🔐 लॉग-इन या रजिस्टर करें  

अधूरी इबादत भाग~32

पढ़ने का समय : 8 मिनट

भाग~32 दिल के ताले 

 

पीछे से अद्वैत के अचानक आने पर रूहानी एकदम से चौंक गई। उसका चेहरा सफेद पड़ गया था, आंखें पलभर को फैल गईं और हाथ में पकड़ी किताब लगभग छूट ही गई। उसकी साँसें तेज हो गई थीं, जैसे कोई चोरी पकड़ी गई हो। 

अद्वैत ने भौंहें चढ़ाते हुए पूछा, “क्या हुआ? यूं सहम क्यों गई?” 

रूहानी ने फौरन खुद को सँभालते हुए सिर झुकाकर कहा, “नहीं, ऐसा कुछ भी नहीं है… वो दरअसल… यहाँ चारों तरफ इतनी शांति है न, तभी जब तुम्हारी आवाज़ अचानक आई तो थोड़ा चौंक गई… शायद इसलिए।” 

उसकी आवाज़ में झिझक थी, लेकिन आँखें कुछ और कह रही थी… एक घबराहट, जो खुद से भी छुपी नहीं थी। 

अद्वैत उसकी बातों को मान तो गया, लेकिन उसकी नज़रें रूहानी के चेहरे पर अटकी रह गईं, जैसे वो कुछ और पढ़ने की कोशिश कर रहा हो। 

फिर वह हल्के से मुस्कराया और बोला, “ठीक है, चलो नीचे।” 

दोनों साथ-साथ सीढ़ियों की ओर बढ़े, लेकिन जैसे ही कदम उठे, वे दोनों एक-दूसरे के विपरीत किनारों पर चलने लगे, जैसे दूरी बनाए रखना अब भी एक अनकहा अनुबंध था। पर सीढ़ियों के हर पड़ाव पर, उनके दिलों के भीतर कुछ था… जो धीरे-धीरे पास आने की कोशिश कर रहा था।

मीना और उसके दोनों बच्चे जब खाना खाकर जाने की तैयारी करने लगे तो अद्वैत और रूहानी जैसे एक ही सोच में डूबे हुए थे, एक साथ बोल पड़े, “यही रह जाओ।” 

उनकी आवाज़ में एक अनकहा अपनापन था, जिसे वो खुद भी शायद अभी ठीक से नहीं समझ पाए थे। दोनों की नज़रें एक पल को आपस में टकराईं और फिर एक हल्की-सी फीकी मुस्कान उनके चेहरों पर तैर गई।

अद्वैत ने बात संभालते हुए कहा, “रात हो गई है मीना, यहीं रुक जाओ बच्चों के साथ, क्या ज़रूरत है इतनी देर में लौटने की।” 

मीना थोड़ी हड़बड़ाई, उसकी आँखों में कुछ छुपा हुआ डर था। उसने जल्दी से जवाब दिया, “न-नहीं सर… मेरे पति आएंगे… और अगर मैं घर पर नहीं रही तो…”

रूहानी ने उसकी बातों में कुछ अजीब सा महसूस किया। उसकी निगाहों में संदेह उभरा, “क्या मतलब?”

मीना ने तुरंत मुस्कुराने की कोशिश की, वो मुस्कान जिसमें सच्चाई कम और बनावट ज़्यादा थी, “अरे नहीं मैडम, मेरा मतलब ये कि अगर मैं नहीं रही तो इनके पापा भूखे रह जाएंगे… उन्हें तो चाय बनाना भी नहीं आता।”

अद्वैत ने एक गहरी सांस लेकर कहा, “ठीक है, मैं कैब बुक कर देता हूँ।”

मीना ने हाथ जोड़ते हुए मना किया, “नहीं, नहीं, सर, मैं चली जाऊंगी।” 

लेकिन तब तक रूहानी भी अद्वैत की बात दोहराई, “नहीं मीना, इतनी रात को अकेले मत जाओ, कैब सही रहेगा।”

मीना ने उन दोनों की बात मान लिया। 

फिर रूहानी ने मीना के बच्चों की ओर मुड़कर कहा, “जब भी मन करे, यहीं आ जाना…”

गुनगुन और चीकू ने ख़ुशी में एक-दूसरे से हाई-फाइव किया, और उस मासूमियत में जैसे एक नया रिश्ता  लेने लगा था…. जिसमें न खून का रिश्ता था, न नाम का, फिर भी कोई डोर थी… जो सबको जोड़ रही थी।

घर में एक बार फिर से वही पुराना, गूंजता हुआ सन्नाटा पसर गया, जैसे सब कुछ अपनी जगह पर लौट आया हो, लेकिन फिर भी कुछ बदल चुका था। 

