस पड़े।
फिर उनकी नजर सफेद बछड़े पर गई।
वह थोड़ी दूर खड़ा था और बड़ी-बड़ी आँखों से कान्हा को देख रहा था।
कान्हा उसके पास गए।
“तुम्हारा नाम क्या रखें?”
बछड़े ने कोई जवाब नहीं दिया।
कान्हा ने उसके सिर पर हाथ फेरा।
“तुम बहुत सफेद हो।”
एक दोस्त बोला—
“इसका नाम गोरा रख दो।”
दूसरा दोस्त बोला—
“नहीं, चाँद रखो।”
कान्हा ने कुछ देर सोचा।
फिर बोले—
“इसका नाम चंदू होगा।”
सभी दोस्तों को नाम पसंद आ गया।
कान्हा ने चंदू को पुकारा—
“चंदू!”
बछड़ा कान खड़े करके उनकी तरफ देखने लगा।
कान्हा खुशी से बोले—
“इसे अपना नाम पसंद आ गया!”
दोस्त हँसने लगे।
सुबह का समय था। नंद भवन में यशोदा मैया रसोई में काम कर रही थीं। उन्होंने बड़े बर्तन में आटा रखा और रोटियाँ बनाने लगीं।
कान्हा कुछ देर तक चंदू और छोटू के साथ खेलते रहे।
लेकिन चंदू बाकी बछड़ों से अलग था।
वह हर चीज को सूँघता, फिर उसे छूने की कोशिश करता।
कभी वह लकड़ी के दरवाजे को नाक से धक्का देता, कभी रस्सी खींचता।
कान्हा उसे देखकर हँसते रहे।
एक दोस्त बोला—
“कान्हा, ये तो तुमसे भी ज्यादा शरारती है।”
कान्हा ने कहा—
“नहीं, ये तो बहुत सीधा है।”
उसी समय चंदू एक रस्सी के पास गया और उसे खींचने लगा।
रस्सी से बंधी छोटी टोकरी नीचे गिर गई।
धड़ाम!
कान्हा चौंक गए।
फिर हँस पड़े।
“चंदू!”
चंदू पीछे हट गया।
कान्हा उसके पास गए।
“ऐसा नहीं करते।”
चंदू ने कान हिलाए।
कान्हा बोले—
“समझ गए?”
चंदू फिर रस्सी सूँघने लगा।
कान्हा ने सिर पकड़ लिया।
“तुम तो मेरी बात सुनते ही नहीं।”
दोस्त हँसने लगे।
उधर यशोदा मैया रसोई में आटा गूँध रही थीं।
उन्होंने बच्चों की हँसी सुनी तो बाहर देखा।
“कान्हा, अंदर मत आना। मैं काम कर रही हूँ।”
कान्हा ने कहा—
“मैं अंदर नहीं आऊँगा।”
यशोदा ने कहा—
“और चंदू को भी अंदर मत आने देना।”
कान्हा ने तुरंत कहा—
“ठीक है।”
लेकिन जैसे ही यशोदा अंदर गईं, चंदू उनकी ओर देखने लगा।
कान्हा ने कहा—
“चंदू, उधर नहीं जाना।”
चंदू ने दो कदम पीछे किए।
फिर अचानक मुड़ा और रसोई की तरफ चल पड़ा।
कान्हा उसके पीछे भागे।
“अरे! रुको!”
चंदू रसोई के दरवाजे तक पहुँच गया।
कान्हा ने उसे रोकने की कोशिश की।
लेकिन चंदू बहुत तेज था।
वह सीधे अंदर चला गया।
यशोदा ने पीछे मुड़कर देखा।
“अरे!”
चंदू आटे के पास पहुँच चुका था।
उसने अपना मुँह आटे वाले बर्तन के पास किया।
कान्हा चिल्लाए—
“चंदू! नहीं!”
लेकिन देर हो चुकी थी।
चंदू ने बर्तन को हल्का सा धक्का दिया।
बर्तन हिल गया और थोड़ा आटा नीचे गिर गया।
यशोदा ने जल्दी से बर्तन पकड़ लिया।
“कान्हा!”
कान्हा ने हाथ जोड़ लिए।
“मैया, मैंने इसे रोका था।”
यशोदा बोलीं—
“लेकिन ये अंदर आया कैसे?”
कान्हा चुप।
तभी चंदू ने अपनी पूँछ हिलाई और पीछे हटते हुए आटे पर पैर रख दिया।
उसके पैरों के निशान पूरे फर्श पर बन गए।
कान्हा उन्हें देखकर हँस पड़े।
यशोदा ने उन्हें देखा।
“तुम्हें हँसी आ रही है?”
कान्हा ने हँसी रोकने की कोशिश की।
“थोड़ी।”
यशोदा भी आखिर मुस्कुरा दीं।
“अब इसे बाहर ले जाओ।”
कान्हा चंदू को बाहर ले गए।
लेकिन चंदू की शरारत अभी खत्म नहीं हुई थी।
आँगन में रखी एक टोकरी में सूखी घास थी।
चंदू उसमें मुँह डालकर घास खींचने लगा।
कुछ ही पल में पूरी घास बाहर बिखर गई।
एक दोस्त बोला—
“कान्हा, ये तो बिल्कुल तुम्हारी तरह है।”
कान्हा बोले—
“मेरी तरह क्यों?”
