शहर के किनारे एक छोटी-सी झोपड़ी में पाँच साल का आरव अपनी माँ सीमा के साथ रहता था। आरव की दुनिया बहुत छोटी थी—उसकी माँ, उसके पापा और उसका छोटा-सा खिलौना हाथी।
उसके पापा रमेश मजदूरी करते थे। सुबह सूरज निकलने से पहले घर से चले जाते और शाम को लौटकर अपने बेटे को गोद में उठा लेते।
आरव हर शाम दरवाजे पर बैठकर उनका इंतजार करता।
“पापा आ गए!” वह दूर से उन्हें देखते ही खुशी से चिल्लाता और दौड़कर उनकी गोद में चढ़ जाता।
रमेश हँसते हुए कहते, “मेरा शेर बेटा!”
आरव उनकी गर्दन से लिपटकर पूछता, “पापा, आज मेरे लिए क्या लाए?”
“आज तेरे लिए टॉफी लाया हूँ।”
“सिर्फ एक?”
“दो हैं।”
“नहीं! मुझे तीन चाहिए।”
रमेश हँस पड़ते।
“अच्छा बाबा, तीन ही सही।”
सीमा दोनों को देखकर मुस्कुराती रहती। गरीबी थी, लेकिन उनके छोटे-से घर में प्यार बहुत था।
एक दिन रमेश काम से लौट रहे थे। रास्ते में अचानक तेज बारिश शुरू हो गई। सड़क पर फिसलन थी। तभी एक तेज रफ्तार वाहन ने उन्हें टक्कर मार दी।
लोग उन्हें अस्पताल लेकर गए, लेकिन डॉक्टर उन्हें बचा नहीं सके।
रमेश की आखिरी साँस अस्पताल में ही निकल गई।
उधर घर में आरव दरवाजे पर बैठा था।
रात बहुत हो गई थी।
सीमा भी बार-बार दरवाजे की तरफ देख रही थी, लेकिन उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था। तभी दो आदमी उनके घर आए।
उनके चेहरे देखकर सीमा समझ गई कि कुछ बहुत बुरा हुआ है।
“सीमा बहन…”
इतना सुनते ही उसके पैरों तले जमीन खिसक गई।
“क्या हुआ मेरे पति को?”
उन लोगों ने सिर झुका लिया।
“रमेश अब इस दुनिया में नहीं रहे।”
सीमा की चीख पूरे घर में गूँज उठी।
आरव डरकर अपनी माँ के पास आया।
“माँ… पापा कहाँ हैं?”
सीमा कुछ नहीं बोल पाई। उसने अपने बेटे को सीने से लगा लिया और फूट-फूटकर रोने लगी।
अगले दिन घर में बहुत लोग आए। आरव को समझ ही नहीं आ रहा था कि सब क्यों रो रहे हैं।
वह बार-बार अपनी माँ से पूछता रहा “माँ, पापा कब आएँगे?”
सीमा बस उसे गले लगाकर कहती “जल्दी आएँगे बेटा…”
लेकिन वह जानती थी कि उसके पति अब कभी वापस नहीं आएँगे।
कुछ दिनों बाद घर बिल्कुल शांत हो गया।
जिस दरवाजे पर आरव रोज अपने पापा का इंतजार करता था, वहीं अब वह चुपचाप बैठा रहता।
एक शाम उसने अपने पापा की पुरानी चप्पल देखी।
वह चप्पल उठाकर अपनी छाती से लगा ली।
“माँ… पापा की चप्पल यहीं है। पापा कहाँ हैं?”
सीमा के पास कोई जवाब नहीं था।
समय बीतता गया, लेकिन दुख कम नहीं हुआ।
रमेश के जाने के बाद घर चलाना बहुत मुश्किल हो गया। सीमा ने दूसरों के घरों में काम करना शुरू कर दिया।
सुबह वह आरव को पड़ोस की चाची के पास छोड़कर काम पर चली जाती।
लेकिन लगातार काम करने और ठीक से खाना न मिलने के कारण सीमा की तबीयत बिगड़ने लगी।
एक दिन काम करते-करते उसे तेज चक्कर आया और वह जमीन पर गिर पड़ी।
पड़ोस के लोगों ने उसे अस्पताल पहुँचाया।
जब आरव को पता चला कि माँ अस्पताल में है, वह दौड़ता हुआ वहाँ पहुँचा।
बिस्तर पर अपनी माँ को देखकर वह डर गया।
“माँ… उठो ना।”
सीमा ने आँखें खोलीं और कमजोर आवाज में कहा “आरव… मेरे पास आओ।”
आरव उसकी छाती से लग गया।
“माँ, आपको क्या हुआ?”
“कुछ नहीं बेटा… थोड़ी कमजोरी है।”
“आप भी मुझे छोड़कर तो नहीं जाओगी ना?”
सीमा की आँखों से आँसू निकल पड़े।
“नहीं बेटा… मैं तुम्हें छोड़कर कहीं नहीं जाऊँगी।”
लेकिन बीमारी बढ़ती जा रही थी।
अब सीमा पहले की तरह काम भी नहीं कर पाती थी।
एक रात आरव अपनी माँ के पास बैठा था। उसने धीरे से पूछा “माँ, अगर आप भी पापा के पास चली गईं तो मैं अकेला हो जाऊँगा?”
