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काली हवेली का आख़िरी कमरा (Last part-3)

पढ़ने का समय : 7 मिनट

तेरहवीं घंटी की आवाज़ के बाद पूरी हवेली में सन्नाटा छा गया।

 

आरव सामने खड़ी उस काली परछाईं को देख रहा था।

 

उसकी आँखें लाल थीं और शरीर धुएँ की तरह हिल रहा था। उसके चेहरे पर कोई निश्चित आकार नहीं था। कभी वह बूढ़े आदमी जैसा दिखाई देता, कभी जवान, और कभी बिल्कुल आरव जैसा।

 

आरव पीछे हटने लगा।

 

“कबीर कहाँ है?”

 

परछाईं हँसी।

 

“जिसे तुम दोस्त समझते हो, वह अभी भी ज़िंदा है।”

 

“तो उसे मेरे सामने लाओ!”

 

परछाईं ने हाथ उठाया।

 

अचानक कमरे की दीवार पर एक तस्वीर दिखाई दी।

 

उसमें कबीर एक छोटे से कमरे में बंद था।

 

वह दरवाज़ा पीट रहा था।

 

“आरव! मुझे यहाँ से निकाल!”

 

आरव ने तस्वीर पर हाथ मारा।

 

“कबीर!”

 

तस्वीर के अंदर कबीर ने आरव को देखा।

 

“तेरहवीं चाबी!”

 

आरव ने नीचे देखा।

 

वही पुरानी चाबी उसकी मुट्ठी में थी।

 

कबीर चिल्लाया—

 

“दीवार के पीछे का दरवाज़ा खोलो!”

 

तभी तस्वीर गायब हो गई।

 

आरव ने दीवार को ध्यान से देखा।

 

उस पर मीरा की तस्वीर बनी हुई थी।

 

आरव ने चाबी तस्वीर के बीच लगा दी।

 

क्लिक!

 

दीवार दो हिस्सों में बँट गई।

 

पीछे एक संकरी सीढ़ी थी।

 

आरव नीचे उतरने लगा।

 

हर सीढ़ी के साथ तापमान गिरता जा रहा था।

 

नीचे पहुँचकर उसे एक विशाल कमरा दिखाई दिया।

 

कमरे के बीचों-बीच कबीर बंधा हुआ था।

 

“आरव!”

 

आरव उसकी तरफ दौड़ा।

 

लेकिन तभी कबीर ने चीखकर कहा—

 

“रुको!”

 

आरव वहीं रुक गया।

 

कबीर के पीछे मीरा खड़ी थी।

 

लेकिन इस बार उसके चेहरे पर डर था।

 

“आरव, ये कबीर नहीं है।”

 

आरव ने चौंककर कबीर को देखा।

 

कबीर मुस्कुराने लगा।

 

उसकी मुस्कान धीरे-धीरे फैलती गई।

 

फिर उसका चेहरा बदलने लगा।

 

कुछ ही सेकंड में वहाँ वही काली परछाईं खड़ी थी।

 

आरव पीछे हट गया।

 

“तुमने मेरे साथ ऐसा क्यों किया?”

 

परछाईं ने कहा—

 

“मैंने कुछ नहीं किया। तुम्हारे परिवार ने किया था।”

 

तभी कमरे की दीवारों पर पुरानी घटनाएँ दिखाई देने लगीं।

 

आरव ने देखा—

 

तीस साल पहले रुद्र प्रताप ने इसी कमरे में एक अनुष्ठान किया था।

 

उसकी बेटी मीरा गंभीर बीमारी से मर रही थी।

 

रुद्र अपनी बेटी को बचाना चाहता था।

 

उसने एक अजीब शक्ति को बुलाया।

 

उस शक्ति ने कहा था—

 

“मैं मीरा को जीवन दूँगा, लेकिन बदले में तुम्हारे परिवार की हर पीढ़ी से एक व्यक्ति मुझे अपना जीवन देगा।”

 

रुद्र ने हामी भर दी।

 

