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😱राजगीर की आखिरी हवेली 😱 भाग 1 — हवेली से आती आवाज़😱

पढ़ने का समय : 6 मिनट

 

 

बिहार के राजगीर से कुछ दूर पहाड़ियों और घने पेड़ों के बीच एक छोटा-सा गाँव था—बरहटा।

 

गाँव छोटा था, लेकिन उसके आखिरी छोर पर खड़ी एक पुरानी हवेली के कारण दूर-दूर तक मशहूर था।

 

लोग उसे सिंह हवेली कहते थे।

 

कहा जाता था कि लगभग पचास साल पहले उस हवेली में एक जमींदार परिवार रहता था। एक रात परिवार के सभी सदस्य अचानक गायब हो गए।

 

न कोई लाश मिली।

 

न कोई सामान चोरी हुआ।

 

न घर के दरवाज़े टूटे।

 

बस हवेली के अंदर एक कमरा ऐसा था, जिसे तब से हमेशा के लिए बंद कर दिया गया था।

 

गाँव के लोग कहते थे कि रात के समय उस कमरे से किसी बच्चे के रोने की आवाज़ आती है।

 

कभी किसी बूढ़े आदमी के चलने की।

 

और कभी…

 

किसी महिला की आवाज़—

 

“दरवाज़ा खोल दो…”

 

गाँव में रहने वाला राघव इन कहानियों को हमेशा मजाक समझता था।

 

वह पटना में रहकर पत्रकारिता करता था और कुछ दिनों के लिए अपने गाँव आया था।

 

एक शाम चाय की दुकान पर बैठे हुए उसने हवेली की बात छेड़ दी।

 

“लोग आज भी उस हवेली से डरते हैं?”

 

बूढ़े दुकानदार रामजी ने उसकी तरफ देखा।

 

“डरना चाहिए।”

 

राघव हँस पड़ा।

 

“आप भी?”

 

रामजी ने चाय का गिलास नीचे रखा।

 

“मैंने अपनी आँखों से देखा है।”

 

“क्या?”

 

“उस हवेली की खिड़की में एक लड़की खड़ी थी।”

 

राघव मुस्कुराया।

 

“कब?”

 

“बीस साल पहले।”

 

“फिर?”

 

रामजी की आवाज़ धीमी हो गई।

 

“अगले दिन जिस आदमी ने उसे देखा था… वह गायब हो गया।”

 

राघव कुछ देर चुप रहा।

 

उसी समय उसके दोस्त अमन का फोन आया।

 

अमन पटना से राघव से मिलने गाँव आया था।

 

उसने कहा—

 

“भाई, सुना है यहाँ एक पुरानी हवेली है।”

 

राघव ने मुस्कुराकर कहा—

 

“चलोगे?”

 

अमन तुरंत तैयार हो गया।

 

उनके साथ गाँव का लड़का छोटू भी चल पड़ा।

 

तीनों शाम करीब पाँच बजे हवेली पहुँच गए।

 

हवेली बाहर से ही डरावनी लग रही थी।

 

ऊँची दीवारों पर बेलें चढ़ी थीं।

 

मुख्य दरवाज़े पर जंग लगी लोहे की जंजीर लटक रही थी।

 

राघव ने जंजीर हटाई।

 

दरवाज़ा अपने आप थोड़ा खुल गया।

 

क्रीईई…

 

अमन ने कहा—

 

“भाई, अभी भी वापस चल सकते हैं।”

 

राघव हँसा।

 

“डर गया?”

 

“नहीं। लेकिन मरने की जल्दी भी नहीं है।”

 

तीनों अंदर चले गए।

 

हवेली के अंदर पुराने फर्नीचर पर धूल जमी थी।

 

दीवारों पर परिवार की पुरानी तस्वीरें लगी थीं।

 

एक तस्वीर में एक आदमी, उसकी पत्नी और दो बच्चे दिखाई दे रहे थे।

 

नीचे तारीख लिखी थी—

 

1978।

 

राघव ने तस्वीर को कैमरे से रिकॉर्ड किया।

 

तभी छोटू ने कहा—

 

“भैया…”

 

“क्या हुआ?”

 

“इस तस्वीर में चार लोग हैं ना?”

 

“हाँ।”

 

“लेकिन दीवार पर पाँच परछाइयाँ क्यों हैं?”

 

राघव ने तस्वीर को ध्यान से देखा।

 

वास्तव में तस्वीर के नीचे दीवार पर पाँच परछाइयाँ दिखाई दे रही थीं।

 

चौथी परछाईं किसी बच्चे की थी।

 

और पाँचवीं…

 

एक बहुत लंबे आदमी की।

 

अमन ने तुरंत कहा—

 

“चलो यहाँ से।”

 

लेकिन तभी ऊपर से किसी के दौड़ने की आवाज़ आई।

 

धड़… धड़… धड़…

 

तीनों ने ऊपर देखा।

 

पहली मंजिल खाली थी।

 

राघव ने आवाज़ लगाई—

 

“कोई है?”

 

कोई जवाब नहीं आया।

 

फिर ऊपर से एक बच्चे की आवाज़ आई—

 

“भैया…”

 

छोटू का चेहरा पीला पड़ गया।

 

“ये आवाज़…”

 

“क्या?”

