अर्जुन की हथेली में पड़ी चाबी लगातार काँप रही थी।
उस पर जंग लगी थी और ऊपर सिर्फ दो शब्द खुदे थे—
कमरा नंबर 13।
अर्जुन ने चाबी को गौर से देखा।
“यह चाबी कहाँ की है?”
गोविंद ने जैसे ही उसे देखा, उसका चेहरा सफेद पड़ गया।
“इसे फेंक दो।”
“क्यों?”
“क्योंकि इस होटल में कमरा नंबर 13 कभी था ही नहीं।”
अर्जुन ने हैरानी से पूछा—
“लेकिन चाबी…?”
गोविंद ने उसकी बात काट दी।
“मैंने कहा इसे फेंक दो।”
अर्जुन ने चाबी मुट्ठी में कस ली।
“नहीं।”
गोविंद ने उसे घूरकर देखा।
“तुम नहीं समझ रहे। इस चाबी के पीछे जितनी मौतें हैं, उतनी शायद पूरे शहर में भी नहीं।”
“मुझे अपने पिता के बारे में जानना है।”
गोविंद चुप हो गया।
कुछ देर बाद उसने धीमी आवाज में कहा—
“तो फिर तुम्हें होटल की पुरानी इमारत में जाना होगा।”
“कहाँ?”
गोविंद ने ऊपर की ओर देखा।
“छत के नीचे एक मंजिल है, जो अब इस्तेमाल नहीं होती।”
“क्या वहाँ कमरा 13 है?”
गोविंद ने जवाब नहीं दिया।
रात के करीब एक बजे दोनों सीढ़ियाँ चढ़ने लगे।
होटल की ऊपरी मंजिल पर पहुँचकर अर्जुन ने देखा कि वहाँ मोटी धूल जमा थी।
दीवारों पर पुराने कमरों के नंबर लिखे थे—
9…
10…
11…
12…
और फिर…
दीवार खत्म हो गई।
कमरा 13 कहीं नहीं था।
गोविंद ने कहा—
“देखा? यहाँ कुछ नहीं है।”
अर्जुन ने चाबी हाथ में ली।
उसी क्षण दीवार के अंदर से हल्की-सी आवाज आई।
खर्र… खर्र…
जैसे कोई अंदर से नाखूनों से दीवार खुरच रहा हो।
अर्जुन ने दीवार पर हाथ रखा।
ठंडी थी।
अचानक वहाँ एक दरवाजा उभर आया।
गोविंद पीछे हट गया।
“हे भगवान…”
दरवाजे पर पीतल की पट्टी लगी थी—
13
अर्जुन ने चाबी ताले में लगाई।
ताला अपने आप घूम गया।
दरवाजा खुला।
अंदर एक लंबा कमरा था।
कमरे में पुराने अखबार, तस्वीरें और फाइलें बिखरी पड़ी थीं।
दीवार पर एक बड़ा नक्शा लगा था।
उसमें पूरे कालपुर के घरों पर लाल निशान बने थे।
अर्जुन धीरे-धीरे आगे बढ़ा।
एक मेज पर उसे पुरानी फाइल मिली।
ऊपर लिखा था—
“कालपुर अपराध अभिलेख — गोपनीय।”
उसने फाइल खोली।
पहला नाम था—
रघुवीर चौहान।
दूसरा—
सावित्री देवी।
तीसरा—
इंस्पेक्टर नरेश।
चौथा—
गोविंद।
अर्जुन की नजर ठहर गई।
“आपका नाम भी है।”
गोविंद ने सिर झुका लिया।
“मैंने कहा था न, मैं निर्दोष नहीं हूँ।”
“आपने क्या किया था?”
गोविंद की आवाज भारी हो गई।
“मैंने मीरा को देखा था।”
अर्जुन ने तुरंत उसकी तरफ देखा।
“कब?”
“उस रात।”
“क्या हुआ था?”
गोविंद कुछ बोल पाता, उससे पहले कमरे की बत्ती अपने आप जल गई।
दीवार पर एक प्रोजेक्टर जैसा प्रकाश पड़ा।
और एक पुराना दृश्य चलने लगा।
एक लड़की भाग रही थी।
वह मीरा थी।
उसके हाथ में एक फाइल थी।
पीछे तीन आदमी उसका पीछा कर रहे थे।
मीरा चिल्लाई—
“मुझे छोड़ दो!”
उनमें से एक आदमी का चेहरा साफ दिखाई दिया।
अर्जुन का दिल रुक गया।
वह उसके पिता थे।
मीरा ने कहा—
“आप ऐसा क्यों कर रहे हैं?”
अर्जुन के पिता ने जवाब दिया—
“क्योंकि तुम्हारे पास ऐसा सबूत है जो बहुत लोगों को बर्बाद कर देगा।”
“तो सच सामने आने दीजिए।”
“सच से ज्यादा जरूरी है परिवार।”
मीरा रो पड़ी।
“आप भी?”
अचानक दृश्य खत्म हो गया।
अर्जुन ने अपने सिर पर हाथ रख लिया।
“मेरे पिता ने…?”
गोविंद बोला—
“उन्होंने मीरा को नहीं मारा था।”
अर्जुन ने राहत की साँस ली।
“फिर?”
“उन्होंने उसे उस जगह पहुँचाया जहाँ से वह वापस नहीं आई।”
“कहाँ?”
