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कान्हा और बिछड़ा बछड़ा

पढ़ने का समय : 7 मिनट

 नन्हे कान्हा की बाल लीलाएँ

 कान्हा और बिछड़ा हुआ बछड़ा

 

अगली सुबह कान्हा सूरज निकलने से पहले ही उठ गए। आज उनके लिए खास दिन था, क्योंकि नंद बाबा ने उन्हें पहली बार गायों के साथ खुले मैदान तक चलने की अनुमति दी थी।

 

कान्हा उठते ही यशोदा मैया के पास पहुँचे।

 

“मैया! उठो ना!”

 

यशोदा ने आँखें खोलकर पूछा—

 

“क्या हुआ कान्हा?”

 

“आज मैं बाबा के साथ गायों को चराने जाऊँगा।”

 

यशोदा मुस्कुराईं।

 

“मुझे याद है। लेकिन इतनी सुबह से इतनी खुशी?”

 

कान्हा बोले—

 

“मैं गायों की घंटियाँ सुनूँगा, उनके साथ चलूँगा और उनकी देखभाल भी करूँगा।”

 

यशोदा ने उनके बाल सँवारे और कहा—

 

“ठीक है, लेकिन बाबा की बात मानना। बहुत दूर मत जाना।”

 

“पक्का!”

 

कुछ देर बाद नंद बाबा गायों को लेकर घर से निकले। कान्हा उनके साथ थे। उनके पीछे उनके कई दोस्त भी चल पड़े।

 

रास्ते भर गायों की घंटियाँ बजती रहीं।

 

टन… टन… टन…

 

कान्हा कभी किसी गाय के पास जाते, कभी किसी बछड़े के सिर पर हाथ फेरते।

 

नंद बाबा उन्हें देखकर मुस्कुरा रहे थे।

 

एक दोस्त ने कहा—

 

“कान्हा, आज तो तुम बिल्कुल बड़े ग्वाले जैसे लग रहे हो।”

 

कान्हा ने गर्व से कहा—

 

“मैं बड़ा होकर भी गायों की देखभाल करूँगा।”

 

दूसरा दोस्त बोला—

 

“और माखन?”

 

कान्हा हँस पड़े।

 

“माखन भी खाऊँगा।”

 

सब बच्चे हँसने लगे।

 

कुछ देर बाद वे एक बड़े हरे मैदान में पहुँचे। वहाँ घास बहुत अच्छी थी। गायें अलग-अलग जगह फैलकर घास खाने लगीं।

 

नंद बाबा ने बच्चों से कहा—

 

“तुम सब यहीं रहना। गायों को बहुत दूर मत जाने देना।”

 

सभी ने कहा—

 

“ठीक है।”

 

कान्हा एक पेड़ के नीचे बैठकर बांसुरी निकालने लगे।

 

उन्होंने धीरे-धीरे धुन बजानी शुरू की।

 

गायों की घंटियाँ और बांसुरी की आवाज मिलकर बहुत प्यारी लग रही थी।

 

कुछ देर बाद कान्हा ने बांसुरी रोक दी।

 

उन्हें लगा जैसे कोई आवाज कर रहा है।

 

“माँ… माँ…”

 

कान्हा ने ध्यान से सुना।

 

आवाज बहुत हल्की थी।

 

उन्होंने अपने दोस्तों से पूछा—

 

“तुमने कुछ सुना?”

 

एक दोस्त बोला—

 

“नहीं।”

 

कान्हा फिर चुप हो गए।

 

कुछ पल बाद वही आवाज फिर सुनाई दी।

 

“माँ…”

 

कान्हा तुरंत खड़े हो गए।

 

“कोई बछड़ा अपनी माँ को बुला रहा है।”

 

वह आवाज की दिशा में चल पड़े।

 

दो दोस्त उनके साथ हो लिए।

 

थोड़ी दूर झाड़ियों के पीछे उन्हें एक छोटा सा बछड़ा दिखाई दिया।

 

वह अकेला खड़ा था और बार-बार अपनी माँ की तरफ देखने की कोशिश कर रहा था।

 

कान्हा उसके पास बैठ गए।

 

“तुम यहाँ अकेले कैसे रह गए?”

