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अधूरी इबादत भाग~31

पढ़ने का समय : 7 मिनट

भाग~31 फटा हुआ पन्ना 

 

अद्वैत किचन में था, apron पहने, चेहरे पर हल्की झुंझलाहट और पसीने की बूंदें। गैस पर रखे तवे से धुआँ उठ रहा था और कड़ाही में कुछ जलने की गंध हवा में तैर रही थी। 

अद्वैत का हाथ थरथरा रहा था, जैसे हर टमाटर का टुकड़ा उसके हाथों से फिसलता जा रहा हो। उसकी सांसें गहरी थीं, पर दिल की धड़कनें असामान्य रूप से तेज़। हर झोंके में जो धुआँ उठता, वह उसकी उम्मीदों को बुझाता जा रहा था और एक आवाज़ उसके मन में बार-बार गूंज रही थी, “क्या मेरी कोशिशें इन मासूमों के लिए कभी मायने रखेंगी?”

तवे पर जलती हुई आवाज़ ने उसे झकझोर दिया, जैसे असफलताओं का बोझ उसके कंधों पर उतर आया हो मानो वह खुद से ही हारता जा रहा था।

मीना और रूहानी के घर में घुसते ही बच्चों की खामोशी ने माहौल में एक भारीपन घोल दिया था। गुनगुन की आँखें भरी हुई थीं और चीकू का हाथ उसकी बहन के हाथ में कसकर जकड़ा हुआ था, जैसे उसने अभी-अभी किसी डरावने दृश्य से खुद को खींच निकाला हो।

मीना ने दौड़कर अपने बच्चों को गले लगाया, “क्या हुआ बच्चो? तुम रो क्यों रहे हो?” गुनगुन ने धीरे से फुसफुसाया, “अद्वैत अंकल ने कुछ जलाया… बहुत तेज़ आवाज़ आई… हमने सोचा कुछ बुरा हो गया।”

रूहानी तेजी से किचन की ओर बढ़ी…. जहाँ अद्वैत झुका हुआ था, हाथ में तवा और चेहरे पर मायूसी। उसे देख रूहानी की आँखों में एक पल के लिए चिंता और फिर एक हल्की सी मुस्कान उभरी।

“तुम ठीक हो?” उसने धीरे से पूछा।

अद्वैत ने चौंककर उसकी ओर देखा, फिर सामान्य सी आवाज़ में बोला, “बच्चो ने कहा कि उन्हें भूख लगी है, इसलिए मैंने सोचा बच्चों के लिए कुछ बना लूँ…. पर शायद मेरा लेखक होना ही ठीक है, रसोइया नहीं।”

“तुम ठीक तो हो ना? मैं… बस डर गई थी उस आवाज़ से… ये बच्चे इतने नाज़ुक होते हैं… तुम भी…” रूहानी की आवाज़ में एक नर्माहट थी, जैसे अपने भीतर की बेचैनी छुपाने की कोशिश कर रही हो।  

उसकी आँखों में न केवल चिंता थी, बल्कि एक छुपा हुआ सवाल भी, जो शायद वो खुद भी समझ नहीं पा रही थी। उसकी सांसें थोड़ी तेज़ हुईं, मानो किसी अनजानी बेचैनी को रोकने की कोशिश हो रही हो।

जब चीकू की मासूम उंगली अद्वैत की ओर उठी और उसने नन्हीं सी आवाज़ में कहा, “अंकल, आपको खाना बनाना नहीं आता ना?” तो कमरे की हवा में एक पल को जैसे नमी भर गई। वो सवाल नहीं था, वो एक सच्चाई थी जो अद्वैत के चेहरे पर शर्म और हल्की मुस्कान बनकर उभरी। 

रूहानी की हँसी जैसे फूट पड़ी, वो खुलकर मुस्कुराई। 

अद्वैत ने भी अपनी गर्दन झुका ली, जैसे उस सवाल ने उसके हाथों की बेबसी और उसके अंदर की गहराई दोनों उजागर कर दी हो।

मीना ने भी मुस्कराते हुए तुरंत कहा, “आप निकलिए, सर… मैं बना देती हूँ,” और वह बिना देर किए पूरे किचन की सफ़ाई में जुट गई, जैसे किचन को सहेजना उसके मन को भी सहेजने जैसा था। 

