भाग~2 सवालों से भरा अजनबी घर
सूरज की हल्की किरणें खिड़की के झीने पर्दों से छनकर कमरे में फैल रही थीं। हल्की हवा में पर्दे हौले-हौले हिल रहे थे, जैसे किसी अदृश्य हाथ ने उन्हें छू लिया हो। धूप की पतली रेखाओं के बीच, हवा में तैरते धूल के महीन कण, किसी भूली-बिसरी याद की तरह दिख रहे थे। रूहानी की पलकें भारी थीं। ऐसा लग रहा था जैसे उसकी आत्मा किसी गहरे कुएं में डूब गई हो।
उसकी सांसें धीमी थीं, जैसे उसका भीतर से सारा जोश कहीं खो गया हो। उसने धीरे-धीरे आँखें खोलीं। पहली चीज़ जो उसकी धुंधली दृष्टि में आई, वो थी छत पर घूमता हुआ पंखा। उसकी ब्लेड धीमी चाल में गोल-गोल घूम रही थीं, जैसे वक़्त खुद भी थम जाना चाहता हो।
रूहानी ने अपना सिर घुमाया, कमरे का जायज़ा लिया। यह कोई होटल का कमरा नहीं था, ना ही अस्पताल का—बल्कि यह एक घर का हॉल था। एक ऐसा घर, जो बड़ा तो नहीं था, लेकिन उसमें एक अजीब-सी शांति पसरी हुई थी। दीवारें हल्के रंग की थीं, लेकिन उन पर हल्की उदासी का साया था। एक तरफ़ लकड़ी की बुकशेल्फ़ थी, जिसमें किताबें करीने से सजी हुई थीं। उन किताबों को देखकर ही अंदाजा लगाया जा सकता था कि यहाँ का मालिक कोई आम इंसान नहीं, बल्कि अपने ही ख्यालों में खोया रहने वाला कोई शख्स होगा।
रूहानी ने माथे पर हाथ फेरा। उसे हल्का दर्द महसूस हो रहा था। और फिर… वो पल दिमाग़ में बिजली की तरह कौंधा।
पुल…
वो ठंडी हवा…
उसका लड़खड़ाते हुए रेलिंग पर चढ़ना…
फिर अचानक कोई उसे खींचता है… एक जोड़ी मजबूत बाहें…
“कौन था वो?”
वो बुदबुदाई।
उसने धीरे से अपना हाथ सोफे से हटाया और पैर नीचे रखे। फर्श पर पैर रखते ही लकड़ी के ठंडेपन का एहसास हुआ। पूरा घर नीरव था, मगर यह खामोशी कानों में अजीब-सा सन्नाटा भर रही थी। एक सन्नाटा, जो कानों में सन्नाटे की तरह गूंज रही थी।
हॉल से दाएँ एक छोटा-सा कॉरिडोर था। रूहानी ने धीरे-धीरे कदम बढ़ाए।
कॉरिडोर संकरा था, मगर साफ़-सुथरा। दीवारों पर पुरानी तस्वीरें टंगी थीं—धुंधली और मोनोक्रोम—जैसे किसी बीते हुए अतीत की परछाइयाँ कैद हों। एक कोने में लकड़ी की एक छोटी-सी मूर्ति रखी थी। वह किसी औरत की आकृति थी—गर्दन झुकी हुई, आँखों में कोई गहरी उदासी। रूहानी ने हाथ बढ़ाकर उसे छुआ और उसकी उंगलियों के नीचे, लकड़ी की सतह पर न जाने क्यों ठंडापन नहीं, बल्कि एक हल्की-सी सिहरन महसूस हुई।
उसने तुरंत हाथ पीछे खींच लिया।
रूहानी आगे बढ़ी। पूरा घर शांत था, मानो दीवारों ने सदियों से कोई आवाज़ नहीं सुनी हो। उसे घर बड़ा नहीं लगा, मगर इसमें एक गहरा खालीपन था, जो उसकी रूह तक महसूस हो रहा था।
वो हॉल में लौट आई। वहाँ एक कोने में डाइनिंग टेबल रखी थी और दूसरी तरफ़ सोफे और सेंटर टेबल। दीवार पर एक बड़ी-सी घड़ी टंगी थी, जिसकी सूइयाँ बिल्कुल धीमे-धीमे खिसक रही थीं। टिक-टिक की आवाज़ पूरे कमरे में गूँज रही थी, जैसे कोई अदृश्य ताकत हर गुजरते पल को दर्ज कर रही हो।
फिर उसकी नज़र ऊपर की तरफ़ गई—सीढ़ियाँ।
वो धीरे-धीरे सीढ़ियाँ चढ़ने लगी।
ऊपर पहुँचते ही उसने देखा कि दो दरवाज़े बंद थे। एक दरवाजे पर हल्की धूल की परत जमी थी, जैसे वहां बहुत समय से कोई गया ही न हो। उसे एक अजीब-सी अनुभूति हुई। वो दरवाज़े कुछ छुपा रहे थे।
वह नीचे आकर हॉल के सोफे पर धीरे से बैठ गई, उसकी उंगलियां आपस में उलझ रही थीं।
घर में कोई नहीं था। न जाने क्यों उसे ऐसा लग रहा था कि वह किसी अजनबी जगह पर नहीं, बल्कि कहीं बहुत गहरे दर्द के बीच बैठी थी।
तभी दरवाज़े पर खटखटाहट हुई।
रूहानी का दिल धक् से रह गया। उसके अंदर डर जागने लगा। इस अजनबी के घर पर पता नहीं कौन आ जाए।
दरवाज़ा खुला और एक साधारण सी औरत अंदर आई—हाथ में थैला पकड़े, चेहरे पर थोड़ी थकान। मगर जैसे ही उसकी नज़र रूहानी पर पड़ी, वो एकदम से चौंक गई।
“अरे…!”
