🔐 लॉग-इन या रजिस्टर करें  

अधूरी इबादत भाग~3

पढ़ने का समय : 7 मिनट

भाग~3 रूहानी की उलझन

मीना की बात सुनकर रूहानी की जिज्ञासा और भी बढ़ गई। वह उत्सुकता से पूछ बैठी, “वैसे तुम्हारे सर का क्या नाम है?”

मीना, जो अब अपने काम में व्यस्त हो चुकी थी, मुस्कुराते हुए जवाब दिया, “अद्वैत अवस्थी।”  

रूहानी ने अगला सवाल किया, “क्या करते हैं वे?”

मीना के चेहरे पर सम्मान झलक उठा। उसने झाड़ू लगाना छोड़कर सीधा होकर गर्व से कहा, “अरे, हमारे सर बहुत बड़े लेखक हैं! बहुत नाम कमाया है उन्होंने!”

लेकिन रूहानी के लिए यह सब नया था। उसने कभी किताबों में दिलचस्पी नहीं ली थी, पढ़ने का शौक उसमें कभी जागा ही नहीं था, न ही किसी लेखक के बारे में ज्यादा सुना था। जब स्कूल में थी, तब भी सिर्फ़ उतना ही पढ़ती थी, जितना ज़रूरी था। साहित्य, कविताएँ, उपन्यास – इन सबसे उसका कभी कोई जुड़ाव नहीं रहा।

लेकिन इस समय, मीना की बातों से ज़्यादा, उसे अद्वैत अवस्थी को लेकर खुद में बढ़ती जिज्ञासा महसूस हो रही थी।

कैसा होगा वो इंसान जो इतनी कहानियाँ लिखता है? 

क्या वो अपनी कहानियों में खुद को छुपा लेता होगा या फिर उनमें अपनी कोई सच्चाई बयां करता होगा?

मीना ने हैरानी से पूछा, “लेकिन आप मुझसे सर के बारे में इतना क्यों पूछ रही हो? कल उनसे बात नहीं कर पाई थी क्या?”  

रूहानी ने गहरी साँस ली। उसकी उंगलियाँ मेज़ के किनारे को हल्के-हल्के सहला रही थीं, “नहीं… कल मैं बेहोश हो गई थी और जब सुबह होश आया, तो तुम्हारे सर यहाँ नहीं थे।”

मीना को यह सुनकर हल्की हैरानी हुई, लेकिन बातचीत का सिलसिला उसे अच्छा लग रहा था। उसने रुचि लेते हुए कहा, “सर तो अपने काम के चलते ज़्यादातर बाहर ही रहते हैं। कभी कोई नई किताब प्रकाशित करनी होती है, तो कभी किसी बड़े लेखक से मिलने जाना पड़ता है। मगर जब भी यहाँ होते हैं, तो बस अपने कमरे में ही बंद रहते हैं, लिखने में डूबे रहते हैं।”

रूहानी खिड़की के बाहर देखने लगी। 

एक प्रसिद्ध लेखक… और यहाँ इस सूने घर में एक अजीब से अकेलेपन में रहता है। ये घर उसे अपनी ओर खींच रहा था, जैसे यहाँ की हर दीवार में कोई अनकही दास्तान क़ैद थी।

मीना अब अपनी सफाई का काम लगभग पूरा कर चुकी थी। उसने टेबल पर कपड़ा मारा और एक हल्की मुस्कान के साथ बोली, “मैं तो तब से यहाँ हूँ, जब सर शादी करके आए थे। शादी के एक साल बाद ही मैडम दुनिया छोड़कर चली गईं।”

रूहानी को यह सुनकर अजीब-सा महसूस हुआ। उसने अद्वैत अवस्थी के चेहरे को याद करने की कोशिश की— वो खाली, गहरी आँखें, जिसमें दर्द की परतें बिछी हुई थीं। 

क्या उस दर्द की वजह उसकी पत्नी की मौत थी? 

या कोई और ज़ख्म भी था, जो उसने किसी से साझा नहीं किया?

मीना की आवाज़ में हल्की उदासी आ गई, मगर जब उसने कहा, “मैडम ने ही मुझे यहाँ काम करने के लिए चुना था,” तो उसके चेहरे पर गर्व की चमक आ गई। शायद वो खुद को इस घर का एक हिस्सा मानने लगी थी, जैसे उसकी पहचान अद्वैत अवस्थी और उनकी पत्नी से जुड़ी हो।

रूहानी भी उसकी बातों में थोड़ी देर के लिए खो गई। एक लेखक, जो अपनी पत्नी को शादी के साल भर बाद ही खो चुका था। उस दर्द का अंदाजा भी नहीं लगाया जा सकता था।

किसी की ज़िंदगी में इतना बड़ा बदलाव सिर्फ़ साल भर में कैसे आ सकता है? 

कोई इतना अकेला कैसे हो सकता है कि सालों तक किसी से बात न करे? 

या फिर वो भी उन्हीं लोगों में से था, जो सिर्फ़ दिखावे की शादी करते हैं?

विचारों में डूबी रूहानी अचानक चौंकी, जब मीना ने उसके सामने चुटकी बजाई, “कहाँ खो गईं आप?”

रूहानी चौंक गई। उसने अपनी पलकों को झपकाया और हल्का मुस्कुरा दिया, “नहीं, बस ऐसे ही…”

मीना भी मुस्कुराई, “अच्छा, बाकी बातें कल करेंगे। मुझे अभी घर जाना है, नहीं तो मेरे बच्चे मुझे खोजने लगेंगे।”

रूहानी ने अनायास ही पूछ लिया, “तुम्हारी शादी कब हुई?”

