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घर से भागी बेटी का बाप

पढ़ने का समय : 6 मिनट

 

सांझ ढलते ही रामनाथ बाबू का दिल किसी अनजाने भय से बैठने लगता था। उनके घर के दालान में जलने वाला पीला बल्ब अब सिर्फ दीवारों पर पसरे सन्नाटे को ही रोशन करता था। उस सूनेपन में एक ही आवाज़ गूंजती रहती थी कमरे की खाली अलमारी और पलंग पर बिखरे हुए कुछ पुराने कागज़।

घर से भागी हुई बेटी रिया का बाप होना दुनिया की सबसे अजीब सजा है। न तो वह खुलकर रो सकते हैं, न ही किसी से अपना दर्द कह सकते हैं। समाज की नज़रों में उनकी इज़्ज़त उनकी बेटी के पैरों तले रौंदी जा चुकी थी, लेकिन एक बाप के दिल से पूछिए—क्या इज़्ज़त उस खून के रिश्ते से बड़ी हो सकती है, जिसे उसने अपनी उंगली पकड़कर चलना सिखाया था?

 

वह सुबह आम दिनों जैसी बिल्कुल नहीं थी। २२ मार्च का वह दिन रामनाथ बाबू की ज़िंदगी को हमेशा के लिए दो हिस्सों में बांट गया। रोज़ की तरह सुबह पांच बजे उनकी आंख खुली। उन्होंने चाय की केतली गैस पर रखी और नेहमी की आदत के मुताबिक रिया के कमरे का दरवाज़ा खटखटाया।

“रिया… ओ रिया, उठ जा बेटा। कॉलेज के लिए देर हो रही है।”

कोई जवाब नहीं आया। आमतौर पर रिया अलार्म बजते ही उठ जाती थी। रामनाथ बाबू ने थोड़ा और ज़ोर से दरवाज़ा धक्का दिया। कुंडी अंदर से बंद नहीं थी, वह हल्की सी आवाज़ के साथ खुल गई।

कमरे का नज़ारा देखकर रामनाथ बाबू के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। पलंग की चादर करीने से तह की हुई थी, लेकिन रिया का तकिया गायब था। मेज़ पर एक लिफाफा रखा था, जिस पर मोटे अक्षरों में लिखा था “पापा, मुझे माफ़ कर देना।”

उस एक पल में रामनाथ बाबू के सिर के बाल और सफेद हो गए। उनके हाथ से चाय का कप छूटकर फर्श पर बिखर गया। गर्म चाय उनके पैरों के पास फैल गई, लेकिन उन्हें उसका अहसास तक नहीं हुआ। उन्होंने कांपते हाथों से वह चिट्ठी खोली। उसमें लिखा था:

 

 “पापा, मैं जानती हूं कि आप मुझसे बहुत प्यार करते हैं और मेरे भविष्य के लिए आपके पास बहुत बड़े सपने हैं। लेकिन मैं उस घुटन भरी ज़िंदगी में घुट रही हूं जहाँ मेरी आज़ादी और मेरी पसंद का कोई मोल नहीं है। मैं अपनी मर्ज़ी से अपनी ज़िंदगी जीने जा रही हूँ। राहुल के साथ मैंने नई दुनिया बसाने का फैसला किया है। कृपया मुझे ढूंढने की कोशिश मत करना। आपकी बेटी—रिया।”

 

उस दिन के बाद से रामनाथ बाबू की दुनिया पूरी तरह बदल गई। जिस मोहल्ले में वे सिर उठाकर चलते थे, अब वहां से निकलते वक्त लोग खिड़कियों के परदे गिरा लेते थे या कानाफूसी करने लगते थे।

मोहल्ले के चौधरी साहब ने तो यहाँ तक कह दिया था, “अरे रामनाथ जी, आधुनिकता के चक्कर में बेटी को ज़्यादा आज़ादी दे दी, नतीजा सामने है। हमारी बेटियों को देखिए, घर की चारदीवारी में संस्कारी हैं।”

रामनाथ बाबू ने उन ताने मारने वालों को कोई जवाब नहीं दिया। वे चुपचाप सिर झुकाकर आगे बढ़ जाते। लेकिन उनके भीतर एक तूफान उठ रहा था। वे रात-रात भर जागकर छत पर टहलते रहते। उनकी आँखों के सामने रिया का बचपन नाचने लगता—जब वह घुटनों के बल चलती थी, जब उसने पहली बार ‘पापा’ कहा था, जब स्कूल में पहला पुरस्कार मिलने पर उसने गर्व से उनका हाथ पकड़ा था।

वे खुद से बार-बार सवाल पूछते—”कहाँ कमी रह गई थी मेरी परवरिश में?” क्या उन्होंने उसे पढ़ाने-लिखाने में कोई कसर छोड़ी थी? क्या उसकी हर ज़रूरत को पूरा करना गुनाह था? या फिर उन्होंने उसे अपनी उम्मीदों के बोझ तले इतना दबा दिया था कि उसे घर से भागने के अलावा कोई रास्ता नहीं दिखा?