अद्वैत ने झेंप मिटाने के अंदाज़ में एप्रन उतारा और चुपचाप सोफे की तरफ़ चला गया, जहां उसके कुछ कागज़, पेन और लैपटॉप रखे हुए थे। वह अपने में ही खोया-सा उन्हें समेटने लगा।

तभी रूहानी भी मीना की मदद के लिए आगे बढ़ी, शायद सिर्फ़ सामान समेटने नहीं, बल्कि उस पल की उलझन समेटने भी।

लेकिन मीना ने बीच में आकर उसका हाथ थाम लिया, मुस्कुरा कर बोली, “आप रहने दीजिए मैडम, सर को ऊपर कुछ ज़रूरत पड़ी तो…” और धीरे से उसका हाथ सामान से अलग कर दिया। 

उस क्षण रूहानी का चेहरे का रंग उड़ गया, जैसे कोई अनकही सीमा फिर से उसकी आँखों के सामने आ खड़ी हुई हो। अभी तक वह अद्वैत के कमरे के अंदर नहीं गई थी…. न उसे कभी ज़रूरत पड़ी, न इजाज़त मिली। 

एग्रीमेंट की एक-एक पंक्ति उसके मन में ताज़ा हो उठी, जिसमें साफ़ कहा गया था — ‘न कोई एक-दूसरे के कमरे में आएगा, न निजी सीमाओं को लांघेगा।’

रूहानी ने हल्के से बात मोड़ दी, “अद्वैत कोई छोटा बच्चा थोड़ी है, वो मैनेज कर लेगा…..” लेकिन उसकी आवाज़ में खुद को समझाने की थकावट थी। 

लेकिन मीना पीछे नहीं हटी। वह मुस्कुराई और बोली, “पति को अपनी पत्नी की ज़रूरत पड़ ही जाती है… देखिए न, सर सीढ़ियाँ चढ़ने लगे हैं…” और जैसे ही अद्वैत की छाया ऊपर जाती दिखी, मीना ने एक धीमा-सा धक्का दिया, “जाइए न मैडम, अब तो मान जाइए…”

रूहानी कुछ नहीं बोली। उसकी पलकें झुकी रहीं, जैसे दिल में कोई गूंगी उलझन पल रही हो। फिर वो चुपचाप, धीमे क़दमों से, अनजाने डर और कहीं भीतर की कोमल उत्सुकता को समेटे, अद्वैत के पीछे-पीछे सीढ़ियाँ चढ़ने लगी।

हर क़दम एक नई दहलीज़ थी और शायद, एक नया मोड़ भी।

अद्वैत अपने कमरे में कदम रखने ही वाला था कि उसकी नज़र दो कदम दूर खड़ी हुई रूहानी पर पड़ी, जो इस अजीब सी स्थिति से बचने के लिए अपनी निगाहें इधर-उधर फेर रही थी। उसकी आंखें झुकी हुई थीं, पर भीतर एक बेचैनी साफ़ झलक रही थी। 

अद्वैत का चेहरा थोड़ा गंभीर हो गया, उसकी आवाज़ में एक गहरी गंभीरता समा गई। “तुम यहां? रुहानी…”

रूहानी जल्दी से अपना हाथ हिलाते हुए बोली, “मैं जानबूझकर यहां नहीं आई, वो मीना ने… मुझे… यहां… तुम्हारी मदद… नहीं, नहीं, मैं कॉन्ट्रैक्ट के नियमों के खिलाफ नहीं जा रही हूँ। प्लीज, मैं मजबूर हो गई थी।”

उसकी आवाज़ में घबराहट थी, शब्द जैसे घुल-मिल गए थे और हाथों की हल्की थरथराहट उसके भीतर की बेचैनी बयां कर रही थी। वह खुद को न्यायसंगत साबित करने की कोशिश में थी, लेकिन अंदर से वह झूठी भी लग रही थी।

अद्वैत ने उसकी इस बेचैन आवाज़ और थरथराते हुए शरीर को देखकर हल्की सी मुस्कान दी, लेकिन फिर खुद ही छिपाने की कोशिश में जल्दी ही कहा, “ठीक है, ठीक है, मैं समझ गया। मैं थोड़ा फ्रेश होकर आता हूँ। तुम जो चाहो तो पढ़ सकती हो।” उसकी आवाज़ में एक नरमी थी, जो रूहानी के भीतर की उलझनों को कुछ कम कर रही थी।