“जहाँ देखो वहाँ शरारत।”
कान्हा ने चंदू को देखा।
फिर बोले—
“लेकिन इसकी शरारतें बहुत मजेदार हैं।”
तभी चंदू ने फिर दौड़ लगा दी।
इस बार वह सीधे आँगन में रखे पानी के बड़े बर्तन की तरफ गया।
कान्हा उसके पीछे भागे।
“चंदू! वहाँ मत जाना!”
चंदू ने बर्तन को सूँघा।
फिर पीछे हट गया।
कान्हा ने राहत की साँस ली।
“चलो, इस बार बच गए।”
लेकिन अचानक चंदू ने अपना सिर बर्तन से टकरा दिया।
बर्तन थोड़ा हिला और पानी बाहर छलक गया।
कान्हा के पैर भीग गए।
दोस्त जोर-जोर से हँसने लगे।
कान्हा ने कहा—
“अब तो तुमने हद कर दी!”
चंदू मासूम बनकर उन्हें देखने लगा।
कान्हा उसका चेहरा देखकर खुद भी हँस पड़े।
दोपहर में नंद बाबा घर लौटे।
उन्होंने आँगन में बिखरी घास, पानी और आटे के निशान देखे।
उन्होंने पूछा—
“आज यहाँ क्या हुआ?”
यशोदा ने कहा—
“आपके नए बछड़े ने पूरा घर उलट-पुलट कर दिया।”
नंद बाबा ने चंदू को देखा।
“इतना शरारती?”
कान्हा तुरंत बोले—
“बाबा, ये बहुत अच्छा है। बस इसे सब चीजों को छूने की आदत है।”
नंद बाबा हँस पड़े।
“तुम्हें तो अच्छा दोस्त मिल गया।”
कान्हा ने कहा—
“हाँ।”
नंद बाबा ने चंदू के सिर पर हाथ फेरा।
“लेकिन इसे धीरे-धीरे समझाना होगा कि क्या करना है और क्या नहीं।”
कान्हा ने सिर हिलाया।
“मैं सिखाऊँगा।”
शाम को कान्हा ने एक खेल बनाया।
उन्होंने चंदू के सामने तीन चीजें रखीं—घास, लकड़ी और एक फूल।
फिर बोले—
“चंदू, घास खानी है।”
चंदू ने घास खा ली।
कान्हा खुश हुए।
“बहुत अच्छे!”
फिर उन्होंने लकड़ी की तरफ इशारा किया।
“इसे नहीं खाना।”
चंदू ने लकड़ी सूँघी और आगे बढ़ गया।
कान्हा ने ताली बजाई।
“शाबाश!”
दोस्तों ने कहा—
“देखो, कान्हा इसे पढ़ा रहे हैं।”
कान्हा बोले—
“हाँ। इसे भी तो सीखना है।”
कुछ देर बाद चंदू फूल की तरफ बढ़ा।
कान्हा ने उसे रोक दिया।
“ये नहीं। ये खेलने के लिए है।”
चंदू पीछे हट गया।
कान्हा ने खुशी से उसकी गर्दन सहलाई।
“तुम सीख रहे हो!”
यशोदा दूर से यह सब देख रही थीं।
उन्होंने नंद बाबा से कहा—
“देखिए, हमारा कान्हा खुद कितना शरारती है, लेकिन चंदू को समझा रहा है।”
नंद बाबा मुस्कुराए।
“शायद दूसरों को समझाते-समझाते खुद भी बहुत कुछ सीख रहा है।”
रात को कान्हा चंदू के पास बैठे।
उन्होंने उसके गले की छोटी सी घंटी को हाथ से छुआ।
टन…
छोटू भी पास खड़ा था।
उसकी घंटी भी बजने लगी।
टन… टन…
कान्हा हँसते हुए बोले—
“अब तो मेरे पास दो घंटियों वाले दोस्त हैं।”
एक दोस्त बोला—
“और दोनों तुमसे कम शरारती हैं।”
कान्हा ने उसे देखा।
“तुम मुझे शरारती कह रहे हो?”
दोस्त भागने लगा।
कान्हा उसके पीछे दौड़ पड़े।
आँगन में फिर बच्चों की हँसी गूँजने लगी।
कुछ देर बाद यशोदा ने सबको घर बुलाया।
कान्हा जाने से पहले चंदू के पास गए।
“कल फिर मिलेंगे।”
चंदू ने अपनी छोटी घंटी बजाई।
कान्हा मुस्कुराए।
“तुमने हाँ कह दिया!”
उस रात कान्हा जल्दी सो गए।
लेकिन अगले दिन एक नई परेशानी उनका इंतजार कर रही थी।
- सुबह जब वे गायों के पास पहुँचे, तो उन्होंने देखा कि छोटू और चंदू दोनों गायों के झुंड से गायब थे।
कान्हा की मुस्कान तुरंत गायब हो गई।
उन्होंने चारों तरफ देखा।
“छोटू?”
कोई जवाब नहीं।
“चंदू?”
दूर कहीं से एक बहुत हल्की घंटी सुनाई दी—
टन…
कान्हा ने अपने दोस्तों की तरफ देखा।
“दोनों शायद जंगल की तरफ चले गए हैं।”
और बिना देर किए कान्हा अपने दोस्तों के साथ उनकी तलाश में निकल पड़े।

मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं
अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं
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