भाग~38 रूहानी… मेरी पत्नी
फ्लैशबैक = एकांश की शादी की रात
उस रात महफ़िल अपने पूरे शबाब पर थी। झूमते हुए झूमर, रंगीन रोशनी में चमकती दीवारें और शहनाइयों की मधुर स्वर-लहरियाँ…. सब कुछ जैसे एक परी-कथा की तरह सजा था।
हर चेहरा मुस्कराता, हर नजरें दुआओं से भरी हुईं, मगर जैसे ही दरवाज़े की भारी चौखट से कदम रखते हुए अद्वैत भीतर दाख़िल हुआ… वक़्त ने धीमी चाल पकड़ ली।
उसका चेहरा गम्भीर था, कंधे तनकर सीधा चलने वाले थे, मगर आँखों में एक बेचैनी थी जिसे शोर-गुल भी नहीं दबा पा रहा था। कमरे की रौशनी उसकी आँखों से उलझ रही थी, पर उसका ध्यान तो कुछ और ही तलाश रहा था। और तभी…..
सीढ़ियों के पास, सफेद सलवार में लिपटी एक लड़की, जिसके कंधे काँप रहे थे, जो किसी तूफान से भागकर आई हो….. बिखरे आँसू, धुँधली नज़रें और मन का ऐसा कोलाहल कि उसे खुद भी नहीं पता था वो कहाँ जा रही है।
और तभी दोनों की टकराहट हुई।
एक झटका… वो अचानक रुक गए। एक सन्नाटा उनके इर्द-गिर्द पसर गया जैसे महफ़िल की हर आवाज़ थम गई हो।
दोनों की नज़रें झुकी हुईं, चेहरों का सामना नहीं हुआ, वे दोनों ही नहीं एक दूसरे की तरफ नहीं मुड़े..… मगर दिलों ने कुछ महसूस किया। कुछ जाना-पहचाना, मगर अनकहा।
लड़की काँपती आवाज़ में बुदबुदाई, “सॉरी…”
अद्वैत भी धीमे से फुसफुसाया, “इट्स ओके…”
बस इतना ही। दोनों फिर अपने रास्ते चल पड़े…. जैसे कुछ हुआ ही नहीं।
यूँ तो अद्वैत सौतेले भाई की शादी में न चाहते हुए भी चला आया था…… केवल अपने भाई की ज़िद के आगे।
शादी की सजावटें भले ही चमचमा रही थीं, पर उसके अंदर कुछ बुरी तरह बुझा हुआ था। हँसी-ठहाकों की गूंज में उसके भीतर एक सन्नाटा था, ठंडा और थरथराता हुआ।
एकांगी स्नेह से भरे इस माहौल में वह बस एक अधूरा किरदार था, जिसे मंच पर होना तो था, पर संवाद नहीं दिए गए थे।
“अरे, देखो तो कौन आया है!”
किसी ने ठहाका लगाया और कुछ चेहरे उसकी ओर मुड़ गए।
“कौन? ओह! वही… नाजायज़ औलाद!”
ये शब्द तीर की तरह उसके भीतर उतर गए। नहीं, ये नया नहीं था। हर बार की तरह वही लहजा, वही ज़हर। लेकिन चेहरा… चेहरा निर्विकार रहा। वही शांति, जो उसने वर्षों से ओढ़ रखी थी जैसे आत्मा के जख्मों पर बर्फ की पट्टियाँ बांध ली हों।
“अब तो बड़ा लेखक बन गया है… नाम है अद्वैत अवस्थी का!” किसी और ने तंज कसा।
“पर एक सच्चाई कभी नहीं बदलेगी, है ना?”
कानों तक बात पहुंची, फिर दिल तक, फिर जैसे रगों में ठंडक उतर आई। उंगलियाँ अनजाने में कस गईं, जैसे अपने ही भीतर कुछ थामने की कोशिश कर रहा हो।
किसी और को जैसे अचानक याद आया…
“वैसे इसकी पत्नी भी मर गई है ना? हाय बेचारी! जाने किस पाप का फल मिला उसे!”