मीना और उसके बच्चों के जाने के बाद अद्वैत और रूहानी के बीच एक अजीब-सी चुप्पी छा गई थी, जो न तो पूरी तरह असहज थी और न ही पूरी तरह सुकून भरी। दोनों एक-दूसरे से नज़रें चुराने लगे….. जैसे उन आंखों में कुछ था जो अभी कहा नहीं जा सकता था।

इस अनकहे बोझ को हल्का करने के लिए अद्वैत ने आखिरकार खुद से कहा, “मुझे नींद आ रही है, मैं जा रहा हूं सोने।”

रूहानी ने भी उसकी तरफ बिना देखे ही धीमे स्वर में जवाब दिया, “गुड नाइट।” और फिर नीचे वाले कमरे में जाकर दरवाज़ा हल्के से बंद कर लिया।

पर उसकी आंखों में नींद नहीं थी, सिर्फ सवाल थे। वो सवाल जो उसके दिल में अब गहराई से उतरते जा रहे थे।

उसे कमरे में टहलते हुए उसी किताब की याद  से ताज़ा हो गई….. वो किताब जिसे उसने अद्वैत के स्टडी रूम में देखा था, जिसके पहले पन्ने पर सुंदर लिखावट में लिखा था “यह किताब मेरे दिल के बहुत करीब है… — इशिता”।

इशिता… कौन थी वो? क्या वो अद्वैत की पहली पत्नी थी? या कोई और…?

मन का भूचाल उसे थकने नहीं दे रहा था। उसी में, उसने चुपचाप अपने पायल की आवाज़ दबाते हुए सीढ़ियों की ओर कदम बढ़ाए। हर सीढ़ी पर उसका दिल और भी तेज़ धड़कने लगा…

उसे नहीं पता था कि वो ऊपर जाकर क्या ढूंढ़ेगी….. जवाब, या और सवाल…

रूहानी दरवाज़े के सामने खड़ी कुछ पलों तक वहीं जमी रही। उसका हाथ धीरे-धीरे डोर नॉब की ओर बढ़ा, जैसे कोई राज़ खोलने जा रही हो। पर तभी उसकी उंगलियाँ एक ठंडी सी सच्चाई से टकराईं — दरवाज़ा बंद था, लॉक लगा हुआ था। 

एक गहरी साँस लेकर वो चुपचाप नीचे लौटी, उसके मन में एक हल्का-सा अफ़सोस और एक अधूरी उत्सुकता थी जो उसके सीने में धड़क रही थी।

अपने कमरे में आकर वो पेट के बल लेट गई, तकिये में चेहरा छुपाते हुए, जैसे किसी खोई हुई सोच को पकड़ना चाहती हो। उसका मन अद्वैत की प्रकृति पर टिक गया…. इतना शांत, लेकिन कहीं न कहीं कुछ छुपा हुआ सा। वो कब अपनी दुनिया खोलता है? और कब खुद को उस ताले में बंद कर लेता है — कुछ समझ नहीं आता।

इन्हीं उलझनों में उसकी आँखें कब मुंदी, उसे खुद भी नहीं पता चला।

सुबह की धीमी रोशनी कमरे में फैल रही थी जब उसकी नींद खुली। बाहर से कॉफ़ी की खुशबू आ रही थी, और जब वो बाहर आई तो देखा…. अद्वैत किचन में कॉफ़ी बना रहा था।

रूहानी किचन के पास पहुँची ही थी कि अद्वैत ने एक मग उसकी ओर बढ़ाया, “मैंने दो कप कॉफ़ी बनाई है… पीना चाहोगी?”

रूहानी ने हल्के से सिर हिलाया और मग लेकर डाइनिंग टेबल की कुर्सी पर बैठ गई।

रूहानी ने मग की सतह पर उठती भाप को देखते हुए हल्की मुस्कान के साथ कहा, “तुम्हें तो कुछ बनाना आता ही नहीं था… तो फिर ये कॉफ़ी किस जादू से बना ली?”

