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अधूरी इबादत भाग~10

पढ़ने का समय : 8 मिनट

भाग~10 तूफ़ान से पहले

 

सुबह की ठंडी हवा खिड़कियों से छनकर कमरे के भीतर उतर रही थी, लेकिन रूहानी के भीतर एक अनाम घबराहट की तपिश थी। उसने बार-बार अपनी हथेलियों को आपस में मसलते हुए खुद को शांत करने की कोशिश की, पर बेचैनी जैसे उसके भीतर से फूट रही थी। 

अद्वैत आज सुबह जल्दी ही निकल गया था। एक पास के शहर में कवि सम्मेलन था, जहाँ उसे मुख्य अतिथि के तौर पर बुलाया गया था। जाते समय उसने सिर्फ एक हल्की-सी मुस्कान के साथ सिर हिलाया था, कुछ कहा नहीं था। शायद कहने को कुछ था भी नहीं। दोनों के बीच अब तक जो दूरी थी, वह अनकही बातों से भरी थी।  

रूहानी ने सोफे पर बैठते हुए गहरी सांस ली। दिल जैसे हल्का नहीं हो रहा था। हर कुछ मिनट पर उसे लग रहा था कि कुछ गलत होने वाला है, कुछ ऐसा जो उसकी समझ से परे है। वह इस अजीब सी भावना को झटकने की कोशिश कर रही थी, लेकिन हर बार वह और गहरे उतरती जा रही थी।  

मीना, जो चाय लेकर आई थी, उसकी खोई-खोई आँखों को देख नहीं पाई। उसने धीरे से चाय का कप सामने रख दिया और मुस्कुराते हुए कहा, “क्या हुआ मैडम, आप बहुत चुपचाप हैं आज? आपके पैर का घाव तो अब पूरी तरह ठीक हो गया है, कई दिन हो गए।”  

रूहानी ने अनमने भाव से अपने तलवे की ओर देखा। वहाँ अब सिर्फ एक हल्का गुलाबी निशान बचा था, जैसे बीते दर्द की कोई फीकी याद। उसने धीमे से कहा, “हाँ, घाव तो ठीक हो गया है, लेकिन पता नहीं क्यों, आज मन बहुत बेचैन हो रहा है… जैसे कुछ बुरा होने वाला है।”  

उसकी आवाज में एक ऐसी मासूमियत और डर था, जिसे सुनकर मीना का दिल पसीज गया। मीना ने अपने अनुभव से सीखा था कि कई बार दिल की बेचैनी कोई झूठा वहम नहीं होती, लेकिन फिर भी उसने रूहानी को ढाढ़स बंधाते हुए कहा, “ज्यादा चिंता मत कीजिए मैडम। सब कुछ अच्छा ही होगा। अच्छे लोगों के साथ अच्छा ही होता है।”  

रूहानी ने एक कमजोर मुस्कान के साथ सिर हिला दिया, लेकिन भीतर का तूफान अब भी थमा नहीं था।  

उसने चाय का कप अपने हाथों में थामा और खिड़की के बाहर झांकने लगी – धूप हल्की थी, पेड़ धीरे-धीरे हिल रहे थे, सब कुछ सामान्य था… फिर भी दिल के किसी कोने में कोई साया मंडरा रहा था, कोई अनदेखा डर जो उसके भीतर घर कर गया था।

मीना अब धीरे-धीरे रूहानी से खुलने लगी थी। घर के काम करते-करते वह अपनी चुप्पी तोड़ बैठी। उसकी आवाज़ में अपनापन घुला था, जैसे अपने दिल का बोझ हल्का कर लेना चाहती हो। उसने सिर झुकाए हुए कहा, “मैडम, आप जानती हैं, मेरे बच्चे की पढ़ाई का सारा खर्च अद्वैत सर उठाते हैं।”

रूहानी ने चौंककर उसकी तरफ देखा। मीना ने सफाई देते हुए आगे कहा, “मेरे पति बहुत शराबी थे। रोज़ पीकर घर आते, गाली-गलौच, मारपीट… सब सहती रही। लेकिन एक रात ज़्यादा पीकर कहीं गिर पड़े और फिर लौटकर नहीं आए।” उसकी आवाज़ में ना कोई पछतावा था, ना कोई आँसू…. बस एक थकान, जो बरसों के जिए हुए दुःख से आई थी।

“उनके मरने के बाद मैंने घर-घर जाकर काम करना शुरू किया। एक दिन अद्वैत सर के पापा के यहाँ भी काम पर लगी। लेकिन…” मीना का चेहरा तनिक कस गया, “उनकी पत्नी को मैं कभी पसंद नहीं आई। रोज़ कोई न कोई गलती निकालती, डाँटतीं। कभी खाना खराब, कभी झाड़ू सही नहीं।”

रूहानी चुपचाप सुनती रही। मीना ने आगे कहा, “फिर एक दिन सर आए। देखा कि मैं डाँट खा रही हूँ। फिर उन्होंने अपनी पत्नी से मिलवाया और कहा — ‘मीना अब हमारे घर काम करेगी।’ बस तब से यहीं हूँ, सर ने कभी कोई शिकायत नहीं की। हमेशा सम्मान दिया।”

मीना के शब्दों में अद्वैत के लिए एक गहरा आदर था। रूहानी ने उसकी आँखों में वह चमक देखी, जो केवल उन लोगों की आँखों में होती है जिन्हें किसी ने टूटने से बचा लिया हो।

कुछ पल दोनों के बीच खामोशी रही। मीना ने धीरे से झाड़ू एक कोने में टिकाई और हिचकिचाते हुए पूछा, “मैडम, आपके घरवाले क्यों नहीं आते आपको देखने?”

यह सवाल हवा में तीर की तरह तना रह गया। रूहानी का दिल एक पल को जैसे रुक गया। उसने पलकों को झपकाया, अपने भीतर उठती कड़वी यादों को जब्त किया। चेहरे पर हल्की सी मुस्कान लाते हुए, उसने नजरें चुराते हुए कहा, “ऐसा कुछ नहीं… वो सब बहुत दूर रहते हैं… व्यस्त होंगे शायद।”

मीना ने उसकी आवाज़ में छुपे दर्द को महसूस कर लिया था, मगर उसने ज़्यादा कुरेदना सही नहीं समझा पर कमरे में जो मौन फैल चुका था, वह अब और भी गाढ़ा हो गया था।

मीना ने माहौल को हल्का करने की कोशिश में फिर से बातचीत शुरू की। इस बार उसकी आवाज़ में हल्की उत्सुकता थी, “वैसे, आप क्या करती थीं, मैडम?”

रूहानी ने एक पल को सोचा, क्या सच बताए या फिर वही आधा-अधूरा जवाब दे, जिसे सुनकर सामने वाला सवाल न बढ़ाए लेकिन मीना की आँखों में कोई छल नहीं था, बस एक सीधी-सादी जिज्ञासा थी।

हल्की मुस्कान के साथ रूहानी ने कहा, “मैं ड्रेस डिजाइनर हूं।”

मीना की आँखों में चमक आ गई। उसने पास आकर चहकते हुए पूछा, “अच्छा! तो आप तो बहुत बड़ी डिजाइनर होंगी न?”

रूहानी ने हल्के से हँसते हुए सिर झुकाया। उसकी हँसी में एक थकी हुई सच्चाई थी।

“नहीं, इतनी बड़ी भी नहीं,” उसने धीरे से कहा, “अभी तो बस… संघर्ष ही कर रही थी। खुद को साबित करने की कोशिश में थी।”

मीना ने सहानुभूति से उसकी ओर देखा। फिर फुर्ती से बोली, “अरे, आप तो बहुत अच्छा काम करती होंगी। कपड़े का डिजाइन बनाना कोई मामूली बात थोड़े न है।”

रूहानी ने मीना की बात पर कुछ नहीं कहा। दिल के किसी कोने में मीना की मासूम प्रशंसा ने हल्का-सा सुकून दिया, जैसे कोई किसी बर्फीली रात में काँपते हुए कंधों पर चुपचाप एक गर्म चादर रख दे।

लेकिन उसी सुकून के नीचे एक कड़वी सच्चाई भी थी कि किस तरह उसका सपना टूटने की कगार पर था, कैसे उसे अपने अस्तित्व के लिए भी लड़ना पड़ा था, कैसे अपने घरवालों के ठुकराए जाने के बाद उसके पास खुद के अलावा कोई सहारा नहीं बचा था।

कमरे में फिर से चुप्पी छा गई। मीना अब अपने बर्तन समेट रही थी, उनकी आवाजें उस भारी सन्नाटे में टकरा कर रह रह कर गूंज रही थीं।

मीना ने आखिरी कुर्सी पर कपड़ा मारते हुए कहा, “ठीक है, मैंने अपना काम कर दिया है, मैं जा रही हूं।”

रूहानी ने चुपचाप सिर हिलाया। उसकी मुस्कान फीकी थी, मगर आँखों में एक हल्का-सा अपनापन झलक गया था।