सीमा का दिल टूट गया।
उसने बेटे को कसकर गले लगा लिया।
“नहीं मेरे बच्चे… तू कभी अकेला नहीं होगा।”
आरव ने मासूमियत से पूछा “तो पापा मुझे क्यों छोड़कर चले गए?”
सीमा के पास उस सवाल का कोई जवाब नहीं था।
उसने बस कहा “कभी-कभी भगवान अच्छे लोगों को अपने पास बुला लेते हैं।”
आरव ने आसमान की तरफ देखा।
“भगवान जी… मेरे पापा को वापस कर दो ना। मुझे उनसे बहुत सारी बातें करनी हैं।”
उस रात वह रोते-रोते सो गया।
कुछ दिनों बाद सीमा की तबीयत और खराब हो गई।
अस्पताल में डॉक्टर ने कहा कि उसका इलाज लंबा चलेगा।
आरव अस्पताल के बाहर बैठा था। उसके हाथ में वही छोटा खिलौना हाथी था, जो उसके पापा ने उसे जन्मदिन पर दिया था।
वह धीरे से खिलौने से बोला “पापा… अगर आप मुझे सुन रहे हो ना, तो वापस आ जाओ।”
उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।
“मैं ज्यादा टॉफी नहीं माँगूँगा। आपकी चप्पल भी नहीं पहनूँगा। बस एक बार मेरे पास आ जाओ।”
तभी एक बुजुर्ग महिला उसके पास आकर बैठ गई।
उन्होंने आरव के सिर पर हाथ रखा।
“बेटा, तुम्हारे पापा तुम्हें बहुत प्यार करते थे।”
आरव ने पूछा “आपको कैसे पता?”
महिला मुस्कुराईं।
“क्योंकि जो पिता अपने बच्चे के लिए मेहनत करता है, वह मरने के बाद भी अपने बच्चे को अकेला नहीं छोड़ता।”
“लेकिन पापा मेरे पास क्यों नहीं हैं?”
“वह तुम्हारी यादों में हैं। जब भी तुम उन्हें याद करोगे, वह तुम्हारे दिल में होंगे।”
आरव ने अपने आँसू पोंछे।
उस दिन पहली बार उसे लगा कि शायद पापा सच में कहीं गए नहीं हैं।
वह माँ के पास गया और उसका हाथ पकड़कर बोला “माँ, आप ठीक हो जाओ। मैं बड़ा होकर बहुत काम करूँगा। आपको कभी काम नहीं करने दूँगा।”
सीमा ने कमजोर मुस्कान के साथ बेटे को देखा।
“मेरा बेटा बहुत बड़ा आदमी बनेगा।”
“हाँ माँ… लेकिन सबसे पहले मैं आपको ठीक कराऊँगा।”
कुछ महीनों तक इलाज चला।
धीरे-धीरे सीमा की तबीयत सुधरने लगी।
आरव भी बड़ा होने लगा।
वह स्कूल जाने लगा और पढ़ाई में बहुत मेहनत करता।
जब भी कोई उससे पूछता “तुम बड़े होकर क्या बनोगे?”
वह मुस्कुराकर कहता “मैं डॉक्टर बनूँगा।”
“क्यों?”
“क्योंकि मैं अपनी माँ को कभी बीमार नहीं होने दूँगा।”
सालों बाद वही छोटा आरव एक दिन डॉक्टर बन गया।
उसने अपनी पहली कमाई से अपनी माँ के लिए एक सुंदर घर खरीदा।
घर के एक कमरे में उसने अपने पापा की पुरानी चप्पल और वह छोटा खिलौना हाथी संभालकर रखा।
दीवार पर अपने पापा की तस्वीर लगाते हुए उसने धीरे से कहा “पापा… देख रहे हो ना? आपका शेर बेटा बड़ा हो गया।”
सीमा पीछे खड़ी रो रही थी।
आरव ने माँ का हाथ पकड़ा और मुस्कुराते हुए कहा “माँ, अब आपको किसी चीज की चिंता नहीं करनी।”
उसने आसमान की ओर देखा।
“पापा… उस दिन मैं बहुत छोटा था। इसलिए समझ नहीं पाया था कि आप कहाँ चले गए। आज समझ गया हूँ… आप मेरे पास नहीं हैं, लेकिन मेरे अंदर हमेशा जिंदा रहोगे।”
हवा का एक हल्का झोंका आया।
आरव मुस्कुराया।
उसे ऐसा लगा जैसे किसी ने प्यार से उसके सिर पर हाथ रखा हो।
उसने आँखें बंद कीं और धीरे से कहा “पापा… अब मैं रोऊँगा नहीं। क्योंकि मुझे पता है, आप मुझे ऊपर से देख रहे हो।”
और उस दिन के बाद आरव ने अपनी जिंदगी का एक ही मकसद बना लिया जिस बच्चे ने अपने पिता को खोया है, उसकी आँखों में वह वही दर्द नहीं आने देगा, जो कभी उसकी आँखों में था।
क्योंकि कुछ रिश्ते मौत के बाद खत्म नहीं होते…
वे यादों में और भी गहरे उतर जाते हैं।

NSW अनुभवी लेखक -🥇

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