 

बछड़ा धीरे से आवाज करने लगा।

 

कान्हा ने उसके सिर पर हाथ फेरा।

 

“डरो मत। हम तुम्हारी माँ को ढूँढ़ेंगे।”

 

एक दोस्त ने कहा—

 

“शायद इसकी माँ दूसरी तरफ चली गई होगी।”

 

कान्हा ने मैदान की तरफ देखा।

 

बहुत सारी गायें थीं।

 

“हमें पहचानना होगा कि इसकी माँ कौन है।”

 

उन्होंने बछड़े को ध्यान से देखा।

 

उसके गले में कोई घंटी नहीं थी।

 

कान्हा बोले—

 

“चलो, इसे धीरे-धीरे गायों के पास ले चलते हैं।”

 

वे बछड़े को लेकर मैदान की ओर लौटे।

 

जैसे ही बछड़ा गायों के पास पहुँचा, वह एक दिशा में तेजी से बढ़ने लगा।

 

कान्हा ने कहा—

 

“रुको! इसे पता है इसकी माँ कहाँ है।”

 

बछड़ा एक सफेद गाय के पास पहुँचा।

 

लेकिन गाय ने उसे देखकर कोई खास प्रतिक्रिया नहीं दी।

 

बछड़ा फिर दूसरी तरफ गया।

 

कान्हा उसके पीछे चलते रहे।

 

अचानक वह एक भूरे रंग की गाय के पास जाकर रुक गया।

 

गाय ने जैसे ही बछड़े को देखा, वह उसकी तरफ बढ़ी।

 

बछड़ा खुशी से अपनी माँ के पास चला गया।

 

कान्हा के चेहरे पर बड़ी सी मुस्कान आ गई।

 

“मिल गई!”

 

दोस्त खुशी से बोले—

 

“सच में इसकी माँ मिल गई!”

 

कान्हा ने गाय के सिर पर हाथ फेरा।

 

“तुम इसे छोड़कर इतनी दूर क्यों चली गई थीं?”

 

नंद बाबा भी वहाँ पहुँच गए थे।

 

उन्होंने पूरा दृश्य देखा।

 

उन्होंने कान्हा से पूछा—

 

“तुम्हें कैसे पता चला कि ये अपनी माँ से बिछड़ गया है?”

 

कान्हा बोले—

 

“इसकी आवाज सुनाई दी थी। ये अपनी माँ को बुला रहा था।”

 

नंद बाबा ने प्यार से कहा—

 

“तुमने बहुत अच्छा किया।”

 

कान्हा ने पूछा—

 

“बाबा, अगर कोई छोटा अपने घरवालों से बिछड़ जाए तो उसे ढूँढ़ना चाहिए ना?”

 

नंद बाबा बोले—

 

“बिल्कुल।”

 

कान्हा कुछ देर उस बछड़े को देखते रहे।

 

फिर उन्होंने कहा—

 

“अब इसे अकेला मत छोड़ना।”

 

नंद बाबा मुस्कुराए।

 

“आज से तुम इसकी भी देखभाल करना।”

 

कान्हा की आँखें चमक उठीं।

 

“सच?”

 

“हाँ।”

 

कान्हा ने बछड़े को गले लगाने की कोशिश की।

 

बछड़ा थोड़ा पीछे हट गया।

 

सभी बच्चे हँस पड़े।

 

कान्हा बोले—

 

“अरे, मैं तुम्हारा दोस्त हूँ।”

 

कुछ देर बाद बछड़ा खुद कान्हा के पास आ गया।

 

कान्हा ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा—

 

“अब डरना नहीं।”

 

दोपहर को बच्चे पेड़ के नीचे बैठकर खाना खाने लगे।

 

कान्हा ने अपनी पोटली खोली।

 

उसमें यशोदा मैया ने रोटी और थोड़ा मक्खन रखा था।

 

एक दोस्त बोला—

 

“मुझे भी थोड़ा दो।”

 

कान्हा ने रोटी का टुकड़ा उसे दे दिया।

 

फिर दूसरे दोस्त को भी दिया।

 

थोड़ी देर में कान्हा के पास बहुत कम खाना बचा।

 

एक दोस्त ने पूछा—

 

“तुम खुद क्या खाओगे?”

 

कान्हा बोले—

 

“मेरे पास अभी भी है।”

 

उन्होंने आखिरी टुकड़ा उठाया।

 

तभी वही छोटा बछड़ा उनके पास आ गया।

 

वह कान्हा को देखने लगा।

 

कान्हा हँस पड़े।

 

“तुम्हें भी चाहिए?”