 

“मेरी छोटी बहन जैसी है।”

 

अमन ने कहा—

 

“तुम्हारी बहन तो पटना में है।”

 

छोटू ने सिर हिलाया।

 

“हाँ।”

 

आवाज़ फिर आई—

 

“छोटू…”

 

इस बार छोटू सीढ़ियों की तरफ बढ़ गया।

 

राघव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

 

“रुको।”

 

छोटू बोला—

 

“वो मुझे बुला रही है।”

 

राघव ने कहा—

 

“जो भी है, ऊपर नहीं जाना।”

 

लेकिन तभी सीढ़ियों के ऊपर एक लड़की दिखाई दी।

 

उसने लाल रंग की पुरानी पोशाक पहनी थी।

 

उसके लंबे बाल चेहरे पर थे।

 

वह बिल्कुल स्थिर खड़ी थी।

 

राघव ने कैमरा उसकी तरफ किया।

 

कैमरे की स्क्रीन पर लड़की दिखाई नहीं दे रही थी।

 

सिर्फ एक खाली गलियारा था।

 

राघव का हाथ काँप गया।

 

“ये…”

 

अचानक लड़की ने अपना सिर उठाया।

 

उसका चेहरा दिखाई दिया।

 

आँखें पूरी तरह काली थीं।

 

उसने धीरे से कहा—

 

“तुम बहुत देर से आए हो।”

 

लाइट अचानक बंद हो गई।

 

तीनों चीख पड़े।

 

कुछ सेकंड बाद लाइट वापस आई।

 

लड़की गायब थी।

 

लेकिन सीढ़ियों के आखिरी पायदान पर एक पुरानी चाबी पड़ी थी।

 

राघव ने चाबी उठा ली।

 

उस पर एक छोटा-सा नंबर लिखा था—

 

13।

 

अमन ने पूछा—

 

“तेरह किस चीज़ का नंबर है?”

 

राघव ने हवेली की ओर देखा।

 

उसे पहली मंजिल पर एक बंद दरवाज़ा दिखाई दिया।

 

दरवाज़े पर वही नंबर था।

 

13।

 

दरवाज़े पर मोटी लोहे की जंजीर लगी थी।

 

राघव ने चाबी लगाई।

 

जंजीर खुल गई।

 

अमन ने उसका हाथ पकड़ लिया।

 

“दरवाज़ा मत खोल।”

 

राघव ने कहा—

 

“हम इतनी दूर सिर्फ देखने आए हैं।”

 

उसने दरवाज़ा खोल दिया।

 

कमरे के अंदर अंधेरा था।

 

फर्श पर पुराने खिलौने पड़े थे।

 

एक टूटी हुई गुड़िया।

 

लकड़ी की छोटी ट्रेन।

 

और एक पुराना झूला।

 

कमरे के बीच में दीवार पर एक वाक्य लिखा था—

 

“जिसे तुम खोज रहे हो, वह तुम्हें पहले से खोज रहा है।”

 

राघव ने दीवार को छुआ।

 

अचानक उसके कान के पास किसी ने फुसफुसाया—

 

“राघव…”

 

वह पीछे हट गया।

 

अमन ने पूछा—

 

“क्या हुआ?”

 

राघव ने कुछ नहीं कहा।

 

तभी कमरे के कोने में रखा पुराना रेडियो अपने आप चालू हो गया।

 

उसमें से टूटी-फूटी आवाज़ आने लगी।

 

“आज रात…”

 

“हवेली में…”

 

“कोई…”

 

“जिंदा नहीं बचेगा…”

 

रेडियो बंद हो गया।

 

अमन ने कहा—

 

“हमें अभी निकलना होगा।”

 

तीनों बाहर भागे।

 

लेकिन जैसे ही वे मुख्य दरवाज़े के पास पहुँचे, दरवाज़ा बंद था।

 

राघव ने उसे खींचा।

 

नहीं खुला।

 

अचानक ऊपर से किसी महिला के रोने की आवाज़ आई।

 

“मेरे बच्चे को बचा लो…”

 

फिर दूसरी आवाज़ आई—

 

“राघव…”

 

“तुमने दरवाज़ा खोल दिया है।”

 

राघव ने ऊपर देखा।

 

पहली मंजिल पर वही काली आँखों वाली लड़की खड़ी थी।

 

इस बार उसके हाथ में एक पुरानी तस्वीर थी।

 

उसने तस्वीर नीचे फेंक दी।

 

राघव ने उसे उठाया।

 

तस्वीर में वही परिवार था।

 

लेकिन इस बार एक बात अलग थी।

 

परिवार के चार लोगों के बीच…

 

राघव खुद खड़ा था।

 

राघव के हाथ से तस्वीर गिर गई।

 

अमन ने कहा—

 

“ये कैसे हो सकता है?”

 

तभी पीछे से दरवाज़ा खुलने की आवाज़ आई।

 

मुख्य दरवाज़ा धीरे-धीरे खुल गया।

 

बाहर रात हो चुकी थी।

 

लेकिन जैसे ही तीनों बाहर निकलने लगे…

 

छोटू रुक गया।

 

“भैया…”

 

राघव ने पीछे देखा।

 

छोटू गायब था।

 

सिर्फ जमीन पर उसकी चप्पल पड़ी थी।

 

और हवेली के अंदर से उसकी आवाज़ आ रही थी—

 

“भैया…”

 

“मुझे ढूँढो…”

 

“मैं अभी जिंदा हूँ।”

 

राघव ने हवेली की ओर देखा।

 

दरवाज़ा अपने आप बंद हो चुका था।

 

और उसके ऊपर दीवार पर ताजा लाल अक्षरों में लिखा था—

 

“अब तीन नहीं… चार लोग हैं।”

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