इस बार भीतर कुछ टूटा। जैसे किसी ने उसकी आत्मा पर खरोंच मार दी हो। उसकी इशिता… वह जो उसकी ज़िंदगी की इकलौती रोशनी थी, उसके सारे अंधेरों में एक मोमबत्ती। अब वह भी नहीं थी। केवल याद थी…. अधूरी, चुप, और बर्फ सी ठंडी।
“और उससे पहले इसकी माँ भी तो छोड़ गई थी इसे…” किसी ने और धीरे कहा, पर पर्याप्त तेज़ कि वो सुन ले।
उसने कुछ नहीं कहा। बस एक गहरी साँस ली, मानो उस सारे ज़हर को अपने भीतर पी गया हो। वह जानता था, शब्दों की लड़ाई में उसकी हार पहले ही तय थी। बचपन से लेकर अब तक, कोई भी उसका सच सुनने को तैयार नहीं था।
वह अपने सौतेले भाई एकांश की ओर बढ़ा। अपने साथ लाया छोटा सा गिफ्ट बॉक्स उसके हाथ में दिया, जैसे सालों की चुप्पी उसमें बंद कर दी हो। एक हल्की सी मुस्कान दी, जो शब्दों से ज़्यादा कहती थी।
एकांश की आँखों में हलचल थी, शायद पछतावा, शायद कुछ कहना जो जुबां तक नहीं आ सका और न ही अद्वैत ने कोई उम्मीद की।
अद्वैत ने भी कुछ नहीं बोला। वो जानता था, अब किसी स्पष्टीकरण की ज़रूरत नहीं रही। जो रिश्ता था, वो कब का मर चुका था। अब बस उसकी राख रह गई थी….. गर्म, चुप और लाचार।
हॉल से बाहर निकलते समय उसके कदम ठोस थे, पर भीतर से वह दरक रहा था। जैसे हर कदम उसके भीतर की एक ईंट गिरा रहा हो।
दरवाज़े से निकलते हुए उसने एक आखिरी बार पीछे देखा…. भीड़ अब भी हँस रही थी, जैसे उसका आना और जाना महज़ हवा का झोंका था।
कार में बैठते ही उसने अपना सिर स्टीयरिंग पर टिका दिया, आँखें बंद कर लीं।
“इशिता…” वह बुदबुदाया।
बस एक नाम… पर उस नाम में पूरा जीवन था। एक खोया हुआ जीवन।
कार स्टार्ट की और वो उसी तरह चला गया जैसे आया था….. चुपचाप, अनदेखा, और भीतर से खाली।
यही उसका नसीब था… आना, देखना, सहना, और बिना शोर किए लौट जाना।
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वर्तमान…….
अद्वैत एकांश से खुद को धीरे से अलग किया।, जैसे कोई पुरानी किताब का पन्ना वापस बंद कर रहा हो….. सहेजते हुए, मगर दोबारा न पढ़ने की कसम के साथ।
उसकी आँखें अब भी एकांश की आँखों में नहीं देख रही थीं, क्योंकि वहाँ सवाल थे….. ऐसे सवाल जिनके जवाब उसके सीने में पत्थर बनकर जमे हुए थे।
“भाई…” एकांश की आवाज़ टूटी, मगर सीधी दिल से निकली, “मेरी शादी की रात… आप अचानक वापस क्यों चले आए थे? बिना बताए… बिना कुछ कहे… मैं आपको पूरे फेरे भर ढूंढता रहा… आप क्यों नहीं रुके?”
