कैद की दुल्हन
विराज सिंघानिया शहर के सबसे बड़े उद्योगपतियों में गिना जाता था। उसके पास आलीशान बंगले, महंगी गाड़ियाँ, दौलत और रसूख की कोई कमी नहीं थी। लोग उसके नाम से ही डरते थे। लेकिन उसके स्वभाव में एक ऐसी कमी थी जिसने उसे कभी किसी का अपना नहीं बनने दिया। उसे बचपन से आदत थी कि जो चीज़ उसे पसंद आ जाए, वह किसी भी कीमत पर उसकी होनी चाहिए।
दूसरी तरफ थी सोनल। एक छोटे से घर में रहने वाली, बेहद मासूम और सादगी पसंद लड़की। उसके पिता एक सरकारी स्कूल में चपरासी थे और माँ सिलाई करके घर चलाने में उनका हाथ बँटाती थीं। सोनल कॉलेज में पढ़ती थी। उसका सपना था कि पढ़-लिखकर अपने माता-पिता का जीवन आसान बनाए। वह रोज़ बस से कॉलेज जाती और लौटते समय मंदिर में माथा टेकना कभी नहीं भूलती थी।
एक दिन विराज अपनी लग्ज़री कार में किसी मीटिंग के लिए जा रहा था। तभी ट्रैफिक सिग्नल पर उसकी नज़र बस स्टॉप पर खड़ी सोनल पर पड़ी। साधारण सूट, कंधे पर बैग और चेहरे पर मासूम मुस्कान। पहली बार किसी लड़की ने उसके मन को इस तरह बेचैन कर दिया।
उस दिन के बाद विराज रोज़ उसी रास्ते से गुजरने लगा। उसने अपने लोगों से सोनल की पूरी जानकारी निकलवा ली—वह कहाँ रहती है, किस कॉलेज में पढ़ती है, कब घर से निकलती है और कब लौटती है।
उसका दोस्त कबीर बोला, “अगर सच में पसंद है तो उसके घर रिश्ता भेज दे।”
विराज हल्का-सा मुस्कुराया।
“मैं इंतज़ार नहीं करता। जो मुझे पसंद आ जाए, उसे हासिल कर लेता हूँ।”
कबीर ने समझाया, “किसी इंसान को चीज़ मत समझ।”
लेकिन विराज ने उसकी बात अनसुनी कर दी।
उधर सोनल को इस बात का ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था कि कोई उसकी हर हरकत पर नज़र रख रहा है।
एक शाम कॉलेज से लौटते समय सड़क सुनसान थी। तभी एक काली एसयूवी उसके सामने आकर रुकी। चार आदमी बाहर निकले।
“कौन हो तुम लोग?” सोनल घबराकर बोली।
उसके जवाब देने से पहले ही उन्होंने उसे जबरदस्ती गाड़ी में बैठा लिया। सोनल चीखती रही, लेकिन सुनसान सड़क पर उसकी आवाज़ किसी तक नहीं पहुँची।
जब उसकी आँखों से पट्टी हटाई गई तो उसने खुद को एक विशाल और आलीशान बंगले के कमरे में पाया। कमरा किसी महल से कम नहीं था, लेकिन उसके लिए वह एक सुनहरा पिंजरा था।
दरवाज़ा खुला।
अंदर विराज आया।
“डरो मत, यहाँ तुम्हें कोई तकलीफ़ नहीं होगी।”
सोनल काँपती हुई बोली, “मुझे यहाँ क्यों लाए हो? मेरे माँ-पापा मेरा इंतज़ार कर रहे होंगे।”
विराज ने शांत आवाज़ में कहा, “क्योंकि मैं तुमसे प्यार करता हूँ।”
सोनल की आँखों से आँसू निकल पड़े।
“जिस प्यार में मेरी मर्ज़ी ही नहीं, वह प्यार नहीं हो सकता। मुझे घर जाने दो।”
विराज ने सिर्फ इतना कहा, “अब यही तुम्हारा घर है।”
उधर सोनल के घर में मातम जैसा माहौल था। उसके माता-पिता ने पूरी रात उसे ढूँढा। पुलिस में शिकायत दर्ज हुई, लेकिन कोई सुराग नहीं मिला। माँ रो-रोकर बेहोश हो जातीं और पिता हर आने-जाने वाले से बेटी के बारे में पूछते।
बंगले में सोनल कई बार भागने की कोशिश करती, लेकिन हर बार सुरक्षा कर्मी उसे पकड़ लेते। उसके मोबाइल से लेकर हर सामान तक उससे ले लिया गया था। बाहर की दुनिया से उसका हर रिश्ता तोड़ दिया गया।
कुछ दिनों बाद विराज ने पूरे परिवार के सामने घोषणा कर दी कि वह सोनल से शादी करेगा।
उसकी माँ ने कहा, “बेटा, जबरदस्ती से कोई रिश्ता नहीं बनता।”
लेकिन विराज के सिर पर जुनून सवार था।
उसने पंडित बुला लिया। सोनल लाख मिन्नतें करती रही।
“मुझे जाने दो… मैं तुम्हारे हाथ जोड़ती हूँ।”
लेकिन उसकी एक न सुनी गई।
