रात के करीब बारह बज रहे थे। बाहर तेज़ बारिश हो रही थी और आसमान में बार-बार बिजली चमक रही थी। शहर से लगभग तीस किलोमीटर दूर, पहाड़ियों और घने जंगलों के बीच एक पुरानी हवेली खड़ी थी—रुद्रपुर हवेली।
कई सालों से उस हवेली में कोई नहीं रहता था।
गाँव के लोग कहते थे कि रात के समय हवेली के अंदर से किसी के चलने की आवाज़ आती है। कभी किसी औरत के रोने की आवाज़ सुनाई देती, तो कभी ऐसा लगता जैसे कोई दरवाज़े पर खड़ा होकर धीरे-धीरे दस्तक दे रहा हो।
लेकिन सबसे अजीब बात यह थी कि हवेली के मुख्य दरवाज़े पर हमेशा एक पुरानी लोहे की कुंडी लगी रहती थी।
फिर भी…
हर रात वहाँ से आहट आती थी।
उसी हवेली को खरीदने के लिए उस रात आरव वहाँ पहुँचा था।
आरव शहर का रहने वाला था और पेशे से फोटोग्राफर। कुछ महीनों पहले उसके पिता की मृत्यु हुई थी और उन्हें विरासत में रुद्रपुर हवेली मिली थी। पिता ने अपनी जिंदगी में कभी इस हवेली का ज़िक्र नहीं किया था।
जब वकील ने कागज़ात देते हुए कहा था, “यह संपत्ति आपके पिता के नाम थी,” तो आरव को विश्वास ही नहीं हुआ था।
उसने उसी दिन तय कर लिया था कि वह हवेली देखने जाएगा।
गाँव में पहुँचते ही एक बूढ़े आदमी ने उसे रोक लिया।
“बाबूजी, हवेली में रात मत बिताइएगा।”
आरव मुस्कुराया।
“क्यों? भूत है क्या?”
बूढ़े के चेहरे का रंग अचानक उड़ गया।
उसने धीमी आवाज़ में कहा, “भूत होता तो अच्छा था।”
आरव की मुस्कान गायब हो गई।
“मतलब?”
बूढ़े ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा, “वहाँ जो है… वह किसी को जाने नहीं देता।”
आरव ने बात को मज़ाक समझकर अपनी कार आगे बढ़ा दी।
कुछ देर बाद वह हवेली के सामने खड़ा था।
हवेली देखकर ही उसके शरीर में सिहरन दौड़ गई।
तीन मंज़िल की विशाल इमारत, जिसकी दीवारों पर काई जम चुकी थी। खिड़कियों के शीशे टूटे हुए थे और मुख्य दरवाज़े के ऊपर एक पुरानी पत्थर की मूर्ति लगी थी।
आरव ने जेब से चाबी निकाली।
चाबी ताले में लगाते ही अचानक…
ठक… ठक… ठक…
अंदर से आवाज़ आई।
आरव ठिठक गया।
उसने दरवाज़े की ओर देखा।
फिर आवाज़ आई।
ठक… ठक… ठक…
जैसे कोई दूसरी तरफ से दरवाज़ा खटखटा रहा हो।
आरव ने धीरे से पूछा, “कौन है?”
कोई जवाब नहीं आया।
उसने दरवाज़ा खोला।
अंदर अंधेरा था।
मोबाइल की टॉर्च जलाकर वह अंदर गया।
धूल से ढकी फर्श, दीवारों पर पुराने चित्र और छत से लटकता एक टूटा हुआ झूमर।
हवा में एक अजीब सी गंध थी—जैसे कई वर्षों से बंद कमरे में नमी और पुराने कपड़ों की गंध मिली हुई हो।
आरव ने अपना सामान नीचे रखा और हवेली का निरीक्षण करने लगा।
तभी उसकी नज़र सीढ़ियों के पास टंगी एक तस्वीर पर पड़ी।
तस्वीर में उसके पिता खड़े थे।
लेकिन उनके साथ एक महिला भी थी।
आरव उस महिला को पहचानता नहीं था।
तस्वीर के पीछे तारीख लिखी थी—
17 जुलाई 1998
आरव के पिता उस समय अविवाहित थे।
फिर यह महिला कौन थी?
आरव ने तस्वीर उतारी और ध्यान से देखने लगा।
तभी ऊपर की मंज़िल से कुछ गिरने की आवाज़ आई।
धड़ाम!