यह सवाल सुनते ही अद्वैत कुछ पल चुप खड़ा रहा। जैसे कोई पुराना घाव फिर से खुल गया हो। उसकी पलकें भारी थीं, पर उनमें आँसू नहीं, सिर्फ एक पुरानी परछाई थी….. दर्द की, ठुकराए जाने की, और न कह पाने की।
“मैं… रुकना चाहता था एकांश,” अद्वैत ने धीमे, थके हुए स्वर में कहा, “लेकिन… वहाँ जो शोर था, वह मेरी आत्मा की चुप्पी को निगलने लगा था। हर मुस्कान मेरे भीतर की किसी स्मृति को घायल कर रही थी।”
उसने दीवार से नजर हटाकर दूर, खिड़की से बाहर अंधे आकाश की ओर देखा।
“जब सबने मेरा स्वागत नहीं, मेरी परछाईं को याद किया… जब हर तंज मेरे ज़ख्मों को कुरेदता चला गया… मैं बस वहाँ और नहीं रह सकता था। तुम्हारे लिए आया था, सच में। लेकिन वो लोग…” वह रुका, साँस खींची।
उसने एक क्षण को आँखें बंद कीं, मानो भीतर का शोर फिर जाग गया हो।
अद्वैत ने एक गहरी साँस ली, जैसे भीतर उठते भूचाल को जबरन रोक रहा हो। उसकी आँखें अब भी खिड़की के उस पार किसी अनदेखी दूरी को ताक रही थीं, पर भीतर कुछ बदल रहा था…. शब्दों की जगह अब जज़्बात ले रहे थे।
उसने अचानक अपनी उदासी को पीछे धकेला और एक हल्का सा मुस्कान लिए, आवाज़ में पुराना अपनापन लौटाते हुए कहा, “वैसे एकांश… तुम भी तो अपनी शादी के बाद अब मिल रहे हो मुझसे। कितने दिन हो गए, गिनती में आ भी नहीं रहा।”
उसके स्वर में कोई उलाहना नहीं था, बस एक मीठी सी शिकायत थी… जैसे कोई टूटा हुआ रिश्ता अपनी पहली दरार पर उँगली रखकर मुस्कुराने की कोशिश कर रहा हो।
एकांश की पलकें झुक गईं, उसकी आँखें भीग गई थीं…… न शर्म से, न अपराधबोध से, बल्कि उस नज़दीकी के एहसास से जिसे उन्होंने खुद ही समय और सन्नाटे के हवाले कर दिया था।
“मैं आया था, भाई..…” उसकी आवाज़ काँपी, “कई बार… दरवाज़े तक। लेकिन… हिम्मत नहीं हुई कि कॉल बेल बजा सकूँ।”
अद्वैत की आँखें थोड़ी नरम पड़ीं, जैसे बरसों की बर्फ पिघलने लगी हो।
एकांश थोड़ा हँसा, हिचकी के बीच में, “लेकिन आज तो तय करके निकला था… कि बात करके ही जाऊँगा। पर ये नहीं सोचा था कि सुबह-सुबह आपके… गेस्ट से भी मुलाकात हो जाएगी।”
अद्वैत ने उसकी बात सुनी, फिर बहुत ठहरकर, अपनी दोनों भौहें सिकोड़ते हुए, जैसे शब्दों को तोलकर बोल रहा हो, जवाब दिया, “रूहानी मेरी गेस्ट नहीं है।”
एकांश ने चौंक कर उसकी ओर देखा। हल्की-सी हँसी के साथ चुटकी ली, “तो रूहानी आपकी कौन है, भाई?”
अद्वैत अब उसकी आँखों में देख रहा था। वहाँ न शरारत थी, न व्यंग्य….. बस एक सीधी, निर्विकार नज़र। जैसे अब और कुछ छिपाना बाकी नहीं था। उसके शब्द सीधे, मगर भारी थे।
“रूहानी मेरी पत्नी है।”
यह सुनते ही एकांश ने एक कदम पीछे ले लिया, जैसे कुछ पकड़ने की कोशिश कर रहा हो जो अब फिसल चुका था। उसके चेहरे पर बहुत सारे भाव एक साथ उभर पड़े….. झटका, अविश्वास, दर्द और कुछ ऐसा, जो वो खुद भी समझ नहीं पाया।
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तो क्या उस रात सीढ़ियों के पास काँपती वो लड़की… वही थी?
फिर क्या छुपा था उन काँपते कंधों, उन बिखरे आँसुओं और उस एक “सॉरी” के पीछे?
एकांश की आँखों में जो सवाल तैर रहे थे… क्या वो सिर्फ रूहानी को लेकर थे?

लिखकर रूह छूने की कोशिश…..
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