 

उन्होंने रोटी का टुकड़ा तोड़कर उसे नहीं दिया, बल्कि पास की घास की ओर इशारा किया।

 

“तुम ये खाओ। ये तुम्हारे लिए है।”

 

बछड़ा घास खाने लगा।

 

कान्हा उसे देखकर मुस्कुराते रहे।

 

शाम होने लगी।

 

नंद बाबा ने गायों को वापस इकट्ठा करना शुरू किया।

 

सभी बच्चे अपने-अपने दोस्तों के साथ चल पड़े।

 

लेकिन अचानक कान्हा ने पीछे देखा।

 

वही छोटा बछड़ा फिर से पीछे रह गया था।

 

कान्हा दौड़कर उसके पास गए।

 

“चलो, घर चलते हैं।”

 

बछड़ा धीरे-धीरे उनके पीछे चलने लगा।

 

रास्ते में उसकी घंटी नहीं बज रही थी।

 

कान्हा ने कहा—

 

“बाबा, इसके लिए भी घंटी लगवा दो।”

 

नंद बाबा ने पूछा—

 

“क्यों?”

 

“ताकि अगर ये फिर पीछे रह जाए तो हमें इसकी आवाज सुनाई दे।”

 

नंद बाबा ने मुस्कुराकर कहा—

 

“ठीक है। कल इसके लिए एक छोटी घंटी ले आएँगे।”

 

कान्हा खुश हो गए।

 

“फिर मैं इसकी घंटी सबसे पहले सुनूँगा।”

 

शाम को नंद भवन पहुँचते ही यशोदा मैया बाहर आईं।

 

उन्होंने कान्हा को देखा।

 

“आज दिन कैसा रहा?”

 

कान्हा बोले—

 

“बहुत अच्छा!”

 

“क्या किया?”

 

कान्हा ने बछड़े की पूरी कहानी सुनाई।

 

यशोदा ने ध्यान से सुना।

 

फिर उन्होंने कान्हा को अपने पास बुलाकर कहा—

 

“तुमने आज बहुत अच्छा काम किया।”

 

कान्हा बोले—

 

“मैया, वो बहुत डर गया था।”

 

यशोदा ने कहा—

 

“किसी को डर में अकेला नहीं छोड़ना चाहिए।”

 

कान्हा ने सिर हिलाया।

 

फिर अचानक बोले—

 

“मैया, कल उसके लिए घंटी आएगी।”

 

यशोदा मुस्कुराईं।

 

“तो अब तुम्हारा एक नया दोस्त भी बन गया।”

 

कान्हा खुशी से बोले—

 

“हाँ। इसका नाम भी रखेंगे।”

 

यशोदा ने पूछा—

 

“क्या नाम रखोगे?”

 

कान्हा कुछ देर सोचते रहे।

 

फिर बोले—

 

“छोटू!”

 

यशोदा हँस पड़ीं।

 

“इतना छोटा नाम?”

 

“हाँ। क्योंकि वो छोटा है।”

 

रात को कान्हा सोने गए तो उनकी बातें सिर्फ उसी बछड़े के बारे में थीं।

 

“मैया, कल मैं छोटू को घास खिलाऊँगा।”

 

“हाँ।”

 

“फिर उसकी घंटी बजाऊँगा।”

 

“हाँ।”

 

“फिर उसके साथ दौड़ूँगा।”

 

यशोदा ने मुस्कुराकर कहा—

 

“और फिर कोई शरारत करोगे?”

 

कान्हा ने तुरंत मासूम चेहरा बनाया।

 

“नहीं।”

 

यशोदा बोलीं—

 

“तुम्हारे इस ‘नहीं’ पर मुझे भरोसा नहीं।”

 

कान्हा हँस पड़े।

 

कुछ ही देर में उनकी आँखें बंद हो गईं।

 

लेकिन अगले दिन जब छोटू के गले में नई घंटी बाँधी गई, तो कान्हा ने देखा कि घंटी की आवाज बाकी सभी घंटियों से अलग थी।

 

कान्हा ने मुस्कुराकर कहा—

 

“अब मैं तुम्हें भीड़ में भी पहचान लूँगा।”

 

छोटू ने अपनी छोटी सी पूँछ हिलाई।

 

और शायद वह भी समझ गया था कि वृंदावन में उसे एक ऐसा दोस्त मिल गया है जो उसकी छोटी-सी आवाज भी सुन लेता है।

 

लेकिन अगले दिन कान्हा और छोटू के सामने एक नई मुसीबत आने वाली थी—वृंदावन की तेज बारिश में छोटू अचानक गायों के झुंड से अलग हो जाएगा।

 

और उसे ढूँढ़ने के लिए कान्हा अकेले नहीं, बल्कि अपने पूरे दोस्तों के साथ निकल पड़ेंगे।

 

 

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