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परछाई (भाग 2 — तहखाने का रहस्य)

पढ़ने का समय : 6 मिनट

 

 

विवेक घंटों तक अपनी परछाई को देखता रहा।

 

सूरज ऊपर था।

 

उसकी परछाई जमीन पर होनी चाहिए थी।

 

लेकिन वह पाँच कदम दूर खड़ी थी।

 

विवेक एक कदम आगे बढ़ा।

 

परछाई वहीं रही।

 

वह पीछे हटा।

 

परछाई फिर भी नहीं हिली।

 

विवेक का गला सूख गया।

 

उसे शंकर चाचा की बात याद आई—

 

“तुम्हारे दादा ने कहा था कि उनकी परछाई उनसे पहले घर पहुँच गई है।”

 

विवेक ने तय किया कि अब वह घर में नहीं रहेगा।

 

उसने अपना बैग उठाया और दरवाज़े की ओर बढ़ा।

 

लेकिन जैसे ही उसने बाहर कदम रखा, उसकी परछाई अचानक उसके सामने आ गई।

 

वह रास्ता रोककर खड़ी थी।

 

विवेक पीछे हट गया।

 

परछाई ने अपना हाथ उठाया और घर के तहखाने की तरफ इशारा किया।

 

फिर जमीन पर एक शब्द उभरा—

 

“सच।”

 

विवेक समझ गया कि उसे तहखाने में जाना होगा।

 

घर के पीछे पुराने स्टोर रूम में उसे एक लोहे का दरवाज़ा मिला।

 

दरवाज़े पर मोटा ताला लगा था।

 

उसे अपनी दादी की पुरानी चाबी याद आई।

 

कुछ देर खोजने के बाद उसे एक लकड़ी के संदूक में चाबी मिल गई।

 

ताला खुल गया।

 

दरवाज़ा खोलते ही सड़ी हुई मिट्टी की गंध आई।

 

सीढ़ियाँ नीचे जा रही थीं।

 

विवेक मोबाइल की रोशनी जलाकर नीचे उतरने लगा।

 

हर सीढ़ी के साथ ठंड बढ़ती जा रही थी।

 

नीचे पहुँचकर उसे एक छोटा कमरा मिला।

 

कमरे की दीवारों पर दर्जनों तस्वीरें लगी थीं।

 

विवेक ने पहली तस्वीर देखी।

 

उसमें उसके दादा थे।

 

दूसरी में उसकी दादी।

 

तीसरी में…

 

एक अजनबी आदमी।

 

लेकिन हर तस्वीर में एक चीज़ समान थी।

 

सबकी परछाई अलग थी।

 

किसी की परछाई पीछे नहीं थी।

 

किसी की बगल में थी।

 

और एक तस्वीर में आदमी खड़ा था…

 

लेकिन उसकी परछाई दीवार पर बैठी हुई थी।

 

विवेक के हाथ काँपने लगे।

 

तभी उसे एक पुरानी डायरी मिली।

 

डायरी उसके दादा की थी।

 

पहले पन्ने पर लिखा था—

 

“परछाई शरीर की नहीं, आत्मा की होती है।”

 

अगले पन्ने पर लिखा था—

 

“हर इंसान की परछाई उसके साथ जन्म लेती है। लेकिन अगर कोई व्यक्ति अपनी परछाई से डरने लगे, तो वह परछाई धीरे-धीरे स्वतंत्र हो सकती है।”

 

विवेक ने पन्ना पलटा।

 

“मैंने उसे पहली बार कुएँ के पास देखा था।”

 

अगले पन्ने पर—

 

“वह मेरी नकल करती थी।”

 

फिर—

 

“कल रात उसने मुझसे पहले घर में प्रवेश किया।”

 

विवेक की साँस रुक गई।

 

फिर एक वाक्य था—

 

“अगर मेरी परछाई अलग हो जाए तो मुझे मार देना, क्योंकि फिर मैं मैं नहीं रहूँगा।”

 

डायरी उसके हाथ से गिर गई।

 

अचानक तहखाने की लाइट जल गई।

 

विवेक चौंक गया।

 

सामने एक बूढ़ा आदमी खड़ा था।

 

“कौन?”

 

आदमी धीरे-धीरे आगे आया।

 

वह शंकर चाचा थे।

 

विवेक ने राहत की साँस ली।

 

“चाचा, आप यहाँ कैसे?”

 

शंकर चाचा ने कहा—

 

“क्योंकि अब समय आ गया है कि तुम्हें सब पता चले।”

 

उन्होंने एक पुरानी तस्वीर दी।

 

तस्वीर में पाँच लोग थे।

 

विवेक के दादा, शंकर चाचा, गाँव का पुराना प्रधान और दो अजनबी लोग।

 

पीछे एक पुराना कुआँ दिखाई दे रहा था।

 

“ये कौन लोग हैं?”

