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लाल चुड़ैल

पढ़ने का समय : 6 मिनट

लाल चुड़ैल

 

(भाग 4 — देवेंद्र का साथी)

 

गौरी की आवाज़ सुनने के बाद अमन कई मिनट तक अपने कमरे के बीचोंबीच खड़ा रहा।

 

कमरे में अंधेरा था।

 

खिड़की खुली थी।

 

और फर्श पर वही लाल चूड़ी पड़ी थी।

 

अमन ने काँपते हाथों से लाइट जलाई।

 

कमरे में कोई नहीं था।

 

उसने तुरंत रवि को फोन किया।

 

फोन कई बार बजा, लेकिन किसी ने नहीं उठाया।

 

कुछ देर बाद अचानक फोन बजा।

 

स्क्रीन पर रवि का नाम था।

 

अमन ने फोन उठाया।

 

“रवि?”

 

दूसरी तरफ कुछ सेकंड तक सन्नाटा रहा।

 

फिर एक धीमी आवाज़ आई—

 

“अमन… लाल हवेली मत जाना।”

 

अमन ने पूछा—

 

“क्यों?”

 

रवि ने कहा—

 

“वहाँ कोई वापस आ गया है।”

 

“कौन?”

 

फोन कट गया।

 

अमन ने तुरंत रवि को दोबारा फोन किया।

 

इस बार फोन बंद था।

 

सुबह होते ही अमन गाँव के लिए निकल पड़ा।

 

जब वह बरवा पहुँचा तो रवि उसे गाँव के बाहर पुराने मंदिर के पास मिला।

 

रवि के चेहरे पर डर साफ दिखाई दे रहा था।

 

अमन ने पूछा—

 

“कल रात क्या हुआ?”

 

रवि ने अपनी जेब से एक पुरानी तस्वीर निकाली।

 

तस्वीर देखकर अमन के होश उड़ गए।

 

उसमें देवेंद्र खड़ा था।

 

उसके साथ एक दूसरा आदमी था।

 

वही आदमी…

 

जिसे अमन ने बचपन से गाँव के मंदिर का पुजारी समझा था।

 

पंडित रघुनाथ।

 

अमन ने कहा—

 

“ये तो मंदिर के पंडित जी हैं।”

 

रवि ने सिर हिलाया।

 

“लेकिन यह तस्वीर तीस साल पुरानी है।”

 

दोनों तुरंत पंडित रघुनाथ के पास पहुँचे।

 

पंडित जी मंदिर में अकेले बैठे मंत्र पढ़ रहे थे।

 

अमन ने तस्वीर उनके सामने रख दी।

 

पंडित जी ने तस्वीर देखी तो उनका चेहरा बदल गया।

 

“यह तुम्हें कहाँ मिली?”

 

“हवेली में।”

 

पंडित जी कुछ देर चुप रहे।

 

फिर बोले—

 

“तुम्हें वहाँ नहीं जाना चाहिए था।”

 

अमन ने गुस्से में पूछा—

 

“देवेंद्र के साथ आपका क्या संबंध था?”

 

पंडित जी ने कोई जवाब नहीं दिया।

 

रवि ने कहा—

 

“हमें सब पता है।”

 

पंडित जी ने धीरे से सिर उठाया।

 

“नहीं। तुम्हें कुछ भी पता नहीं।”

 

उन्होंने मंदिर का दरवाज़ा बंद कर दिया।

 

“देवेंद्र सिर्फ एक लालची आदमी नहीं था। वह तांत्रिक साधना करता था।”

 

अमन की रीढ़ में ठंड उतर गई।

 

“किस चीज़ की साधना?”

 

पंडित जी ने मंदिर के पीछे बने एक छोटे कमरे की ओर इशारा किया।

 

“मृत आत्माओं को नियंत्रित करने की।”

 

उन्होंने बताया कि देवेंद्र को विश्वास था कि अगर किसी शक्तिशाली आत्मा को अपने वश में कर लिया जाए तो इंसान अमर हो सकता है।

 

उसने कई वर्षों तक पुराने श्मशान में साधना की।

 

लेकिन एक रात उसे ऐसी आत्मा मिली जिसे वह नियंत्रित नहीं कर सका।

 

वह आत्मा थी—

 

लाल चुड़ैल।

 

अमन ने धीरे से पूछा—

 

“चंद्रा?”

 

पंडित जी ने सिर हिलाया।

 

“नहीं।”

 

कमरे में सन्नाटा छा गया।

 

“तो फिर चंद्रा कौन थी?”

 

पंडित जी ने कहा—

 

“चंद्रा उस आत्मा की शिकार थी।”

 

अमन के हाथ से तस्वीर गिरते-गिरते बची।

 

“क्या मतलब?”

 

पंडित जी ने बताया—

 

“जिस रात देवेंद्र ने चंद्रा और गौरी को तहखाने में बंद किया, उसी रात उसने अपनी तांत्रिक साधना पूरी करने की कोशिश की। चंद्रा की मौत के बाद उसकी आत्मा तो वहीं रह गई… लेकिन उसी समय तहखाने में एक दूसरी शक्ति जाग गई।”

 

“वही लाल चुड़ैल?”

 

“हाँ।”

 

रवि ने पूछा—

 

“लेकिन वह चंद्रा के रूप में क्यों दिखाई देती थी?”

 

पंडित जी ने कहा—

 

“क्योंकि वह लोगों को अपने पास बुलाने के लिए परिचित चेहरा पहनती थी।”

 

अमन को पिछली रात गौरी की बात याद आई—

 

“देवेंद्र अकेला नहीं था।”

 

उसने पूछा—

 

“तो देवेंद्र का साथी कौन था?”