मीरा बच गई।

 

लेकिन उसी रात रुद्र को अपनी गलती का एहसास हुआ।

 

उसने उस शक्ति को कैद करने के लिए कमरा 13 बनवाया।

 

लेकिन शक्ति ने पूरे परिवार को एक-एक करके मार दिया।

 

मीरा को भी।

 

मरने से पहले मीरा ने उस शक्ति को हवेली में बंद कर दिया।

 

लेकिन एक शर्त थी—

 

हर इक्कीस साल बाद रुद्र के परिवार का कोई वंशज हवेली में आएगा और उसकी जगह कैद हो जाएगा।

 

आरव की आँखों में आँसू आ गए।

 

“तो मेरे पिता?”

 

मीरा ने सिर झुका लिया।

 

“तुम्हारे पिता ने तुम्हें बचाने के लिए अपना नाम और शहर बदल दिया था।”

 

आरव ने पूछा—

 

“और तुम?”

 

मीरा ने कहा—

 

“मैंने तुम्हें यहाँ इसलिए बुलाया क्योंकि मुझे लगा था कि तुम ही इस श्राप को खत्म कर सकते हो।”

 

परछाईं जोर से हँसी।

 

“वह श्राप खत्म नहीं कर सकता।”

 

आरव ने पूछा—

 

“क्यों?”

 

परछाईं ने उसकी तरफ देखते हुए कहा—

 

“क्योंकि अब तुम मेरे हो।”

 

अचानक आरव के हाथ में जलन होने लगी।

 

उसकी हथेली पर एक काला निशान बन गया।

 

मीरा चिल्लाई—

 

“आरव! चाबी को आग में डालो!”

 

कमरे के बीच एक पुरानी लोहे की भट्टी जल रही थी।

 

आरव ने चाबी उसमें फेंक दी।

 

आग अचानक नीली हो गई।

 

परछाईं दर्द से चीखने लगी।

 

“नहीं!”

 

पूरा कमरा काँपने लगा।

 

दीवारों में दरारें पड़ गईं।

 

मीरा ने आरव से कहा—

 

“जल्दी! आख़िरी दरवाज़ा खोलो!”

 

आरव ने सामने देखा।

 

वहाँ एक छोटा-सा लकड़ी का दरवाज़ा था।

 

उस पर कोई ताला नहीं था।

 

लेकिन उसके ऊपर लिखा था—

 

“जिसे सच स्वीकार है, वही इसे खोल सकता है।”

 

आरव ने दरवाज़े पर हाथ रखा।

 

उसके सामने उसके पिता दिखाई दिए।

 

वह रो रहे थे।

 

“बेटा, मुझे माफ करना।”

 

आरव की आँखों से आँसू निकल आए।

 

“आपने मुझे क्यों छोड़ा?”

 

उसके पिता ने कहा—

 

“क्योंकि अगर मैं तुम्हें अपने पास रखता, तो वह तुम्हें ढूँढ लेता।”

 

दृश्य गायब हो गया।

 

फिर आरव ने अपनी माँ को देखा।

 

फिर बचपन की यादें।

 

फिर वह रात जब उसके पिता अचानक घर छोड़कर चले गए थे।

 

आरव समझ गया कि उसके माता-पिता ने उससे नफरत नहीं की थी।

 

वे उसे बचा रहे थे।

 

उसने दरवाज़ा खोल दिया।

 

अंदर कुछ नहीं था।

 

सिर्फ एक आईना।

 

आरव आईने के सामने खड़ा हुआ।

 

आईने में उसे अपना चेहरा दिखाई दिया।

 

लेकिन उसके पीछे मीरा खड़ी थी।

 

और उसके पीछे वह काली परछाईं।

 

मीरा ने कहा—

 

“आरव, तुम्हें फैसला करना होगा।”

 

“कैसा फैसला?”

 

“या तो तुम हवेली से बाहर जाओ और श्राप हमेशा के लिए तुम्हारे परिवार के साथ रहेगा…”

 

“या?”