कुछ समय बाद दोनों की शादी करवा दी गई। शादी के मंडप में सोनल की आँखों में आँसू थे। उसके चेहरे पर दुल्हन की खुशी नहीं, बल्कि कैद का दर्द था।
शादी के बाद भी कुछ नहीं बदला। बंगले के हर दरवाज़े पर पहरा था। सोनल बाहर नहीं जा सकती थी। उसके कमरे की खिड़की से दूर दिखाई देता खुला आसमान उसे हर दिन अपनी आज़ादी की याद दिलाता।
विराज रोज़ उसके लिए महंगे कपड़े, गहने और तोहफ़े लाता।
एक दिन उसने हीरे का हार बढ़ाते हुए कहा, “ये तुम्हारे लिए।”
सोनल ने हार की तरफ देखे बिना जवाब दिया,
“जिस इंसान के पास आज़ादी नहीं होती, उसके लिए हीरे भी बेड़ियाँ लगते हैं।”
विराज पहली बार निरुत्तर हो गया।
दिन बीतते गए। सोनल पहले जैसी हँसमुख लड़की नहीं रही। उसने ठीक से खाना छोड़ दिया। वह चुपचाप घंटों खिड़की के पास बैठी रहती।
एक दिन उसकी तबीयत बहुत बिगड़ गई। डॉक्टर ने जाँच के बाद कहा,
“इन्हें बीमारी से ज़्यादा मानसिक तनाव है। अगर ये ऐसे ही रहीं तो इनकी हालत और खराब हो सकती है।”
उस रात विराज सो नहीं पाया। उसे पहली बार अपने किए पर पछतावा होने लगा। उसने सोचा, “क्या सच में मैं इससे प्यार करता हूँ? अगर करता हूँ, तो यह मेरे साथ खुश क्यों नहीं है?”
अगली सुबह वह सोनल के कमरे में गया।
“अगर मैं तुम्हें आज़ाद कर दूँ… क्या तुम मुझे माफ़ कर पाओगी?”
सोनल ने उसकी ओर देखा।
“माफ़ करना मुश्किल नहीं होता, लेकिन जो भरोसा कभी बना ही नहीं, उसे लौटाना नामुमकिन होता है।”
विराज की आँखें झुक गईं।
वह धीरे से उठा, कमरे का दरवाज़ा खोला और अपनी जेब से बंगले के मुख्य गेट की चाबी निकालकर सोनल के हाथ में रख दी।
“आज से तुम आज़ाद हो। तुम्हें कोई नहीं रोकेगा।”
सोनल कुछ पल तक उसे देखती रही। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि यह सच है।
वह धीरे-धीरे बंगले से बाहर निकली। कई दिनों बाद उसने खुली हवा में साँस ली। उसकी आँखों से आँसू बह निकले। उसे लगा जैसे किसी ने उसके पैरों की अदृश्य ज़ंजीरें खोल दी हों।
वह अपने घर पहुँची।
दरवाज़ा खुलते ही उसकी माँ ने उसे देखा और दौड़कर गले लगा लिया। पिता की आँखों से भी आँसू बहने लगे। वह पल पूरे परिवार के लिए किसी चमत्कार से कम नहीं था।
कुछ दिनों बाद पुलिस ने विराज को पूछताछ के लिए बुलाया। उसने अपने अपराध को छिपाने की कोशिश नहीं की। उसने माना कि उसने सोनल को उसकी इच्छा के विरुद्ध अपने पास रखा था। कानून ने अपना काम किया और उसे अपने किए की सज़ा मिली।
सोनल ने धीरे-धीरे अपने जीवन को फिर से सँभाला। उसने अपनी पढ़ाई पूरी की, नौकरी की और अपने माता-पिता का सहारा बनी। उस दर्द ने उसे कमजोर नहीं, बल्कि पहले से कहीं अधिक मजबूत बना दिया।
विराज ने जेल में रहते हुए कई बार अपने फैसलों पर पछतावा किया। उसे समझ में आ गया कि प्यार किसी को अपनी मर्ज़ी से बाँध लेने का नाम नहीं है। अगर किसी रिश्ते में सम्मान, भरोसा और दोनों की सहमति न हो, तो वह रिश्ता नहीं, केवल कैद बनकर रह जाता है।
सालों बाद जब विराज जेल से बाहर निकला, उसने दूर से एक कार्यक्रम में सोनल को देखा। वह आत्मविश्वास से मंच पर खड़ी थी और महिलाओं की सुरक्षा तथा आत्मसम्मान पर भाषण दे रही थी। विराज बिना उससे मिले वापस लौट गया। उसे महसूस हुआ कि कुछ गलतियाँ ऐसी होती हैं जिन्हें जीवन भर का पछतावा भी पूरी तरह मिटा नहीं सकता।
उस दिन के बाद दोनों की राहें फिर कभी नहीं मिलीं। लेकिन उनकी कहानी हर उस इंसान के लिए एक सीख बन गई कि सच्चा प्यार किसी पर अधिकार जमाने में नहीं, बल्कि उसकी इच्छा, सम्मान और आज़ादी की कद्र करने में होता है।

मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं
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