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😱 शिनिगामी 😱( मौत का संदेशवाहक)😱

पढ़ने का समय : 8 मिनट

 

 

“हारुतो… तुम्हारे पिता वापस आ गए हैं।”

 

तहखाने में खड़ा हारुतो पत्थर की तरह जम गया।

 

ऊपर से किसी के कदमों की आवाज़ आ रही थी।

 

ठक… ठक… ठक…

 

धीरे-धीरे वे कदम सीढ़ियों की तरफ बढ़ने लगे।

 

हारुतो ने अपनी साँस रोक ली।

 

उसे दादी की बात याद आई—

 

“जो भी सुनो… पीछे मत देखना।”

 

लेकिन तभी ऊपर से उसके पिता की आवाज़ आई।

 

“हारुतो?”

 

वह आवाज़ बिल्कुल वैसी ही थी।

 

गहरी।

 

शांत।

 

जैसी आवाज़ वह बचपन से सुनता आया था।

 

हारुतो की आँखों से आँसू निकल पड़े।

 

“पापा…?”

 

कोई जवाब नहीं आया।

 

कुछ सेकंड बाद आवाज़ फिर आई।

 

“बेटा, बाहर आओ।”

 

हारुतो ने तहखाने के दरवाज़े की ओर कदम बढ़ाया।

 

तभी उसे कुछ अजीब महसूस हुआ।

 

उसके पिता हमेशा उसे “हारु” कहकर बुलाते थे।

 

कभी “हारुतो” नहीं।

 

उसका दिल तेजी से धड़कने लगा।

 

वह दरवाज़े से कुछ कदम पीछे हट गया।

 

फिर ऊपर से उसकी दादी की चीख सुनाई दी।

 

“हारुतो! दरवाज़ा मत खोलना!”

 

और उसके तुरंत बाद…

 

एक भारी आवाज़ आई।

 

धड़ाम!

 

फिर सब शांत हो गया।

 

हारुतो ने काँपते हाथों से दरवाज़े की कुंडी पकड़ी।

 

उसने धीरे से दरवाज़ा खोला।

 

ऊपर का कमरा खाली था।

 

लालटेन टूटी हुई थी।

 

फर्श पर दादी की चादर पड़ी थी।

 

लेकिन दादी कहीं नहीं थीं।

 

हारुतो ने उन्हें पुकारा।

 

“दादी?”

 

कोई उत्तर नहीं।

 

तभी उसे फर्श पर कुछ दिखाई दिया।

 

काले रंग की मिट्टी से बने पैरों के निशान।

 

वे दरवाज़े से शुरू होकर घर के पीछे वाले कमरे तक जा रहे थे।

 

हारुतो उनके पीछे चल पड़ा।

 

कमरे का दरवाज़ा आधा खुला था।

 

अंदर से सड़ी हुई गंध आ रही थी।

 

उसने दरवाज़ा खोला।

 

और जो उसने देखा, उसे देखकर उसका शरीर सुन्न पड़ गया।

 

कमरे की दीवार पर दर्जनों तस्वीरें लगी थीं।

 

गाँव के लोगों की तस्वीरें।

 

बच्चे।

 

बूढ़े।

 

औरतें।

 

पुरुष।

 

हर तस्वीर के नीचे एक तारीख लिखी थी।

 

कुछ तारीखें बहुत पुरानी थीं।

 

लेकिन सबसे डरावनी बात यह थी कि कई तस्वीरों में लोगों के चेहरों पर लाल निशान बने थे।

 

हारुतो ने एक तस्वीर उठाई।

 

वह उसकी माँ की थी।

 

नीचे तारीख लिखी थी—

 

12 अक्टूबर 2006

 

और उसके नीचे एक शब्द था—

 

“मृत।”

 

हारुतो का गला सूख गया।

 

उसकी माँ की मृत्यु भी 12 अक्टूबर 2006 को हुई थी।

 

उसने अगली तस्वीर उठाई।

 

उसके पिता की तस्वीर थी।

 

नीचे लिखा था—

 

“मृत — 3 अगस्त 2014।”

 

हारुतो के हाथ से तस्वीर गिर गई।

 

उसका पिता जिंदा था।

 

कम से कम वह यही सोचता आया था।

 

उसके पिता पिछले बारह वर्षों से शहर में काम कर रहे थे।

 

हर महीने पैसे भेजते थे।

 

हर कुछ दिनों में फोन करते थे।

 

लेकिन अचानक उसे कुछ याद आया।

 

पिछले तीन महीनों से उसके पिता ने उसे फोन नहीं किया था।

 

उन्होंने सिर्फ संदेश भेजे थे।

 

छोटे-छोटे संदेश।

 

“मैं ठीक हूँ।”

 

“जल्द घर आऊँगा।”

 

“दरवाज़ा रात में मत खोलना।”

 

हारुतो के हाथ काँपने लगे।

 

तभी कमरे के कोने से किसी बच्चे के रोने की आवाज़ आई।

 

“माँ…”

 

हारुतो धीरे से मुड़ा।

 

वहाँ एक छोटी लड़की बैठी थी।

 

उसके बाल उसके पूरे चेहरे को ढके हुए थे।

 

हारुतो ने पूछा,

 

“तुम कौन हो?”

