सुनसान रास्ते पर सोम्या
शाम ढल चुकी थी। आसमान पर बादल थे और सड़क के दोनों तरफ ऊंचे-ऊंचे पेड़ खड़े थे। दूर तक कोई घर दिखाई नहीं दे रहा था।
सोम्या अकेली उस सुनसान रास्ते पर चली जा रही थी।
उसकी उम्र करीब बीस साल थी। वह शहर से अपने गांव जा रही थी, लेकिन बस उसे मुख्य सड़क से कुछ दूर छोड़कर चली गई थी। गांव तक पहुंचने के लिए उसे करीब तीन किलोमीटर का रास्ता पैदल तय करना था।
सोम्या ने मोबाइल निकाला।
नेटवर्क नहीं था।
“बस थोड़ा रास्ता और है,” उसने खुद से कहा।
उसने बैग कंधे पर ठीक किया और आगे बढ़ने लगी।
कुछ दूर जाने के बाद उसे लगा कि कोई उसके पीछे चल रहा है।
उसने कदम धीमे कर दिए।
पीछे से भी कदमों की आवाज धीमी हो गई।
सोम्या ने अचानक पीछे मुड़कर देखा।
सड़क खाली थी।
सिर्फ हवा से पेड़ों की पत्तियां हिल रही थीं।
उसने खुद को समझाया—
“शायद मेरा भ्रम है।”
वह फिर आगे बढ़ गई।
कुछ कदम बाद वही आवाज फिर सुनाई दी।
टक…
टक…
टक…
जैसे कोई उसके पीछे धीरे-धीरे चल रहा हो।
सोम्या ने इस बार बिना पीछे देखे तेज कदम बढ़ा दिए।
आवाज भी तेज हो गई।
अब उसका दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।
तभी सड़क के किनारे उसे एक पुराना पत्थर दिखाई दिया। उस पर गांव का नाम लिखा था।
“बस दो किलोमीटर…”
सोम्या ने राहत की सांस ली।
लेकिन तभी सामने उसे एक बूढ़ा आदमी दिखाई दिया।
वह सड़क के किनारे खड़ा था।
सोम्या कुछ पल के लिए रुक गई।
बूढ़े ने पूछा—
“बेटी, कहां जा रही हो?”
“गांव जा रही हूं।”
“इस रास्ते से?”
“जी।”
बूढ़े ने चिंता से कहा—
“अंधेरा होने से पहले पहुंच जाओ।”
सोम्या ने पूछा—
“क्या इस रास्ते पर कोई परेशानी है?”
बूढ़े ने कुछ पल उसकी तरफ देखा।
फिर कहा—
“परेशानी रास्ते में नहीं है।”
सोम्या ने हैरानी से पूछा—
“फिर?”
बूढ़ा कुछ बोलता, उससे पहले दूर से किसी गाड़ी की रोशनी दिखाई दी।
बूढ़ा तुरंत सड़क से हट गया।
गाड़ी पास आई और बिना रुके आगे निकल गई।
सोम्या ने राहत की सांस ली।
जब उसने पीछे मुड़कर बूढ़े को देखना चाहा तो वहां कोई नहीं था।
वह चौंक गई।
“अभी तो यहीं थे…”
उसने आसपास देखा।
कोई दिखाई नहीं दिया।
अब सोम्या के मन में डर बैठ चुका था।
वह तेजी से आगे बढ़ने लगी।
कुछ दूर जाकर उसे एक छोटा-सा पुराना मंदिर दिखाई दिया।
मंदिर के बाहर एक लालटेन जल रही थी।
सोम्या अंदर चली गई।
वहां एक बुजुर्ग महिला बैठी थी।
महिला ने उसे देखते ही कहा—
“तुम देर से निकली हो।”
सोम्या ने हैरानी से पूछा—
“आपको कैसे पता?”
महिला मुस्कुराई।
“इस रास्ते से गुजरने वाले हर इंसान के चेहरे पर डर देखकर पता चल जाता है।”
सोम्या बैठ गई।
“मुझे लग रहा है कोई मेरा पीछा कर रहा है।”
महिला ने तुरंत बाहर देखा।
“किसी को देखा?”
“नहीं। बस कदमों की आवाज आती है।”
महिला कुछ देर चुप रही।
फिर बोली—
“यह रास्ता पुराना है। पहले यहां से गांव के लोग पैदल आया-जाया करते थे।”
“फिर अब इतना सुनसान क्यों है?”
“क्योंकि लोगों ने नया रास्ता बना लिया।”
सोम्या ने पूछा—
“और पुराना रास्ता?”
महिला ने कहा—
“पुराने रास्ते पर चलने वाले अक्सर अपने डर के साथ चलते हैं।”
सोम्या को बात समझ नहीं आई।
महिला ने उसे पानी दिया।
“कुछ देर यहीं बैठ जाओ। अंधेरा थोड़ा कम होने दो।”
सोम्या ने मोबाइल देखा।
अचानक उसमें नेटवर्क आ गया।
उसने तुरंत अपनी मां को फोन किया।
“मां, मैं रास्ते में हूं।”
उधर से मां की घबराई आवाज आई—
“तुम अभी तक नहीं पहुंची?”
“नहीं, बस थोड़ी देर में पहुंच जाऊंगी।”
मां ने कहा—
“सोम्या, तुम पुराने रास्ते से तो नहीं आ रही?”
