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“तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 6

पढ़ने का समय : 10 मिनट

तेरी मेरी दास्तान

 

एपिसोड 6 — वो राज जो दिल तोड़ सकता था

 

सुबह की पहली किरण खिड़की से होते हुए कमरे में आई, लेकिन आरोही की आंखें रातभर की बेचैनी के कारण अब भी भारी थीं।

 

वह बिस्तर पर बैठी अपनी डायरी के उसी पन्ने को देख रही थी, जिस पर उसने आरव के बारे में लिखा था “कुछ लोग जिंदगी में अचानक आते हैं… फिर पता ही नहीं चलता कि कब उनकी मौजूदगी आदत बन गई।”

 

उसने उंगलियों से उन शब्दों को हल्के से छुआ।

 

फिर उसकी आंखों के सामने मां का चेहरा आ गया।

 

“आरव के परिवार की वजह से तुम्हारे पापा की मौत हुई थी।”

 

आरोही ने आंखें बंद कर लीं।

 

दिल आरव पर भरोसा करना चाहता था।

 

लेकिन दिमाग बार-बार सवाल कर रहा था अगर मां सच कह रही हैं तो?

 

तभी फोन बजा।

 

स्क्रीन पर आरव का नाम देखकर उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई।

 

उसने कॉल उठा लिया।

 

“हैलो।”

 

दूसरी तरफ से आरव की आवाज आई “गुड मॉर्निंग।”

 

आरोही ने धीमे से कहा,

 

“गुड मॉर्निंग।”

 

“सोई नहीं थी?”

 

आरोही चौंक गई।

 

“तुम्हें कैसे पता?”

 

“तुम्हारी आवाज बता रही है।”

 

आरोही हल्का-सा मुस्कुरा दी।

 

“तुम्हें हर बात कैसे पता चल जाती है?”

 

“तुम्हारी बातें सुनते-सुनते आदत हो गई है।”

 

आरोही कुछ पल चुप रही।

 

फिर बोली,

 

“आरव…”

 

“हम्म?”

 

“आज मिलोगे?”

 

“जहां कहो।”

 

“उसी झील के पास।”

 

“छह बजे?”

 

“हां।”

 

“पक्का?”

 

आरोही मुस्कुराई।

 

“पक्का।”

 

फोन कट गया।

 

आरोही ने मोबाइल सीने से लगा लिया।

 

पता नहीं क्यों…

 

आरव से बात करने के बाद उसके दिल का डर थोड़ा कम हो जाता था।

 

दूसरी तरफ आरव अपने ऑफिस में बैठा था।

 

कबीर उसके सामने एक फाइल लेकर खड़ा था।

 

“हमें विक्रम सूद के बारे में कुछ और पता चला है।”

 

आरव ने फाइल ली।

 

“क्या?”

 

“पिछले दस सालों में उसने कई बार अपनी कंपनी का नाम बदला है।”

 

“क्यों?”

 

“पैसे को इधर-उधर करने के लिए।”

 

आरव ने कागज पलटा।

 

अचानक उसकी नजर एक तारीख पर रुक गई।

 

“ये वही तारीख है।”

 

कबीर ने पूछा,

 

“कौन सी?”

 

“जिस दिन विनय मेहरा का एक्सीडेंट हुआ था।”

 

कबीर ने सिर हिलाया।

 

“हां।”

 

आरव की आंखों में गुस्सा भर आया।

 

“इसका मतलब विक्रम वहां था?”

 

“सीधे तौर पर नहीं। लेकिन उसकी कार उसी इलाके में देखी गई थी।”

 

आरव कुर्सी से उठ गया।

 

“मुझे उस एक्सीडेंट की पूरी रिपोर्ट चाहिए।”

 

“मैंने मंगवा ली है।”

 

कबीर ने एक फाइल उसके सामने रख दी।

 

आरव ने फाइल खोली।

 

पहले पन्ने पर लिखा था “सड़क दुर्घटना — चालक की मौके पर मौत।”

 

लेकिन नीचे एक लाइन लाल पेन से काटी गई थी।

 

आरव ने पूछा,

 

“ये किसने काटी?”

 

कबीर ने कहा,

 

“पुरानी फाइल है। शायद पुलिस विभाग ने।”

 

आरव ने उस लाइन को ध्यान से देखा।

 

“यहां कुछ लिखा था।”

 

“हां।”

 

“क्या?”

