भाग~6 कहानी वहीं रुक गई
कार का दरवाज़ा खोलते ही अद्वैत को अजीब-सी बेचैनी ने घेर लिया। जैसे कोई अनकही बात हवा में तैर रही हो, जैसे कोई याद अब भी घर की दीवारों से चिपकी बैठी हो। उसके मन में एक डर सरसराने लगा—पता नहीं क्यों, लेकिन दिल धड़कने लगा था तेज़… जैसे कुछ होने वाला हो।
वो तेज़ क़दमों से घर के भीतर दाखिल हुआ। अंदर की हल्की रौशनी, खिड़की से छनकर आती धूप और टेबल पर पड़े पानी के गिलास से उठती नमी… सब कुछ सामान्य था। पर उसकी आँखें जिसे ढूंढ रही थीं, वह नज़रों से ओझल थी।
“रूहानी?” उसने धीमे से पुकारा।
कोई जवाब नहीं आया।
उसी क्षण एक धीमी आहट उसके बाएँ तरफ से आई। वो उधर बढ़ा और जैसे ही दरवाज़ा खोला, सामने का दृश्य उसके दिल को सिहराने वाला था।
रूहानी नंगे पाँव फर्श पर बिखरे टूटे काँच पर चल रही थी। उसके कदम डगमगा रहे थे, पर उसकी चाल में एक अजीब-सी जिद थी, जैसे दर्द अब उसके लिए मायने नहीं रखता। अद्वैत का दिल धक् से रह गया। एक पल भी देर करता, तो शायद कोई और हादसा हो जाता।
“रूहानी!” वो चीख़ा और तेज़ी से आगे बढ़ा।
उसने झपटकर उसका हाथ पकड़ा और एक झटके में उसे अपनी तरफ खींच लिया। रूहानी उसकी बाहों में आकर झूल गई। उसका शरीर हल्का था, जैसे जान ही न बची हो और अद्वैत की बाँहों में एक अजीब-सी गर्मी उतर आई।
अद्वैत की आँखों के ठीक सामने रूहानी का चेहरा था। साँवली-सी रंगत, पर उसमें एक सुकून था, जैसे किसी भूले हुए गीत की धुन हो जो बरसों बाद फिर से कानों में पड़ी हो। उसका चेहरा थकान और डर से ढँका हुआ था, पर उस पल में कुछ ऐसा था जो अद्वैत को भीतर तक हिला गया।
उसके दिल के कोनों में, जो अब तक वीरान पड़े थे, कुछ जागने लगा था। लेकिन जैसे ही वो एहसास पनपा, उसकी पलकें झपकीं और उसकी पत्नी का चेहरा तैरता हुआ सामने आ गया—वही मुस्कुराहट, वही ठंडी-सी नज़रे, वही शांत आवाज़ जो अब केवल यादों में बची थी।
उसने सिर हल्के से झटका, जैसे किसी परछाईं को खुद से दूर करना चाहता हो।
“नहीं,” उसने मन ही मन कहा, “ये सब नहीं दोबारा…”
थोड़ी ग्लानि से भरे हुए, उसने रूहानी को थोड़ा सीधा किया और उसकी ओर देखा। अब भी उसकी आँखें बंद थीं, वो डर में सिमटी हुई थी।
उसकी मासूम प्रतिक्रिया पर अद्वैत के होंठों पर हल्की सी मुस्कान तैर गई। मगर अगले ही पल उसने उसे छुपा लिया। जैसे खुद से ही शर्मिंदगी हो रही हो कि इस क्षण में भी वो मुस्कुरा कैसे गया।
वो उसे दोनों बाहों में उठा लिया। उसके वजन में हल्कापन था, लेकिन उसकी थकान गहरी थी।
धीरे से सोफे पर बिठाकर वो थोड़ी देर उसे देखता रहा। फिर बिना कुछ बोले पलटा और पास ही रखे ड्रॉअर के पास गया। वहाँ से फर्स्ट ऐड बॉक्स निकाला और वापस लौटकर उसके सामने फर्श पर बैठ गया।
“मुझे ये सब करने की क्या ही ज़रूरत ….” वो बुदबुदाया, जैसे खुद को भी नहीं पता था कि उसे ये सब क्यों करना पड़ रहा है।
उसने चुपचाप धीरे से उसका पैर उठाया और सोफे के पास वाले टेबल पर रख दिया। उसके तलवे में कांच के कई छोटे-छोटे टुकड़े चुभे हुए थे, जिनसे हल्का खून रिस रहा था।
रूहानी के तलवों से जब उसने पहला टुकड़ा निकाला, तो वो हल्का हिली, जैसे दर्द को अब भी महसूस कर सकती हो।
अद्वैत के छूने से वो असहज हो उठी। पैर पीछे खींचने लगी। शायद दर्द बढ़ गया था।
“थोड़ा और…” अद्वैत बुदबुदाया, “बस एक टुकड़ा और है…”
अद्वैत अगला टुकड़ा निकालने ही वाला था कि रूहानी तड़पकर चीख़ पड़ी।
“आह!” उसकी चीख कमरे की हवा में गूंज गई।
उसकी हालत देखकर अद्वैत की साँस तेज़ हुई। “शिट… थोड़ा आराम से निकालता हूँ।” उसने धीरे से कहा, जैसे उसकी लाचारी खुद पर भारी पड़ रही हो।
तभी, रूहानी ने पहली बार कुछ कहा। उसकी आवाज़ टूटी हुई थी, मगर ठोस थी, जैसे अपने घावों की रक्षा कर रही हो।
“नहीं… नहीं… प्लीज़… तुम मेरे पाँव मत छुओ।”
उसकी आवाज़ में कुछ था। घृणा नहीं… दर्द था, एक डर था… आत्म-संकोच भी शायद।
अद्वैत एक पल के लिए थमा, उसकी आँखें ऊपर उठीं और रूहानी के चेहरे पर टिक गईं।
हाँ, अद्वैत ने उसकी बात सुनी, पर अनसुनी कर दी। उसकी उँगलियाँ अब भी उसके पैर के आसपास थीं। शायद अद्वैत किसी और ही सोच में था, या शायद… खुद से लड़ रहा था।
उसने गहरी साँस ली, और पहली बार रूखे लहज़े में बोला, “मरने का इतना ही शौक है तो हिम्मत करके एक बार में ही मर जाओ, ऐसे ट्राई क्यों करती हो जिसमें जान पूरी तरह से जाने का चांस इतना कम रहता है?”
उसके लहजे में तल्ख़ी थी। शायद वह खुद पर गुस्सा था, शायद अपनी लाचारी पर, जिसे अद्वैत खुद समझ नहीं पा रहा था। पर जैसे ही उसने ये कहा, उसकी आत्मा को यह एहसास हुआ कि ये बात बहुत कठोर थी।
रूहानी का चेहरा सन्न हो गया। अद्वैत ने उसे देखा, कैसे उसकी आँखें एकाएक धुंधला गईं। रूहानी के चेहरे पर ऐसे भाव थे जैसे कोई उसे अब तक समझने की कोशिश नहीं कर पा रहा था ….. शायद वह अद्वैत भी नहीं।
रूहानी को अपने कानों पर अब भी यकीन नहीं हो पा रहा थी। उसे सुबह में कही मीना की बात याद आ गई। उसने उसके बारे में कितना कुछ कहा था – संवेदनशील, शांत, अपने दुखों में डूबा, मगर किसी और का दर्द समझने वाला।
लेकिन उसके सामने जो खड़ा था, वह तो जैसे अपने ही डर में कैद कोई और आदमी था। वो खड़ूस था, बेरुख़, और कहीं न कहीं खुद में उलझा हुआ।
वो सन्न सी बैठी रही, उसकी आँखें अद्वैत के चेहरे पर जमी थीं, जैसे समझने की कोशिश कर रही हो कि कौन है ये आदमी जो उसके जले पर नमक छिड़क रहा है।
