भाग~39 कुछ तो छुपा है…
एकांश के कानों को यकीन नहीं हुआ… सामने खड़ी रूहानी, वही रूहानी, जिसकी आँखों में कभी उसने खुद को देखा था, जिसकी हँसी से उसकी सुबहें जगा करती थीं…. आज वही औरत, अद्वैत की पत्नी कहलाने लगी है?
उसके ही भाई की पत्नी…..
फिर भले ही वो आज किसी और का पति है , कोई और औरत जिसके साथ उसने अग्नि के सात फेरे लिए थे…..
एक पल को तो उसका शरीर सुन्न हो गया, समय जैसे थम गया। उसके चारों ओर की आवाजें मद्धम पड़ गईं और आँखों के सामने सिर्फ रूहानी का चेहरा छाया हुआ था और उसकी मांग में भरा सिंदूर और गले में मंगलसूत्र….. जो चीख-चीखकर कह रहा था कि अब वह किसी और की है।
उसने अद्वैत की ओर देखा….. वो अद्वैत जो बचपन से ही उसका हमदर्द रहा, जिसने उसे कभी यह महसूस होने नहीं दिया कि वह उसका सगा भाई नहीं है।
एकांश के दिल में अद्वैत के लिए कभी कोई ईर्ष्या नहीं थी… कभी भी नहीं। लेकिन यह… यह बहुत अलग था।
“इतनी जल्दी?” एक प्रश्न खुद-ब-खुद उसके भीतर से उठा।
“भाई ईशिता भाभी को इतनी जल्दी कैसे भूल सकते है? क्या सब कुछ इतना ही आसान था उनके लिए?”
लेकिन यह सवाल सिर्फ अद्वैत के लिए नहीं था। यह सवाल खुद रूहानी के लिए भी था।
वो रूहानी, जिसे वह जानता था…. टूटने के बाद भी मुस्कुराने वाली, मगर भीतर से बिखरने वाली।
क्या वो सच में इतनी जल्दी आगे बढ़ गई? इतनी जल्दी move on कर पाना क्या उसके लिए इतना आसान था?
एकांश के भीतर उठता सवाल जैसे खुद एक दरवाज़ा खोल गया..…. एक पुरानी गली का, जहाँ हर मोड़ पर एक मुस्कान बिखरी थी, हर दीवार पर कोई अधूरी बात टंगी थी।
flashback
रूहानी और उसका वो पुराना स्टूडियो… वही ईंटों से बने कच्चे से कमरे का कोना, जहाँ धूप शाम की तरह उतरती थी और कपड़े के टुकड़ों पर रंग नहीं, सपने चिपकाए जाते थे।
उस शाम भी कुछ ऐसा ही था। हल्की हल्की बारिश हो रही थी। बाहर का आसमान जैसे उदास था, मगर भीतर की हवा में कोई मीठा साज़ बज रहा था।
कमरे की एक दीवार पर रूहानी के स्केच चिपके थे…. कुछ अधूरे, कुछ अनगढ़, मगर हर एक में उसका दिल धड़कता था।
एकांश फर्श पर बैठा था, कैमरा गोद में रखे और सामने खड़ी थी रूहानी… हल्के नीले रंग की इंडो-वेस्टर्न ड्रेस में, बालों को रबर बैंड से ऊपर बाँध रखा था, कुछ लटें उसके गालों पर गिरती थी और उसकी आँखों में वो चमक थी जो केवल अपने सपनों से लड़ने वालों में होती है।
“इतनी जल्दी क्यों भागती हो तुम हर बार कैमरे से?” एकांश ने मुस्कुराकर पूछा था, उसकी आँखों में खेलती हुई रौशनी उस पर टिकी थी।