 

“हम पता कर रहे हैं।”

 

आरव ने फाइल बंद कर दी।

 

“मुझे आज ही जवाब चाहिए।”

 

शाम के छह बजने वाले थे।

 

आरोही झील के किनारे पहुंच चुकी थी।

 

आज मौसम कुछ अलग था।

 

आसमान पर बादल थे।

 

हवा में बारिश की खुशबू थी।

 

वह जेट्टी के पास खड़ी आरव का इंतजार कर रही थी।

 

कुछ ही देर में दूर से आरव दिखाई दिया।

 

आरोही के चेहरे पर मुस्कान आ गई।

 

आरव उसके पास पहुंचा।

 

“बहुत इंतजार करवाया?”

 

आरोही ने कहा,

 

“बस पांच मिनट।”

 

“मुझे लगा तुम नाराज हो जाओगी।”

 

“क्यों?”

 

“क्योंकि तुमसे मिलने के लिए मुझे एक जरूरी काम छोड़ना पड़ा।”

 

आरोही ने मुस्कुराकर पूछा,

 

“कौन सा काम?”

 

आरव ने कहा,

 

“तुमसे ज्यादा जरूरी कुछ नहीं।”

 

आरोही ने नजरें झुका लीं।

 

“तुम बहुत बातें बनाने लगे हो।”

 

“तुम्हारे साथ रहकर सीख रहा हूं।”

 

दोनों हंस पड़े।

 

कुछ देर वे झील के किनारे चलते रहे।

 

फिर आरोही ने धीरे से पूछा,

 

“आरव।”

 

“हम्म?”

 

“अगर तुम्हें पता चले कि तुम्हारे परिवार ने कोई बहुत बड़ी गलती की है… तो क्या तुम उन्हें माफ कर पाओगे?”

 

आरव ने उसकी तरफ देखा।

 

“गलती कितनी बड़ी है, उस पर निर्भर करता है।”

 

“अगर किसी की जिंदगी बर्बाद कर दी हो?”

 

आरव कुछ पल चुप रहा।

 

“नहीं।”

 

आरोही ने पूछा,

 

“और अगर वो गलती जानबूझकर न की गई हो?”

 

“तो शायद।”

 

“और अगर तुम्हें उस इंसान से प्यार हो जाए, जिसके परिवार के साथ तुम्हारे परिवार ने गलत किया हो?”

 

आरव की चाल अचानक धीमी हो गई।

 

उसने आरोही को देखा।

 

“तुम ये सवाल क्यों पूछ रही हो?”

 

आरोही ने नजरें झुका लीं।

 

“बस ऐसे ही।”

 

आरव उसके सामने आकर खड़ा हो गया।

 

“आरोही।”

 

“हम्म?”

 

“तुम्हारे मन में कुछ है।”

 

आरोही चुप रही।

 

आरव ने धीरे से पूछा,

 

“क्या तुम मुझसे डरने लगी हो?”

 

आरोही की आंखों में आंसू आ गए।

 

“नहीं।”

 

“तो फिर?”

 

“मुझे डर है कि कहीं तुम्हें खो न दूं।”

 

आरव कुछ पल उसे देखता रहा।

 

फिर उसने उसका हाथ पकड़ लिया।

 

“तुम मुझे इतनी आसानी से नहीं खो सकती।”

 

आरोही ने उसकी तरफ देखा।

 

“इतना भरोसा?”

 

“तुम पर।”

 

आरोही की आंखों से एक आंसू गिर पड़ा।

 

आरव ने उसे धीरे से पोंछ दिया।

 

“रो क्यों रही हो?”

 

“पता नहीं।”

 

“झूठ।”

 

“क्या?”

 

“तुम्हारी आंखें बता रही हैं कि तुम्हें कुछ परेशान कर रहा है।”

 

आरोही ने उसका हाथ पकड़ लिया।

 

“अगर मैं तुमसे एक बात छुपा रही हूं तो?”

 

आरव ने कहा,

 

“तो जब मन करे बता देना।”

 

“तुम नाराज नहीं होगे?”

 

“नहीं।”

 

“क्यों?”