गोविंद ने कमरे के फर्श की तरफ इशारा किया।
फर्श के बीच एक लोहे का ढक्कन था।
अर्जुन ने उसे उठाया।
नीचे अँधेरी सीढ़ियाँ थीं।
सीढ़ियाँ जमीन के बहुत नीचे जा रही थीं।
नीचे से सड़ांध की गंध आ रही थी।
गोविंद ने कहा—
“यही कालपुर का असली पेट है।”
दोनों नीचे उतरने लगे।
सीढ़ियाँ खत्म हुईं तो एक विशाल सुरंग सामने थी।
दीवारों पर हजारों नाम लिखे थे।
कुछ नामों पर काला रंग लगा था।
कुछ पर लाल।
अर्जुन ने पूछा—
“इनका मतलब?”
गोविंद ने कहा—
“लाल मतलब पाप स्वीकार किया।”
“और काला?”
“पाप छिपाया।”
अचानक सामने से बच्चे के रोने की आवाज आई।
“माँ…”
अर्जुन उस दिशा में बढ़ा।
एक छोटे कमरे में उसे लकड़ी का पिंजरा मिला।
अंदर कोई नहीं था।
लेकिन पिंजरे की दीवार पर लिखा था—
“जिसे समाज ने दोषी कहा, वह हमेशा दोषी नहीं होता।”
अर्जुन को अपने पुराने केस याद आने लगे।
उसने कितनी बार बिना पूरी सच्चाई जाने लोगों को दोषी ठहराया था।
तभी पीछे से आवाज आई—
“तीसरा पाप।”
अर्जुन पलटा।
मीरा उसके पीछे खड़ी थी।
उसकी आँखों में आँसू थे।
“विश्वासघात।”
अर्जुन ने पूछा—
“तुम्हारे साथ किसने विश्वासघात किया?”
मीरा ने उसकी तरफ देखा।
“तुम्हारे पिता ने।”
“लेकिन उन्होंने तुम्हें नहीं मारा।”
“मुझे मौत ने नहीं मारा।”
“फिर?”
मीरा ने कहा—
“मुझे उस आदमी की चुप्पी ने मारा, जिस पर मुझे सबसे ज्यादा भरोसा था।”
अर्जुन की आँखें भर आईं।
“मेरे पिता ने आखिर किया क्या?”
मीरा ने एक पुराना लिफाफा उसकी तरफ बढ़ाया।
“यह उन्होंने तुम्हारे लिए छोड़ा था।”
अर्जुन ने लिफाफा खोला।
अंदर एक पत्र था।
“अर्जुन,
अगर तुम यह पत्र पढ़ रहे हो, तो शायद कालपुर ने तुम्हें भी बुला लिया है।
मैंने जो किया, उसके लिए मेरे पास कोई बहाना नहीं।
मैंने मीरा को बचाने के बजाय उसे उन लोगों के हवाले कर दिया जिनसे वह लड़ रही थी।
लेकिन मैं उसे मरते हुए नहीं देख सका।
मैंने उसे एक गुप्त सुरंग के रास्ते बाहर भेज दिया।
अगर वह जीवित रही होगी, तो तुम्हें सच बताएगी।
लेकिन अगर वह मर गई…
तो समझना कि मैंने उसे नहीं, अपने डर को चुना था।
— तुम्हारा पिता”
अर्जुन ने पत्र नीचे कर लिया।
“तो मीरा…”
पीछे से आवाज आई—
“मैं मरी नहीं थी।”
अर्जुन ने पलटकर देखा।
मीरा वहाँ खड़ी थी।
लेकिन इस बार उसके चेहरे पर डर नहीं था।
उसने कहा—
“मुझे इस शहर ने छिपा दिया था।”
“कहाँ?”
“यहीं।”
अचानक जमीन काँपने लगी।
दीवारों पर लिखे हजारों नाम चमकने लगे।
और एक विशाल काली आकृति सुरंग के आखिरी छोर से बाहर आने लगी।
गोविंद चीख पड़ा—
“यह आ गया!”
अर्जुन ने पूछा—
“कौन?”
गोविंद ने काँपते हुए कहा—
“कालपुर का असली मालिक।”
काली आकृति धीरे-धीरे आगे बढ़ी।
उसका चेहरा नहीं था।
बस दो लाल आँखें थीं।
उसने अर्जुन की तरफ हाथ बढ़ाया।
और उसकी आवाज पूरे तहखाने में गूँज उठी—
“तुमने तीन पाप देख लिए हैं… अब चौथा तुम्हारा अपना है।”
अर्जुन पीछे हट गया।
अचानक उसके सामने एक दृश्य उभरा—
एक सड़क…
एक कार…
एक दुर्घटना…
और ड्राइविंग सीट पर बैठा था…
खुद अर्जुन।
उसकी साँस रुक गई।
मीरा ने धीरे से कहा—
“अब तुम्हें याद करना होगा… उस रात तुमने किसे मारा था।”
अर्जुन ने सिर पकड़ लिया।
उसे कुछ याद नहीं था।
लेकिन अगले ही पल उसकी स्मृति में एक आवाज गूँजी—
“अर्जुन, गाड़ी मत चलाओ…”
और उसके बाद…
एक जोरदार टक्कर।
अँधेरा।
और एक बच्चे की चीख।
काली आकृति मुस्कुराई।
“चौथा पाप…”
उसने फुसफुसाकर कहा—
“हत्या।”

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇
चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं
शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।
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