रात के करीब साढ़े ग्यारह बजे इंदरजीत उस पुराने होटल के सामने खड़ा था। बारिश इतनी तेज़ हो रही थी कि सड़क पर कुछ मीटर दूर तक भी साफ दिखाई नहीं दे रहा था। आसमान में बार-बार बिजली चमकती और कुछ सेकंड के लिए पूरा इलाका सफेद रोशनी में नहा जाता।
होटल का नाम था—होटल शांति निवास।
नाम सुनने में जितना शांत था, उसकी इमारत उतनी ही डरावनी लग रही थी।
तीन मंज़िला वह पुरानी इमारत पिछले कई सालों से शहर के उस सुनसान हिस्से में खड़ी थी। दीवारों पर जगह-जगह सीलन थी, खिड़कियों के शीशे टूटे हुए थे और मुख्य दरवाज़े के ऊपर लगा बोर्ड हवा के साथ लगातार चरमराता था।
इंदरजीत ने अपने बैग को कंधे पर ठीक किया और अंदर चला गया।
वह शहर में नया था। उसे एक निजी कंपनी में नौकरी मिली थी और ऑफिस से नज़दीक होने के कारण उसने कुछ दिनों के लिए इसी होटल में कमरा लेने का फैसला किया था।
रिसेप्शन पर एक बूढ़ा आदमी बैठा था।
उसका चेहरा झुर्रियों से भरा था और उसकी आंखें कुछ अजीब तरह से स्थिर थीं।
“कमरा चाहिए?” बूढ़े ने बिना इंदरजीत की तरफ देखे पूछा।
“जी। एक रात के लिए।”
बूढ़े ने रजिस्टर खोला।
“नाम?”
“इंदरजीत।”
बूढ़े ने उसका नाम लिख लिया।
फिर उसने चाबियों का एक गुच्छा उठाया। कुछ सेकंड तक वह चाबियों को देखता रहा और आखिर में एक चाबी अलग कर ली।
उस पर पीतल की छोटी-सी प्लेट लगी थी।
101
इंदरजीत ने चाबी लेने के लिए हाथ बढ़ाया।
लेकिन बूढ़े ने चाबी देने से पहले उसका हाथ पकड़ लिया।
“एक बात याद रखना।”
इंदरजीत ने हैरानी से उसकी तरफ देखा।
“जी?”
बूढ़े की आवाज़ अचानक धीमी हो गई।
“रात के बाद अगर कमरे के अंदर से किसी के रोने की आवाज़ आए… तो दरवाज़ा मत खोलना।”
इंदरजीत कुछ पल उसे देखता रहा।
फिर हल्का-सा हंस दिया।
“बाबा, आप मज़ाक कर रहे हैं?”
बूढ़े ने कोई जवाब नहीं दिया।
उसने बस चाबी इंदरजीत के हाथ में रख दी।
“कमरा नंबर 101… पहली मंज़िल पर।”
इंदरजीत सीढ़ियों की तरफ बढ़ गया।
पीछे से बूढ़े की आवाज़ फिर सुनाई दी।
“और हाँ… अगर कोई तुम्हारा नाम लेकर दरवाज़ा खटखटाए, तब भी दरवाज़ा मत खोलना।”
इंदरजीत रुक गया।
उसने पीछे मुड़कर देखा।
लेकिन बूढ़ा अब रजिस्टर में कुछ लिख रहा था।
इंदरजीत ने इसे होटल के मालिक की अजीब आदत समझकर बात वहीं छोड़ दी।
पहली मंज़िल पर पहुंचकर उसने कमरा नंबर 101 खोज लिया।
दरवाज़ा पुराना था। लकड़ी पर कई खरोंचें थीं।
उसने चाबी लगाई।
क्लिक।
दरवाज़ा खुल गया।
कमरे के अंदर अजीब-सी ठंड थी।
बाहर इतनी उमस और बारिश होने के बावजूद कमरे में ऐसा लग रहा था जैसे कई घंटों से कोई खिड़की खुली हो।
कमरे में एक पुराना पलंग, एक मेज़, एक कुर्सी और दीवार पर टंगा हुआ बड़ा-सा आईना था।
इंदरजीत ने अपना बैग रखा और खिड़की बंद करने के लिए आगे बढ़ा।
खिड़की पहले से बंद थी।
लेकिन शीशे पर अंदर की तरफ पानी की बूंदें जमी थीं।
उसने हाथ से शीशा साफ किया।
बाहर अंधेरा था।
अचानक बिजली चमकी।
और उस एक पल की रोशनी में इंदरजीत को लगा कि सड़क के उस पार कोई लड़की खड़ी है।
सफेद कपड़ों में।
वह बिल्कुल स्थिर थी।
इंदरजीत ने दोबारा देखा।
वहां कोई नहीं था।
“शायद मेरा भ्रम है।”
उसने पर्दा खींच दिया।
फिर वह पलंग पर लेट गया।
रात के करीब बारह बजकर पंद्रह मिनट हुए होंगे कि कमरे में अचानक…
ठक… ठक… ठक…
की आवाज़ आई।
इंदरजीत उठकर बैठ गया।
आवाज़ दरवाज़े से आ रही थी।
उसने घड़ी देखी।
12:15 AM.
उसे रिसेप्शन वाले बूढ़े की बात याद आई।
“किसी के नाम लेने पर भी दरवाज़ा मत खोलना।”
वह कुछ देर शांत बैठा रहा।
फिर बाहर से आवाज़ आई।
“इंदरजीत…”
उसका शरीर जैसे जम गया।
आवाज़ बहुत धीमी थी।
लेकिन वह साफ उसका नाम था।
“इंदरजीत… दरवाज़ा खोलो।”
उसने सांस रोक ली।
वह दरवाज़े के पास नहीं गया।
कुछ सेकंड तक सन्नाटा रहा।
फिर…
ठक… ठक… ठक…
इस बार आवाज़ और तेज़ थी।
“इंदरजीत… मुझे अंदर आने दो।”
उसने मोबाइल उठाया।
नेटवर्क गायब था।
उसने रिसेप्शन पर फोन करने की कोशिश की।
फोन नहीं लगा।
तभी दरवाज़े के नीचे से एक काली परछाईं दिखाई दी।
किसी के पैर दरवाज़े के बाहर खड़े थे।
इंदरजीत की नजरें उन पैरों पर टिक गईं।
वह व्यक्ति बिल्कुल स्थिर खड़ा था।
फिर धीरे-धीरे दरवाज़े के नीचे से एक हाथ दिखाई दिया।
उंगलियां असामान्य रूप से लंबी थीं।
वे दरवाज़े के नीचे से अंदर आने की कोशिश कर रही थीं।
इंदरजीत पीछे हट गया।
तभी बाहर से एक लड़की की आवाज़ आई।
“तुमने मुझे पहचाना नहीं, इंदरजीत?”
इंदरजीत का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।
वह आवाज़…
उसे जानी-पहचानी लग रही थी।
लेकिन वह याद नहीं कर पा रहा था कि उसने यह आवाज़ कहां सुनी थी।
अचानक बाहर सब शांत हो गया।
हाथ गायब हो गया।
पैरों की परछाईं भी नहीं थी।
इंदरजीत ने राहत की सांस ली।
वह वापस पलंग पर बैठा।
लेकिन तभी उसकी नजर सामने लगे आईने पर पड़ी।
आईने में वह अकेला नहीं था।
उसके पीछे एक लड़की खड़ी थी।
सफेद कपड़े।
लंबे काले बाल।
चेहरा बालों से ढका हुआ।
इंदरजीत ने डरते हुए पीछे मुड़कर देखा।
पीछे कोई नहीं था।
उसने फिर आईने में देखा।
लड़की अब उसके बिल्कुल पीछे खड़ी थी।
इंदरजीत चीखने ही वाला था कि आईने पर अपने आप धुंध जमने लगी।
उस धुंध पर किसी ने उंगली से धीरे-धीरे लिखा—
“तुम बहुत देर से आए हो।”
इंदरजीत पीछे हट गया।
तभी कमरे की लाइट बंद हो गई।
पूरा कमरा अंधेरे में डूब गया।
मोबाइल की टॉर्च जलाकर उसने चारों तरफ देखा।
कुछ नहीं था।
फिर उसकी नजर पलंग के नीचे पड़ी।
वहां से एक पुरानी डायरी बाहर निकली हुई थी।
इंदरजीत ने कांपते हाथों से डायरी उठाई।
पहले पन्ने पर लिखा था—
“अगर तुम्हें यह डायरी कमरा नंबर 101 में मिली है, तो समझ लो कि उसने तुम्हें भी चुन लिया है।”
नीचे तारीख लिखी थी।
17 अगस्त 2006
इंदरजीत ने अगला पन्ना पलटा।
उसमें होटल के इसी कमरे के बारे में लिखा था।
“हर रात 12:15 पर वह आती है।”
अगली लाइन पढ़ते ही इंदरजीत के हाथ कांपने लगे।
“वह दरवाज़ा नहीं खोलती… वह इंतज़ार करती है कि तुम खुद उसे अंदर बुलाओ।”
तभी कमरे के दरवाज़े पर फिर दस्तक हुई।
ठक… ठक… ठक…
इंदरजीत ने डायरी बंद कर दी।
बाहर से वही लड़की की आवाज़ आई।
लेकिन इस बार आवाज़ बिल्कुल उसके कान के पास से आई—
“इंदरजीत… दरवाज़ा तो तुमने पहले ही खोल दिया था।”
इंदरजीत धीरे-धीरे पीछे मुड़ा।
कमरे का दरवाज़ा…
खुला हुआ था।
और उसके बाहर अंधेरे गलियारे में एक लड़की खड़ी थी।
उसका चेहरा अब भी बालों से ढका था।
लेकिन उसके हाथ में…
इंदरजीत की वही डायरी थी।
वही डायरी…
जो कुछ सेकंड पहले उसके हाथ में थी।

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇
चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं
शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।
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