 

शंकर चाचा बोले—

 

“तीस साल पहले गाँव में एक साधु आया था। उसने दावा किया था कि वह इंसान की परछाई को अलग करके उसे हमेशा के लिए नियंत्रित कर सकता है।”

 

विवेक ने पूछा—

 

“क्यों?”

 

“धन और ताकत के लिए।”

 

“क्या मेरे दादा ने उसकी मदद की?”

 

“हाँ।”

 

विवेक का चेहरा कठोर हो गया।

 

“फिर?”

 

शंकर चाचा ने कहा—

 

“प्रयोग के दौरान कुछ गलत हो गया।”

 

“क्या?”

 

“साधु की अपनी परछाई उसके शरीर से अलग हो गई।”

 

विवेक ने धीरे से पूछा—

 

“और फिर?”

 

“उसने बाकी लोगों की परछाइयाँ निगलना शुरू कर दिया।”

 

तभी तहखाने में तेज़ हवा चली।

 

दीवार पर लगी सभी तस्वीरें एक साथ हिलने लगीं।

 

विवेक की अपनी परछाई दीवार पर दिखाई दी।

 

लेकिन अब उसके पीछे एक दूसरी बड़ी परछाई खड़ी थी।

 

शंकर चाचा ने घबराकर कहा—

 

“वह आ गया।”

 

अंधेरे में एक भारी आवाज़ गूँजी—

 

“तुम्हारे दादा ने मुझे धोखा दिया था।”

 

विवेक ने पूछा—

 

“तुम कौन हो?”

 

दीवार पर एक विशाल काली आकृति बनी।

 

“मैं वह हूँ जिसे तुम्हारे दादा ने जगाया था।”

 

“तुमने उन्हें मारा?”

 

“नहीं।”

 

आवाज़ हँसी।

 

“उन्होंने खुद अपनी परछाई मुझे दे दी थी।”

 

विवेक पीछे हट गया।

 

“मेरी परछाई तुमसे क्यों जुड़ी है?”

 

“क्योंकि तुम उसी खून से हो।”

 

अचानक विवेक की परछाई जमीन से उठकर दीवार पर चढ़ गई।

 

वह धीरे-धीरे इंसान का आकार लेने लगी।

 

फिर उसकी आवाज़ आई—

 

“मुझे आज़ाद करो।”

 

विवेक ने चौंककर कहा—

 

“तुम बोल सकती हो?”

 

परछाई ने सिर हिलाया।

 

“मैं तुम्हारी परछाई नहीं हूँ।”

 

“तो कौन हो?”

 

उसने जवाब दिया—

 

“मैं तुम्हारे दादा की परछाई हूँ।”

 

विवेक स्तब्ध रह गया।

 

“मेरे दादा की?”

 

“उन्होंने अपनी आत्मा का एक हिस्सा मुझे देकर उस काली शक्ति को कैद किया था।”

 

शंकर चाचा ने कहा—

 

“लेकिन अब वह कैद टूट रही है।”

 

तभी तहखाने का दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया।

 

धड़ाम!

 

काली शक्ति की आवाज़ गूँजी—

 

“आज तुम्हारे शरीर की बारी है।”

 

अचानक विवेक की परछाई उसके शरीर से अलग होकर सामने आ गई।

 

कमरे में दो परछाइयाँ थीं।

 

एक विवेक की।

 

दूसरी काली शक्ति की।

 

दोनों एक-दूसरे पर टूट पड़ीं।

 

दीवारें काँपने लगीं।

 

शंकर चाचा चिल्लाए—

 

“विवेक! कुएँ तक जाओ!”

 

“क्यों?”

 

“वहीं से इसे वापस भेजा जा सकता है!”

 

विवेक दौड़कर सीढ़ियों की ओर गया।

 

पीछे से काली परछाई उसका पीछा करने लगी।

 

वह लगभग उसके पैरों तक पहुँच चुकी थी।

 

विवेक बाहर निकला और पुराने कुएँ की तरफ भागा।

 

लेकिन वहाँ पहुँचते ही उसने देखा—

 

कुएँ के अंदर कोई खड़ा था।

 

एक औरत।

 

सफेद चेहरा।

 

काले बाल।

 

और उसकी परछाई…

 

कुएँ की दीवार पर नहीं थी।

 

वह सीधे विवेक की तरफ आ रही थी।

 

औरत ने धीरे से कहा—

 

“तुम्हारे दादा ने मुझे यहाँ बंद किया था।”

 

विवेक ने काँपते हुए पूछा—

 

“तुम कौन हो?”

 

औरत ने मुस्कुराकर कहा—

 

“मैं वह परछाई हूँ… जिससे बाकी सारी परछाइयाँ पैदा हुई थीं।”

 

कुएँ के अंदर से अचानक हजारों लोगों की फुसफुसाहट सुनाई देने लगी।

 

और विवेक ने महसूस किया—

 

उसकी अपनी परछाई अब पूरी तरह गायब हो चुकी थी।

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