मीना के जाते ही रूहानी ने धीरे से दरवाजा बंद कर दिया। दरवाज़ा बंद करते समय उसका हाथ कुछ पल के लिए हैंडल पर रुका, जैसे वह इस छोटे-से घर में पसरी एकाकी खामोशी से खुद को बचाने की कोशिश कर रही हो।

कमरे में फिर से वही पुरानी चुप्पी फैल गई। रूहानी ने गहरी साँस ली और खुद को संयत करते हुए सोचा कि आज शायद कुछ पल अपने लिए भी होंगे। लेकिन इस उम्मीद को वक़्त ने लंबा नहीं चलने दिया।

कुछ ही देर में दरवाज़े पर फिर से दस्तक हुई। रूहानी ने चौंक कर पलटकर दरवाजे की ओर देखा। उसके दिल में हल्की-सी बेचैनी उठी।

“अब कौन?” उसने खुद से बुदबुदाया और धीमे कदमों से दरवाजे की ओर बढ़ी।

जैसे ही उसने दरवाजा खोला, सामने मीना खड़ी थी। हाथों में अपनी चुन्नी मरोड़ते हुए, आँखों में उम्मीद की चमक लिए।

“अरे तुम?” रूहानी ने थोड़ा आश्चर्य से पूछा।

मीना हड़बड़ाई-सी बोली, “मैडम, एक बात कहनी थी। आप तो ड्रेस डिजाइनर हो ना? मेरे बच्चों के लिए ड्रेस डिजाइन कर दोगी क्या?”

उसकी आवाज़ में संकोच और एक मासूम उम्मीद दोनों थीं।

रूहानी ने भौंहें चढ़ाकर पूछा, “ड्रेस?”

मीना ने जल्दी-जल्दी समझाया, “वो क्या है ना, मेरी बेटी का जन्मदिन आने वाला है। एक ड्रेस देखी थी उसने बाजार में, बहुत पसंद आई है उसे। लेकिन बहुत महंगी है, मारे बस की नहीं। अगर आप वही ड्रेस बना दें… तो मेरी गुड़िया बहुत खुश हो जाएगी।”

रूहानी के होंठों पर एक कोमल मुस्कान तैर गई। मीना की आँखों में एक माँ का प्रेम साफ़ चमक रहा था।

रूहानी ने सिर हिलाते हुए कहा, “हां, बना दूंगी। लेकिन मैं कोई बहुत फेमस डिजाइनर नहीं हूं। फिर भी, अपनी बेटी को ले आना। मैं उसके नाप की ड्रेस डिजाइन कर दूंगी।”

मीना के चेहरे पर एक चमक आ गई, जैसे उसे कोई अनमोल तोहफा मिल गया हो। उसने बार-बार धन्यवाद कहा, फिर खुशी-खुशी पलट गई।

रूहानी ने फिर दरवाजा धीरे से बंद कर दिया। कमरे में लौटते हुए उसके चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान बनी रही, जो मीना के भोलेपन से उपजी थी।

लेकिन जैसे ही वह अपने बिस्तर के किनारे बैठी, पुराने विचार फिर से उसे घेरने लगे। उसने सोचा, “कितने दिन हो गए स्टूडियो गए हुए… सारा सामान वहीं रखा है।” एक कसक सी उसके भीतर उठी।

“आज चली जाऊंगी,” उसने धीरे से खुद से वादा किया।

मन में एक हल्का सा उत्साह जागा… शायद काम में खुद को डुबो कर वह इस अनजानी खालीपन से बच सकेगी।

उसे लगा जैसे कोई चीज़ उसके भीतर फिर से सांस लेने लगी हो लेकिन उसकी ये सोच भी बस कुछ ही पल ठहरी।

अचानक दरवाज़े पर फिर से दस्तक हुई। इस बार दस्तक में थोड़ी जोर थी, थोड़ी बेसब्री भी।

रूहानी ने झल्लाकर बड़बड़ाया, “अब क्या है, मीना?”

तेज कदमों से दरवाजे की ओर बढ़ते हुए उसने चिटकनी घुमाई और दरवाजा खोल दिया।

लेकिन दरवाजा खोलते ही उसके शरीर का सारा रक्त जैसे एक पल को थम गया और सांस अटक गई।

——

कौन था वह, जो इस बार मीना नहीं थी? 

क्यों उसकी आंखों में अचानक डर की परछाई दौड़ गई? 

क्या वही अनजानी आशंका अब हकीकत बनने जा रही थी?

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