“आप कौन हैं?” वह जोर से चीखी।
रूहानी भी घबरा गई, मगर खुद को संभालते हुए बोली, “वो… मैं…” उसकी आवाज़ लड़खड़ा गई।
“आप यहाँ आईं कैसे?” औरत अभी भी सहमी हुई थी।
“मैं…” रूहानी को समझ नहीं आया कि क्या कहे। “वो… कल… एक्सीडेंट…”
“एक्सीडेंट?” औरत के चेहरे पर संदेह उभर आया।
“हाँ… वो इंसान… जिन्होंने मुझे बचाया था ….”
औरत ने कुछ पल उसे ध्यान से देखा, फिर सहज होकर बोली, “ओह… अच्छा… सर ने आपको बचाया है?”
रूहानी ने सिर हिलाया।
“तुम कौन हो?” रूहानी ने पूछा।
“मैं यहाँ की मेड हूँ। दो साल से काम कर रही हूँ। सफाई, खाना बनाना… बस यही।”
“तुम्हारा नाम क्या है?”
“मीना,” औरत ने हल्की मुस्कान के साथ कहा।
“और… वो तुम्हारे सर… वो कहाँ हैं?”
“सर तो सुबह-सुबह निकल गए होंगे। वैसे आपका नाम क्या है?”
रूहानी चुप हो गई।
फिर धीरे से कहा, “रूहानी।”
मीना ने थोड़ी देर तक उसे घूरा। फिर अचानक बोली,
“बुरा मत मानिएगा, मैडम… मगर मैंने यहाँ पिछले एक साल में किसी औरत को आते नहीं देखा। खासकर सर की पत्नी के जाने के बाद तो बिल्कुल नहीं…”
रूहानी के भीतर भूचाल आ गया।
“उनकी पत्नी?”
“हाँ… सर की पत्नी का तो पिछले साल ही देहांत हो गया था। बहुत ही अच्छी और शांत स्वभाव की थीं। उनके जाने के बाद से सर बिल्कुल बदल गए हैं… ना किसी से बात करते हैं, ना किसी को घर पर बुलाते हैं…”
रूहानी की आँखें धीरे-धीरे चौड़ी हो गईं।
“मर… गईं?” उसके होठों पर बस यही शब्द फिसले।
मीना ने हल्की सहानुभूति जताते हुए सिर हिलाया, “बहुत मुश्किल वक़्त था उनके लिए।”
रूहानी का मन डगमगाने लगा।
उस आदमी की आँखों का खालीपन…
उसकी उदासी…
और अब ये सुनना कि उसकी पत्नी इस दुनिया में नहीं रही…
सब कुछ किसी उलझे हुए रहस्य की तरह लगने लगा।
रूहानी की साँसें तेज़ हो रही थीं। उसे ऐसा लग रहा था जैसे वह किसी ऐसी कहानी का हिस्सा बन गई है, जिसमें न चाहते हुए भी उसे शामिल होना पड़ रहा है।
“मैडम… आप ठीक हैं?” मीना की आवाज़ ने उसे चौंका दिया।
“हाँ… हाँ, मैं ठीक हूँ…” रूहानी ने खुद को संभालते हुए कहा।
मगर उसकी आँखों में सवालों का सैलाब उमड़ रहा था —
वो कौन था?
उसकी आँखों में वो खालीपन क्यों था?
क्या ये घर सिर्फ़ ईंट और पत्थरों का बना था, या इसमें कोई अनकहा दर्द दफ़न था?
उसके दिल में इस अजनबी शख्स को लेकर एक अजीब-सा खिंचाव महसूस हो रहा था — ऐसा खिंचाव जो डर के साथ-साथ किसी अनकही कहानी को जानने की बेचैनी से भरा हुआ था।
उसका मन कह रहा था—यह कहानी सिर्फ़ उसकी नहीं थी। वह किसी और की जिंदगी के ऐसे पन्ने में दाखिल हो गई थी, जहां से वापस लौटना अब शायद उसके बस में नहीं था।
——–
दरवाज़े के पीछे आखिर क्या था, जिसे वक़्त की धूल ने ढक रखा था?
उस आदमी की आँखों का खालीपन… क्या वो सिर्फ़ ग़म था, या किसी छुपे हुए राज़ की परछाई?
इस घर की खामोशी में कोई अनसुनी दास्तान थी, मगर क्या रूहानी उसे सुनने के लिए तैयार थी?

लिखकर रूह छूने की कोशिश…..
🥹🥹

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