जुड़वां बहनें
बरसों पहले एक छोटे से शहर में एक ही दिन, एक ही समय पर जुड़वां बेटियों का जन्म हुआ। पूरे घर में खुशियाँ थीं। पिता ने दोनों का नाम रखा—नेहा और नैना।
दोनों का चेहरा बिल्कुल एक जैसा था, लेकिन किस्मत बिल्कुल अलग।
माँ सविता जाने क्यों बचपन से ही नेहा पर जान छिड़कती थी। वह उसे गोद में खिलाती, नए कपड़े पहनाती, उसकी हर छोटी-बड़ी बात पर मुस्कुराती। लेकिन नैना को हमेशा अपने से दूर रखती। अगर नैना गोद में आने की कोशिश करती तो वह कह देती, “जा, अपनी दादी के पास जा।”
नैना तब बहुत छोटी थी। उसे समझ नहीं आता था कि माँ उसे प्यार क्यों नहीं करती।
समय बीतता गया।
दोनों बहनें स्कूल जाने लगीं। हर सुबह सविता नेहा के बाल बड़े प्यार से बनाती, उसके टिफिन में उसकी पसंद का खाना रखती। वहीं नैना को खुद ही अपने बाल बनाने पड़ते। कई बार उसका टिफिन भी खाली रह जाता।
एक दिन स्कूल में टीचर ने पूछा, “तुम दोनों जुड़वां हो?”
नेहा मुस्कुराकर बोली, “जी मैडम।”
टीचर ने नैना से कहा, “तुम इतनी उदास क्यों रहती हो?”
नैना बस हल्का-सा मुस्कुरा दी। वह किसी से अपने दिल की बात नहीं कह पाती थी।
घर लौटते ही सविता ने नेहा को गले लगा लिया।
“आ गई मेरी राजकुमारी?”
फिर उसने नैना की तरफ देखा और बोली, “इतनी देर क्यों लगा दी? कोई काम समय पर नहीं होता तुमसे।”
नैना चुपचाप अपना बैग रखकर कमरे में चली गई।
उस रात वह तकिए में मुँह छिपाकर बहुत रोई।
धीरे-धीरे दोनों बड़ी होने लगीं।
नेहा को जो चाहिए होता, माँ तुरंत दिला देती। नया मोबाइल, नए कपड़े, महँगे जूते…
लेकिन जब नैना कुछ माँगती तो जवाब मिलता, “इतने पैसे नहीं हैं।”
एक दिन पिता ने यह सब देखा।
उन्होंने सविता से कहा, “दोनों हमारी बेटियाँ हैं। इतना फर्क क्यों करती हो?”
सविता गुस्से में बोली, “मुझे मत सिखाइए कि बच्चों को कैसे पालते हैं।”
पिता चुप हो गए, लेकिन उनका दिल टूट गया।
नैना पढ़ाई में बहुत तेज थी। उसने हर परीक्षा में पहला स्थान हासिल किया।
जब रिजल्ट आया तो पूरे स्कूल ने उसकी तारीफ की।
प्रिंसिपल ने सविता को बुलाया और कहा, “आपको अपनी बेटी पर गर्व होना चाहिए।”
सविता ने बस इतना कहा, “ठीक है।”
घर लौटकर उसने नैना से सिर्फ एक बात कही, “इससे कोई बड़ा काम नहीं हो गया।”
वहीं अगर नेहा छोटी-सी प्रतियोगिता भी जीत जाती तो पूरा घर मिठाई से भर जाता।
नैना हर बार यही सोचती…
“क्या मैं सच में इतनी बुरी हूँ?”
समय के साथ नेहा भी समझने लगी कि माँ दोनों के साथ बराबरी नहीं करती।
एक दिन उसने माँ से पूछा, “आप नैना दीदी को प्यार क्यों नहीं करती?”
