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अधूरी इबादत भाग~16

पढ़ने का समय : 6 मिनट

भाग~16 खुद से बड़ा सवाल

 

अद्वैत उस पुराने, हल्की रोशनी वाले कैफ़े के एक कोने की टेबल पर बैठा था, जहाँ लकड़ी की मेज़ें और दीवारों पर लगे पुराने पोस्टर अब भी बीते ज़माने की खुशबू सँजोए हुए थे।

वो बच्चा, जो पहली बार उससे मिला था, अब उसकी ज़िंदगी की सबसे गंभीर बात कह चुका था…. शादी की, रिश्तों की, भरोसे की। यश के शब्द अब भी उसके ज़ेहन में गूंज रहे थे, और उसकी आँखें उस बालक की मासूम गंभीरता में उलझी हुई थीं, जैसे वो किसी गहरे सवाल के जवाब ढूँढ रही हों।

“तुम तो आज पहली बार मुझसे मिल रहे हो, यश,” अद्वैत की आवाज़ में एक अजीब सी नरमी थी, मानो वह किसी नाजुक काँच को थाम रहा हो, “तो तुम मुझे अपनी दीदी से शादी करने के लिए कैसे कह सकते हो?”

यश ने चौंकने की बजाय बहुत सधे हुए स्वर में जवाब दिया, उसकी आँखों में कोई हिचक नहीं थी, “दीदी ने आपके बारे में जितना बताया है, उससे मुझे तो आप बहुत भले इंसान लगते हो।”

अद्वैत ने एक पल को उसकी ओर देखा, उसकी आँखों में सच में कोई छल नहीं था। मगर वो यह सुनकर और जानना चाहता था। उसकी आवाज़ में थोड़ी जिज्ञासा उभरी, “भला इंसान कैसे?”

यश का चेहरा खिल उठा। “सबसे पहली बात,” उसने कहा, “आपने मेरी दीदी की जान बचाई है। और दूसरी, सबसे बड़ी बात – आपने कभी भी उनका फायदा नहीं उठाया, न उनके साथ कुछ ग़लत किया। आजकल तो लोग बस मौके ढूंढते हैं, लेकिन आपने… आपने उन्हें स्पेस दिया, इज़्ज़त दी… वो चीज़ जो शायद उन्हें सबसे ज़्यादा चाहिए थी।”

अद्वैत के भीतर कुछ खामोशी से हिलने लगा। यश के मासूम शब्दों ने उसे अंदर तक छू लिया था। उसे लगा जैसे कोई उसके अंधेरे कमरे में एक छोटा सा दीया जला गया हो, बिना कोई शोर किए। उस पल में अद्वैत को एहसास हुआ कि भले ही उसने कुछ बड़ा नहीं किया हो, पर शायद… शायद उसका होना ही किसी के लिए काफी हो गया था।

अद्वैत को अपने बारे में यश के मुँह से ये बातें सुनना कुछ अजीब सा लग रहा था। भीतर कहीं कुछ काँप गया था। जैसे कोई पुरानी धूल में ढकी हुई तस्वीर अचानक आँखों के सामने आ गई हो—अपनी माँ की वो आँखें, जिनमें उसने आखिरी बार देखा था खुद पर भरोसा। वो आँखें जो कहती थीं, “दूसरे जैसे मत बनना, अद्वैत… अपनी अच्छाई को मत छोड़ना।” आज यश के मासूम शब्दों ने उस अधूरी बात को पूरा कर दिया था।

जिस अद्वैत अवस्थी को दुनिया अक्सर “नजायज़” कहकर किनारे कर देती थी, जिसके नाम के आगे कभी पिता का नाम नहीं जुड़ा, जिसकी परवरिश सवालों की छांव में हुई—क्या वही अद्वैत आज किसी के लिए “भला इंसान” कहलाने लायक बन गया है? क्या उसने सचमुच अपनी माँ के आदर्शों को जी लिया है, जो एक किशोर लड़के की आँखों में इतनी साफ इज्ज़त उतर आई?

लेकिन जैसे ही उसका मन उन ख्यालों में बहने लगा, उसने खुद को एक झटका दिया। नहीं, अभी भावनाओं में बहने का समय नहीं है। उसने गहराई से यश की आँखों में देखा, फिर धीमी, मगर साफ आवाज़ में बोला, “यश, तुम्हें किसी भी तरह अपनी दीदी को कल कोर्ट लेकर आना होगा। तभी हम दोनों की शादी हो पाएगी।”

यश कुछ कहने ही वाला था कि अद्वैत ने जल्दी से जोड़ा, “लेकिन इस बारे में सिर्फ़ तुम्हें और रूहानी को ही पता होना चाहिए। कोई तीसरा नहीं। कोई भी नहीं।”

उसके शब्दों में कोई डर नहीं था, मगर एक जिम्मेदारी की थकान ज़रूर थी। मानो वो उस अकेले पुल पर खड़ा हो जहाँ से नीचे छलांग लगाना भी जरूरी था और टिके रहना भी। उसकी आवाज़ में स्थिरता थी, लेकिन भीतर कहीं बहुत गहराई में एक बवंडर चल रहा था…. डर, उम्मीद और एक अजीब-सी राहत का। जैसे वो किसी ऐसी डोर को थामे खड़ा था जो अगर टूटी, तो सब कुछ बिखर जाएगा, लेकिन अगर बची रही… तो शायद एक नई ज़िंदगी शुरू हो सकती थी।

यश की बातों को सुनते हुए अद्वैत का मन कुछ झिझकता है, लेकिन उसने अपने भीतर के असमंजस को दबा दिया। “आप फिक्र मत कीजिए सर, कल मैं उन्हें शादी की शॉपिंग के नाम से ले आऊँगा,” यश का विश्वासपूर्ण स्वर सुनकर अद्वैत ने एक गहरी सांस ली। 

फिर, जैसे किसी कांटे को उखाड़ने की कोशिश करते हुए उसने अपनी चिंता को एक बार फिर से व्यक्त किया, “लेकिन साथ में कोई और नहीं होना चाहिए, ना ही तुम्हारी माँ या तुम्हारे पापा।” अद्वैत के शब्दों में गहरी चिंता थी, जैसे उसके मन में एक अंधी सी गलती का डर पल रहा हो, जो इस फैसले को और भी कठिन बना रहा था।

यश ने एक हल्की मुस्कान के साथ कहा, “आप निश्चिंत रहिए, दीदी को लेकर मैं अकेले ही आऊँगा, माँ-पापा मुझे कुछ नहीं बोलेंगे।” यश के शब्दों में एक तरह का आत्मविश्वास था, लेकिन अद्वैत के भीतर एक हल्की सी खटक महसूस हुई। यह विश्वास था या फिर एक और भ्रम, वह नहीं जानता था।

उसके मन में एक असमंजस था, जैसे एक तट पर खड़ा कोई इंसान जो जानता है कि समुद्र की लहरें कभी भी उसे अपनी चपेट में ले सकती हैं, फिर भी वह कदम बढ़ाने के लिए तैयार नहीं है। उसने अपने भीतर की घबराहट को शांत किया, और फिर से अपने ध्यान को एक ही बिंदु पर केंद्रित किया। “बस, अब यहीं तक,” उसने खुद से कहा, और फिर वहां से जाने का निर्णय लिया।

अद्वैत जैसे ही उठने वाला था, तभी उसकी नजरें रुहानी के फोन पर पड़ीं, जो अभी भी उसके हाथों में था। कुछ पल के लिए वह जैसे ठहर गया। उसकी उंगलियाँ फोन के आसपास हल्की सी घूमने लगीं, जैसे उसे इसे वापस करना न हो, बल्कि उसमें छुपे हुए किसी गहरे रिश्ते को थामे रखने की इच्छा हो।

दिल में उथल-पुथल सी महसूस हो रही थी। वह रुहानी से जुड़ी हर बात, हर याद, उसकी आँखों के सामने जैसे सजीव हो उठी। पर फिर उसने खुद को सँभाला और यथार्थ में लौटते हुए यश को फोन वापस करते हुए कहा, “अपनी दीदी को उसका फोन दे देना।”

यश ने उस फोन को सावधानी से अद्वैत से लिया और उसे अपने हाथों में थाम लिया, जैसे कोई बहुमूल्य चीज हो। वह खड़ा होने लगा, जाने के लिए तैयार था, तभी अद्वैत ने उसे रोकते हुए कहा, “और हाँ, रुहानी को बोल देना कि मैंने अपना नंबर इस में सेव कर लिया है और मैं उससे बात कर लूंगा।”

यश ने सिर झुकाकर कहा, “जी जरूर, धन्यवाद,” और धीरे-धीरे कदम बढ़ाए। अद्वैत ने उसे जाते हुए देखा, लेकिन उसका मन अभी भी कहीं और था। उसके भीतर जैसे एक अजीब सी लहर दौड़ रही थी। उसका ध्यान अब भी उसी फोन पर था, जिसमें रुहानी की यादें और उसकी खुशबू बसी हुई थी। यश के जाते ही अद्वैत वहीं बैठा रहा, जैसे किसी उलझी हुई सोच में खो गया हो। उसके दिल में एक अजीब सी गहरी खामोशी थी, जिसे वह खुद भी समझ नहीं पा रहा था।

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क्या अद्वैत की ज़िंदगी में अब भी कोई और आ सकता था, या फिर वह खुद ही किसी अजनबी भविष्य की ओर बढ़ रहा था?

क्या रुहानी इस समझौते को स्वीकार करेगी, जो अद्वैत ने बिना उससे पूछे तय कर दिया है? 

अद्वैत की उम्मीदों और रुहानी के दिल के बीच जो अनकही बातें हैं, क्या वे दोनों के सामने आने वाली राह को बदल देंगी?

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