बहुत समय पहले की बात है। पहाड़ों और हरे-भरे जंगलों से घिरे एक सुंदर से गाँव में मोहन नाम का एक छोटा-सा लड़का रहता था। मोहन बहुत ही चंचल, दयालु और हँसमुख था। पूरे गाँव में उसकी शरारतों और मददगार स्वभाव की चर्चा होती थी। वह हर किसी से प्यार से बात करता और हमेशा दूसरों की सहायता करने के लिए तैयार रहता।
लेकिन मोहन के मन में एक छोटी-सी इच्छा हमेशा रहती थी। वह चाहता था कि उसका कोई ऐसा दोस्त हो, जो हर समय उसके साथ रहे। गाँव के बच्चे स्कूल चले जाते थे और कई बार अपने कामों में व्यस्त हो जाते थे। ऐसे में मोहन अकेला महसूस करता।
एक दिन सुबह-सुबह वह खेतों की ओर घूमने निकला। ठंडी हवा चल रही थी। पेड़ों पर रंग-बिरंगे पक्षी चहचहा रहे थे और तितलियाँ फूलों पर मंडरा रही थीं।
अचानक उसकी नज़र झाड़ियों के पीछे किसी हलचल पर पड़ी।
वह धीरे-धीरे वहाँ पहुँचा।
उसने देखा कि एक छोटा-सा हिरण काँपता हुआ खड़ा था। उसकी आँखों में डर साफ दिखाई दे रहा था।
मोहन ने धीरे से कहा,
“डरो मत… मैं तुम्हें कोई नुकसान नहीं पहुँचाऊँगा।”
हिरण कुछ देर तक उसे देखता रहा। फिर धीरे-धीरे उसके पास आ गया।
मोहन ने प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरा।
“आज से तुम मेरे दोस्त हो। मैं तुम्हारा नाम झूमर रखता हूँ, क्योंकि तुम चलते नहीं, झूमते हुए दौड़ते हो।”
जैसे ही उसने यह कहा, हिरण खुशी से उछल पड़ा।
उस दिन से दोनों की दोस्ती शुरू हो गई।
अब हर सुबह मोहन जंगल जाता और झूमर उसका इंतज़ार करता।
दोनों मिलकर पेड़ों के बीच दौड़ लगाते।
कभी नदी किनारे बैठते।
कभी तितलियों के पीछे भागते।
कभी पेड़ों से गिरे मीठे फलों का स्वाद लेते।
जब भी मोहन उदास होता, झूमर उसके पास आकर अपना सिर उसके कंधे से सटा देता।
मोहन मुस्कुरा उठता।
धीरे-धीरे पूरे गाँव को दोनों की दोस्ती के बारे में पता चल गया।
लोग कहते,
“ऐसी दोस्ती बहुत कम देखने को मिलती है।”
कुछ ही दिनों बाद गाँव में साल का सबसे बड़ा मेला लगने वाला था।
गाँव के बच्चे कई दिनों से उसकी तैयारी कर रहे थे।
मोहन ने झूमर से कहा,
“चलो, इस बार तुम्हें भी मेला दिखाता हूँ।”
झूमर खुशी से उछल पड़ा।
मेले वाले दिन पूरा गाँव रंग-बिरंगी सजावट से जगमगा रहा था।
चारों ओर मिठाइयों की खुशबू फैल रही थी।
बच्चे झूलों पर झूल रहे थे।
कोई बाँसुरी बजा रहा था तो कोई कठपुतली का खेल दिखा रहा था।
मोहन और झूमर भी मेले में घूमने लगे।
दोनों ने गुड़ की रेवड़ी खाई।
रंग-बिरंगे गुब्बारे देखे।
झूलों को देखकर झूमर खुशी से उछलने लगा।
तभी अचानक मेले में अफरा-तफरी मच गई।
एक शिकारी वहाँ आ पहुँचा।
उसकी नज़र जैसे ही झूमर पर पड़ी, उसकी आँखें चमक उठीं।
वह धीरे-धीरे झूमर की ओर बढ़ने लगा।
मोहन ने यह देख लिया।
वह तुरंत झूमर के सामने खड़ा हो गया।
“रुक जाओ!”
