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भूतिया गुड़िया (part-2)

पढ़ने का समय : 6 मिनट

 

 

आरव की आँखें खुलीं तो सुबह हो चुकी थी।

 

उसकी माँ उसके पास बैठी थी और पिता डॉक्टर को बुलाने के लिए बाहर गए थे।

 

आरव ने घबराकर पूछा, “गुड़िया कहाँ है?”

 

माँ ने कोई जवाब नहीं दिया।

 

आरव तुरंत उठकर कमरे में देखने लगा।

 

मेज खाली थी।

 

बिस्तर के नीचे कुछ नहीं था।

 

अलमारी बंद थी।

 

लेकिन दीवार पर लिखा हुआ वाक्य अब भी मौजूद था—

 

“मीरा अभी घर नहीं आई है…”

 

आरव ने काँपती आवाज़ में पूछा, “माँ, आपको ये दिखाई दे रहा है?”

 

माँ ने सिर हिला दिया।

 

“हाँ।”

 

उसी समय बाहर से किसी बच्चे के हँसने की आवाज़ आई।

 

दोनों ने खिड़की की तरफ देखा।

 

खिड़की के बाहर कोई नहीं था।

 

आरव ने उसी दिन गाँव के बुजुर्ग से मिलने का फैसला किया।

 

वही बूढ़ा आदमी, जिसने उसे हवेली के बारे में चेतावनी दी थी, गाँव के मंदिर के पास बैठा था।

 

आरव उसके सामने बैठ गया।

 

“बाबा, मुझे मीरा के बारे में बताइए।”

 

बूढ़े का चेहरा सफेद पड़ गया।

 

“तुमने उसे देख लिया?”

 

आरव ने सिर हिलाया।

 

“मैं उसकी गुड़िया घर ले आया था।”

 

बूढ़े ने अपना माथा पकड़ लिया।

 

“तुमने बहुत बड़ी गलती कर दी।”

 

“मीरा कौन थी?”

 

बूढ़े ने कुछ देर चुप रहने के बाद कहना शुरू किया।

 

लगभग पचास साल पहले काली हवेली में एक परिवार रहता था—ठाकुर रुद्र प्रताप, उनकी पत्नी सावित्री और उनकी सात साल की बेटी मीरा।

 

मीरा बहुत खुशमिजाज बच्ची थी।

 

उसके पास एक लाल फ्रॉक वाली गुड़िया थी, जिसका नाम उसने खुद “गुड़िया” रखा था।

 

लेकिन एक रात मीरा अचानक गायब हो गई।

 

पूरा गाँव उसे खोजने लगा।

 

तीन दिन बाद हवेली के बंद कमरे से उसकी आवाज़ सुनाई दी।

 

“माँ… मुझे बाहर निकालो…”

 

सावित्री ने कमरे का दरवाज़ा खोलने की कोशिश की, लेकिन दरवाज़ा बाहर से नहीं, अंदर से बंद था।

 

जब दरवाज़ा तोड़ा गया, तो मीरा वहाँ नहीं थी।

 

सिर्फ उसकी गुड़िया कमरे के बीचोंबीच रखी थी।

 

और दीवार पर खून से लिखा था—

 

“वह खेलना चाहती है।”

 

उस दिन के बाद सावित्री पागल हो गई।

 

वह हर रात कहती थी कि मीरा उसके कमरे में आती है।

 

कुछ दिनों बाद सावित्री भी गायब हो गई।

 

ठाकुर रुद्र प्रताप ने हवेली छोड़ दी।

 

लेकिन जाने से पहले उन्होंने उस कमरे को हमेशा के लिए बंद कर दिया।

 

बूढ़े ने कहानी खत्म की।

 

आरव ने पूछा, “मीरा की मौत कैसे हुई?”

 

बूढ़े ने धीमे स्वर में कहा, “किसी को नहीं पता।”

 

“और गुड़िया?”

 

बूढ़े ने उसकी तरफ देखा।

 

“गुड़िया को कभी हवेली से बाहर नहीं आना चाहिए था।”

 

आरव ने पूछा, “क्यों?”

 

बूढ़े ने जवाब दिया, “क्योंकि वह गुड़िया नहीं है।”

 

आरव चुप हो गया।

 

“वह मीरा का घर है।”

 

उस रात आरव ने गुड़िया को ढूँढने का फैसला किया।

 

वह घर के हर कमरे में खोजने लगा।

 

अचानक उसे ऊपर की मंजिल से हँसी सुनाई दी।

 

“ही… ही… ही…”

 

वह सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर गया।

 

गलियारे के आखिर में वही पुराना कमरा था।

 

दरवाज़ा खुला हुआ था।

 

अंदर गुड़िया कुर्सी पर बैठी थी।

 

आरव ने दूर से ही कहा, “तुम यहाँ कैसे आई?”

 

गुड़िया ने कोई जवाब नहीं दिया।

 

तभी उसके पीछे कमरे का दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया।

 

धड़ाम!

 

आरव ने दरवाज़ा खोलने की कोशिश की।

 

दरवाज़ा नहीं खुला।

 

कमरे में अचानक ठंड बढ़ने लगी।

 

फिर एक बच्ची की आवाज़ आई—

 

“मेरे साथ खेलोगे?”

 

आरव ने पीछे देखा।

 

गुड़िया अब कुर्सी पर नहीं थी।

 

वह कमरे के कोने में खड़ी थी।

 

उसकी आँखें लाल थीं।

 

आरव ने दीवार पर देखा।

 

वहाँ अचानक एक पुरानी तस्वीर दिखाई दी।

 

तस्वीर में मीरा खड़ी थी।

 

उसके हाथ में वही गुड़िया थी।

 

लेकिन तस्वीर के पीछे एक और बच्ची दिखाई दे रही थी।

 

वह बच्ची मीरा जैसी ही दिखती थी।

 

आरव ने तस्वीर उतार ली।

 

पीछे लिखा था—

 

“मीरा अकेली नहीं थी।”

 

तभी कमरे में किसी के रोने की आवाज़ गूँजी।

 

“मुझे भी बाहर निकालो…”

 

आरव ने चारों तरफ देखा।

 

दीवार के पीछे से आवाज़ आ रही थी।

 

उसने दीवार पर हाथ मारा।

 

एक जगह खोखली आवाज़ आई।

 

आरव ने पास पड़ा लोहे का डंडा उठाया और दीवार तोड़ने लगा।

 

कुछ ही देर में दीवार में एक छोटा-सा छेद हो गया।

 

अंदर एक पुरानी लकड़ी की पेटी थी।

 

उसने पेटी बाहर निकाली।

 

पेटी खोलते ही उसके अंदर पुराने कागज़, एक चाँदी की पायल और बच्चों के कई बाल मिले।

 

सबसे नीचे एक डायरी थी।

 

डायरी सावित्री की थी।

 

आरव ने उसे पढ़ना शुरू किया।

 

पहले कुछ पन्नों में मीरा के बारे में सामान्य बातें थीं।

 

फिर एक पन्ने पर लिखा था—

 

“रुद्र ने मुझसे झूठ बोला। मीरा कमरे में अकेली नहीं थी।”

 

अगले पन्ने पर—

 

“वह बच्ची मीरा की बहन थी।”

 

आरव के हाथ काँपने लगे।

 

लेकिन मीरा की कोई बहन गाँव में कभी नहीं जानी गई थी।

 

अगले पन्ने पर लिखा था—

 

“उसका नाम तारा था।”

 

फिर एक और वाक्य—

 

“रुद्र ने तारा को कुएँ में धकेल दिया।”

 

आरव के शरीर में सिहरन दौड़ गई।

 

तभी कमरे के बाहर से किसी के दौड़ने की आवाज़ आई।

 

धड़धड़धड़…

 

फिर अचानक सन्नाटा।

 

आरव ने गुड़िया की तरफ देखा।

 

गुड़िया जमीन पर पड़ी थी।

 

उसके पास दीवार पर ताजा खून से लिखा था—

 

“मीरा नहीं… तारा।”

 

आरव पीछे हटने लगा।

 

तभी उसके कान के पास किसी ने फुसफुसाकर कहा—

 

“तुमने मेरा नाम पढ़ लिया।”

 

आरव ने पलटकर देखा।

 

उसके सामने एक छोटी बच्ची खड़ी थी।

 

उसके बाल चेहरे पर बिखरे थे।

 

आँखें पूरी तरह काली थीं।

 

और उसके गले में वही चाँदी की पायल थी जो पेटी में रखी थी।

 

आरव चीख पड़ा।

 

बच्ची मुस्कुराई।

 

“अब तुम भी मेरे साथ खेलोगे।”

 

अचानक कमरे की सारी खिड़कियाँ खुल गईं।

 

तेज हवा चलने लगी।

 

गुड़िया जमीन से उठकर हवा में तैरने लगी।

 

और फिर एक साथ दो आवाज़ें आईं—

 

“हम दोनों को घर चाहिए।”

 

आरव ने किसी तरह दरवाज़ा खोलकर भागना शुरू किया।

 

लेकिन नीचे पहुँचते ही उसने देखा—

 

पूरा घर बदल चुका था।

 

जहाँ पहले टूटी हुई हवेली थी, वहाँ अब रोशनी से भरा एक पुराना घर दिखाई दे रहा था।

 

दीवारों पर लोग चल रहे थे।

 

बच्चे खेल रहे थे।

 

और बीच में मीरा और तारा खड़ी थीं।

 

आरव समझ गया—

 

वह वर्तमान में नहीं था।

 

वह उस रात में पहुँच चुका था…

 

जिस रात दोनों बच्चियाँ गायब हुई थीं।

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