रूहानी ने झिझकते हुए नजर झुकाया, फिर उसके सामने चुपचाप आ खड़ी हुई, “क्योंकि तुम मुझे वैसा देख लेते हो… जैसा मैं खुद को कभी नहीं देख पाई।”
एकांश की आँखें पल भर को ठहर गईं। उसने कैमरा नीचे रख दिया और धीमे से बोला, “और मैं तुम्हें वैसी देखना ही नहीं चाहता… जैसी तुम खुद को देखती हो।”
रूहानी के होंठ थरथराए थे। वो कुछ कहती, उससे पहले ही एकांश ने आगे बढ़कर उसकी हथेली थाम ली। उस छोटे से स्पर्श में जो गर्माहट थी, उसने कमरे की नमी को भी छू लिया।
“कभी-कभी लगता है…” रूहानी की आवाज़ टूटी, “तुम्हारे कैमरे में नहीं, तुम्हारी आँखों में रहना चाहती हूँ मैं।”
एकांश कुछ पल तक उसे बस देखता रहा। रूहानी के चेहरे पर वो मासूम-सी ख्वाहिश थी, जैसे कोई बच्चा टॉफ़ी नहीं, एक घर माँग रहा हो।
“तो रहो न,” एकांश ने फुसफुसाकर कहा, “यह आँखें तुम्हारा इंतज़ार करती हैं… हर पल।”
वो एक क्षण… समय जैसे ठहर गया था।
रूहानी ने उसकी ओर देखा…. गहराई से, पूरी तरह, जैसे उसके भीतर उतर जाना चाहती हो, उस नज़्म की तरह, जिसे कोई पढ़ ले।
रूहानी ने धीरे से कहा, “तुम्हें खो दूँगी, तो शायद सब कुछ खो जाएगा… क्योंकि अब जब दिल धड़कता है, तो लगता है बस तुम्हारे नाम पर ही ज़िंदा है।”
वो उससे लिपट गई थी, उस पुराने स्टूडियो की भींगी हवा में, उसकी हथेलियों में अपनी साँसें भरते हुए। कोई वादा नहीं था, बस एक साँझ थी, जिसमें रूहानी ने पहली बार खुद को पूरा महसूस किया था, एकांश की बाँहों में।
उसी शाम एकांश ने जो तस्वीरें खींचीं, वो कभी किसी को नहीं दिखाई। वो उसके स्टूडियो की सबसे नज़दीकी दराज़ में बंद रहीं… क्योंकि उनमें रूहानी नहीं, उसकी पूरी दुनिया कैद थी।
उसका दिल अब फिर से वही खो गया… उसी स्टूडियो में, उसी हल्की बारिश में… उसी वाक्य पर….
“तुम्हें खो दूँगी, तो सब कुछ खो जाएगा…”
flashback end
एकांश की आँखों में अब सवालों की आग थी। हर लम्हा एक साज़िश सा लगने लगा। दिल किसी पुराने गीत की तरह बार-बार वही धुन गुनगुनाता रहा— “कुछ तो है… कुछ छुपा हुआ है…”
अब वह पीछे नहीं हटेगा। उसे जानना होगा… हर सच, हर परत… और उस सवाल का जवाब, जो अब उसकी रातों की नींद उड़ाने वाला था।
“भाई… आप कब रूहानी से मिले?” एकांश की आवाज़ धीमी थी, मगर भीतर से कंपकंपाती हुई निकली। जैसे किसी बंद दरवाज़े को सालों बाद खटखटाया हो।
अद्वैत कुछ पल के लिए चुप रह गया। उसे समझ नहीं आया कि कहाँ से शुरू करे, कौन सा सच पहले बताए और कौन सा खुद तक ही सीमित रखे।
लेकिन उससे पहले ही एक अजीब-सी बात उसके मन में कौंधी, एकांश ने रूहानी का नाम सीधे क्यों लिया?