सविता ने बात टाल दी।
लेकिन नेहा के मन में सवाल रह गया।
कॉलेज का समय आया।
नैना ने छात्रवृत्ति हासिल कर ली।
उसने अपनी मेहनत से पढ़ाई पूरी की और एक बड़ी कंपनी में नौकरी पा ली।
पहली तनख्वाह मिलने पर वह सबसे पहले घर आई।
उसने माँ के लिए सुंदर-सी साड़ी खरीदी।
मुस्कुराकर बोली, “माँ… ये आपके लिए।”
सविता ने बिना देखे कहा, “रख दो।”
उसके चेहरे पर खुशी की जगह कोई भाव ही नहीं था।
नैना मुस्कुराने की कोशिश करती रही, लेकिन उसकी आँखें नम हो गईं।
कुछ महीनों बाद नेहा की नौकरी नहीं लग पा रही थी।
वह बहुत परेशान रहने लगी।
तब नैना ने अपने ऑफिस में उसकी सिफारिश की।
कुछ समय बाद नेहा को भी नौकरी मिल गई।
उसने खुशी से नैना को गले लगा लिया।
“दीदी… अगर तुम नहीं होती तो मैं कभी सफल नहीं हो पाती।”
नैना मुस्कुरा दी।
“हम बहनें हैं… एक-दूसरे का साथ देना ही हमारा रिश्ता है।”
नेहा की आँखें भर आईं।
उसे पहली बार महसूस हुआ कि जिसे माँ ने हमेशा कम समझा, वही सबसे बड़ी इंसान निकली।
एक दिन अचानक सविता की तबीयत बहुत खराब हो गई।
उन्हें अस्पताल में भर्ती करना पड़ा।
डॉक्टर ने कहा, “कुछ दिन इन्हें पूरी देखभाल की ज़रूरत होगी।”
नेहा नौकरी के कारण ज्यादा समय नहीं दे पाती थी।
लेकिन नैना ने छुट्टी ले ली।
वह दिन-रात अस्पताल में माँ के पास बैठी रहती।
समय पर दवाइयाँ देना, खाना खिलाना, डॉक्टर से बात करना…
वह सब कुछ अकेले संभाल रही थी।
एक रात सविता की आँख खुली।
उन्होंने देखा कि नैना कुर्सी पर बैठे-बैठे ही सो गई थी। उसके हाथ में अभी भी माँ की दवा थी।
सविता की आँखों से आँसू निकल पड़े।
उन्होंने पहली बार महसूस किया कि जिसे उन्होंने हमेशा ठुकराया, वही सबसे ज्यादा उनका साथ निभा रही है।
अस्पताल से घर लौटने के बाद भी नैना ने उनकी सेवा में कोई कमी नहीं छोड़ी।
एक शाम सविता ने नैना को अपने पास बुलाया।
काँपती आवाज़ में बोलीं,
“बेटा… क्या तुम मुझे माफ़ कर दोगी?”
नैना चौंक गई।
“माफ़? किस बात के लिए, माँ?”
सविता रो पड़ीं।
“मैंने तुम्हें कभी बेटी का प्यार नहीं दिया। हर बार तुम्हें गलत ठहराया। तुम्हारी हर खुशी को नजरअंदाज किया। मुझे नहीं पता मैंने ऐसा क्यों किया… लेकिन मैंने तुम्हारे साथ बहुत बड़ा अन्याय किया।”
नैना की आँखें भी भर आईं।
वह धीरे से माँ के पास बैठ गई।
“माँ… मुझे हमेशा आपके प्यार की कमी महसूस हुई। हर रात यही सोचकर रोती थी कि शायद मुझसे कोई गलती हो गई है। लेकिन आज आपने मुझे अपनी बेटी कहकर बुलाया… मेरे लिए यही सबसे बड़ा तोहफा है।”
सविता ने उसे कसकर गले लगा लिया।
सालों का जमा हुआ दर्द आँसुओं के साथ बह गया।
नेहा भी पास आ गई।
उसने दोनों को गले लगा लिया।तीनों देर तक रोती रहीं।
उस दिन पहली बार उस घर में किसी के साथ भेदभाव नहीं था।
कुछ दिनों बाद परिवार एक साथ बैठा था।
सविता ने दोनों बेटियों का हाथ अपने हाथों में लिया और बोलीं,
“आज से मेरे लिए तुम दोनों बराबर हो। मैंने बहुत देर कर दी, लेकिन अब कभी किसी के साथ फर्क नहीं करूँगी।”
नैना मुस्कुराई।
“माँ, देर से मिला प्यार भी बहुत कीमती होता है।”
घर में फिर से हँसी लौट आई।
हम सब जानते हैं कि माँ का प्यार सबसे बड़ा होता है, लेकिन अगर वही प्यार किसी एक बच्चे से छिन जाए तो उसका दर्द पूरी जिंदगी साथ रहता है। फिर भी सच्चा दिल कभी नफरत नहीं सीखता। नैना ने अपने व्यवहार से साबित कर दिया कि प्रेम और क्षमा, दोनों मिलकर सबसे गहरे रिश्तों के घाव भी भर सकते हैं।

मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं
अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं
प्रातिक्रिया दे