आरव चौंक गया।
उसने टॉर्च ऊपर की ओर की।
सीढ़ियों पर अंधेरा पसरा हुआ था।
“शायद कोई लकड़ी गिरी होगी,” उसने खुद से कहा।
वह ऊपर जाने लगा।
पहली मंज़िल पर पहुँचते ही उसे एक लंबा गलियारा दिखाई दिया।
गलियारे के आखिर में एक दरवाज़ा था।
दरवाज़े पर मोटी जंजीर बंधी थी।
आरव उसके पास गया।
दरवाज़े के ऊपर लाल रंग से कुछ लिखा था।
धूल हटाने पर शब्द साफ़ दिखाई दिए—
“इसे मत खोलना।”
आरव कुछ पल तक उस चेतावनी को देखता रहा।
फिर उसने जंजीर को छुआ।
उसी क्षण…
उसके पीछे किसी के चलने की आवाज़ आई।
छप… छप… छप…
जैसे कोई गीले पैरों से फर्श पर चल रहा हो।
आरव ने तुरंत पीछे मुड़कर देखा।
गलियारा खाली था।
लेकिन फर्श पर…
गीले पैरों के निशान थे।
वे निशान धीरे-धीरे उसकी ओर आ रहे थे।
एक…
दो…
तीन…
आरव की साँसें तेज़ हो गईं।
निशान उसके ठीक सामने आकर रुक गए।
लेकिन वहाँ कोई नहीं था।
अचानक उसके कान के पास किसी ने बहुत धीमी आवाज़ में कहा—
“तुम… वापस क्यों आए?”
आरव के पूरे शरीर में झटका लगा।
वह पीछे हट गया।
“क… कौन है?”
कोई जवाब नहीं।
फिर नीचे से दरवाज़ा बंद होने की तेज़ आवाज़ आई।
धड़ाम!
आरव दौड़कर नीचे पहुँचा।
मुख्य दरवाज़ा बंद था।
उसने कुंडी खींची।
दरवाज़ा नहीं खुला।
तभी उसकी नज़र सामने की दीवार पर पड़ी।
वहाँ एक पुरानी घड़ी लगी थी।
घड़ी की दोनों सुइयाँ बारह बजे पर अटकी हुई थीं।
और तभी…
ठक… ठक… ठक…
वही आवाज़ फिर सुनाई दी।
इस बार आवाज़ हवेली के अंदर से नहीं…
बल्कि उसके पीछे वाले बंद कमरे से आ रही थी।
आरव धीरे-धीरे उस कमरे की ओर बढ़ा।
कमरे का दरवाज़ा आधा खुला था।
उसने टॉर्च अंदर की।
कमरा बिल्कुल खाली था।
सिर्फ बीच में एक पुरानी लकड़ी की कुर्सी रखी थी।
कुर्सी पर एक सफेद कपड़ा पड़ा था।
आरव ने कपड़ा हटाया।
नीचे एक पुरानी डायरी थी।
उसने डायरी खोली।
पहले पन्ने पर उसके पिता की लिखावट थी।
सिर्फ एक वाक्य लिखा था—
“अगर आरव कभी इस हवेली में आए, तो उसे सच मत बताना।”
आरव के हाथ काँपने लगे।
उसने अगला पन्ना पलटा।
उसमें लिखा था—
“वह हर रात बारह बजे आती है।”
आरव ने घड़ी की ओर देखा।
बारह बजकर एक मिनट हो चुका था।
अचानक पीछे से फिर आवाज़ आई—
ठक… ठक… ठक…
इस बार आवाज़ बहुत करीब थी।
आरव ने धीरे-धीरे गर्दन घुमाई।
दरवाज़े के बाहर कोई खड़ा था।
सफेद कपड़ों में एक औरत।
उसका चेहरा लंबे काले बालों से ढका हुआ था।
आरव कुछ बोल पाता, उससे पहले वह औरत धीरे-धीरे सिर उठाने लगी।
और उसी क्षण हवेली की सारी लाइटें एक साथ जल उठीं।
आरव ने आँखें बंद कर लीं।
जब उसने दोबारा आँखें खोलीं…
वहाँ कोई नहीं था।
लेकिन उसके हाथ में पकड़ी डायरी के आखिरी पन्ने पर अब एक नई लाइन लिखी थी—
“तुम्हें सच जानना है तो कल रात ऊपर वाले बंद कमरे का दरवाज़ा खोलना।”
और उसके ठीक नीचे…
आरव का नाम लिखा था।
“आरव…”
बाहर बारिश और तेज़ हो चुकी थी।
और हवेली की तीसरी मंज़िल से एक बार फिर किसी के चलने की आवाज़ आने लगी।
छप… छप… छप…
आरव समझ चुका था…
वह हवेली में अकेला नहीं था।

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇
चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं
शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।
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