 

रिया के जाने के एक महीने बाद पुलिस थाने से एक सिपाही रामनाथ बाबू के घर आया। उसने औपचारिकता निभाते हुए कहा, “बाबूजी, बालिग है लड़की। उसने कोर्ट मैरिज कर ली है और थाने में बयान दर्ज करा दिया है कि वह अपनी मर्जी से गई है। अब हम इसमें कुछ नहीं कर सकते।”

रामनाथ बाबू ने सिपाही को धन्यवाद कहा और दरवाज़ा बंद कर दिया। उस कानूनी कागज़ ने रिया को तो आज़ाद कर दिया था, लेकिन रामनाथ बाबू को अपने ही घर में कैद कर दिया था।

समय बीतता गया। लोग भूलने लगे कि रामनाथ बाबू के घर में कोई आंधी आई थी। लेकिन एक बाप की यादें कभी नहीं मिटतीं। रिया की मां तो इस सदमे को बर्दाश्त नहीं कर पाईं और रिया के जाने के छह महीने बाद ही दिल का दौरा पड़ने से चल बसीं। जाने से पहले उनके आखिरी शब्द थे—”रामनाथ… रिया को माफ कर देना… वह हमारी ही तो खून है।”

पत्नी की मौत ने रामनाथ बाबू को अंदर से पूरी तरह तोड़ दिया। अब वे इस घर में बिल्कुल अकेले थे। उनका अकेलापन चीख-चीखकर उन्हें डराता था।

वह एक फोन कॉल

एक सर्द शाम थी। रामनाथ बाबू अपने बरामदे में बैठे चाय की चुस्कियां ले रहे थे, तभी उनकी जेब में रखा पुराना फोन बज उठा। स्क्रीन पर एक अनजाना मोबाइल नंबर चमक रहा था।

उन्होंने फोन उठाया और कांपती आवाज़ में कहा, “हैलो…”

दूसरी तरफ से कुछ सेकंड तक सिर्फ सिसकियों की आवाज़ आती रही। फिर एक जानी-पहचानी, डरी हुई लेकिन प्यारी सी आवाज़ गूंजी—”पापा…”

वह एक शब्द रामनाथ बाबू के सीने को चीरकर निकल गया। उनके हाथ से फोन छूटते-छूटते बचा। गले में कुछ अटक गया था, आवाज़ बाहर नहीं आ रही थी।

“पापा… मैं रिया बोल रही हूँ,” उधर से फिर आवाज़ आई, इस बार रुलाई फूट पड़ी थी। “पापा… मुझे बहुत पछतावा है। राहुल… वह जैसा दिखता था, वैसा नहीं है। वह मुझे मारता है, रोज़ शराब पीकर परेशान करता है। मेरा सब कुछ लुट गया पापा… अब मेरे पास आपके सिवा इस दुनिया में कोई नहीं है। क्या… क्या आप मुझे अपने पास वापस आने देंगे?”

बाप का दिल और समाज की दीवारें

उस एक पल में रामनाथ बाबू के सामने पूरी फिल्म की तरह पिछले दो साल का संघर्ष घूम गया। समाज का ताना, पत्नी की मौत, उनका अपना अकेलापन और रिया की वह रुलाई।

एक तरफ उनका वह स्वाभिमान था, जिसे मोहल्ले वालों ने रौंद डाला था; दूसरी तरफ उस बाप का दिल था जो अपनी औलाद को तड़पता हुआ नहीं देख सकता था। समाज कहता था कि जो बेटी बाप की इज़्ज़त नीलाम कर दे, उसे कभी मुड़कर नहीं देखना चाहिए। लेकिन बाप का दिल कह रहा था—”इज़्ज़त और प्रतिष्ठा से बड़ी मेरी औलाद की जान और उसकी मुस्कान है।”

रामनाथ बाबू की आंखों से आंसुओं का बांध टूट पड़ा। उन्होंने अपने आंसुओं को पोछा, गहरी सांस ली और फोन पर दृढ़ता से कहा “बेटा… तू अपना बैग उठा और तुरंत स्टेशन पहुँच। तेरा बाप अभी तुझे लेने आ रहा है। समाज क्या कहता है, मुझे परवाह नहीं। तू मेरी बेटी थी, बेटी है और हमेशा मेरी ही रहोगी। जल्दी आ जा, घर सूना पड़ा है।”

फोन कट गया। रामनाथ बाबू ने अपनी पुरानी शॉल उठाई, दरवाज़े की कुंडी लगाई और तेज़ी से बाहर की तरफ कदम बढ़ा दिए। उनके चेहरे पर अब कोई शिकन नहीं थी, बल्कि एक अजीब सी शांति और उम्मीद थी।

घर से भागी हुई बेटी का बाप आखिरकार जीत चुका था—उसने समाज के नियमों को नहीं, बल्कि अपने बाप होने के धर्म को चुन लिया था।

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