सोम्या चौंक गई।
“हां। क्यों?”
मां कुछ पल चुप रहीं।
“तुम्हें पता नहीं इस रास्ते के बारे में?”
“क्या?”
“तुम्हारे नाना इसी रास्ते से गांव लौटते समय कई साल पहले गायब हो गए थे।”
सोम्या का चेहरा सफेद पड़ गया।
“क्या?”
“हमें बाद में उनका सामान मिला था। लेकिन उनका कुछ पता नहीं चला।”
सोम्या ने फोन काट दिया।
उसने मंदिर में बैठी महिला की तरफ देखा।
“आपको मेरे नाना के बारे में पता है?”
महिला ने शांत स्वर में पूछा—
“तुम्हारे नाना का नाम क्या था?”
सोम्या ने नाम बताया।
महिला की आंखें भर आईं।
“वह मेरे भाई थे।”
सोम्या जैसे पत्थर की हो गई।
“क्या?”
महिला ने कहा—
“उस रात भी बहुत अंधेरा था। तुम्हारे नाना इस रास्ते से लौट रहे थे। उन्हें किसी ने रास्ते में रोक लिया था।”
“कौन?”
“मैं नहीं जानती।”
सोम्या की आंखों में डर था।
“फिर उनकी मौत…?”
महिला ने सिर हिलाया।
“मैंने कभी नहीं कहा कि वह मर गए थे।”
सोम्या ने हैरानी से पूछा—
“तो क्या वह जिंदा थे?”
महिला ने मंदिर के पीछे की तरफ इशारा किया।
“उनका सामान वहां मिला था। लेकिन अगले दिन से वह गायब हो गए।”
अचानक मंदिर के बाहर फिर वही आवाज सुनाई दी।
टक…
टक…
टक…
सोम्या का दिल जोर से धड़कने लगा।
महिला ने कहा—
“डरो मत।”
आवाज मंदिर के पास आ रही थी।
फिर दरवाजे के सामने वही बूढ़ा आदमी दिखाई दिया जिसे सोम्या ने सड़क पर देखा था।
सोम्या डर गई।
बूढ़े ने धीरे से कहा—
“सोम्या?”
सोम्या पीछे हट गई।
“आप मेरा नाम कैसे जानते हैं?”
बूढ़े ने अपना चेहरा उठाया।
सोम्या की आंखें फैल गईं।
उसके हाथ में वही पुरानी अंगूठी थी, जो उसकी मां ने उसे अपने नाना की निशानी के रूप में दिखाई थी।
बूढ़ा बोला—
“तुम बिल्कुल अपनी मां जैसी दिखती हो।”
सोम्या की आंखों से आंसू निकल पड़े।
“नाना…?”
बूढ़े ने सिर हिला दिया।
वह उसका नाना ही था।
वह कई साल पहले इस रास्ते पर हुई एक घटना के बाद गांव से दूर चला गया था। उसने अपनी पहचान छिपाकर जिंदगी बिताई थी, क्योंकि उस समय कुछ गलत लोगों से उसकी दुश्मनी हो गई थी और उसे डर था कि उसकी वजह से परिवार खतरे में पड़ सकता है।
उसने कहा—
“मैं तुम्हें अपने पास बुला नहीं सकता था। लेकिन आज जब मैंने तुम्हें इस रास्ते पर अकेले देखा, तो मैं तुम्हें यहां से सुरक्षित ले जाना चाहता था।”
सोम्या रोते हुए उनके पास गई।
“आप इतने साल कहां थे?”
“बहुत दूर।”
“हमने आपको मरा हुआ समझ लिया था।”
बूढ़े की आंखें भी नम हो गईं।
“मुझे पता था।”
तभी मंदिर में बैठी महिला भी उठ खड़ी हुई।
वह दोनों को देखकर मुस्कुराई।
“अब मेरा काम पूरा हुआ।”
सोम्या ने उसकी तरफ देखा।
“आप कौन हैं?”
महिला ने कहा—
“जिसने इतने साल तुम्हारे नाना का इंतजार किया।”
वह सोम्या के नाना की बहन थी।
अगली सुबह सोम्या अपने नाना के साथ गांव पहुंची।
मां ने दरवाजा खोला।
सामने अपने पिता को देखकर वह कुछ पल तक बोल ही नहीं पाईं।
फिर वह दौड़कर उनसे लिपट गईं।
घर में सालों से जमा इंतजार उस दिन आंसुओं में बह निकला।
सोम्या चुपचाप यह सब देखती रही।
उसे समझ आ गया था कि कभी-कभी सुनसान रास्ते सिर्फ डर की तरफ नहीं ले जाते।
कुछ रास्ते हमें उन लोगों तक भी पहुंचा देते हैं, जिन्हें हम जिंदगी भर खोया हुआ समझते रहे।
उस दिन के बाद गांव वालों ने उस पुराने रास्ते को फिर से ठीक करवाया।
लेकिन सोम्या जब भी वहां से गुजरती, कुछ पल रुकती जरूर थी।
वह उस पुराने मंदिर की तरफ देखती और मुस्कुरा देती।
क्योंकि उसके लिए वह सुनसान रास्ता अब डर की जगह नहीं था।
वह रास्ता उसकी जिंदगी की सबसे बड़ी खोई हुई खुशी तक पहुंचने का रास्ता बन चुका था।

मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं
अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं
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