 

“या तुम यहीं रहकर इसे खत्म कर दो।”

 

आरव ने परछाईं की तरफ देखा।

 

“अगर मैं यहीं रह गया तो?”

 

मीरा मुस्कुराई।

 

“तुम्हारा शरीर नहीं रहेगा। लेकिन तुम्हारी आत्मा इस हवेली को हमेशा के लिए बंद कर देगी।”

 

आरव कुछ सेकंड तक चुप रहा।

 

फिर उसने फैसला कर लिया।

 

उसने आईने को उठाया और पूरी ताकत से जमीन पर पटक दिया।

 

छन्न्न्न!

 

आईना टूटते ही भयंकर चीख सुनाई दी।

 

काली परछाईं टूटने लगी।

 

उसका शरीर धुएँ में बदल गया।

 

“तुम नहीं जानते कि तुमने क्या किया है!”

 

आरव ने कहा—

 

“अब इस हवेली में कोई नहीं फँसेगा।”

 

परछाईं ने आख़िरी बार चीखते हुए कहा—

 

“अगर मैं खत्म हुआ… तो तुम्हारी यादें भी खत्म होंगी!”

 

अचानक आरव के सिर में तेज दर्द हुआ।

 

उसने अपनी आँखें बंद कर लीं।

 

जब उसने आँखें खोलीं तो सुबह हो चुकी थी।

 

वह जंगल के बाहर सड़क पर पड़ा था।

 

उसके पास कबीर भी बेहोश पड़ा था।

 

कुछ देर बाद कबीर ने आँखें खोलीं।

 

“आरव…”

 

“हाँ?”

 

“हम बच गए?”

 

आरव ने पीछे देखा।

 

वहाँ अब कोई हवेली नहीं थी।

 

सिर्फ एक जला हुआ खंडहर था।

 

दोनों धीरे-धीरे सड़क की तरफ चलने लगे।

 

लेकिन आरव को कुछ अजीब महसूस हो रहा था।

 

उसे अपने बचपन की कोई याद नहीं आ रही थी।

 

उसे अपने माता-पिता के चेहरे याद नहीं थे।

 

उसे अपना पुराना घर याद नहीं था।

 

यहाँ तक कि उसे यह भी याद नहीं था कि वह कबीर को कब से जानता था।

 

कबीर ने उसकी तरफ देखा।

 

“तुम ठीक हो?”

 

आरव ने मुस्कुराकर कहा—

 

“हाँ।”

 

फिर उसने अपनी जेब में हाथ डाला।

 

उसके हाथ में एक छोटी-सी तस्वीर थी।

 

तस्वीर में मीरा खड़ी थी।

 

लेकिन अब वह मुस्कुरा रही थी।

 

तस्वीर के पीछे एक आख़िरी वाक्य लिखा था—

 

“धन्यवाद, आरव। अब मैं आज़ाद हूँ।”

 

आरव ने तस्वीर को सीने से लगा लिया।

 

तभी दूर जंगल के अंदर से किसी बच्ची की हँसी सुनाई दी।

 

आरव और कबीर दोनों रुक गए।

 

कबीर ने घबराकर पूछा—

 

“तुमने भी सुना?”

 

आरव ने सिर हिलाया।

 

दोनों ने पीछे मुड़कर जंगल की तरफ देखा।

 

वहाँ कुछ नहीं था।

 

सिर्फ पेड़ों के बीच हवा चल रही थी।

 

आरव ने राहत की साँस ली और आगे बढ़ गया।

 

लेकिन उसे पता नहीं था…

 

कि उसकी जेब में रखी तस्वीर के अंदर मीरा अब अकेली नहीं थी।

 

उसके पीछे एक नया चेहरा दिखाई दे रहा था।

 

वही काली परछाईं।

 

और तस्वीर के नीचे धीरे-धीरे नए शब्द उभर रहे थे—

 

“हवेली खत्म हुई है… श्राप नहीं।”

 

समाप्त।

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