क्या वो उसे पहले से जानता था? उसकी आँखों में सवाल तैर गए।
“तुम… तुम रूहानी को कैसे जानते हो, एकांश?” अद्वैत की आवाज़ अब कुछ सख़्त थी, जैसे दिल में बैठी शंका को अब ज़ुबान मिल गई हो।
दोनों की आँखें एक-दूसरे से टकराईं… एक में आश्चर्य था, दूसरे में छुपा हुआ डर।
और तभी, जैसे उन दोनों के सवालों को सुनकर कोई तीसरा जवाब देने चला हो, पीछे से एक धीमी, मगर भारी आवाज़ आई……
दोनों भाई पलटे तो देखा, रूहानी अब धीरे-धीरे उठकर बैठ चुकी थी। उसका चेहरा उतरा हुआ था, आँखों के नीचे नींद और उलझनों की छाया साफ़ दिख रही थी।
उसकी आवाज़ बस इतनी कि सन्नाटे ने भी कान लगाकर सुनी, “पानी…” वह बस इतना ही कह पाई।
दोनों जैसे किसी सहज पल में लौट आए हों, बिना कुछ बोले, दोनो अलग-अलग गिलासों में पानी लेकर डाइनिंग टेबल से उसकी ओर बढ़े।
अद्वैत के हाथ में कांपती उंगलियाँ थी और एकांश की आँखों में हज़ार सवाल छिपे थे।
रूहानी ने नज़रें उठाईं, दोनों के हाथों में पकड़े पानी को देखा…. कुछ ऐसा था उस दृश्य में, जैसे अतीत और वर्तमान पहली बार आमने-सामने खड़े हों।
पर उसने पानी नहीं पिया। वह तुरंत खड़ी हुई, अपनी कपड़े ठीक करते हुए बोली, “मुझे एक अर्जेंट काम है, निकलना होगा।”
और बिना किसी की ओर देखे, तेजी से अपना पर्स उठाया और दरवाज़े की ओर बढ़ गई।
“रूहानी,” अद्वैत की आवाज़ में चिंता भी थी और असहजता भी, “नाश्ता तो करती जाओ…”
एकांश ने एक पल सोचा, फिर संयम से कहा, “अगर जल्दी है तो मैं छोड़ देता हूँ तुम्हें… अपनी कार से।”
रूहानी वहीं दरवाज़े के पास ठिठक गई। उसकी पीठ अब भी उनकी ओर थी, मगर भीतर कहीं कुछ जैसे टूट रहा था।
आँखें नम हो चुकी थीं, पर उसने पलकें मजबूती से रोके रखीं। कुछ कहना चाहती थी, पर ज़ुबान साथ नहीं दे रही थी।
ठीक उसी पल एकांश का मोबाइल बजा, वह जेब से निकालकर स्क्रीन की ओर देखने लगा। उसकी पत्नी का नाम चमक रहा था।
उसने एक हल्की-सी मुस्कान के साथ अद्वैत को गले लगाया, “ठीक है, भाई… फिर जल्दी आऊँगा। घर से कॉल आ रहा है।”
अद्वैत ने सिर हिलाकर उसे विदा किया, लेकिन वो जो अगला वाक्य एकांश ने हवा में कहा, उसने जैसे कमरे की दीवारों को भी सिहरने पर मजबूर कर दिया।
एकांश के आख़िरी शब्द उसके कानों में नहीं, सीधे उसकी धड़कनों में गूंजे, “आपकी वाइफ से अच्छे से मुलाकात भी तो नहीं हुई है…. इशिता भाभी को गए हुए अभी ज्यादा वक्त भी तो नहीं गुजरा है,” यह कहकर एकांश मुस्कुराया और दरवाज़े की ओर बढ़ गया।
अद्वैत भी बस एक हल्की मुस्कान के साथ सिर हिलाता रहा, जैसे सब कुछ सामान्य हो।
रूहानी वहीं दरवाज़े की चौखट के पास जैसे जम-सी गई। उसकी साँसें रुक गई थीं। हाथ में पकड़ा पर्स अब हथेली में पसीने से भीग चुका था।
शब्द हवा में जैसे फँस गए थे और दिल की धड़कन किसी पुरानी घड़ी की तरह लड़खड़ाने लगी थी।
“एकांश राठौड़…”
उसने मन ही मन दोहराया, होंठों के नीचे कुछ काँपा। उसके चेहरे का रंग उड़ गया था, जैसे अचानक कोई परदा हट गया हो और अतीत की नंगी रौशनी आँखों में चुभने लगी हो।
“अद्वैत अवस्थी का छोटा भाई…”
वह शब्द जो अब तक केवल नाम थे, अचानक अर्थ लेने लगे थे….. भारी, जटिल, और असहनीय।
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“आपकी वाइफ से अच्छे से मुलाकात भी तो नहीं हुई है…” क्या एकांश के शब्दों में कोई छुपा इशारा था… जो रूहानी ही समझ सकी?
क्या अब सच सामने आएगा… या सब कुछ और गहराई में दफ़न हो जाएगा?

लिखकर रूह छूने की कोशिश…..
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