 

आरव ने मुस्कुराकर कहा,

 

“क्योंकि तुम्हारे हर राज से ज्यादा जरूरी तुम हो।”

 

आरोही ने उसकी आंखों में देखा।

 

और उसी पल उसे महसूस हुआ…

 

वह इस इंसान से सच में प्यार करने लगी थी।

 

अचानक बारिश शुरू हो गई।

 

पहले कुछ बूंदें गिरीं।

 

फिर बारिश तेज हो गई।

 

आरोही हंसते हुए भागने लगी।

 

आरव भी उसके पीछे दौड़ा।

 

दोनों एक पेड़ के नीचे जाकर खड़े हो गए।

 

आरोही के बाल भीग चुके थे।

 

आरव ने उसकी तरफ देखा।

 

“तुम हमेशा बारिश में ऐसे ही भागती हो?”

 

“हां।”

 

“क्यों?”

 

“क्योंकि बारिश में रोना आसान होता है।”

 

आरव की मुस्कान गायब हो गई।

 

“क्या मतलब?”

 

आरोही ने धीमे से कहा,

 

“बारिश आंसुओं को छुपा देती है।”

 

आरव कुछ बोल नहीं पाया।

 

फिर उसने अपना हाथ आगे बढ़ाया।

 

“अब रोना हो तो मेरे सामने रोना।”

 

आरोही ने उसकी तरफ देखा।

 

“क्यों?”

 

“क्योंकि मैं तुम्हारे आंसू बारिश के भरोसे नहीं छोड़ सकता।”

 

आरोही की आंखें भर आईं।

 

वह धीरे से उसके करीब आ गई।

 

कुछ पल के लिए दोनों के बीच सिर्फ बारिश की आवाज थी।

 

आरव ने धीरे से कहा,

 

“आरोही…”

 

“हम्म?”

 

“मुझे लगता है…”

 

वह रुक गया।

 

“क्या?”

 

आरव कुछ कह पाता, उससे पहले उसका फोन बज उठा।

 

कबीर का कॉल था।

 

आरव ने फोन उठाया।

 

“बोल।”

 

दूसरी तरफ से कबीर की घबराई आवाज आई “आरव, हमें विनय मेहरा की मौत के बारे में एक बड़ा सबूत मिला है।”

 

आरव का चेहरा बदल गया।

 

“क्या?”

 

“उस रात की एक CCTV रिकॉर्डिंग मिली है।”

 

“कहां?”

 

“एक पुराने पेट्रोल पंप से।”

 

आरव ने तुरंत पूछा,

 

“क्या दिख रहा है?”

 

कबीर कुछ सेकंड चुप रहा।

 

फिर बोला “एक काली कार।”

 

आरव ने पूछा,

 

“किसकी?”

 

कबीर की आवाज भारी हो गई।

 

“तुम्हारे पिता की।”

 

आरव के चेहरे का रंग उड़ गया।

 

उसने कुछ पल कुछ नहीं कहा।

 

“कबीर… पक्का?”

 

“हां।”

 

आरव ने फोन नीचे कर दिया।

 

आरोही ने उसकी तरफ देखा।

 

“क्या हुआ?”

 

आरव ने उसकी आंखों में देखा।

 

उसके पास कोई जवाब नहीं था।

 

लेकिन अब उसके पास एक सवाल था क्या सच में उसके पिता का आरोही के पिता की मौत से कोई संबंध था?

 

उसी समय शहर के दूसरे हिस्से में एक पुराना कमरा।

 

एक आदमी लैपटॉप के सामने बैठा था।

 

स्क्रीन पर वही CCTV फुटेज चल रही थी।

 

उसने वीडियो रोक दिया।

 

फ्रेम में राजवीर सिंह की कार दिखाई दे रही थी।

 

वह मुस्कुराया।

 

“अब खेल शुरू होगा।”

 

उसने फोन उठाया।

 

“वो सबूत आरव तक पहुंच गया है।”

 

दूसरी तरफ से आवाज आई—

 

“बहुत अच्छा।”

 

“लेकिन अगर उसने पूरी रिकॉर्डिंग देख ली तो?”

 

“उसे पूरी रिकॉर्डिंग कभी नहीं मिलेगी।”

 

आदमी हंसा।

 

“और आरोही?”

 

“उसका क्या?”

 

“उसे भी पता चल जाएगा।”

 

कुछ पल खामोशी रही।

 

फिर दूसरी तरफ से आवाज आई “नहीं। अभी नहीं।”

 

“क्यों?”

 

“क्योंकि पहले दोनों को एक-दूसरे पर शक करना होगा।”

 

कॉल कट हो गई।

 

बारिश अब और तेज हो चुकी थी।

 

आरोही ने आरव की आंखों में देखा।

 

“तुम मुझसे कुछ छुपा रहे हो।”

 

आरव ने धीमे से कहा,

 

“हां।”

 

“क्या?”

