Part- 21: “टूटते रिश्ते का दर्द”
आरव ठाकुर हाउस के गलियारे में तेज़ कदमों से चल रहा था। उसके दिल की धड़कन इतनी तेज़ थी कि लगता था छाती से बाहर निकल आएगी। वो कॉल… वो लिफाफा… वो शब्द – “प्रिया तेरी बहन है। असली में। डायरी का राज़ अधूरा था।” उसके दिमाग में बार-बार गूंज रहे थे। वो आदमी कौन था? वो चेहरा… वो आवाज… सब धुंधला था। लेकिन शब्द साफ थे, जैसे चाकू की धार। आरव का चेहरा सफेद पड़ गया था, हाथ कांप रहे थे। वो सीढ़ियां उतरते हुए खुद से बुदबुदाया, “ये नहीं हो सकता। झूठ है। सब झूठ। प्रिया… मेरी प्रिया… मेरी पत्नी। वो मेरी बहन नहीं हो सकती।”
लेकिन वो लेटर… वो फोटो… सब कुछ इतना असली लग रहा था। आरव कार की ओर बढ़ा। बाहर रात का सन्नाटा था, बर्फ हल्की-हल्की गिर रही थी, जैसे आसमान भी उसके दर्द पर रो रहा हो। वो कार में बैठा, इंजन स्टार्ट किया। दिमाग में तूफान था। “अगर ये सच है तो… हमारी शादी… हमारा प्यार… सब गलत। मैंने क्या कर दिया? प्रिया… वो निर्दोष है। वो नहीं जानती। मैं उसे कैसे बताऊं? कैसे सहूं?”
आरव ने कार तेज़ चलाई। सड़कें खाली थीं, शिमला की पहाड़ी रोड्स पर बर्फ की पतली परत थी, जो गाड़ी के टायरों से चिपक रही थी। वो स्पीड बढ़ाता गया – 60, 80, 100। हवा कान में सीटी बजा रही थी। उसके दिमाग में फ्लैशबैक्स आने लगे। बचपन की वो शामें, जब प्रिया छोटी सी थी। “भैया… मुझे गोद लो ना!” वो हंसती, दौड़ती। आरव उसे उठाता, घुमाता। “प्रिया, तू मेरी छोटी राजकुमारी है।” फिर वो रात – एक्सीडेंट की खबर। “प्रिया लापता है।” सालों का दर्द, इंतजार। फिर प्रिया की वापसी। “आरव… मैं तेरी बहन हूं?” नहीं, वो राज़ खुला – खून का रिश्ता नहीं। फिर प्यार… वो किस, वो स्पर्श, वो रातें। “प्रिया… तू मेरी है।” लेकिन अब? “अगर वो मेरी असली बहन है तो… मैंने क्या कर दिया? हमने क्या कर दिया?”
आरव की आंखें नम हो गईं। वो चीखा, “नहीं! ये झूठ है!” कार और तेज़। पहाड़ी मोड़ आ रहा था, लेकिन वो ब्रेक नहीं लगाया। दिमाग में सिर्फ एक सवाल – “क्या करूं? प्रिया से कहूं? या चुप रहूं? शादी हो गई। वो मेरी पत्नी है। लेकिन अगर सच है तो… गलत है। पाप है। मैं उसे दुख नहीं दे सकता। खुद को मार लूं? या भाग जाऊं?” वो रो रहा था। आंसू गालों पर बह रहे थे, कार की विंडस्क्रीन धुंधली हो रही थी। “प्रिया… सॉरी। मैं तुझे खुश रखना चाहता था। लेकिन अब…”
वहीं कमरे में प्रिया बिस्तर पर बैठी थी। लाल साड़ी अभी भी पहनी थी, मेहंदी की खुशबू कमरे में फैली हुई थी। वो इंतजार कर रही थी – आरव का। उसका दिल उछल रहा था। “आरव… जल्दी आओ ना। आज हमारी पहली रात है।” लेकिन समय गुजर रहा था। घड़ी की सुई आगे बढ़ रही थी। प्रिया का मन घबरा रहा था। “क्यों इतनी देर? वो कॉल… कौन था? आरव का चेहरा… कुछ गलत लग रहा था।” वो उठी, खिड़की के पास गई। बाहर बर्फ गिर रही थी। दिल में एक अजीब सी बेचैनी। “कुछ गलत होने वाला है। मुझे पता है। आरव… कहां हो तुम?”
प्रिया ने फोन उठाया। आरव को कॉल किया। रिंग जा रही थी, लेकिन कोई जवाब नहीं। “आरव… पिक करो ना।” बेचैनी बढ़ गई। वो कमरे में चक्कर लगाने लगी। मंगलसूत्र को छू रही थी। “आरव… तुम ठीक हो ना? वो कॉल… काम का था? लेकिन इतनी रात को कौन काम?” मन में बुरे ख्याल आने लगे। “कहीं कोई खतरा तो नहीं? विक्रम? या कोई और?” प्रिया की सांस तेज़ हो गई। वो दरवाजे की ओर गई। “आरव… जल्दी आओ। मुझे डर लग रहा है।”
आरव की कार अब पहाड़ी रोड पर थी। स्पीड 120। मोड़ आया। वो ब्रेक लगाने की कोशिश की, लेकिन दिमाग कहीं और था। “प्रिया… अगर सच है तो मैं उसे देख नहीं सकता। मैं खुद को सजा दूंगा।” कार स्लिप हुई। बर्फ की वजह से। वो स्टियरिंग संभालने की कोशिश की, लेकिन देर हो गई। कार सड़क से उतरी, पेड़ से टकराई। धमाका। कांच टूटा, कार पलटी। आरव का सिर स्टीयरिंग से टकराया। खून बहने लगा। दर्द। अंधेरा। “प्रिया… सॉरी…”
प्रिया कमरे में थी। फोन फिर बजाया। कोई जवाब नहीं। दिल जोरों से धड़क रहा था। “आरव… कुछ गलत हुआ है। मुझे पता है।” वो बाहर निकली। रिया के कमरे में गई। “रिया… उठ। आरव… वो कहीं गया है।”
रिया उठी। “क्या? कहां?”
प्रिया रो रही थी। “पता नहीं। एक कॉल आया था। उसके बाद चला गया। फोन नहीं उठा रहा।”
रिया ने कहा, “चल, पापा को बताते हैं।”
लेकिन तभी फोन आया। हॉस्पिटल से। “आरव ठाकुर का एक्सीडेंट हो गया है। जल्दी आएं।”
प्रिया का दिल बैठ गया। “आरव…”

NSW अनुभवी लेखक -🥇

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