मीना ने हड़बड़ी में कपड़े ठीक करते हुए कहा, “अरे, वो सब फिर कभी। अभी तो मुझे जाना होगा, बच्चे राह देख रहे होंगे।”

इतना कहकर वह तेजी से बर्तन समेटने लगी। उसने चाय और नाश्ता रूहानी के सामने रखते हुए कहा, “ये खा लीजिएगा, मैडम। और सर के इंतजार मत कीजिएगा, उनका कोई ठिकाना नहीं। कभी आधी रात को आते हैं, तो कभी अगली सुबह तक।”

रूहानी ने चुपचाप सिर हिला दिया। मीना ने एक अंतिम मुस्कान दी और दरवाज़ा बंद करके चली गई।

अब फिर वही खामोशी।

कमरे की हर चीज़ वैसी ही थी, लेकिन अब ये खामोशी और गहरी हो गई थी। रूहानी ने चाय का कप उठाया, लेकिन पीने का मन नहीं था। वह सोफे पर बैठी रही, अपनी ही उलझनों में घिरी हुई।

उसकी आँखें दीवार पर टंगी घड़ी पर चली गईं।

टिक… टिक… टिक…

समय धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था, मगर इस घर के भीतर सब कुछ रुका हुआ महसूस हो रहा था।

उसका मन कह रहा था कि उसे यहाँ नहीं होना चाहिए था। उसे वापस जाना चाहिए। लेकिन वापस कहाँ?

उसकी ज़िंदगी में पीछे मुड़कर देखने के लिए अब कुछ भी नहीं था। ना कोई घर, ना कोई ऐसा जिसे वह अपना कह सके। 

एक अजनबी ने उसे बचाया और अब वह उसी अजनबी के घर में बैठी थी, उसके बारे में सोचते हुए।

उसे महसूस हो रहा था कि यह जगह उसे खींच रही थी, लेकिन क्यों? वह खुद नहीं समझ पा रही थी।

बाहर से हवा का हल्का झोंका आया और पर्दे धीरे-धीरे हिलने लगे। उस हवा में एक ठंडक थी, जो उसकी रूह तक महसूस हो रही थी।

वह उठी और धीरे-धीरे हॉल में चहलकदमी करने लगी। उसकी नज़र किताबों की शेल्फ़ पर पड़ी।

उसने धीरे से एक किताब उठाई। उस किताब के कवर पर लेखक का नाम लिखा था, लेकिन उसकी आँखें सिर्फ़ उन मोटे अक्षरों को देख रही थीं—”अद्वैत अवस्थी”

 

उसने उंगलियों से नाम को छुआ। उसकी लिखी हुई किताबें…

उसने किताब के पन्ने पलटने शुरू किए। उसकी नज़र एक पंक्ति पर ठहर गई—  

“कुछ जख़्म ऐसे होते हैं, जिन्हें वक़्त नहीं भरता, बस इन्सान उनके साथ जीना सीख जाता है।” 

उसका दिल एक पल के लिए ठहर गया।

यह कैसा संयोग था कि उस इंसान की किताब में उसे खुद का अक्स मिल रहा था, जिसने उसे मौत के करीब से बचाया था?  

पन्ने आगे बढ़ते गए और हर शब्द जैसे किसी भूली हुई वेदना को फिर से उभार रहा था—  

“कभी-कभी हम अपनी तकलीफ़ें किसी से बाँटते नहीं, क्योंकि हमें डर होता है कि कोई समझेगा ही नहीं। लेकिन सच तो यह है कि कुछ दर्द ऐसे होते हैं, जिन्हें सिर्फ़ महसूस किया जा सकता है, बाँटा नहीं जा सकता।”

रूहानी को महसूस हुआ कि उसकी आँखें हल्की-सी नम हो गई थीं।

क्या अद्वैत अवस्थी ने अपनी कहानियों में खुद को छुपा लिया था?  

या फिर वो अपनी किसी सच्चाई को इन शब्दों के पीछे किसी अनकही टीस की तरह छोड़ गया था?  

उसने किताब धीरे से बंद कर दी, फिर धीरे से वापस शेल्फ़ में रख दी लेकिन वो पंक्तियाँ अब भी उसके दिल के भीतर गूंज रही थीं।  

वह खिड़की के पास गई और पर्दा थोड़ा हटाया।

वह सोचने लगी— क्या उसे भी अकेलेपन से डर लगता होगा?

या फिर उसने इस अकेलेपन को ही अपनी ज़िंदगी बना लिया है?

उसके मन में कई सवाल थे, लेकिन जवाब कहीं नहीं थे।

कमरे में घड़ी की टिक-टिक जारी थी।

वह धीरे-धीरे सोफे पर बैठ गई, अपने घुटनों को समेटते हुए।

उसकी आँखों में हल्की नमी थी, लेकिन उसे खुद नहीं पता था कि यह किसलिए थी।

क्या अपने लिए? या उस अजनबी के लिए, जो अब उसके सवालों के घेरे में था?

क्या वह सच में किसी ऐसी कहानी का हिस्सा बनने जा रही थी, जिसके अंत से वह अनजान थी?

—————-

उसने धीरे-धीरे अपनी जगह से उठकर इधर-उधर नजर दौड़ाई। कहीं कुछ तो था जो उसे बेचैन कर रहा था। तभी अचानक उसे अहसास हुआ— उसका मोबाइल!  

वो तेजी से अपना फोन ढूंढने लगी। नोटिफिकेशन लाइट टिमटिमा रही थी… लेकिन ये संदेश किसके थे?  

Comments

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *