आरव कई मिनट तक उस काँच के टुकड़े को देखता रहा।
उसमें दिखाई देने वाला बच्चा लगातार उसकी तरफ देख रहा था।
“तुम कौन हो?”
बच्चे ने कोई जवाब नहीं दिया।
फिर आईने में एक और दृश्य दिखाई दिया।
एक स्कूल।
बच्चे हँस रहे थे।
एक गरीब बच्चा अकेला बैठा था।
बाकी बच्चे उसका मजाक उड़ा रहे थे।
शिक्षक सब देख रहा था।
लेकिन उसने आँखें फेर लीं।
दृश्य बदल गया।
एक सड़क।
एक घायल आदमी पड़ा था।
लोग वीडियो बना रहे थे।
लेकिन कोई मदद नहीं कर रहा था।
दृश्य फिर बदला।
एक घर।
एक लड़की रो रही थी।
परिवार वाले उसे चुप करा रहे थे।
“लोग क्या कहेंगे?”
दृश्य बदलता गया।
हर जगह एक ही चीज थी—
लोग गलत देख रहे थे, लेकिन चुप थे।
आरव की आँखों में आँसू आ गए।
अब उसे समझ आ चुका था कि आईना किसी भूत की कहानी नहीं था।
यह इंसान की उस आदत की कहानी था जिसमें वह दूसरों के पाप देखता है, लेकिन अपने हिस्से की चुप्पी भूल जाता है।
तभी मीरा उसके सामने दिखाई दी।
पहली बार वह पूरी तरह शांत लग रही थी।
आरव ने पूछा—
“क्या तुम्हें अब मुक्ति मिल गई?”
मीरा ने सिर हिलाया।
“मुझे तब तक मुक्ति नहीं मिल सकती थी जब तक मेरी कहानी झूठ के नीचे दबाई गई थी।”
“अब?”
“अब सच सामने है।”
आरव ने पूछा—
“तो आईना खत्म?”
मीरा मुस्कुराई।
“आईना कभी खत्म नहीं होता।”
“क्यों?”
“क्योंकि समाज बदलता रहता है… लेकिन इंसान के भीतर का लालच, डर और अहंकार भी साथ बदलते हैं।”
इतना कहकर वह गायब हो गई।
अगली सुबह आरव सूरजपुर के चौक पर पहुँचा।
वहाँ उसने वह बड़ा आईना लगवाया जो हवेली के टूटे हुए टुकड़ों से बचा था।
लोग उसके चारों तरफ जमा हो गए।
आरव ने कहा—
“यह आईना किसी को डराने के लिए नहीं है।”
लोग चुप रहे।
“यह हमें याद दिलाने के लिए है कि हम दूसरों को जिस नजर से देखते हैं, कभी उसी नजर से खुद को भी देखें।”
एक बूढ़ा आदमी आगे आया।
उसने कहा—
“अगर कोई अपना सच देखकर बदल जाए तो?”
आरव ने कहा—
“तो आईना सफल है।”
एक महिला ने पूछा—
“और अगर कोई सच देखकर भी न बदले?”
आरव ने जवाब दिया—
“तो आईना दोषी नहीं होगा।”
उसी समय हवा चली।
आईने की सतह पर हल्की धुंध छा गई।
लोग पीछे हटने लगे।
फिर आईने में पूरे कस्बे का चेहरा दिखाई दिया।
लेकिन इस बार कोई डरावना चेहरा नहीं था।
सिर्फ इंसान थे।
थके हुए।
डरे हुए।
गलतियाँ किए हुए।
लेकिन सच स्वीकार करने की कोशिश करते हुए।
हरिदास बाबा आगे आए।
उन्होंने आईने को देखा।
“अब यह शांत है।”
आरव ने पूछा—
“क्यों?”
बाबा बोले—
“क्योंकि अब लोग इससे डर नहीं रहे।”
“फिर?”
“अब वे खुद को देखने लगे हैं।”
सूरजपुर की कहानी वहीं खत्म हो गई।
लेकिन आरव की नहीं।
कुछ महीने बाद वह शहर चला गया।
उसने एक नई किताब लिखनी शुरू की।
नाम था—
“समाज का आईना।”
उसने किताब की शुरुआत एक लाइन से की—
“हम राक्षसों को जंगलों में ढूँढते रहे, जबकि वे हमारे डर, लालच और चुप्पी के पीछे छिपे थे।”
किताब के आखिरी पन्ने पर उसने लिखा—
“अगर कभी आपको लगे कि दुनिया बहुत बुरी हो गई है, तो दूसरों के चेहरे देखने से पहले अपना चेहरा देखिए।”
उस रात आरव अपने कमरे में अकेला बैठा था।
उसके सामने वही काँच का छोटा टुकड़ा रखा था।
उसने उसे उठाया।
इस बार उसमें सिर्फ उसका चेहरा था।
आरव मुस्कुराया।
“सब खत्म।”
तभी काँच पर एक छोटी-सी दरार पड़ी।
आरव की मुस्कान गायब हो गई।
दरार धीरे-धीरे फैलने लगी।
और उसके बीच एक शब्द उभरा—
“नहीं।”
कमरे की बत्ती अपने आप बुझ गई।
अंधेरे में किसी बच्चे की आवाज आई—
“आईना अभी जाग रहा है।”
आरव ने टॉर्च जलाई।
कमरा खाली था।
लेकिन काँच के टुकड़े में अब उसका चेहरा नहीं था।
वहाँ हजारों लोग दिखाई दे रहे थे।
अलग-अलग शहर।
अलग-अलग चेहरे।
अलग-अलग कहानियाँ।
और उन सबके पीछे…
एक ही काली परछाईं।
आरव ने धीरे से पूछा—
“तुम कौन हो?”
आईने में परछाईं ने अपना चेहरा उठाया।
और पहली बार उसने साफ आवाज में जवाब दिया—
“मैं समाज हूँ।”
आरव के हाथ से काँच गिर गया।
काँच फर्श पर टूट गया।
लेकिन इस बार कोई डरावनी आवाज नहीं आई।
सिर्फ एक धीमी फुसफुसाहट सुनाई दी—
“जब तक इंसान खुद को दूसरों से बेहतर समझता रहेगा… मैं जिंदा रहूँगा।”
सुबह जब सूरज निकला, आरव ने खिड़की खोली।
बाहर लोग अपने काम पर जा रहे थे।
दुकानें खुल रही थीं।
बच्चे स्कूल जा रहे थे।
मंदिर की घंटियाँ बज रही थीं।
सब कुछ सामान्य था।
लेकिन अब आरव जानता था—
हर चेहरे के पीछे एक कहानी है।
हर मुस्कान के पीछे एक दर्द हो सकता है।
हर अच्छाई के पीछे कोई स्वार्थ छिपा हो सकता है।
और हर बुरे इंसान के भीतर भी बदलने की संभावना होती है।
उसने आखिरी बार आईने में खुद को देखा।
इस बार उसने खुद से सिर्फ एक सवाल पूछा—
“अगर पूरा समाज मेरा आईना है… तो मैं समाज को क्या चेहरा दिखा रहा हूँ?”
आईने ने कोई जवाब नहीं दिया।
क्योंकि जवाब आरव को खुद देना था।
और शायद यही इस कहानी का सबसे डरावना सच था—
भूतों से डरना आसान है।
अपने असली चेहरे से डरना मुश्किल।
समाप्त।

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇
चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं
शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।
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