 

पंडित जी ने उसकी आँखों में देखा।

 

“मैं।”

 

कमरे में जैसे समय रुक गया।

 

रवि ने गुस्से में पंडित जी को पकड़ लिया।

 

“तुमने चंद्रा को मरने दिया!”

 

पंडित जी ने विरोध नहीं किया।

 

“हाँ।”

 

उनकी आँखों से आँसू बहने लगे।

 

“मैंने देवेंद्र की मदद की थी। लेकिन मुझे नहीं पता था कि वह किस शक्ति को बुला रहा है।”

 

अमन ने पूछा—

 

“फिर आपने हमें यह सब पहले क्यों नहीं बताया?”

 

पंडित जी ने जवाब दिया—

 

“क्योंकि मुझे डर था कि अगर मैंने सच बताया तो वह शक्ति फिर जाग जाएगी।”

 

अचानक मंदिर की घंटी अपने आप बजने लगी।

 

टन… टन… टन…

 

पंडित जी का चेहरा सफेद पड़ गया।

 

“वह जाग चुकी है।”

 

मंदिर के बाहर हवा तेज़ हो गई।

 

दीवारों पर लाल परछाइयाँ दिखाई देने लगीं।

 

फिर एक आवाज़ आई—

 

“रघुनाथ…”

 

पंडित जी काँपने लगे।

 

“नहीं…”

 

आवाज़ फिर आई—

 

“तुमने वादा किया था…”

 

अमन ने पूछा—

 

“किससे?”

 

पंडित जी ने मंदिर के फर्श की ओर देखा।

 

“उससे।”

 

अचानक फर्श पर लाल रंग की एक दरार दिखाई दी।

 

दरार फैलती गई।

 

और मंदिर के नीचे से एक सीढ़ी दिखाई देने लगी।

 

पंडित जी पीछे हटे।

 

“यह रास्ता… लाल हवेली तक जाता है।”

 

अमन ने पूछा—

 

“लेकिन हवेली तो गाँव के दूसरी तरफ है।”

 

“जमीन के नीचे रास्ते हैं।”

 

तीनों नीचे उतरने लगे।

 

सुरंग बहुत पुरानी थी।

 

दीवारों पर अजीब निशान बने थे।

 

कुछ जगहों पर लाल मोमबत्तियाँ जल रही थीं।

 

अमन ने पूछा—

 

“ये सब अभी भी जल रही हैं?”

 

पंडित जी ने कहा—

 

“इन्हें कोई जलाता नहीं।”

 

अचानक पीछे से किसी के चलने की आवाज़ आई।

 

छप… छप… छप…

 

तीनों मुड़े।

 

सुरंग खाली थी।

 

फिर आवाज़ सामने से आई।

 

एक लड़की दिखाई दी।

 

गौरी।

 

वह धीरे-धीरे उनकी तरफ चल रही थी।

 

लेकिन इस बार उसकी आँखें फिर काली थीं।

 

रवि ने फुसफुसाकर कहा—

 

“यह गौरी नहीं है।”

 

गौरी अचानक मुस्कुराई।

 

“बहुत देर कर दी तुम लोगों ने।”

 

पंडित जी ने मंत्र पढ़ना शुरू किया।

 

गौरी की हँसी तेज़ होती गई।

 

फिर उसके पीछे एक विशाल लाल परछाई दिखाई दी।

 

अमन ने पहली बार उस असली शक्ति को देखा।

 

वह इंसान जैसी नहीं थी।

 

उसके बाल जमीन तक फैले थे।

 

चेहरा आधा इंसान का था और आधा राख जैसा।

 

और उसकी आँखें पूरी तरह लाल थीं।

 

उसने पंडित रघुनाथ की ओर देखा।

 

“तीस साल पहले तुमने मुझे बुलाया था।”

 

पंडित जी काँपने लगे।

 

“मैंने गलती की थी।”

 

वह शक्ति हँसी।

 

“गलती की कीमत कोई और नहीं… तुम दोगे।”

 

अचानक पंडित जी हवा में उठ गए।

 

अमन और रवि चीख पड़े।

 

पंडित जी ने आखिरी बार अमन की ओर देखा।

 

“लाल हवेली के नीचे… तीसरा दरवाज़ा…”

 

फिर उनकी गर्दन एक तरफ झुक गई।

 

उनका शरीर जमीन पर गिर पड़ा।

 

सुरंग में सन्नाटा छा गया।

 

अमन ने पूछा—

 

“तीसरा दरवाज़ा क्या है?”

 

पीछे से चंद्रा की आवाज़ आई—

 

“वही दरवाज़ा… जिसे कभी खोलना नहीं चाहिए।”

 

अमन ने पीछे देखा।

 

चंद्रा खड़ी थी।

 

लेकिन उसके चेहरे पर इस बार डर था।

 

उसने कहा—

 

“क्योंकि उसके पीछे मैं नहीं हूँ।”

 

“तो कौन है?”

 

चंद्रा ने धीरे से जवाब दिया—

 

“जिसने मुझे लाल चुड़ैल बनाया…”

 

और उसी क्षण सुरंग की दीवार पर एक तीसरा लोहे का दरवाज़ा दिखाई दिया।

 

उस दरवाज़े पर खून से लिखा था—

 

“जो इसे खोलेगा, उसकी आत्मा कभी वापस नहीं आएगी।”

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