अद्वैत ने किचन काउंटर से टेक लगाते हुए मुस्कराया, उसकी आवाज़ में एक सादगी और थोड़ा-सा संकोच भी था, “हाँ, बहुत कुछ तो नहीं आता… लेकिन एक-दो चीजें बना लेता हूँ। बस, घर पर ज़रूरी सामान हो और… मन भी हो।”

उसके ‘मन भी हो’ कहने में जो ठहराव था, वो रूहानी की रूह को छू गया। उसने अनजाने ही नज़रें झुका लीं, जैसे उस मामूली-सी कॉफ़ी के पीछे की भावनाओं को पढ़ने लगी हो। उस मग में केवल कॉफ़ी नहीं थी, उसमें शायद कोशिश थी… एक अनकही भावना… या फिर किसी आदत को दोबारा अपनाने की शुरुआत।

कुछ क्षणों बाद, अद्वैत सोफे पर बैठ गया और उसने एक छोटा फोल्डर और लिफ़ाफ़ा उसकी ओर बढ़ाया, “ये लो…पूरे 25 लाख हैं, और ये एग्रीमेंट। साइन कर दो।”

रूहानी ने कॉफ़ी साइड में रखकर काग़ज़ों पर दस्तख़त कर दिए। फिर मुस्कुराकर बोली, “थैंक यू अद्वैत… तुम्हें अंदाज़ा भी नहीं है कि तुमने मेरी ज़िंदगी की कितनी बड़ी मदद की है। मैं अब अपने सपनों को पूरा करके रहूँगी। मीना आएगी तो मुझे उसके साथ जाना होगा।”

अद्वैत ने हल्की हैरानी से पूछा, “आज फिर से क्यों?”

रूहानी ने कुछ पल चुप रहकर सोचा — कितनी बार तो चाहा था कि ये इन्सान एक बार पूछे कि वो उसके पैसे कहाँ लगा रही है… अब जब पूछ ही लिया है, तो बता ही देती हूँ

उसने कहा, “मैं एक स्ट्रगलिंग ड्रेस डिज़ाइनर हूँ, तो नया स्टूडियो ले रही हूँ… उसी के लिए ये सब।”

अद्वैत की आँखों में चमक आ गई। मुस्कराकर बोला, “अरे वाह! लेखक की पत्नी ड्रेस डिज़ाइनर…. ये तो कुछ ज़्यादा ही यूनिक कॉम्बिनेशन हो गया, है ना?”

रूहानी उसके शब्दों से जैसे भीतर तक सिहर उठी। वो अचानक कुछ पल को चुप हो गई, उसके हाथ में पकड़ा कॉफ़ी मग ठंडा होने लगा लेकिन उसकी पकड़ अब भी वैसी ही टिकी रही। 

उसकी आँखें अद्वैत की ओर थीं, पर नजरें जैसे किसी और ही सवाल में उलझी थीं….. क्या उसने सच में ‘पत्नी’ कहा? वो शब्द जो अब तक सिर्फ दस्तावेज़ों में था, आज अद्वैत की ज़ुबान पर था… यूँ सहज, यूँ स्वाभाविक।

अद्वैत को जैसे महसूस हुआ कि उसने कुछ ज़्यादा कह दिया है, उसकी नज़रें फौरन झुक गईं। वो भी खुद को संयत कर घूंट भरते हुए अपनी कॉफी खत्म की और नज़रे चुराते हुए बोला, “मुझे तुमसे एक ज़रूरी बात करनी है… या यूँ कह लो कि कुछ पूछना है।”

रूहानी, जो अब तक अपने मन के उलझे धागों को सुलझाने में लगी थी, थोड़ी झेंपते हुए बोली, “क्या?”

अद्वैत ने हल्की सी साँस लेकर कहा, “अगले संडे यहीं पास में एक साहित्यिक समारोह हो रहा है… वहाँ मुझे आमंत्रित किया गया है। लेकिन… बात ये है कि उन्होंने मुझसे कहा है कि मुझे अपनी पत्नी के साथ आना होगा।”

उसने रूहानी की ओर देखा, आँखों में एक सवाल था, जो शब्दों से ज़्यादा गहरा था।

“तो… क्या तुम चलोगी?”

रूहानी की सांस थम सी गई। उसके होंठ हिले, लेकिन कोई आवाज़ नहीं निकली। 

अद्वैत की निगाहें उसके चेहरे पर टिकी थीं, हर छोटी सी झलक पढ़ने की कोशिश में। कमरे की चुप्पी में सिर्फ उनके दिल की धड़कनों की गूंज़ सुनाई देती थी। 

क्या वह हां कहेगी? या खामोशी ही उसका जवाब होगी? 

—————–

क्या मीना की उस अचानक डर भरी बात के पीछे कोई छुपा हुआ सच था?

क्या ‘इशिता’ का नाम सिर्फ एक नाम था, या उसके पीछे छुपा था कोई अधूरा किस्सा? 

क्या रूहानी उस साहित्यिक समारोह में अद्वैत के साथ जाने को तैयार होगी, या उसकी खामोशी में छुपा होगा कोई अनसुलझा दर्द?

Comments

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *