भाग~15 अद्वैत की सबसे बड़ी चुनौती
अद्वैत सुबह की पहली रोशनी के साथ ही घर से निकल पड़ा। उसके कदम धीमे थे लेकिन मन तेज़ी से दौड़ रहा था…. जैसे हर मोड़ पर कोई अधूरी बात उसका इंतज़ार कर रही हो।
यश द्वारा भेजे गए पते को उसने रात भर निहारते हुए कितनी बार देखा था, अब वही पता उसे एक अजनबी सच्चाई की ओर ले जा रहा था।
कार चलाते हुए भी उसकी नज़रें अक्सर सड़कों से हटकर शहर की धड़कनों को पढ़ने की कोशिश करती… कोरे आसमान के नीचे फैले चाय के ठेले, जागती हुई दुकानों की नीम रोशनी और कॉलेज के बाहर खड़े युवाओं की हल्की सी चहक…. ये सब उस शहर के अपनेपन को बिखेर रहे थे, फिर भी अद्वैत के मन में कुछ अनकहा, कुछ अधूरा सा महसूस हो रहा था।
उसने कार एक शांत गली में मोड़ी और कुछ देर बाद एक छोटे लेकिन सलीके से सजे कैफ़े के सामने आकर रुक गई। कैफ़े की बाहरी दीवारों पर बेलें चढ़ी थीं, जिन पर सुबह की धूप छिटकी हुई थी। भीतर से हल्की सी जैज़ म्यूज़िक की आवाज़ आ रही थी और एक पुरानी लकड़ी की खिड़की के पार कुछ रंगीन कुर्सियाँ करीने से रखी थीं।
अद्वैत कुछ देर बाहर ही खड़ा रहा। उसकी आँखें हर आहट पर टिक जाती और दिल हर दरवाज़े की ओर उम्मीद से देखता। कुछ देर बाद वह वह कैफ़े में प्रवेश किया।
अंदर की हवा में कॉफी और वैनिला की खुशबू थी और कोनों में रखी किताबों से उठती खामोशी…. सब कुछ बेहद सुकून देने वाला था, लेकिन अद्वैत की बेचैनी उस शांति को भी चीर रही थी। उसने अपनी निगाहें चारों ओर दौड़ाईं, किसी अपरिचित लेकिन परिचित चेहरे की तलाश में।
अद्वैत कैफ़े के कोने वाली टेबल पर बैठा था, जहाँ एक बड़ी सी खिड़की बाहर सड़क की हलचल दिखा रही थी। उसने सामने टेबल पर रूहानी का फोन रखा। उसकी उंगलियाँ बार-बार फोन के पास जाती, जैसे हर स्पर्श में कोई संकेत टटोल रही हो।
वह लगातार बाहर झाँकता रहा…. उसकी आँखों में किसी अजनबी की प्रतीक्षा का तनाव था। हर बार जब कोई लड़का कैफ़े के पास आता, उसका मन थोड़ी देर के लिए ठहर जाता और फिर उसी अनिश्चितता में लौट जाता।
कुछ ही देर में एक दुबला-पतला किशोर, स्कूल यूनिफॉर्म में, बैग लटकाए, तेज़-तेज़ कदमों से आता दिखा। उसने वही बाहर से रूहानी के फोन पर कॉल किया। अद्वैत ने फोन को देखा, और फिर खिड़की से बाहर….. दोनों की नज़रें मिली और एक सहज मुस्कान के साथ उन्होंने अपने-अपने हाथ हिलाए, जैसे किसी अनकहे बंधन को पहचान लिया हो।
यश दरवाजा खोलते ही अद्वैत की ओर ऐसे लपका, मानो कोई छोटा भाई किसी बड़े को बहुत दिनों बाद देख रहा हो। उसकी साँसें तेज़ थीं, लेकिन आँखों में गहरी कृतज्ञता की चमक थी। उसने बैग उतारकर एक ओर रखा और बिना देर किए अद्वैत के सामने बैठ गया।
वह कुछ पल तक उसे देखता रहा, फिर भर्राए गले से बोला — “सर… मैं आपको सिर्फ एक बार शुक्रिया कहना चाहता था… आपने मेरी दीदी को बचाया… वरना आज शायद हम…” उसकी आवाज़ टूटने लगी, लेकिन उसने खुद को सम्भाला, “मैं नहीं जानता आपने क्यों और कैसे किया… लेकिन मेरे लिए आप भगवान से कम नहीं।”
अद्वैत की आँखों में उस क्षण एक अजीब सा सन्नाटा उतर आया…. तारीफ सुनना उसे कभी सहज नहीं लगता था, खासकर तब जब वो खुद अपने किए पर संशय में हो। उसने धीमे स्वर में कहा, “मैंने कुछ ख़ास नहीं किया… बस जो सही लगा, वही किया।”
यश की आँखों में आँसू तैर रहे थे, मगर उन्हीं अश्रुओं की गहराई में कहीं एक विश्वास भी चमक रहा था… जैसे उसे यक़ीन हो चला हो कि उसकी दीदी की टूटी-बिखरी कहानी शायद फिर से एक मुकम्मल रूप ले सके।
अद्वैत कुछ क्षणों तक यश को एकटक देखता रहा, जैसे उसके भीतर चल रही भावनाओं को समझना चाहता हो। कैफ़े की हल्की रोशनी में यश का चेहरा थका हुआ था, लेकिन आँखों में जो सच्चाई थी, वो अद्वैत को भीतर तक छू रही थी।
उसने अपनी हथेलियाँ मेज़ पर रख दीं, और थोड़ी देर की चुप्पी के बाद धीमे स्वर में पूछा, “यश… क्या तुम मुझे बता सकते हो कि रूहानी ने ऐसा कदम क्यों उठाया था?”
उसकी आवाज़ में जिज्ञासा से ज़्यादा दर्द था, जैसे वह उस अधूरे रहस्य के धागे को पकड़कर कुछ समझने की कोशिश कर रहा हो।
यश ने एक गहरी साँस ली, उसके होंठ थोड़े काँपे, लेकिन उसने बोलना शुरू किया, “सर, दीदी हमेशा से थोड़ी अलग थी… कुछ साल पहले से ही वह कपड़े डिज़ाइन करने का सपना देखा करती थी, लेकिन मम्मी-पापा को यह मंज़ूर नहीं था। माँ हमेशा उसे शादी और घरेलू जिम्मेदारियाँ निभाने की सलाह देती रहती थी जैसे उसकी अपनी इच्छाएँ कोई मायने नहीं रखती थीं।”
अद्वैत ने चुपचाप यश की बातों को सुन रहा। यश ने बात आगे बढ़ाई, “फिर एक दिन कुछ हुआ। घर में एक बड़ा झगड़ा और दीदी बहुत टूट गई थी। माँ -पापा ने जब उन्हें कहा की वो उनके मर गई तब शायद उन्होंने सोचा होगा कि सब कुछ खत्म कर दे।”
अद्वैत की आँखें धीरे-धीरे नम होने लगीं। हर एक शब्द उसे रूहानी के उस चेहरे की याद दिला रहा था जो चुप तो रहता था, पर बहुत कुछ कहता था।
यश ने फिर कुछ ऐसा कहा जिससे अद्वैत पर मानो बिजली गिर पड़ी हो। उसके शब्दों ने उसकी पूरी दुनिया को हिला दिया।
यश ने गहरी चिंता में डूबकर कहा, ‘आपके यहाँ से जाने के बाद पापा ने यह ऐलान कर दिया कि वह जल्द से जल्द दीदी की शादी कर देंगे… एक ऐसे आदमी से, जो पुरानी सोच और सख्त धारणाओं में बंधा हो, और जो दीदी की स्वतंत्रता को समझ न सके। दीदी ने उन्हें मना किया, लेकिन पापा को सिर्फ नाम और इज़्ज़त की परवाह है।’ यश की आँखों से एक आँसू टपककर टेबल पर गिरा।
यश की बातों को सुनते ही अद्वैत के मन में कई विचारों की लहरें उठने लगीं। वह सोचने लगा, अगर रूहानी की शादी सच में हो गई तो उसकी व्यक्तिगत उलझनें उसकी पेशेवर छवि को गहरा नुकसान पहुँचा सकती हैं।
लेखक के रूप में उसकी प्रतिष्ठा और सफलता पर इसका प्रतिकूल असर पड़ेगा। मीडिया पहले ही उसकी निजी ज़िंदगी को घेर चुका था और वह जानता था कि यदि यशस्वी से इस अनुबंधित शादी के बारे में बात नहीं की, तो उसका करियर खतरे में पड़ सकता है। उसका आत्म-सम्मान अब दबावों के नीचे दबा हुआ था और उसे सिर्फ अपनी छवि की चिंता सता रही थी।
लेकिन अगले ही पल, यश की बातों से अद्वैत को राहत मिली। उसने महसूस किया कि यश की मासूमियत और उसके विश्वास में एक गहरी पीड़ा छिपी थी, जो उसकी दीदी को बचाने की आखिरी उम्मीद थी।
थोड़ी देर रुककर उसने सीधा अद्वैत की आँखों में देखा और बोला, “सर… इसीलिए मैं आपसे मिलना चाहता था। मैं जानता हूँ कि आप दीदी के लिए अजनबी हैं, लेकिन फिर भी… आपने उन्हें ज़िंदगी दी है। और अगर… अगर आप उनसे शादी कर लें… तो शायद दीदी की शादी के लिए पापा जबरदस्ती नहीं कर पाएंगे।”
यश के शब्दों में एक मासूम सी ज़िद थी, एक छोटे भाई की उम्मीद, जिसने अपनी बहन को खोते-खोते बचाया था… और अब उसे फिर से टूटने नहीं देना चाहता था। अद्वैत बस चुप था, जैसे शब्द कहीं खो गए हों और दिल एक अनकहे बोझ से भर गया हो।
अद्वैत ने हल्के से मुस्कुराने की कोशिश की, लेकिन वो मुस्कान पूरी नहीं हो सकी और उसने बहुत संयम से यश की ओर देखा।
“तुम तो आज पहली बार मुझसे मिल रहे हो, यश,” अद्वैत की आवाज़ में एक अजीब सी नरमी थी, मानो वह किसी नाजुक काँच को थाम रहा हो, “तो तुम मुझे अपनी दीदी से शादी करने के लिए कैसे कह सकते हो?”
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क्या अद्वैत इस घने उलझन के बीच अपनी पहचान और करियर को खतरे में डालने को तैयार था?
अद्वैत के दिल में एक सवाल गूंजा… क्या यह सच में सिर्फ एक रास्ता था, या फिर यह एक ऐसा चक्र था जिससे निकलने का कोई रास्ता नहीं था?
उसकी ज़िंदगी की सबसे बड़ी चुनौती अब इस ए:क सवाल पर टिकी थी – क्या वह खुद को उस रिश्ते में बँधने दे सकता था?

लिखकर रूह छूने की कोशिश…..
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