 

लड़की ने सिर उठाया।

 

उसका चेहरा बिल्कुल सफेद था।

 

उसकी आँखें नहीं थीं।

 

सिर्फ दो काले खाली गड्ढे।

 

हारुतो पीछे हट गया।

 

लड़की ने मुस्कुराते हुए कहा,

 

“तुम्हारे पिता ने मुझे भी यही सवाल पूछा था।”

 

अचानक कमरे की सारी तस्वीरें अपने-आप हिलने लगीं।

 

फिर एक साथ गिरने लगीं।

 

धड़… धड़… धड़…

 

लड़की गायब हो गई।

 

हारुतो कमरे से भागकर बाहर आया।

 

घर का मुख्य दरवाज़ा खुला हुआ था।

 

बाहर बारिश रुक चुकी थी।

 

लेकिन जंगल की तरफ से धुंध गाँव में उतर रही थी।

 

और उस धुंध के भीतर…

 

एक आदमी खड़ा था।

 

लंबा कोट।

 

झुका हुआ सिर।

 

हाथ में पुरानी छतरी।

 

हारुतो की आँखें फैल गईं।

 

“पापा?”

 

आदमी ने सिर उठाया।

 

वह सचमुच उसका पिता था।

 

हारुतो दौड़कर उसके पास गया।

 

“पापा!”

 

उसके पिता ने उसे गले लगा लिया।

 

उनका शरीर बर्फ की तरह ठंडा था।

 

हारुतो काँप गया।

 

“आप इतने साल कहाँ थे?”

 

पिता ने कुछ नहीं कहा।

 

हारुतो ने उनका चेहरा देखा।

 

चेहरा वही था।

 

लेकिन आँखें…

 

उनमें कोई भाव नहीं था।

 

“पापा?”

 

पिता ने धीरे से कहा,

 

“तुम्हें यहाँ नहीं होना चाहिए था।”

 

“क्या?”

 

“तुम्हारी दादी ने गलती की।”

 

हारुतो ने घबराकर पूछा,

 

“दादी कहाँ हैं?”

 

पिता ने जंगल की तरफ देखा।

 

“वह उसे रोकने गई है।”

 

“किसे?”

 

पिता ने उत्तर नहीं दिया।

 

तभी जंगल के भीतर से घंटी बजी।

 

टन…

 

पिता का चेहरा बदल गया।

 

“भागो।”

 

“लेकिन—”

 

“भागो!”

 

उनकी आवाज़ अचानक इतनी तेज़ थी कि हारुतो पीछे हट गया।

 

जंगल से कोई चीज़ उनकी तरफ आ रही थी।

 

पेड़ों के बीच एक काली आकृति दिखाई दी।

 

लंबे हाथ।

 

झुका हुआ शरीर।

 

और हाथ में वही लोहे की घंटी।

 

शिनिगामी।

 

हारुतो के पिता ने उसका हाथ पकड़ा।

 

“अगर वह तुम्हारा नाम पुकारे, तो जवाब मत देना।”

 

दोनों गाँव की तरफ भागने लगे।

 

पीछे से घंटी लगातार बज रही थी।

 

टन… टन… टन…

 

हर घंटी के साथ गाँव का एक घर अंधेरे में डूबता जा रहा था।

 

पहले मंदिर की बत्तियाँ बुझीं।

 

फिर स्कूल।

 

फिर गाँव के घर।

 

एक-एक करके पूरा गाँव अंधेरे में डूब गया।

 

कुछ ही मिनटों में पूरा कुरोमोरी काली धुंध में घिर चुका था।

 

पिता हारुतो को गाँव के पुराने मंदिर में ले गए।

 

मंदिर का दरवाज़ा बंद करते हुए उन्होंने कहा,

 

“यह जगह कुछ समय के लिए उसे रोक सकती है।”

 

हारुतो ने पूछा,

 

“आपको यह सब कैसे पता है?”

 

पिता चुप रहे।

 

“आप कौन हैं?”

 

पिता ने उसकी ओर देखा।

 

“मैं तुम्हारा पिता हूँ।”

 

“नहीं!”

 

हारुतो की आवाज़ काँप रही थी।

 

“मेरे पिता की मौत 2014 में हो चुकी थी।”

 

कुछ पल तक दोनों एक-दूसरे को देखते रहे।

 

फिर उसके पिता ने सिर झुका लिया।

 

“तुम्हें सच पता चल गया।”

 

मंदिर के अंदर एक पुरानी घंटी लटकी थी।

 

पिता ने उसे देखा।

 

“बारह साल पहले मैं मर गया था।”

 

हारुतो की आँखों से आँसू निकल आए।

 

“तो फिर आप…”

 

“मैं यहाँ अपनी इच्छा से नहीं हूँ।”

 

“कौन लाया आपको?”