रूहानी को पूरी बात समझ नहीं आ रही थी, तभी अद्वैत ने अपने कमरे के बगल वाले कमरे की ओर इशारा किया और कहा, “यह मेरा लाइब्रेरी या कह लो स्टडी रूम है। तब तक यहीं रहो, मैं आता हूँ, फिर साथ में नीचे चलते हैं ताकि मीना को शक न हो।”

उस पल रूहानी के चेहरे पर हल्का सा सुकून आया, मानो किसी ने उसकी बेचैनी को थोडा सा कम कर दिया हो।

रूहानी ने धीरे से सिर हिलाया और अद्वैत के स्टडी रूम में प्रवेश कर गई। अद्वैत भी अपने कमरे में वापस चला गया। 

रूहानी ने धीरे-धीरे कमरे में कदम रखा, उसके होंठ अपने आप में कतर रहे थे, जैसे किसी अनजानी बेचैनी को छुपाने की कोशिश कर रही हो। उसका मन इस जगह को लेकर थोड़ा असहज था…. यह अद्वैत की निजी दुनिया थी, एक ऐसी दुनिया जिसमें वह खुद को अनजान पा रही थी। 

उसने चारों ओर देखा तो किताबों की कतारें थीं, लेकिन वे सब कुछ ऐसी किताबें थीं जिन्हें पढ़कर शायद ही कोई दिल बहलाए…. क्योंकि यहाँ सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि ज्ञान, शोध और शिल्प का संगम था। 

हर शेल्फ पर इतिहास, दर्शन, विज्ञान और विभिन्न संस्कृतियों पर गंभीर ग्रंथ सजे थे, जिनके साथ लेखन कला की बारीकियों को सिखाने वाली मार्गदर्शिकाएँ और व्याकरण की किताबें भी थीं। 

यह लाइब्रेरी किसी कथाकार के लिए विचारों का स्रोत और रचनात्मकता की प्रयोगशाला थी, जहाँ से अनगिनत कहानियों को जन्म मिलना था।

वैसे तो रूहानी की रुचि कभी पढ़ाई में नहीं रही थी; वह हमेशा से जीवन के रंगीन, संवेदनशील पक्ष की ओर अधिक आकर्षित रही, न कि सूखे शब्दों की दुनिया की ओर।

फिर उसकी नज़र एक किताब पर पड़ी…. पुरानी, धूल झड़ी हुई, जिसकी कवर झुर्रीदार थी। वह किताब कुछ अलग सी लग रही थी, शायद अद्वैत की वह ज़िन्दगी जिसे वह आम तौर पर छुपाता था। 

उसने झिझकते हुए किताब निकाली और पन्ने पलटने लगी। ये कोई गंभीर या भारी किताब नहीं थी, बल्कि एक खूबसूरत कविता संग्रह था, जिसमें भावनाओं की गहराई और जीवन की नाजुकता के अनकहे रंग समाए थे। 

रूहानी को एहसास हुआ कि अद्वैत के भीतर भी कोई छुपा हुआ कोमल पक्ष है, जो शायद उसने कभी सामने आने नहीं दिया।

उसने पन्ने पलटते हुए एक फटा हुआ पन्ना देखा, जिस पर खूबसूरती से लिखा था — “यह किताब मेरे दिल के बहुत करीब है। उम्मीद है, तुम इसे संभालकर रखोगे – इशिता।” 

“इशिता…” नाम रूहानी के होठों पर धीरे से बया हुआ, उसके भीतर अचानक से एक हलचल मच गई, उसके दिल की धड़कनें तेज हो गईं, जैसे किसी पुराने राज की परतें अब धीरे-धीरे खुल रही हों। उसने झट से किताब बंद कर दी, लेकिन वह छोटा सा संदेश उसके मन में सवालों के तूफान छोड़ गया।

तभी पीछे से अद्वैत की आवाज़ आई। 

——

क्या इशिता कौन है, और क्यों इस किताब में उसके दिल की बातें छुपी हैं? 

क्या अद्वैत के भीतर छिपा वह कोमल पक्ष कहीं उनके रिश्ते की नींव बदलने वाला था? 

जब रूहानी ने वो पन्ना छू लिया है… क्या वो सिर्फ एक पाठक रहेगी? या किसी पुराने सच की गवाह बनेगी?

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