 

“अभी नहीं बता सकता।”

 

आरोही की आंखें नम हो गईं।

 

“फिर से?”

 

“आरोही, मुझ पर भरोसा करो।”

 

“मैं करती हूं।”

 

“तो?”

 

“लेकिन डरती भी हूं।”

 

आरव उसके करीब आया।

 

“मुझसे?”

 

“नहीं।”

 

“फिर?”

 

आरोही ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा,

 

“उस सच से… जो शायद हम दोनों को एक-दूसरे से दूर कर दे।”

 

आरव का दिल बैठ गया।

 

उसने धीरे से कहा,

 

“अगर सच हमें अलग करने आएगा…”

 

आरोही ने उसकी तरफ देखा।

 

“तो?”

 

आरव ने उसका हाथ कसकर पकड़ लिया।

 

“तो मैं सच से लड़ूंगा।”

 

आरोही की आंखों में आंसू आ गए।

 

वह कुछ बोलती, उससे पहले आरव ने उसके माथे पर हल्के से हाथ रखा।

 

“बस एक बात याद रखना।”

 

“क्या?”

 

“जो कुछ भी हो… मैं तुम्हें छोड़कर नहीं जाऊंगा।”

 

आरोही ने आंखें बंद कर लीं।

 

लेकिन उसी पल…

 

दूर सड़क पर एक काली कार खड़ी थी।

 

कार के अंदर बैठा इंसान उन्हें देख रहा था।

 

उसके हाथ में आरोही के पिता की पुरानी तस्वीर थी।

 

और तस्वीर के पीछे लिखा था “जब बेटी को सच्चाई पता चलेगी, तब पिता का अधूरा बदला पूरा होगा।”

 

रात को घर लौटकर आरोही ने देखा कि उसकी मां सोई नहीं थीं।

 

वह उसी लकड़ी के डिब्बे को सामने रखकर बैठी थीं।

 

आरोही उनके पास गई।

 

“मां?”

 

मां ने चौंककर डिब्बा बंद कर दिया।

 

“तुम आ गई?”

 

“ये क्या है?”

 

“कुछ नहीं।”

 

“मां, मैंने देख लिया।”

 

मां ने कुछ नहीं कहा।

 

आरोही ने डिब्बा उठाया।

 

“इसमें क्या है?”

 

मां की आंखों में आंसू आ गए।

 

“तुम्हारे पापा की आखिरी निशानी।”

 

आरोही ने डिब्बा खोल दिया।

 

अंदर पुराने कागज, एक चाबी और एक लिफाफा था।

 

उसने लिफाफा उठाया।

 

उस पर लिखा था “मेरी बेटी आरोही के लिए।”

 

आरोही की सांस अटक गई।

 

“पापा ने मेरे लिए लिखा था?”

 

मां ने सिर हिलाया।

 

“हां।”

 

“आपने मुझे पहले क्यों नहीं दिया?”

 

“क्योंकि तुम्हारे पापा ने कहा था… जब तक तुम सच जानने के लायक न हो जाओ, इसे मत खोलना।”

 

आरोही की उंगलियां कांप रही थीं।

 

उसने लिफाफा खोलने के लिए हाथ बढ़ाया।

 

लेकिन जैसे ही उसने उसे खोला…

 

अंदर सिर्फ एक पन्ना था।

 

पहली लाइन पढ़ते ही उसकी आंखें फैल गईं “आरोही, अगर तुम ये खत पढ़ रही हो, तो समझ लेना कि तुम्हारे पिता की मौत कोई हादसा नहीं थी…”

 

आरोही के हाथ से खत लगभग छूट गया।

 

उसने कांपती आवाज में अगली लाइन पढ़ी “और जिस परिवार से तुम्हें सबसे ज्यादा नफरत होगी… उसी परिवार में एक ऐसा इंसान है, जिसे तुम्हें हर हाल में बचाना होगा।”

 

आरोही की आंखें फैल गईं।

 

उसके दिल में सिर्फ एक नाम आया आरव।

 

लेकिन क्यों?

 

उसके पिता ने आरव को बचाने की बात क्यों लिखी थी?

 

और आखिर ऐसा कौन-सा सच था…

 

जिसने दस साल पहले दो परिवारों को दुश्मन बना दिया था?

 

जारी रहेगा…

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