शिकारी हँसते हुए बोला,
“हटो बच्चे, यह हिरण अब मेरा है।”
मोहन ने साहस से कहा,
“यह कोई सामान नहीं है। यह मेरा दोस्त है।”
लेकिन शिकारी उसकी बात सुनने को तैयार नहीं था।
उसने जाल निकाल लिया।
झूमर डरकर पीछे हटने लगा।
मोहन जल्दी से सोचने लगा कि क्या किया जाए।
तभी उसकी नज़र पास में बँधी एक बकरी पर पड़ी।
उसके दिमाग में एक योजना आई।
उसने झूमर से धीरे से कहा,
“तुम अभी जंगल की तरफ भागो। मैं सब संभाल लूँगा।”
झूमर तुरंत दौड़ पड़ा।
उधर मोहन ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगा,
“अरे… बकरी भाग रही है!”
शिकारी का ध्यान बकरी की ओर चला गया।
वह उसी के पीछे दौड़ पड़ा।
इसी बीच मोहन ने गाँव के चौकीदार और पुलिस को सूचना दे दी।
कुछ ही मिनटों में पुलिस वहाँ पहुँच गई।
उन्होंने शिकारी को पकड़ लिया।
शिकारी भागने की कोशिश करता रहा, लेकिन वह बच नहीं पाया।
गाँव के लोगों ने राहत की साँस ली।
झूमर धीरे-धीरे जंगल से वापस आया।
जैसे ही उसने मोहन को सुरक्षित देखा, वह दौड़कर उसके पास आया और अपना सिर उसके सीने से लगा दिया।
मोहन ने मुस्कुराकर उसे गले लगा लिया।
गाँव के मुखिया ने दोनों की बहादुरी की बहुत प्रशंसा की।
उन्होंने कहा,
“आज मोहन ने साबित कर दिया कि सच्चा दोस्त वही होता है, जो अपने दोस्त की रक्षा के लिए हर मुश्किल का सामना करे।”
उस दिन मेले में सभी बच्चों ने मोहन के लिए ज़ोरदार तालियाँ बजाईं।
कुछ दिनों बाद गाँव के लोगों ने जंगल के जानवरों की सुरक्षा के लिए एक विशेष अभियान शुरू किया।
उन्होंने जंगल के बाहर चेतावनी वाले बोर्ड लगाए।
वन विभाग की मदद से जानवरों की सुरक्षा के लिए गश्त भी बढ़ाई गई।
मोहन भी इस अभियान का हिस्सा बन गया।
अब वह गाँव के बच्चों को जानवरों से प्यार करना और उनकी रक्षा करना सिखाने लगा।
झूमर भी अक्सर दूर खड़ा होकर उसे देखता और जैसे मुस्कुराता हुआ दिखाई देता।
समय बीतता गया, लेकिन दोनों की दोस्ती पहले से भी ज़्यादा गहरी होती गई।
हर सुबह सूरज की पहली किरण के साथ मोहन जंगल पहुँच जाता और झूमर उसका इंतज़ार करता मिलता।
दोनों फिर उसी तरह दौड़ते, खेलते और हँसते।
उनकी दोस्ती पूरे गाँव के लिए एक मिसाल बन गई।
लोग अपने बच्चों से कहते,
“अगर दोस्ती निभानी है, तो मोहन और झूमर जैसी निभाओ।”
मोहन ने समझ लिया था कि दोस्ती केवल साथ खेलने का नाम नहीं है, बल्कि मुश्किल समय में एक-दूसरे का साथ निभाने का नाम है।
झूमर ने भी अपने व्यवहार से यह साबित कर दिया कि प्रेम और विश्वास की कोई भाषा नहीं होती।
इंसान और जानवर भी सच्चे दोस्त बन सकते हैं, अगर उनके दिल में प्यार और अपनापन हो।
उस दिन से गाँव के लोग हर साल मेले के दिन “मित्रता दिवस” मनाने लगे, ताकि सभी बच्चों को सच्ची दोस्ती का महत्व याद रहे।
और जब भी कोई बच्चा जंगल की ओर जाता, उसे अक्सर एक प्यारा-सा हिरण और उसका सबसे अच्छा दोस्त मोहन साथ-साथ खेलते हुए दिखाई देते हैं।

NSW अनुभवी लेखक -🥇

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