अद्वैत ने उसे खोया हुआ देखा तो झल्लाकर उसकी आँखों के सामने चुटकी बजाई, “कुछ कहोगी भी कि नहीं? घर नहीं जाना है क्या तुम्हें? सब राह देख रहे होंगे तुम्हारी।”
उसका सवाल सीधा नहीं था, बल्कि एक तीर था—जख्म को कुरेद देने वाला।
रूहानी जैसे अचानक सूख गई हो। उसका चेहरा पीला पड़ा, जैसे किसी पुराने ज़ख्म को फिर से खोल दिया गया हो।
‘घर’
ये शब्द उसके भीतर एक तूफान बनकर उठा। उसकी आँखों में तिर आया हर मंज़र—वो गालियाँ, वो झगड़े, वो ज़हर जो उसके अपने लफ्ज़ों में घोलते थे।
कुछ देर की खामोशी के बाद उसने धीमे से कहा, “क्या मैं यहाँ कुछ दिनों के लिए रह सकती हूँ? मेरे घाव ठीक होने तक… तुम कहो तो मैं किराया भी दे दूंगी।”
अद्वैत ने चौंककर उसे देखा। उसकी आँखों में कोई चाल नहीं थी, बस एक अजीब-सी बेचैनी थी।
“मतलब तुम्हारा इस दुनिया में कोई नहीं?” उसने थोड़ा अचंभित होते हुए पूछा।
रूहानी ने एक थका हुआ सा मुस्कान दी, “कुछ ऐसा ही समझ लो।”
अद्वैत ने गहरी सांस ली, जैसे कोई पुरानी याद सीने में चुभ गई हो।
“तो अब तक कहाँ रहती थी?” उसने पूछा।
रूहानी का चेहरा बुझ गया। वो जवाब देना चाहती थी, पर बस “अ… उ…” करती रह गई।
अद्वैत ने आँखें संकरी कीं और फिर अचानक जैसे उसे कोई शंका हुई, “नहीं… नहीं… कहीं तुम चोर निकली तो…?”
रूहानी का चेहरा लाल पड़ गया। एक तीखी गर्माहट उसके गालों तक चढ़ आई।
“क्या मैं तुम्हें शक्ल से चोर नज़र आती हूँ?” वो झल्लाकर बोली।
अद्वैत ने कुछ कहने के लिए मुँह खोला ही था कि तभी सोफे के पास पड़ा रूहानी का मोबाइल बजने लगा। दोनों की निगाहें अचानक उधर मुड़ीं। मोबाइल की स्क्रीन पर उभरे नाम को देखकर दोनों कुछ पल के लिए स्थिर हो गए।
एक लंबा सन्नाटा कमरे में पसर गया।
अद्वैत ने रूहानी की तरफ देखा। उसकी आँखों में फिर वही डर लौट आया था। मगर इस बार उसके साथ कोई और भी था—राज़… गहरे राज़ जो उसकी साँसों में छुपे थे।
नाम अब भी स्क्रीन पर चमक रहा था, लेकिन दोनों में से किसी ने भी उसे उठाने की हिम्मत नहीं की।
उस एक नाम ने जैसे उनकी पूरी बातचीत को अधर में रोक दिया था।
अद्वैत ने कुछ कहने के लिए मुँह खोला… पर इस बार शब्द नहीं निकले।
और रूहानी बस अपने मोबाइल को देखती रही… जैसे कोई पुराना साया फिर से लौट आया हो…
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कौन था वो, जिसकी कॉल ने रूहानी की साँसें थमा दीं?
क्या उस नाम के पीछे छिपा है कोई ऐसा सच जिसे रूहानी ने अब तक दुनिया से छुपाकर रखा है?
अगर अद्वैत ने वो नाम पुकार लिया… तो क्या टूट जाएगी वो खामोश दीवार, जो अब तक उनके बीच खड़ी थी?

लिखकर रूह छूने की कोशिश…..
🥹🥹


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