 

पिता ने धीमे स्वर में कहा,

 

“शिनिगामी।”

 

हारुतो पीछे हट गया।

 

“क्यों?”

 

पिता ने मंदिर के फर्श पर बने एक पुराने निशान की तरफ इशारा किया।

 

वहाँ एक गोल घेरा बना था।

 

उसके चारों ओर जापानी अक्षरों जैसे चिन्ह खुदे थे।

 

“हर पचास साल में शिनिगामी एक परिवार चुनता है।”

 

“उस परिवार के किसी एक व्यक्ति को मृत्यु के बाद उसका सेवक बनना पड़ता है।”

 

हारुतो ने डरते हुए पूछा,

 

“और हमारा परिवार?”

 

पिता ने उसकी आँखों में देखा।

 

“हमारा परिवार पिछले सौ साल से चुना जा रहा है।”

 

तभी मंदिर के बाहर किसी ने दरवाज़ा खटखटाया।

 

ठक…

 

दोनों चुप हो गए।

 

फिर दूसरी दस्तक।

 

ठक… ठक…

 

पिता ने हारुतो के मुँह पर उंगली रख दी।

 

बाहर से दादी की आवाज़ आई।

 

“हारुतो… दरवाज़ा खोलो।”

 

हारुतो ने राहत की साँस ली।

 

“दादी!”

 

वह दरवाज़े की तरफ बढ़ा।

 

लेकिन पिता ने उसका हाथ पकड़ लिया।

 

“रुको।”

 

“वह दादी हैं!”

 

पिता ने सिर हिलाया।

 

“नहीं।”

 

बाहर से फिर आवाज़ आई।

 

“हारुतो… मैं हूँ।”

 

हारुतो दरवाज़े के पास गया और नीचे की दरार से बाहर देखने लगा।

 

उसे दादी के पैर दिखाई दिए।

 

वह वहीं खड़ी थीं।

 

लेकिन…

 

उनके पैरों के पंजे उल्टी दिशा में मुड़े हुए थे।

 

हारुतो पीछे हट गया।

 

बाहर खड़ी चीज़ अचानक हँसने लगी।

 

फिर दादी की आवाज़ बदल गई।

 

“तुम्हारे पिता ने तुम्हें बहुत कुछ बता दिया।”

 

दरवाज़े पर एक लंबी काली उँगली दिखाई दी।

 

“लेकिन एक बात नहीं बताई…”

 

पिता का चेहरा सफेद पड़ गया।

 

काली उँगली धीरे-धीरे दरवाज़े पर ऊपर की तरफ चलने लगी।

 

“तुम्हारे परिवार को शिनिगामी ने क्यों चुना।”

 

हारुतो ने पिता की तरफ देखा।

 

“क्यों?”

 

पिता ने आँखें बंद कर लीं।

 

बाहर से आवाज़ आई—

 

“क्योंकि तुम्हारे पूर्वजों ने…”

 

एक लंबी खामोशी हुई।

 

फिर दरवाज़े के पीछे से फुसफुसाहट आई—

 

“पहले शिनिगामी को बनाया था।”

 

मंदिर के अंदर अचानक सारी मोमबत्तियाँ जल उठीं।

 

और सामने रखी बुद्ध की मूर्ति के पीछे…

 

एक पुराना लकड़ी का दरवाज़ा दिखाई दिया।

 

हारुतो ने उसे पहले कभी नहीं देखा था।

 

दरवाज़े पर खून से एक ही वाक्य लिखा था—

 

“जिसने शिनिगामी को जन्म दिया, उसका अंतिम वंशज ही उसे खत्म कर सकता है।”

 

हारुतो ने काँपते हुए पूछा,

 

“अंतिम वंशज कौन है?”

 

उसके पिता ने उसकी तरफ देखा।

 

और पहली बार…

 

उनकी आँखों में डर दिखाई दिया।

 

“तुम।”

 

उसी पल मंदिर की घंटी अपने-आप बज उठी।

 

टन…

 

और दूर जंगल से किसी ने चीखकर कहा—

 

“हारुतो!!!”

 

तीसरी घंटी बजते ही मंदिर की सारी खिड़कियाँ टूट गईं।

 

काली धुंध अंदर भरने लगी।

 

और उस धुंध के बीच…

 

एक बहुत लंबी आकृति धीरे-धीरे मंदिर के अंदर प्रवेश कर गई।

 

उसके चेहरे पर इस बार कोई आँखें नहीं थीं।

 

लेकिन वह सीधे हारुतो को देख रही थी।

 

शिनिगामी ने अपना हाथ उठाया।

 

और उसकी हथेली पर एक नया नाम उभर आया—

 

“हारुतो — मृत्यु: आज रात।”

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